US-Canada Trade War में ‘छोटे कुत्ते’ वाली एंट्री! स्कॉट बेसेंट का मार्क कार्नी पर तंज, 50% टैरिफ से बढ़ा तनाव
US-Canada Trade War: अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनाव अब सिर्फ टैरिफ और व्यापार समझौते की शर्तों तक सीमित नहीं रह गया है। दोनों देशों के नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच तीखी बयानबाजी ने विवाद को और सुर्खियों में ला दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कनाडा को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसकी चर्चा अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है।
बेसेंट ने अमेरिका और कनाडा के बीच चल रहे व्यापारिक गतिरोध की तुलना एक बड़े जर्मन शेफर्ड और उस पर लगातार भौंकने वाले छोटे कुत्ते की स्थिति से कर दी। उनका इशारा साफ तौर पर कनाडा की ओर था।
अमेरिकी वित्त मंत्री ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी पर एक बेहतर व्यापार समझौते को ठुकराने का आरोप भी लगाया। दूसरी ओर कनाडाई पक्ष का कहना है कि बातचीत के अंतिम चरण में अमेरिका ने समझौते की शर्तों में बदलाव कर दिया था।
यानी एक तरफ टैरिफ का दबाव है, दूसरी तरफ नेताओं की तीखी बयानबाजी। ऐसे में अमेरिका और कनाडा के बीच दशकों पुराने कारोबारी रिश्ते एक बार फिर बड़े तनाव के दौर से गुजरते दिखाई दे रहे हैं।
स्कॉट बेसेंट ने कनाडा को क्यों बताया ‘छोटा कुत्ता’?
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एक इंटरव्यू में अपने पुराने अनुभव का उदाहरण देते हुए कनाडा के साथ मौजूदा व्यापारिक तनाव को समझाने की कोशिश की।
उन्होंने बताया कि उनके पास कभी एक जर्मन शेफर्ड कुत्ता था। पार्क में एक छोटा कुत्ता लगातार उनके जर्मन शेफर्ड पर भौंकता रहता था। बड़े कुत्ते ने काफी समय तक छोटे कुत्ते को नजरअंदाज किया।
लेकिन एक दिन बड़े कुत्ते का भी धैर्य खत्म हो गया।
बेसेंट ने इसी उदाहरण को अमेरिका और कनाडा के बीच मौजूदा स्थिति से जोड़ दिया। उनके बयान का आशय यह था कि कनाडा लगातार अमेरिका पर दबाव बनाने या विरोध जताने की कोशिश कर रहा है, जबकि अमेरिका लंबे समय से इसे नजरअंदाज करता रहा है।
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत टूट चुकी है और टैरिफ को लेकर टकराव बढ़ गया है।
मार्क कार्नी पर भी बेसेंट का सीधा हमला
स्कॉट बेसेंट ने कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी पर भी निशाना साधा।
उन्होंने आरोप लगाया कि कार्नी ने एक बेहतर व्यापार समझौते को स्वीकार नहीं किया। अमेरिकी पक्ष के अनुसार, बातचीत के दौरान कनाडा के सामने ऐसा प्रस्ताव रखा गया था जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को स्थिर किया जा सकता था।
लेकिन कनाडा इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुआ।
दूसरी ओर कार्नी का पक्ष बिल्कुल अलग है। कनाडाई प्रधानमंत्री का कहना है कि बातचीत के आखिरी चरण में अमेरिका ने समझौते की शर्तों में बदलाव कर दिया था। इस वजह से डील को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका।
इस तरह दोनों देशों के बीच विवाद की जड़ सिर्फ टैरिफ नहीं, बल्कि यह सवाल भी है कि आखिर बातचीत टूटने की जिम्मेदारी किसकी थी।
तीन दिन की ट्रेड बातचीत भी नहीं निकाल सकी रास्ता
अमेरिका और कनाडा के बीच 19 से 21 अगस्त तक तीन दिन तक व्यापारिक बातचीत हुई थी।
उम्मीद थी कि दोनों देश टैरिफ और व्यापार से जुड़े मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझा लेंगे। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक कई मुद्दों पर प्रगति भी हुई थी।
लेकिन कुछ अहम विषयों पर दोनों पक्ष एक-दूसरे की शर्तों को स्वीकार नहीं कर सके।
नतीजा यह हुआ कि बातचीत किसी व्यापक व्यापार समझौते तक नहीं पहुंच सकी।
इसके बाद दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव और बढ़ गया।
50% टैरिफ ने विवाद को और गहरा किया
व्यापार समझौता न होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा से आने वाले कुछ सामान पर 50% टैरिफ लागू कर दिया।
बताया गया कि यह टैरिफ करीब 20 अरब डॉलर के कनाडाई सामान पर लागू किया गया, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये के बराबर बैठता है।
यह कनाडा से अमेरिका भेजे जाने वाले कुल सामान का करीब 5% बताया गया है।
हालांकि आंकड़ा कुल द्विपक्षीय व्यापार की तुलना में सीमित हिस्सा हो सकता है, लेकिन 50% जैसी ऊंची टैरिफ दर ने दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों में चिंता बढ़ा दी है।
कनाडा ने इस कदम को सामान्य व्यापारिक फैसला नहीं माना और इसे अपने ऊपर दबाव डालने की कार्रवाई बताया।
मार्क कार्नी बोले- ‘हम जंग में हैं’
अमेरिकी टैरिफ के बाद कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बेहद कड़ा रुख अपनाया।
उन्होंने अमेरिका के साथ बढ़ते व्यापारिक विवाद की तुलना जंग से करते हुए कहा कि कनाडा पर हमला हुआ है और वह इस स्थिति में अपने हितों की रक्षा करेगा।
कार्नी की इस टिप्पणी से साफ हो गया कि कनाडा फिलहाल अमेरिकी दबाव के सामने आसानी से झुकने के मूड में नहीं है।
दोनों देशों के बीच बयानबाजी का स्तर बढ़ने के साथ व्यापारिक विवाद अब राजनीतिक मुद्दा भी बनता जा रहा है।
कनाडा ने भी दिया ‘डॉलर-फॉर-डॉलर’ जवाब
अमेरिका की ओर से टैरिफ लगाए जाने के बाद कनाडा ने भी जवाबी कार्रवाई का ऐलान किया।
मार्क कार्नी ने कहा कि कनाडा अमेरिकी टैरिफ का डॉलर-फॉर-डॉलर जवाब देगा।
इसका मतलब साफ है कि यदि अमेरिकी कदम कनाडाई उत्पादों को नुकसान पहुंचाता है, तो कनाडा भी अमेरिकी सामान पर बराबर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश करेगा।
ऐसी स्थिति में व्यापार युद्ध लंबा खिंचने की आशंका बढ़ जाती है।
क्योंकि टैरिफ सिर्फ सरकारों को प्रभावित नहीं करते। उनका असर आयातकों, निर्यातकों, कंपनियों, सप्लाई चेन और अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
अमेरिका का दावा- कनाडा की नीतियां अमेरिकी कंपनियों के लिए नुकसानदेह
अमेरिका का कहना है कि कनाडा की कुछ व्यापारिक नीतियां अमेरिकी कंपनियों के हितों के खिलाफ हैं।
दोनों देशों के बीच लंबे समय से कई क्षेत्रों में व्यापारिक मतभेद रहे हैं। इनमें ऑटोमोबाइल, डेयरी उत्पाद, शराब और लकड़ी का कारोबार विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि कुछ कनाडाई नीतियों से अमेरिकी कंपनियों को समान अवसर नहीं मिलता।
कनाडा हालांकि अपने घरेलू बाजार और उद्योगों की सुरक्षा को अपनी व्यापार नीति का वैध हिस्सा मानता है।
यही अंतर दोनों देशों के बीच बातचीत को मुश्किल बना रहा है।
विवाद की पहली बड़ी वजह- अमेरिकी कारों को लेकर शिकायत
अमेरिका ने कनाडा पर अमेरिकी कारों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया है।
ऑटोमोबाइल सेक्टर दोनों देशों के बीच बेहद महत्वपूर्ण व्यापारिक क्षेत्र है। अमेरिका और कनाडा की अर्थव्यवस्थाएं लंबे समय से ऑटो सप्लाई चेन के जरिए एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
ऐसे में इस क्षेत्र में लगाए जाने वाले अतिरिक्त शुल्क का असर केवल एक देश की कंपनियों तक सीमित नहीं रह सकता।
वाहन निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पार्ट्स कई बार सीमा पार करके उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं। इसलिए टैरिफ बढ़ने पर कंपनियों की लागत और सप्लाई चेन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
डेयरी मार्केट पर कनाडा का संरक्षण भी विवाद की वजह
अमेरिका और कनाडा के बीच डेयरी उत्पादों को लेकर भी लंबे समय से मतभेद हैं।
कनाडा अपने डेयरी बाजार को घरेलू उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए कई तरह की नीतियों से संरक्षित करता है।
अमेरिका इसे अपने डेयरी उत्पादकों के लिए बाजार तक पहुंच की बाधा के रूप में देखता है।
यही मुद्दा दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत में बार-बार सामने आता रहा है।
अमेरिकी शराब की बिक्री को लेकर भी मतभेद
शराब का कारोबार भी अमेरिका-कनाडा विवाद के प्रमुख मुद्दों में शामिल है।
अमेरिकी पक्ष का आरोप है कि कनाडा में कुछ अमेरिकी शराब उत्पादों की बिक्री को लेकर प्रतिबंध या बाधाएं हैं।
कनाडा की ओर से घरेलू नियमों और बाजार नीतियों का हवाला दिया जाता है।
इन छोटे दिखने वाले व्यापारिक मुद्दों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि जब दोनों देशों के बीच व्यापक समझौता नहीं हो पाता, तो यही विषय टैरिफ और जवाबी टैरिफ का आधार बन सकते हैं।
टैरिफ लागू करने से पहले ट्रंप ने क्यों बढ़ाई थी समयसीमा?
अमेरिका ने पहले नए टैरिफ लागू करने के लिए 20 अगस्त की समयसीमा तय की थी।
लेकिन निर्धारित तारीख के करीब पहुंचते-पहुंचते दोनों देशों ने बातचीत का रास्ता अपनाने का फैसला किया।
इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ लागू करने की समयसीमा तीन दिन आगे बढ़ा दी।
उद्देश्य यही था कि बातचीत के जरिए किसी समझौते तक पहुंचने की संभावना बनी रहे।
कुछ मुद्दों पर प्रगति के बावजूद महत्वपूर्ण विवादों का समाधान नहीं हो सका और अंततः टैरिफ लागू कर दिए गए।
अमेरिका-कनाडा रिश्तों में यह सिर्फ टैरिफ का विवाद नहीं
US-Canada Trade War को समझने के लिए केवल 50% टैरिफ पर नजर डालना पर्याप्त नहीं है।
दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय में राजनीतिक बयानबाजी भी काफी बढ़ी है।
डोनाल्ड ट्रंप कई बार कनाडा को लेकर ऐसे बयान दे चुके हैं जिनसे कनाडा में नाराजगी पैदा हुई।
कनाडाई नेताओं ने भी अमेरिकी दबाव का जवाब देते हुए अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों की रक्षा की बात कही है।
यानी आर्थिक विवाद अब राजनीतिक और राष्ट्रीय पहचान से जुड़े सवालों को भी छूने लगा है।
ट्रंप का ‘51वां राज्य’ वाला बयान भी विवाद की वजह
डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाए जाने की बात कह चुके हैं।
ट्रंप का तर्क रहा है कि अमेरिका कनाडा के साथ व्यापार में बड़ा आर्थिक संबंध रखता है और दोनों देशों के बीच मौजूद असमानताओं को खत्म करने के लिए कनाडा का अमेरिका में शामिल होना एक विकल्प हो सकता है।
कनाडा ने इस विचार को स्वीकार नहीं किया।
कनाडाई राजनीति में इसे देश की संप्रभुता के खिलाफ टिप्पणी के तौर पर देखा गया।
इसलिए जब भी ट्रंप कनाडा को लेकर इस तरह की टिप्पणी करते हैं, दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव और चर्चा में आ जाता है।
जस्टिन ट्रूडो को ‘गवर्नर’ कहने पर भी हुआ था विवाद
अमेरिका-कनाडा तनाव के दौरान ट्रंप ने कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को कई बार ‘गवर्नर’ कहकर संबोधित किया था।
यह संबोधन कनाडा में महज राजनीतिक तंज के रूप में नहीं देखा गया।
कनाडाई नेताओं और जनता के एक वर्ग ने इसे देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता के प्रति अपमानजनक संकेत माना।
ट्रूडो के बाद मार्क कार्नी के नेतृत्व में भी अमेरिका-कनाडा संबंधों में कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।
सीमा सुरक्षा और फेंटानिल भी बड़ा मुद्दा
व्यापार विवाद के अलावा अमेरिका और कनाडा के बीच सीमा सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं हैं।
अमेरिकी प्रशासन कनाडा की सीमा से अवैध प्रवास और खतरनाक नशीली दवाओं, खासकर फेंटानिल, की तस्करी को लेकर चिंता जताता रहा है।
अमेरिका ने कनाडा से सीमा निगरानी मजबूत करने और अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की मांग की है।
कनाडा की ओर से भी सीमा सुरक्षा को लेकर कार्रवाई की बात कही गई है।
लेकिन इन मुद्दों पर राजनीतिक बयानबाजी के कारण मामला केवल सुरक्षा नीति तक सीमित नहीं रहता और दोनों देशों के बीच व्यापक संबंधों पर असर डालता है।
क्या अमेरिका पर कनाडाई टैरिफ का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा?
स्कॉट बेसेंट ने यह भी दावा किया है कि कनाडा की ओर से लगाए जाने वाले टैरिफ का अमेरिकी कीमतों पर प्रभाव बहुत मामूली होगा।
अमेरिकी प्रशासन का संकेत है कि कनाडा के साथ व्यापारिक तनाव के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था इस दबाव को संभाल सकती है।
हालांकि व्यापार विशेषज्ञों के नजरिए से किसी भी बड़े व्यापारिक साझेदार के साथ टैरिफ बढ़ने पर वास्तविक असर क्षेत्र और उत्पाद के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
किसी उत्पाद का अतिरिक्त शुल्क कंपनी वहन करती है, आयातक वहन करता है या अंततः उपभोक्ता तक कीमत बढ़कर पहुंचती है—यह पूरी सप्लाई चेन पर निर्भर करता है।
अमेरिका और कनाडा एक-दूसरे के बड़े व्यापारिक साझेदार
अमेरिका और कनाडा के आर्थिक रिश्ते बेहद गहरे हैं।
दोनों देशों के बीच हर साल बड़े पैमाने पर वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार होता है। कई उद्योगों में दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
ऑटोमोबाइल सेक्टर इसका बड़ा उदाहरण है। एक देश में बनने वाला पार्ट दूसरे देश में पहुंचकर वाहन निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है।
इसी तरह ऊर्जा, कृषि, डेयरी, लकड़ी, विनिर्माण और अन्य क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच लंबे समय से व्यापारिक संबंध हैं।
इसलिए टैरिफ युद्ध का असर केवल सरकारों के बीच कागजी आंकड़ों तक सीमित रहने की संभावना नहीं होती।
कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?
टैरिफ बढ़ने पर आयातित सामान की लागत बढ़ सकती है।
यदि कोई कंपनी विदेश से कच्चा माल या तैयार उत्पाद खरीदती है और उस पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है, तो कंपनी के पास आम तौर पर कुछ विकल्प होते हैं—लागत खुद उठाना, सप्लायर से कीमत कम करवाना या अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालना।
लंबे समय तक व्यापारिक तनाव रहने पर कंपनियां वैकल्पिक सप्लायर और नए बाजार तलाश सकती हैं।
लेकिन सप्लाई चेन बदलना भी महंगा और समय लेने वाला काम होता है।
यही वजह है कि अमेरिका-कनाडा जैसे गहरे कारोबारी रिश्ते वाले देशों में लंबे समय तक चलने वाला टैरिफ विवाद उद्योगों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
कनाडा के लिए भी चुनौती आसान नहीं
अमेरिका कनाडा का बेहद महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है।
ऐसे में अमेरिकी बाजार तक पहुंच में बाधा पैदा होना कनाडाई कंपनियों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
कनाडा की जवाबी कार्रवाई राजनीतिक रूप से मजबूत संदेश दे सकती है, लेकिन आर्थिक रूप से इसका असर कनाडाई आयातकों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि दोनों देशों के लिए टैरिफ बढ़ाने के साथ-साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना भी महत्वपूर्ण माना जाएगा।
बेसेंट और कार्नी की बयानबाजी क्यों महत्वपूर्ण है?
स्कॉट बेसेंट और मार्क कार्नी के बीच लगातार हो रही बयानबाजी इस बात का संकेत देती है कि व्यापार विवाद अब उच्च राजनीतिक स्तर तक पहुंच चुका है।
बेसेंट जहां कनाडा को अमेरिका की आर्थिक ताकत के सामने दबाव में आने वाला पक्ष दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं कार्नी कनाडा की संप्रभुता और आर्थिक हितों की रक्षा करने की राजनीतिक लाइन पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।
ऐसी बयानबाजी घरेलू राजनीति में दोनों नेताओं के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक चलने पर बातचीत के माहौल को मुश्किल बना सकती है।
अब आगे क्या हो सकता है?
दोनों देशों के सामने सबसे व्यावहारिक रास्ता फिर से बातचीत की मेज पर लौटना है।
टैरिफ के जरिए दबाव बनाया जा सकता है, लेकिन अमेरिका और कनाडा की अर्थव्यवस्थाओं के बीच गहरी निर्भरता को देखते हुए स्थायी समाधान केवल व्यापारिक बातचीत से ही निकल सकता है।
ऑटोमोबाइल, डेयरी, शराब, लकड़ी और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अलग-अलग समझौते या व्यापक पैकेज तैयार करने की कोशिश हो सकती है।
हालांकि इसके लिए दोनों पक्षों को सार्वजनिक बयानबाजी से आगे बढ़कर वास्तविक समझौते की गुंजाइश तलाशनी होगी।
‘छोटे कुत्ते’ वाली टिप्पणी ने बढ़ा दी राजनीतिक गर्मी
स्कॉट बेसेंट की जर्मन शेफर्ड और छोटे कुत्ते वाली तुलना ने निश्चित तौर पर अमेरिका-कनाडा व्यापार विवाद को एक अलग रंग दे दिया है।
यह बयान केवल एक राजनीतिक तंज नहीं है, बल्कि उस समय आया है जब दोनों देश टैरिफ, बाजार पहुंच और व्यापार समझौते को लेकर आमने-सामने हैं।
कनाडा अपनी तरफ से अमेरिकी टैरिफ का जवाब देने की बात कर चुका है, जबकि अमेरिका अपने कदम को व्यापारिक हितों की रक्षा से जोड़ रहा है।
अब देखना यह होगा कि दोनों देशों के बीच यह टकराव लंबे समय तक चलता है या फिर बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच बातचीत का कोई रास्ता निकलता है।
फिलहाल इतना जरूर है कि अमेरिका और कनाडा के बीच रिश्तों में जो तल्खी पहले राजनीतिक बयानों तक दिखाई देती थी, वह अब टैरिफ और जवाबी कार्रवाई के जरिए वास्तविक कारोबारी चुनौती में बदलती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में दोनों देशों की सरकारों के फैसले यह तय करेंगे कि यह विवाद सीमित व्यापारिक टकराव रहता है या उत्तरी अमेरिका के दो बड़े आर्थिक साझेदारों के बीच लंबे US-Canada Trade War का रूप लेता है।

