Shehbaz Sharif की भारत को फिर ‘पानी’ पर चेतावनी, बोले- सिंधु का पानी रोकने की कोशिश हुई तो देंगे मुंहतोड़ जवाब; कश्मीर पर भी दोहराया पुराना रुख
Shehbaz Sharif Indus Water Treaty को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से जारी तनाव एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी के केंद्र में आ गया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल समझौते को लेकर भारत को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा और यदि पानी को रोकने या कम करने की कोशिश हुई तो पाकिस्तान इसका जवाब देगा।
शहबाज शरीफ ने यह टिप्पणी 13 अगस्त को इस्लामाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान की। इसी अवसर पर उन्होंने यादगार-ए-फतह स्मारक का उद्घाटन भी किया, जिसे मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य संघर्ष की याद में बनाया गया है।
अपने भाषण में शहबाज ने केवल सिंधु जल समझौते का मुद्दा नहीं उठाया। उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के पुराने रुख को दोहराया, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा की, चीन को पाकिस्तान का बेहद करीबी मित्र बताया और मई 2025 के संघर्ष के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका का दावा फिर दोहराया।
इस भाषण में अफगानिस्तान और फिलिस्तीन का मुद्दा भी सामने आया।
भारत को पानी के मुद्दे पर शहबाज की कड़ी चेतावनी
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने सिंधु जल समझौते को लेकर कहा कि पाकिस्तान अपने हिस्से के पानी पर कोई समझौता नहीं करेगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर पाकिस्तान के पानी को रोकने या उसके प्रवाह को कम करने का प्रयास किया गया तो इसका जवाब दिया जाएगा।
शहबाज की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर गंभीर मतभेद बने हुए हैं।
भारत ने अप्रैल 2025 में इस समझौते को निलंबित करने का फैसला किया था। इसके बाद से पाकिस्तान लगातार भारत से समझौते को बहाल करने की मांग करता रहा है।
सिंधु जल समझौता आखिर है क्या?
भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी के बंटवारे से जुड़ा सिंधु जल समझौता 19 सितंबर 1960 को हुआ था।
इस समझौते पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।
विश्व बैंक की भूमिका से तैयार हुए इस समझौते ने सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के उपयोग को लेकर दोनों देशों के बीच एक व्यवस्था बनाई।
समझौते के तहत पूर्वी नदियों और पश्चिमी नदियों के पानी के उपयोग को लेकर दोनों देशों के अधिकार तय किए गए।
रावी, ब्यास और सतलुज का पानी भारत के हिस्से में
सिंधु नदी प्रणाली की पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज—के पानी के उपयोग का अधिकार मुख्य रूप से भारत को दिया गया।
वहीं पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—के पानी का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया।
हालांकि समझौते में भारत के लिए पश्चिमी नदियों पर भी कुछ सीमित उपयोग की व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जिनमें घरेलू उपयोग, गैर-खपत उपयोग और निर्धारित शर्तों के तहत जलविद्युत परियोजनाएं शामिल हैं।
यही तकनीकी और कानूनी प्रावधान भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चर्चा और विवाद का विषय रहे हैं।
65 साल बाद भारत ने समझौता किया निलंबित
1960 में लागू हुआ सिंधु जल समझौता करीब 65 वर्षों तक दोनों देशों के बीच जल बंटवारे की आधारभूत व्यवस्था बना रहा।
लेकिन अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इसे निलंबित करने की घोषणा की।
भारत ने अपने फैसले को सीमा पार आतंकवाद और पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं के संदर्भ में रखा।
भारत का रुख रहा है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक सिंधु जल समझौते पर निलंबन जारी रहेगा।
पाकिस्तान कहता है—एकतरफा निलंबन स्वीकार नहीं
पाकिस्तान ने भारत के इस फैसले को स्वीकार नहीं किया है।
इस्लामाबाद का कहना है कि सिंधु जल समझौता एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है और भारत इसे एकतरफा तरीके से निलंबित नहीं कर सकता।
यही कानूनी और राजनीतिक मतभेद अब दोनों देशों के बीच पानी को लेकर विवाद का मुख्य आधार बन चुका है।
पाकिस्तान लगातार यह तर्क देता रहा है कि समझौते की व्यवस्था के तहत उसके हिस्से के पानी की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए।
पानी का सवाल पाकिस्तान के लिए इतना संवेदनशील क्यों?
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि सिंधु नदी प्रणाली पर अत्यधिक निर्भर है।
देश की बड़ी कृषि भूमि सिंचाई के लिए सिंधु प्रणाली की नदियों और उनसे जुड़े नहर नेटवर्क पर निर्भर करती है।
गेहूं, चावल, कपास और गन्ने जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में सिंचाई का महत्वपूर्ण योगदान है।
इसलिए नदी के पानी के प्रवाह में किसी बड़े बदलाव की आशंका पाकिस्तान में केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहती, बल्कि वह खाद्य सुरक्षा, कृषि, रोजगार और अर्थव्यवस्था से जुड़ा प्रश्न बन जाती है।
पाकिस्तान के सामने बढ़ती जल संकट की चुनौती
पाकिस्तान पहले से ही जल संकट की चुनौती का सामना कर रहा है।
जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, भूजल का अत्यधिक दोहन और सिंचाई व्यवस्था में पानी की बर्बादी जैसी समस्याएं देश के जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही हैं।
ऐसे माहौल में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौते को लेकर तनाव पाकिस्तान के लिए और संवेदनशील हो जाता है।
इसलिए शहबाज शरीफ के भाषण में पानी के मुद्दे को प्रमुखता मिलना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
सिंध और बलूचिस्तान में पानी को लेकर चिंता
सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लिए विशेष महत्व रखती है।
सिंध की कृषि और बड़ी आबादी सिंधु नदी तथा उससे जुड़े सिंचाई नेटवर्क पर निर्भर है।
बलूचिस्तान में भी जल उपलब्धता लंबे समय से एक गंभीर चुनौती रही है।
अगर जल उपलब्धता में कमी आती है तो कृषि उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय रोजगार पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि किसी क्षेत्र में पानी की कमी का कारण केवल भारत के साथ जल समझौते को मान लेना उचित नहीं होगा। पाकिस्तान के भीतर पानी के वितरण, सिंचाई दक्षता, जल प्रबंधन और जलवायु संबंधी समस्याएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सुक्कुर बैराज को लेकर भी चिंता
सिंधु नदी पर बने बड़े सिंचाई ढांचे पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।
सुक्कुर बैराज सिंध प्रांत के प्रमुख सिंचाई ढांचों में से एक है। इससे जुड़े नहर नेटवर्क के माध्यम से कृषि क्षेत्रों तक पानी पहुंचाया जाता है।
पानी के प्रवाह में कमी, नदी के स्तर में बदलाव और सिंचाई संबंधी समस्याएं ऐसे ढांचों की कार्यक्षमता पर असर डाल सकती हैं।
इसीलिए पाकिस्तान में सिंधु नदी के पानी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी का असर सीधे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाता है।
शहबाज ने कश्मीर पर भी दोहराया पाकिस्तान का रुख
अपने भाषण में शहबाज शरीफ ने कश्मीर का मुद्दा भी उठाया।
उन्होंने कहा कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का रुख नहीं बदलेगा और कश्मीरियों की कुर्बानी को बेकार नहीं जाने दिया जाएगा।
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर दशकों से सबसे विवादित मुद्दों में शामिल रहा है।
भारत जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है, जबकि पाकिस्तान इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है।
दोनों देशों के बीच इसी मुद्दे को लेकर कई युद्ध और सैन्य टकराव हो चुके हैं।
मई 2025 के संघर्ष का भी किया जिक्र
शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य संघर्ष का भी उल्लेख किया।
उन्होंने पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई की प्रशंसा करते हुए दावा किया कि सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत को हराया।
भारत और पाकिस्तान दोनों ने मई 2025 के संघर्ष के दौरान अपनी-अपनी सैन्य उपलब्धियों के दावे किए थे।
इसलिए शहबाज का बयान पाकिस्तान की आधिकारिक राजनीतिक कथा का हिस्सा माना जा रहा है।
यादगार-ए-फतह स्मारक का उद्घाटन
13 अगस्त को शहबाज शरीफ ने इस्लामाबाद में यादगार-ए-फतह स्मारक का उद्घाटन किया।
यह स्मारक मई 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष की स्मृति से जुड़ा बताया गया है।
स्मारक का उद्घाटन और शहबाज का भाषण एक ही कार्यक्रम में होना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
पाकिस्तान में मई 2025 के संघर्ष को सेना की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।
आसिम मुनीर की शहबाज ने फिर की तारीफ
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा भी की।
उन्होंने सैन्य नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित करते हुए मई 2025 के संघर्ष में पाकिस्तान की उपलब्धि का दावा किया।
पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका को देखते हुए प्रधानमंत्री की ओर से सेना प्रमुख की सार्वजनिक प्रशंसा का राजनीतिक महत्व भी होता है।
विशेष रूप से भारत के साथ सुरक्षा और सैन्य तनाव के संदर्भ में सेना को मजबूत नेतृत्व के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता है।
ट्रंप की भूमिका पर फिर किया बड़ा दावा
शहबाज शरीफ ने मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान युद्धविराम को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका का दावा भी दोहराया।
उन्होंने कहा कि ट्रंप की पहल के कारण दोनों देशों के बीच संघर्ष को समय रहते रोकने में मदद मिली।
शहबाज पहले भी ट्रंप की भूमिका की प्रशंसा कर चुके हैं।
पाकिस्तान की ओर से अमेरिकी राष्ट्रपति की भूमिका को लेकर यह दावा लगातार सामने आता रहा है।
भारत का रुख इससे अलग रहा है
भारत लगातार यह कहता रहा है कि मई 2025 में संघर्षविराम किसी तीसरे देश की मध्यस्थता के कारण नहीं हुआ।
भारत का कहना रहा है कि दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सीधे संपर्क और बातचीत के बाद सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी।
इसलिए शहबाज शरीफ और भारत की ओर से संघर्षविराम की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं।
यह अंतर दोनों देशों की राजनीतिक व्याख्याओं के बीच स्पष्ट अंतर दिखाता है।
चीन को लेकर शहबाज का बड़ा बयान
शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में चीन-पाकिस्तान संबंधों की भी जमकर प्रशंसा की।
उन्होंने चीन को पाकिस्तान का महान मित्र बताते हुए कहा कि वह मुश्किल समय में चट्टान की तरह पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है।
उन्होंने दोनों देशों की दोस्ती को हिमालय से भी मजबूत बताया।
पाकिस्तान की विदेश नीति में चीन को लंबे समय से सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में माना जाता है।
चीन-पाकिस्तान संबंधों की रणनीतिक अहमियत
चीन और पाकिस्तान के संबंध केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं।
दोनों देशों के बीच आर्थिक, रक्षा, बुनियादी ढांचे और ऊर्जा क्षेत्रों में भी सहयोग है।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों का प्रमुख हिस्सा है।
ग्वादर बंदरगाह और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं भी इस सहयोग की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।
कश्मीर, पानी और चीन—एक ही भाषण में तीन बड़े संदेश
शहबाज शरीफ के भाषण में तीन प्रमुख संदेश स्पष्ट दिखाई दिए।
पहला, भारत के साथ सिंधु जल समझौते को लेकर पाकिस्तान का कड़ा रुख।
दूसरा, कश्मीर पर पाकिस्तान की पारंपरिक राजनीतिक स्थिति को दोहराना।
तीसरा, चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बताना।
इन तीनों मुद्दों का संबंध पाकिस्तान की सुरक्षा और विदेश नीति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
फिलिस्तीन का मुद्दा भी भाषण में उठा
शहबाज शरीफ ने फिलिस्तीन के लोगों के अधिकारों के समर्थन की बात भी कही।
गाजा में जारी संघर्ष के बीच पाकिस्तान लगातार फिलिस्तीनी मुद्दे को अपनी विदेश नीति में प्रमुखता देता रहा है।
शहबाज ने कहा कि पाकिस्तान फिलिस्तीनियों के अधिकारों का समर्थन जारी रखेगा।
पाकिस्तान की सरकारें लंबे समय से फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और फिलिस्तीनियों के अधिकारों के समर्थन की बात करती रही हैं।
अफगानिस्तान से भी शहबाज की अपील
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के संबंध हाल के वर्षों में तनावपूर्ण रहे हैं।
शहबाज शरीफ ने अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार से अपील की कि उसकी जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होना चाहिए।
यह टिप्पणी मुख्य रूप से सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा चिंताओं के संदर्भ में देखी जा सकती है।
पाकिस्तान लंबे समय से अफगानिस्तान पर अपनी जमीन से संचालित होने वाली आतंकवादी गतिविधियों को रोकने का दबाव बनाता रहा है।
TTP को लेकर पाकिस्तान की सुरक्षा चिंता
अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी के बाद पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच संबंधों में कई उतार-चढ़ाव आए हैं।
पाकिस्तान का आरोप रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP के सदस्य अफगान क्षेत्र में सुरक्षित ठिकानों का इस्तेमाल करते हैं।
अफगान तालिबान इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर लगातार मतभेद रहे हैं।
शहबाज का अफगान सरकार से किया गया आग्रह इसी सुरक्षा चिंता को दर्शाता है।
अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता का भी दावा
शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में यह दावा भी किया कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है।
यह पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका को क्षेत्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं और दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रतिबंध जैसे कई मुद्दे विवाद का कारण रहे हैं।
ऐसे में पाकिस्तान अपने आपको क्षेत्रीय संवाद के लिए एक संभावित माध्यम के रूप में प्रस्तुत करता रहा है।
पानी का मुद्दा अब भारत-पाकिस्तान तनाव का नया केंद्र
कश्मीर लंबे समय से दोनों देशों के बीच विवाद का मुख्य मुद्दा रहा है, लेकिन सिंधु जल समझौते के निलंबन के बाद पानी भी द्विपक्षीय तनाव के केंद्र में आ गया है।
पाकिस्तान के लिए यह अस्तित्व और अर्थव्यवस्था से जुड़ा मुद्दा है।
भारत के लिए यह सुरक्षा, जल संसाधन प्रबंधन और सीमा पार आतंकवाद के संदर्भ में एक व्यापक रणनीतिक मुद्दा बन चुका है।
इस वजह से पानी पर दोनों देशों की बयानबाजी आने वाले समय में भी तेज रह सकती है।
क्या भारत पाकिस्तान का पानी रोक सकता है?
यह मुद्दा राजनीतिक भाषणों से कहीं अधिक जटिल है।
सिंधु जल प्रणाली में नदी प्रवाह, बांध, जलाशय, मौसम, हिमपात, वर्षा, सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाएं सभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच समझौते के प्रावधान भी तकनीकी और कानूनी रूप से विस्तृत हैं।
इसलिए ‘पानी रोकने’ या ‘पानी कम करने’ जैसे राजनीतिक शब्दों को वास्तविक जल प्रबंधन क्षमता और कानूनी व्यवस्था के संदर्भ में समझना जरूरी है।
सिंधु जल समझौते पर आगे की राह आसान नहीं
समझौते के निलंबन के बाद दोनों देशों के बीच कानूनी और कूटनीतिक सवाल खड़े हुए हैं।
पाकिस्तान इसे एकतरफा कदम मानता है, जबकि भारत इसे आतंकवाद के संदर्भ में अपनी नीति का हिस्सा बताता है।
अगर दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है तो जल समझौते पर बातचीत की संभावना भी बन सकती है।
लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में पानी का मुद्दा दोनों देशों के लिए संवेदनशील बना हुआ है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पानी का दबाव
पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था सिंचाई पर भारी निर्भरता रखती है।
पानी की उपलब्धता में कमी से फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे खाद्य कीमतें, ग्रामीण आय और निर्यात पर भी असर पड़ सकता है।
कपास और चावल जैसे कृषि उत्पाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और निर्यात के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए सिंधु नदी प्रणाली में किसी बड़े बदलाव की आशंका पाकिस्तान के आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए गंभीर विषय है।
लेकिन पाकिस्तान का जल संकट केवल भारत की वजह से नहीं
यह भी महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान की जल समस्या के कई घरेलू कारण हैं।
पुरानी सिंचाई व्यवस्था, पानी की बर्बादी, नहरों में रिसाव, भूजल का अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन और कमजोर जल प्रबंधन भी संकट को बढ़ाते हैं।
इसलिए भारत-पाकिस्तान जल विवाद के साथ-साथ पाकिस्तान को अपने घरेलू जल प्रबंधन में भी सुधार की आवश्यकता है।
शहबाज का भाषण और पाकिस्तान की घरेलू राजनीति
भारत, कश्मीर, सेना और चीन जैसे मुद्दे पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मई 2025 के सैन्य संघर्ष की सफलता का दावा करना सरकार और सेना के लिए राष्ट्रीय एकता तथा सुरक्षा की राजनीतिक कहानी को मजबूत करता है।
वहीं पानी का मुद्दा पाकिस्तान की जनता के लिए सीधे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा है।
किसानों और सिंचाई पर निर्भर क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील विषय है।
आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर नजर
शहबाज शरीफ के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि सिंधु जल समझौता निकट भविष्य में भारत-पाकिस्तान संबंधों का महत्वपूर्ण मुद्दा बना रहेगा।
कश्मीर, आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और पानी—इन सभी विषयों पर दोनों देशों की स्थिति में बड़ा अंतर मौजूद है।
ऐसे में किसी भी नए राजनीतिक या सैन्य घटनाक्रम का सीधा असर द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है।
पानी से लेकर कश्मीर तक, पाकिस्तान का संदेश साफ
शहबाज शरीफ के भाषण में भारत को पानी के मुद्दे पर चेतावनी, कश्मीर पर पुराना रुख, मई 2025 के संघर्ष को लेकर सेना की प्रशंसा और चीन के साथ दोस्ती का संदेश एक साथ दिखाई दिया।
साथ ही उन्होंने फिलिस्तीन और अफगानिस्तान का मुद्दा उठाकर पाकिस्तान की व्यापक विदेश नीति को भी सामने रखा।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे संवेदनशील मुद्दा सिंधु जल समझौता है, क्योंकि इसका सीधा संबंध दोनों देशों की नदियों, कृषि और करोड़ों लोगों की आजीविका से है।

