BRICS Summit 2026: पहलगाम हमले पर रूस-चीन समेत 11 देशों का कड़ा रुख, आतंकियों की फंडिंग और पनाह देने वालों पर कार्रवाई; मोदी-जिनपिंग की 50 मिनट बैठक
नई दिल्ली में चल रहे BRICS Summit 2026 ने शनिवार को उस समय बड़ा कूटनीतिक संदेश दिया, जब सदस्य देशों ने 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी निंदा करते हुए आतंकवाद के खिलाफ साझा और सख्त रुख अपनाया। नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के हर रूप की निंदा की गई और स्पष्ट किया गया कि आतंकियों को किसी भी आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता।
घोषणा में आतंकवाद की फंडिंग रोकने, आतंकियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने और सीमा पार आतंकवाद समेत आतंक से जुड़े पूरे नेटवर्क पर मिलकर कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया गया। खास बात यह रही कि BRICS के भीतर पश्चिम एशिया को लेकर अलग-अलग नजरिया रखने वाले ईरान, सऊदी अरब और UAE जैसे देश भी संयुक्त घोषणा पर सहमत हुए।
भारत के लिए इसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। संयुक्त बयान पर सहमति के लिए बातचीत देर रात से लेकर शनिवार सुबह करीब 4 बजे तक चली। कई मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच मतभेद थे, लेकिन भारतीय पक्ष ने बातचीत के जरिए साझा जमीन तैयार करने की कोशिश जारी रखी।
नई दिल्ली घोषणा में पहलगाम हमले का सीधा जिक्र
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। BRICS की नई दिल्ली घोषणा में इस हमले की कड़ी निंदा की गई। घोषणा का संदेश केवल हमले की निंदा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आतंकवाद के पूरे ढांचे के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत को रेखांकित किया गया।
BRICS देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों को अस्वीकार करते हुए कहा कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता या समुदाय से जोड़ना उचित नहीं है। साथ ही आतंकवाद को किसी भी राजनीतिक, वैचारिक या अन्य आधार पर सही ठहराने के प्रयासों का विरोध किया गया।
घोषणा में आतंकियों तक पहुंचने वाली वित्तीय मदद रोकने और उन्हें सुरक्षित पनाह देने वाले नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। यह बिंदु भारत के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नई दिल्ली लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फंडिंग और सुरक्षित ठिकानों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाता रहा है।
BRICS के 10 बड़े फैसले और संदेश
नई दिल्ली घोषणा में कई महत्वपूर्ण मुद्दों को जगह मिली है। इनमें आतंकवाद से लेकर वैश्विक व्यापार, परमाणु जोखिम और BRICS के भविष्य तक के विषय शामिल हैं।
1. पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा
22 अप्रैल 2025 को हुए हमले में 26 लोगों की मौत का उल्लेख करते हुए BRICS देशों ने इसकी कड़ी निंदा की।
2. आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस
आतंकवाद के हर रूप और हर अभिव्यक्ति के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया।
3. आतंकवाद को धर्म से जोड़ने का विरोध
घोषणा में कहा गया कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता या समुदाय के साथ जोड़ना उचित नहीं है।
4. आतंक की फंडिंग और पनाह पर कार्रवाई
आतंकियों को आर्थिक मदद, सुरक्षित ठिकाने या अन्य प्रकार का समर्थन उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई पर जोर दिया गया।
5. आतंकियों और आतंकी संगठनों की जवाबदेही
आतंकवादी संगठनों और उनसे जुड़े लोगों के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता बताई गई।
6. संयुक्त राष्ट्र की आतंकरोधी संधि पर जोर
अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर प्रस्तावित व्यापक संयुक्त राष्ट्र संधि को जल्द अपनाने की मांग की गई।
7. BRICS के मूल सिद्धांतों को मजबूत करने की बात
आपसी सम्मान, संप्रभु समानता, एकजुटता और सहमति के आधार पर निर्णय लेने को संगठन के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।
8. एकतरफा टैरिफ पर चिंता
एकतरफा टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई गई। ऐसे कदमों को विश्व व्यापार संगठन यानी WTO के नियमों के अनुरूप रखने की बात कही गई।
9. परमाणु खतरे पर चिंता
परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की आशंका और बढ़ते वैश्विक तनाव को लेकर चिंता जाहिर की गई।
10. भारत की BRICS अध्यक्षता की सराहना
BRICS देशों ने भारत की अध्यक्षता के दौरान BRICS Plus और Outreach संवाद समेत विभिन्न पहलों की सराहना की।
मोदी-जिनपिंग की 50 मिनट बैठक, रिश्तों में नई गर्माहट के संकेत
BRICS Summit 2026 का दूसरा बड़ा घटनाक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक रही। जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत पहुंचे हैं और गलवान संघर्ष के बाद यह उनका पहला भारत दौरा है।
भारत मंडपम में दोनों नेताओं के बीच करीब 50 मिनट बातचीत हुई। बैठक में दोनों देशों के संबंधों को आगे बढ़ाने और मतभेदों को विवाद में बदलने से रोकने पर जोर दिया गया।
मोदी ने भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों—सम्मान, संवेदनशीलता और आपसी हित—को रेखांकित किया। उनका संदेश था कि दोनों देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन्हें इस तरह संभालना जरूरी है कि वे व्यापक संबंधों को नुकसान न पहुंचाएं।
जिनपिंग ने भी भारत-चीन संबंधों को बेहतर बनाए रखने की चीन की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों की राष्ट्रीय परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन दोनों एक-दूसरे की खूबियों से सीख सकते हैं।
यह बातचीत इसलिए भी अहम है क्योंकि गलवान के बाद भारत और चीन के संबंधों में लंबे समय तक तनाव रहा। सीमा पर सैन्य तैनाती बढ़ी, राजनीतिक संबंध प्रभावित हुए और दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी गहरी हुई। इसके बावजूद व्यापारिक संबंध पूरी तरह नहीं टूटे।
गलवान के बाद पहली भारत यात्रा क्यों महत्वपूर्ण है?
शी जिनपिंग इससे पहले अक्टूबर 2019 में भारत आए थे। उस समय प्रधानमंत्री मोदी और जिनपिंग ने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में अनौपचारिक बातचीत की थी। इसके कुछ महीनों बाद ही दोनों देशों के संबंधों पर तनाव का दौर शुरू हुआ और जून 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई।
गलवान संघर्ष में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे। इसके बाद LAC पर दोनों तरफ बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य संसाधन तैनात किए गए।
अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच सीमा पर कुछ महत्वपूर्ण स्तर पर डिसएंगेजमेंट हुआ। इसके बाद उच्चस्तरीय राजनीतिक बातचीत का रास्ता फिर खुला। मोदी और जिनपिंग की बाद की मुलाकातों ने भी रिश्तों में संवाद की वापसी के संकेत दिए।
अब नई दिल्ली में आमने-सामने बातचीत के बाद उम्मीद है कि दोनों देश सीमा विवाद, व्यापार, वीजा, लोगों के बीच संपर्क और अन्य लंबित मुद्दों पर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे।
भारत-चीन रिश्तों की सबसे बड़ी मुश्किल: भरोसा और व्यापार घाटा
दोनों देशों के संबंधों में सुधार के संकेत जरूर हैं, लेकिन तस्वीर अभी आसान नहीं है। भारत और चीन के बीच दो बड़े सवाल अब भी बने हुए हैं—Trust Deficit और Trade Deficit।
सीमा विवाद के कारण भरोसे की कमी लंबे समय से बनी हुई है। 1962 के युद्ध के बाद से दोनों देशों के बीच सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ। देपसांग, चुमार, डोकलाम और गलवान जैसे घटनाक्रमों ने इस समस्या को और जटिल बनाया है।
दूसरी ओर व्यापार का आंकड़ा भी भारत के लिए चुनौती है। 2025-26 में दोनों देशों के बीच करीब 151 अरब डॉलर का कारोबार हुआ। इसमें भारत ने चीन से लगभग 132 अरब डॉलर का सामान आयात किया, जबकि चीन को भारत का निर्यात करीब 19 अरब डॉलर रहा। इससे भारत का व्यापार घाटा करीब 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
भारत चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, बैटरी, सोलर कंपोनेंट्स और कई औद्योगिक सामान बड़े पैमाने पर खरीदता है। दूसरी ओर भारत से चीन को बड़ी मात्रा में अपेक्षाकृत कम मूल्य वाले कच्चे या प्राथमिक उत्पाद निर्यात होते हैं।
यही वजह है कि भारत एक तरफ चीन के साथ आर्थिक संबंधों को स्थिर रखना चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ रणनीतिक और औद्योगिक निर्भरता को लेकर चिंतित भी है।
जिनपिंग से बातचीत से पहले तैयार हुई थी जमीन
जिनपिंग के भारत आने से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के चीन दौरे ने भी दोनों देशों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने की जमीन तैयार की थी। रिपोर्टों के अनुसार, सीमा विवाद, सैन्य संपर्क व्यवस्था, वीजा और व्यापार समेत कई मुद्दों पर बातचीत हुई थी।
अब मोदी-जिनपिंग बैठक में इन मुद्दों को राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ाने का अवसर मिला है।
इसी बीच चीन की चाइना सदर्न एयरलाइंस ने भी छह साल बाद भारत के लिए नियमित यात्री उड़ानें बहाल करने की घोषणा की है। 21 सितंबर से ग्वांगझू-दिल्ली रूट पर सेवा शुरू होने की बात कही गई है। यह कदम दोनों देशों के बीच लोगों के संपर्क और कारोबारी आवाजाही के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
BRICS में साझा करेंसी नहीं, फिलहाल स्थानीय मुद्राओं पर जोर
BRICS को लेकर एक और बड़ी चर्चा साझा करेंसी की रही है। लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल BRICS देशों की कोई साझा नई मुद्रा शुरू करने का प्रस्ताव नहीं है।
विदेश मंत्रालय के आर्थिक संबंध सचिव सुधाकर दलेला के मुताबिक, सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन बढ़ाने को लेकर बातचीत जारी है। इसका मकसद व्यापार में आने वाली लागत और भुगतान संबंधी बाधाओं को कम करना है।
यानी फिलहाल लक्ष्य डॉलर को अचानक खत्म करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थानीय भुगतान विकल्पों को बढ़ाना है।
भारत के लिए इसका अर्थ रुपया आधारित लेन-देन के विस्तार से भी जुड़ सकता है। अगर BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ता है तो मुद्रा बदलने की लागत कम हो सकती है और कुछ परिस्थितियों में डॉलर के उतार-चढ़ाव का जोखिम भी घट सकता है।
हालांकि डॉलर की वैश्विक भूमिका को तेजी से खत्म करना आसान नहीं है। BRICS देश वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, डिजिटल भुगतान और CBDC जैसी तकनीकों पर काम जरूर कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल किसी एक साझा BRICS करेंसी की आधिकारिक शुरुआत सामने नहीं है।
मोदी ने BRICS के अगले 20 साल के लिए रखा नया एजेंडा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS को अगले चरण में ले जाने के लिए संगठन के अगले 20 वर्षों का नया एजेंडा तैयार करने का प्रस्ताव रखा।
मोदी ने कहा कि BRICS की अध्यक्षता हर साल बदलती है, लेकिन इससे पहले लिए गए फैसलों के क्रियान्वयन की गति नहीं रुकनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने एक स्थायी व्यवस्था का सुझाव दिया।
एक सुरक्षित डिजिटल रिकॉर्ड बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया, जिसमें यह दर्ज किया जा सके कि कौन-सा फैसला किस देश या संस्था की जिम्मेदारी है, उसे कब तक पूरा करना है और उसकी प्रगति क्या है।
यह प्रस्ताव BRICS को केवल वार्षिक शिखर सम्मेलन तक सीमित रखने के बजाय लगातार काम करने वाले संस्थागत मंच के रूप में विकसित करने की दिशा में देखा जा सकता है।
ग्लोबल साउथ को नियम मानने वाला नहीं, नियम बनाने वाला बनाना चाहते हैं मोदी
प्रधानमंत्री ने AI, साइबरस्पेस, अंतरिक्ष और बायोटेक्नोलॉजी जैसी नई तकनीकों के लिए बनने वाले वैश्विक नियमों में विकासशील देशों की बराबर भागीदारी की मांग की।
मोदी का तर्क है कि तकनीक आने वाले दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था और समाज को बड़े स्तर पर प्रभावित करेगी। ऐसे में नियम केवल कुछ विकसित देशों द्वारा तय नहीं किए जाने चाहिए।
उन्होंने ग्लोबल साउथ के देशों से केवल मौजूदा नियमों का पालन करने के बजाय नियम बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
युवाओं के लिए भी प्रधानमंत्री ने एक पहल का सुझाव दिया। उन्होंने युवा राजनयिकों और नीति-निर्माताओं को बातचीत, कूटनीति और कानून से जुड़े विषयों में प्रशिक्षण देने की जरूरत बताई।
इसके साथ ही समुद्र में संकट में फंसे नाविकों की सहायता के लिए BRICS देशों के बीच इमरजेंसी नेटवर्क बनाने का प्रस्ताव भी सामने रखा गया। इसका उद्देश्य जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सहायता, परिवार से संपर्क और सुरक्षित निकासी में मदद करना होगा।
ईरान-UAE की बातचीत ने भी खींचा ध्यान
BRICS Summit 2026 के दौरान पश्चिम एशिया की राजनीति भी चर्चा के केन्द्र में रही। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद से बातचीत की।
पश्चिम एशिया में तनाव के बीच ईरान और UAE के नेताओं की बातचीत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई क्षेत्रीय मुद्दों पर दोनों देशों के रुख अलग रहे हैं। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने की प्रक्रिया पिछले कुछ वर्षों में आगे बढ़ी है।
पजशकियान ने कहा कि पश्चिम एशिया को अमेरिका की ‘पुलिसिंग’ की जरूरत नहीं है और क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी क्षेत्र के देशों की होनी चाहिए।
उन्होंने शांतिपूर्ण परमाणु ठिकानों को हमलों और धमकियों से सुरक्षित रखने की बात कही। साथ ही BRICS देशों से एकतरफा प्रतिबंधों का मिलकर सामना करने और फिलिस्तीन के मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
जिनपिंग ने भी पश्चिम एशिया के युद्ध पर चिंता जताई
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव को लेकर चिंता जताई। चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक जिनपिंग ने कहा कि इस संघर्ष से क्षेत्र के लोगों को भारी नुकसान हुआ है और इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित पूरे नहीं हो रहे हैं।
अगले साल BRICS की अध्यक्षता चीन संभालेगा। इसलिए नई दिल्ली में जिनपिंग की मौजूदगी और भारत के साथ उनकी बातचीत को चीन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
BRICS के मंच पर रामनाथस्वामी मंदिर की तस्वीर
नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन के दौरान भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की झलक भी दिखाई दी। BRICS नेताओं के स्वागत के लिए लगाए गए मंच पर तमिलनाडु के रामेश्वरम स्थित प्रसिद्ध रामनाथस्वामी मंदिर की तस्वीर प्रदर्शित की गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को इस मंदिर के बारे में जानकारी दी। यह पहल भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक नेताओं के सामने प्रस्तुत करने का भी हिस्सा रही।
20 से ज्यादा देशों के नेता, दिल्ली में हाई-सिक्योरिटी इंतजाम
12 और 13 सितंबर को आयोजित BRICS सम्मेलन के लिए राजधानी दिल्ली में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान समेत कई महत्वपूर्ण नेता दिल्ली पहुंचे हैं।
सुरक्षा व्यवस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुरक्षा में लगे पुलिस वाहनों की भी स्निफर डॉग से जांच की जा रही है। भारत मंडपम और आसपास के इलाकों में सुरक्षा एजेंसियों ने कई स्तर की व्यवस्था की है।
BRICS नेताओं ने सम्मेलन के दौरान सामूहिक तस्वीर खिंचवाई और भारत मंडपम के बाहर पौधारोपण कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया।
डिनर में भारतीय स्वाद की झलक, विदेशी मेहमानों के लिए खास इंतजाम
प्रधानमंत्री मोदी की ओर से वैश्विक नेताओं और प्रतिनिधियों के लिए आयोजित डिनर में भी भारतीय संस्कृति और खान-पान को प्रमुखता दी गई।
मेन्यू में उत्तर प्रदेश के गलौटी कबाब, महाराष्ट्र की भाकरवड़ी और राजस्थान की कचौड़ी जैसे व्यंजनों को शामिल किया गया। अलग-अलग होटलों में भी विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के लिए क्षेत्रीय भारतीय व्यंजनों की विशेष व्यवस्था की गई।
द लीला पैलेस में दाल मखनी, बिरयानी, दिल्ली स्टाइल चाट के साथ सत्तू, बाजरा और रागी से बने व्यंजन शामिल किए गए। ताज महल होटल में कश्मीर, पुरानी दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान, बंगाल और तमिलनाडु के लोकप्रिय स्नैक्स पेश किए गए।
ऐसे आयोजनों में डिनर केवल खान-पान तक सीमित नहीं होता। अनौपचारिक माहौल में नेताओं और प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के अवसर भी बढ़ते हैं। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इसे ‘डिनर डिप्लोमेसी’ के तौर पर देखा जाता है।
BRICS में 11 देश, बढ़ता प्रभाव और बढ़ती चुनौती
BRICS की शुरुआत BRIC के रूप में हुई थी। 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने BRIC शब्द का इस्तेमाल ब्राजील, रूस, भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के संदर्भ में किया था।
बाद में 2006 में समूह बना और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहली आधिकारिक बैठक हुई। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम BRICS हुआ।
समय के साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देश इससे जुड़े। अब BRICS में 11 पूर्ण सदस्य हैं—ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया।
समूह की ताकत केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसकी सदस्यता में दुनिया की बड़ी आबादी और महत्वपूर्ण ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन तथा औद्योगिक क्षमताएं शामिल हैं।
लेकिन यही विविधता BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है। ईरान, सऊदी अरब और UAE के बीच पश्चिम एशिया को लेकर अलग-अलग रणनीतिक हित हैं। अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और विदेश नीति प्राथमिकताओं वाले देशों को एक साझा मंच पर लंबे समय तक एकजुट रखना आसान नहीं होगा।
पाकिस्तान और तुर्किये की सदस्यता अब भी सवाल
BRICS के विस्तार के बाद पाकिस्तान और तुर्किये समेत कई देशों ने समूह में शामिल होने की इच्छा जताई थी। पाकिस्तान ने 2023 में सदस्यता के लिए आवेदन किया था और उसे चीन तथा रूस का समर्थन मिलने की बात सामने आई थी।
हालांकि अब तक पाकिस्तान BRICS का पूर्ण सदस्य नहीं बना है। नए सदस्य को शामिल करने के लिए मौजूदा सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। भारत ने आधिकारिक रूप से पाकिस्तान की सदस्यता रोकने की बात नहीं कही है, लेकिन विभिन्न रिपोर्टों में नई दिल्ली के रुख को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं।
भारत के लिए BRICS Summit 2026 का असली महत्व क्या है?
इस पूरे सम्मेलन को केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक के रूप में देखना तस्वीर को अधूरा कर देगा। भारत के लिए यह कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
एक तरफ नई दिल्ली ने पहलगाम हमले के बाद आतंकवाद के मुद्दे को BRICS जैसे बड़े बहुपक्षीय मंच पर साझा घोषणा का हिस्सा बनाने में सफलता हासिल की। दूसरी तरफ भारत ने ईरान, UAE और सऊदी अरब जैसे देशों के बीच मौजूद मतभेदों के बावजूद संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाने की कोशिश की।
तीसरी तरफ मोदी-जिनपिंग बैठक ने भारत-चीन संबंधों में संवाद की निरंतरता का संकेत दिया। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि सीमा विवाद या रणनीतिक मतभेद खत्म हो गए हैं।
चौथी चुनौती आर्थिक है। स्थानीय मुद्राओं में कारोबार, डिजिटल भुगतान और डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिशें BRICS के आर्थिक एजेंडे को नई दिशा दे सकती हैं।
और पांचवां बड़ा मुद्दा ग्लोबल साउथ की भूमिका है। भारत चाहता है कि AI, साइबरस्पेस, अंतरिक्ष और बायोटेक्नोलॉजी जैसी उभरती तकनीकों के वैश्विक नियम तय करते समय विकासशील देशों की आवाज भी निर्णायक हो।
अगले साल चीन की बारी, लेकिन इस साल भारत ने छोड़ी कई बड़ी छाप
भारत की अध्यक्षता में BRICS के दौरान 30 से ज्यादा शहरों में 350 से अधिक बैठकें आयोजित किए जाने की बात प्रधानमंत्री मोदी ने कही। भारत ने अपने एजेंडे में लचीलापन, नवाचार, सहयोग, टिकाऊ विकास और आम लोगों की जरूरतों को प्रमुखता देने का दावा किया।
अब अगले साल BRICS की अध्यक्षता चीन के पास होगी। ऐसे में नई दिल्ली में मोदी और जिनपिंग की बैठक का महत्व और बढ़ जाता है। दोनों देशों के बीच संबंध किस दिशा में जाते हैं, इसका असर केवल द्विपक्षीय रिश्तों पर नहीं बल्कि BRICS के भीतर शक्ति-संतुलन और एजेंडे पर भी पड़ सकता है।
BRICS Summit 2026 में आतंकवाद, पश्चिम एशिया, वैश्विक व्यापार, स्थानीय मुद्राओं, ग्लोबल साउथ और भारत-चीन संबंधों से जुड़े मुद्दे एक साथ सामने आए हैं। इसलिए नई दिल्ली घोषणा केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि ऐसे समय में सदस्य देशों के बीच न्यूनतम साझा सहमति का संकेत भी है, जब दुनिया कई मोर्चों पर तनाव और अस्थिरता से गुजर रही है।
BRICS Summit 2026 का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अलग-अलग रणनीतिक हितों और आपसी मतभेदों के बावजूद सदस्य देश कुछ मुद्दों पर साझा रुख बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पहलगाम आतंकी हमले की निंदा, आतंक की फंडिंग और पनाह देने वालों के खिलाफ कार्रवाई, मोदी-जिनपिंग की बातचीत और ग्लोबल साउथ को वैश्विक नियम-निर्माण में बड़ी भूमिका देने की पहल—इन सभी घटनाक्रमों ने नई दिल्ली सम्मेलन को भारत की कूटनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है।

