Benjamin Netanyahu का ब्रिटेन पर तीखा तंज—‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ब्रिटेन’! बोले- परमाणु हथियार वाला ऐसा देश बनने से पहले ईरान को रोकना जरूरी
Netanyahu Britain Islamic Republic टिप्पणी को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। इजराइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने ब्रिटेन की मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर तीखी टिप्पणी करते हुए उसे व्यंग्यात्मक अंदाज में ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ब्रिटेन’ तक कह दिया।
नेतन्याहू ने यह टिप्पणी गुरुवार को आर्मी रेडियो के एक पॉडकास्ट के दौरान की। बातचीत में उन्होंने ब्रिटेन में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव, इजराइल को लेकर बदलते राजनीतिक नजरिए और यूरोप में बढ़ती मुस्लिम आबादी के संदर्भ में अपनी बात रखी।
इजराइली प्रधानमंत्री ने अपनी टिप्पणी को ईरान के परमाणु कार्यक्रम से भी जोड़ा। उनका तर्क था कि इजराइल ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने की कोशिश कर रहा है और इसी संदर्भ में उन्होंने ब्रिटेन को लेकर यह व्यंग्य किया।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नेतन्याहू की टिप्पणी राजनीतिक और व्यंग्यात्मक बयान है। ब्रिटेन कोई ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ नहीं है और न ही उसकी संवैधानिक व्यवस्था किसी इस्लामी गणराज्य के रूप में स्थापित है।
नेतन्याहू ने ब्रिटेन को क्यों कहा ‘इस्लामिक रिपब्लिक’?
नेतन्याहू ने ब्रिटेन की मौजूदा स्थिति की तुलना ईरान से करते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कोई ब्रिटेन को ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ब्रिटेन’ कह सकता है और इसी क्रम में परमाणु हथियारों को लेकर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी की।
उनका मुख्य संदर्भ ईरान था। इजराइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताता रहा है।
नेतन्याहू का कहना था कि इजराइल यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके।
उन्होंने ब्रिटेन को लेकर कही गई टिप्पणी को इसी संदर्भ में जोड़ते हुए यह संकेत देने की कोशिश की कि वह पश्चिमी देशों में हो रहे सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को लेकर चिंतित हैं।
ब्रिटेन और ईरान की तुलना में परमाणु हथियार का मुद्दा
नेतन्याहू की टिप्पणी में सबसे संवेदनशील हिस्सा परमाणु हथियारों से जुड़ा था।
ब्रिटेन एक स्थापित परमाणु शक्ति है और उसके पास लंबे समय से परमाणु हथियार मौजूद हैं। वहीं ईरान के पास परमाणु हथियार होने की पुष्टि नहीं है और उसका परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय रहा है।
इसलिए नेतन्याहू का बयान वास्तविक परमाणु स्थिति की तुलना करने के बजाय एक राजनीतिक तंज के रूप में सामने आया।
उन्होंने जिस अंदाज में ब्रिटेन और ईरान का संदर्भ जोड़ा, उसका उद्देश्य ब्रिटेन की घरेलू राजनीति और यूरोप में हो रहे सामाजिक बदलावों पर अपनी असहमति व्यक्त करना था।
नेतन्याहू की नजर में बदल गया है ब्रिटेन का इजराइल को देखने का नजरिया
नेतन्याहू ने बातचीत के दौरान ब्रिटेन के पुराने और वर्तमान रुख की तुलना भी की।
उन्होंने 1967 के अरब-इजराइल युद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय ब्रिटेन में इजराइल के प्रति दृष्टिकोण आज की तुलना में अलग था।
उन्होंने ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के परिवार का उदाहरण देते हुए कहा कि चर्चिल के बेटे और पोते उस दौर में पत्रकार के रूप में इजराइल आए थे और युद्ध की रिपोर्टिंग इजराइल के पक्ष में की थी।
नेतन्याहू के अनुसार आज के ब्रिटेन में वैसा माहौल देखना मुश्किल है।
यह टिप्पणी उनके उस व्यापक तर्क का हिस्सा थी जिसमें वह पश्चिमी देशों में इजराइल के प्रति बदलते नजरिए को जनसांख्यिकीय और राजनीतिक बदलावों से जोड़ते हैं।
यूरोप में मुस्लिम आबादी को लेकर नेतन्याहू की चिंता
नेतन्याहू पहले भी यूरोप की जनसांख्यिकी और मुस्लिम आबादी से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं।
उनका कहना है कि यूरोपीय देशों में मुस्लिम आबादी और मुस्लिम प्रवासियों की संख्या में बदलाव का असर वहां की राजनीति पर पड़ रहा है।
उनके अनुसार इसका एक प्रभाव इजराइल के प्रति यूरोपीय सरकारों और समाजों के रवैये में भी दिखाई देता है।
हालांकि, यूरोप में इजराइल को लेकर राजनीतिक रुख में बदलाव को केवल जनसंख्या संरचना से जोड़ना एक जटिल विषय है। इसके पीछे गाजा में मानवीय स्थिति, विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय कानून, घरेलू राजनीति और पश्चिमी देशों के भीतर राजनीतिक मतभेद जैसे कई कारक भी मौजूद हैं।
7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद बदला यूरोप का रुख
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल ने गाजा में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया।
हमास के हमले में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और लोगों को बंधक बनाया गया। इसके बाद इजराइल की सैन्य कार्रवाई लंबे समय तक जारी रही।
गाजा में बड़ी संख्या में नागरिकों के मारे जाने, विस्थापन और मानवीय संकट की खबरों के बाद यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में इजराइली सैन्य कार्रवाई को लेकर आलोचना बढ़ी।
इसी दौर में यूरोपीय देशों के भीतर इजराइल की नीतियों को लेकर बहस तेज हुई।
नेतन्याहू इन बदलते रुख को कई बार यूरोप की आंतरिक राजनीति और जनसांख्यिकीय बदलावों से जोड़ते रहे हैं।
इजराइल और यूरोप के रिश्तों में बढ़ा तनाव
इजराइल और यूरोपीय देशों के संबंध लंबे समय से आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग पर आधारित रहे हैं। लेकिन गाजा युद्ध के बाद इन संबंधों में कई मुद्दों पर मतभेद बढ़े हैं।
कुछ यूरोपीय सरकारों ने इजराइल के आत्मरक्षा के अधिकार को स्वीकार करते हुए भी गाजा में सैन्य कार्रवाई के तरीके और नागरिकों की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई।
यही अंतर नेतन्याहू की आलोचना का एक प्रमुख आधार रहा है।
उनका आरोप है कि पश्चिमी देशों में इजराइल के प्रति पुराना समर्थन कमजोर हुआ है।
नेतन्याहू का दावा—जनसांख्यिकीय बदलाव भी वजह
नेतन्याहू के अनुसार यूरोप में आबादी का बदलता स्वरूप राजनीति को प्रभावित कर रहा है।
उनका मानना है कि मुस्लिम आबादी के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के कारण यूरोपीय सरकारों का इजराइल के प्रति रवैया भी बदल रहा है।
हालांकि, यह नेतन्याहू का राजनीतिक विश्लेषण है और इसे यूरोप के सभी देशों की आधिकारिक स्थिति नहीं माना जा सकता।
यूरोप में इजराइल-फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों और आम जनता के बीच भी अलग-अलग विचार मौजूद हैं।
जेडी वेंस का पुराना बयान भी चर्चा में आया
नेतन्याहू की ब्रिटेन को लेकर की गई टिप्पणी के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की पुरानी टिप्पणी भी चर्चा में आ गई है।
वेंस ने 2024 में एक भाषण के दौरान परमाणु हथियार रखने वाले पहले इस्लामी देश को लेकर एक टिप्पणी की थी।
उस बातचीत में उन्होंने कहा था कि उन्हें ईरान का नाम पहले याद आया, लेकिन पाकिस्तान पहले से परमाणु हथियार रखने वाला देश है। इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन को लेकर भी व्यंग्यात्मक टिप्पणी की थी।
उस समय वेंस अमेरिकी सीनेट में ओहायो का प्रतिनिधित्व करते थे।
उनकी टिप्पणी ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सत्ता में आने और प्रवासन नीति को लेकर राजनीतिक बहस के संदर्भ में थी।
ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार के संदर्भ में वेंस का बयान
वेंस की टिप्पणी उस समय आई थी जब ब्रिटेन में लेबर पार्टी सत्ता में आई थी और कीर स्टार्मर प्रधानमंत्री बने थे।
अमेरिकी राजनीति में वेंस का रुख प्रवासन और पश्चिमी देशों की घरेलू नीतियों पर काफी मुखर रहा है।
ब्रिटेन के संदर्भ में उनकी टिप्पणी भी राजनीतिक व्यंग्य के रूप में सामने आई थी।
अब नेतन्याहू के बयान के साथ उस पुराने बयान की तुलना की जा रही है क्योंकि दोनों टिप्पणियों में ब्रिटेन और ‘इस्लामिक’ पहचान को परमाणु हथियारों के संदर्भ से जोड़ा गया।
फैक्ट चेक: ब्रिटेन ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ नहीं है
नेतन्याहू के बयान को समझने के लिए तथ्य और राजनीतिक व्यंग्य के बीच अंतर करना जरूरी है।
ब्रिटेन का आधिकारिक राजनीतिक और संवैधानिक ढांचा उसे इस्लामिक गणराज्य के रूप में परिभाषित नहीं करता। ब्रिटेन की सरकार और कानून व्यवस्था किसी इस्लामी गणराज्य के मॉडल पर आधारित नहीं है।
इसलिए ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ब्रिटेन’ कोई आधिकारिक संवैधानिक नाम नहीं है, बल्कि नेतन्याहू द्वारा इस्तेमाल किया गया राजनीतिक और व्यंग्यात्मक संबोधन है।
पाकिस्तान का आधिकारिक नाम क्या है?
इसके विपरीत पाकिस्तान का आधिकारिक संवैधानिक नाम इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान है।
पाकिस्तान के संविधान में इस्लाम को राज्य धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त है।
यही वह अंतर है जो नेतन्याहू की टिप्पणी को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
ब्रिटेन और पाकिस्तान की संवैधानिक व्यवस्थाएं अलग हैं और दोनों को एक ही राजनीतिक श्रेणी में रखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
पाकिस्तान बना था पहला परमाणु हथियार रखने वाला मुस्लिम बहुल देश
पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु परीक्षण किए थे और उसके बाद वह परमाणु हथियार रखने वाला पहला मुस्लिम बहुल देश बना।
इसलिए परमाणु हथियार और ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ शब्द को जोड़ते समय पाकिस्तान का संदर्भ स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
नेतन्याहू की टिप्पणी में इसी राजनीतिक संदर्भ का इस्तेमाल करते हुए ब्रिटेन और ईरान का जिक्र किया गया।
लेकिन ब्रिटेन की वास्तविक परमाणु शक्ति की स्थिति इससे अलग है, क्योंकि वह दशकों से परमाणु हथियार रखने वाला देश है।
ब्रिटेन पहले से परमाणु शक्ति है
नेतन्याहू की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक पहलू यह भी है कि ब्रिटेन पहले से ही परमाणु हथियार रखने वाला देश है।
ब्रिटेन की परमाणु क्षमता लंबे समय से उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का हिस्सा है।
इसलिए यदि बयान को शाब्दिक रूप से लिया जाए तो ब्रिटेन के ‘परमाणु हथियार हासिल करने’ की बात तथ्यात्मक अर्थ में सही नहीं बैठती। नेतन्याहू का संदर्भ स्पष्ट रूप से ब्रिटेन की कथित सामाजिक और राजनीतिक दिशा को लेकर व्यंग्य था।
यही वजह है कि उनके बयान को राजनीतिक टिप्पणी के रूप में समझना अधिक उचित है।
ईरान पर नेतन्याहू का पुराना रुख
ईरान लंबे समय से इजराइल की सुरक्षा नीति के केंद्र में रहा है।
इजराइली नेतृत्व ईरान के परमाणु कार्यक्रम को संभावित खतरे के रूप में देखता है। नेतन्याहू कई बार कह चुके हैं कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना इजराइल की प्रमुख सुरक्षा प्राथमिकताओं में है।
इसी मुद्दे को उन्होंने ब्रिटेन पर की गई टिप्पणी के साथ जोड़ा।
इजराइल और ईरान के बीच परमाणु तनाव
इजराइल और ईरान के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि इजराइल ईरान की परमाणु क्षमता को अपने लिए गंभीर खतरा मानता है।
परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी लंबे समय से चिंता बनी हुई है।
नेतन्याहू का ताजा बयान इसी पुराने विवाद को ब्रिटेन में हो रहे सामाजिक और राजनीतिक बदलावों के साथ जोड़ने की कोशिश करता है।
गाजा युद्ध ने बढ़ाई इजराइल की अंतरराष्ट्रीय आलोचना
7 अक्टूबर 2023 के बाद गाजा में शुरू हुई इजराइली सैन्य कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा की।
इजराइल का कहना रहा है कि उसका लक्ष्य हमास की सैन्य क्षमता को खत्म करना और अपने नागरिकों की सुरक्षा करना है।
दूसरी ओर गाजा में नागरिकों की बड़ी संख्या में मौत, विस्थापन और मानवीय संकट को लेकर इजराइल की सैन्य रणनीति की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई।
यही मतभेद यूरोप और इजराइल के रिश्तों में भी दिखाई दिए।
फिलिस्तीन को लेकर भी नेतन्याहू का सख्त रुख
नेतन्याहू की ब्रिटेन संबंधी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब फिलिस्तीन के भविष्य को लेकर भी उनका रुख लगातार चर्चा में रहा है।
नेतन्याहू ने पहले कहा था कि जब तक वह प्रधानमंत्री हैं, फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना नहीं होगी।
उन्होंने गाजा से इजराइली सेना हटाने को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया और कहा कि इजराइल हमास को केवल प्रतीकात्मक रूप से नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से समाप्त करना चाहता है।
यह रुख फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के समर्थक देशों की नीति से टकराता है।
गाजा और दो-राष्ट्र समाधान पर गहरा मतभेद
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में फिलिस्तीन-इजराइल विवाद के समाधान के लिए दो-राष्ट्र समाधान लंबे समय से प्रमुख प्रस्ताव रहा है।
लेकिन नेतन्याहू की सरकार के भीतर इस विकल्प को लेकर गहरे मतभेद रहे हैं और खुद नेतन्याहू ने फिलिस्तीनी राज्य के गठन का विरोध किया है।
इसी वजह से इजराइल और उसके पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी राजनीतिक तनाव देखने को मिलता है।
ब्रिटेन का इजराइल के प्रति रुख क्यों बदला?
ब्रिटेन में इजराइल को लेकर राजनीतिक दृष्टिकोण को केवल मुस्लिम आबादी से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
गाजा में नागरिकों की स्थिति, मानवीय सहायता, अंतरराष्ट्रीय कानून, बंधकों का मुद्दा, हमास की गतिविधियां, इजराइल की सैन्य रणनीति और घरेलू ब्रिटिश राजनीति—सभी ने वहां सार्वजनिक बहस को प्रभावित किया है।
इसीलिए नेतन्याहू का विश्लेषण एक राजनीतिक दृष्टिकोण है, जिसे व्यापक तथ्यात्मक संदर्भ में देखना आवश्यक है।
नेतन्याहू की टिप्पणी पर विवाद की वजह
‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ब्रिटेन’ जैसी भाषा स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विवाद पैदा कर सकती है।
ब्रिटेन एक बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज है, जहां अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग रहते हैं।
किसी देश की मुस्लिम आबादी या मुस्लिम प्रवासियों की मौजूदगी को सीधे उसकी संवैधानिक पहचान से जोड़ना एक राजनीतिक निष्कर्ष है, तथ्यात्मक स्थिति नहीं।
यही कारण है कि नेतन्याहू का बयान राजनीतिक टिप्पणी के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि ब्रिटेन की वास्तविक संवैधानिक स्थिति के वर्णन के रूप में।
ब्रिटेन में मुस्लिम आबादी का मुद्दा क्यों राजनीतिक है?
ब्रिटेन में मुस्लिम समुदाय देश की सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रवासन, धार्मिक स्वतंत्रता, एकीकरण और बहुसांस्कृतिक समाज को लेकर ब्रिटेन में लंबे समय से राजनीतिक बहस चलती रही है।
इन मुद्दों पर ब्रिटेन के राजनीतिक दलों की नीतियां अलग-अलग हैं।
लेबर पार्टी की सरकार के दौरान भी प्रवासन और सामाजिक एकीकरण से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं।
लेकिन इसे सीधे ब्रिटेन के ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ बनने से जोड़ना एक राजनीतिक अतिशयोक्ति है।
नेतन्याहू का बयान इजराइल की व्यापक विदेश नीति से जुड़ा
नेतन्याहू का ताजा बयान केवल ब्रिटेन पर टिप्पणी नहीं है। इसके पीछे इजराइल की व्यापक विदेश नीति और पश्चिमी देशों के साथ उसके बदलते संबंधों की चिंता भी दिखाई देती है।
इजराइल चाहता है कि उसके पश्चिमी सहयोगी ईरान के खिलाफ उसकी सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से लें।
साथ ही नेतन्याहू गाजा युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना कर रहे हैं।
ऐसे में यूरोप की राजनीतिक दिशा पर टिप्पणी करना उनके व्यापक राजनीतिक संदेश का हिस्सा भी माना जा सकता है।
ईरान को लेकर इजराइल की प्राथमिकता साफ
नेतन्याहू ने अपने बयान में सबसे स्पष्ट संदेश ईरान के संदर्भ में दिया।
उनका कहना था कि इजराइल यह सुनिश्चित करने के लिए प्रयास कर रहा है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके।
इजराइल की सुरक्षा नीति में यह मुद्दा वर्षों से सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहा है।
तेहरान और यरुशलम के बीच तनाव के कारण परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई भी टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुरंत चर्चा का विषय बन जाती है।
ब्रिटेन और ईरान की तुलना ने बढ़ाया राजनीतिक तापमान
नेतन्याहू द्वारा ब्रिटेन को ईरान के संदर्भ में रखने से बयान का राजनीतिक प्रभाव और बढ़ गया।
ब्रिटेन और ईरान की राजनीतिक व्यवस्थाएं पूरी तरह अलग हैं। एक ओर ब्रिटेन संवैधानिक राजतंत्र और संसदीय लोकतंत्र है, वहीं ईरान इस्लामी गणराज्य की राजनीतिक व्यवस्था वाला देश है।
इसलिए नेतन्याहू की तुलना को वास्तविक संवैधानिक समानता के बजाय राजनीतिक व्यंग्य के रूप में देखना जरूरी है।
जेडी वेंस की टिप्पणी से समानता क्यों?
नेतन्याहू और जेडी वेंस के बयानों में समानता इस वजह से देखी जा रही है क्योंकि दोनों ने ब्रिटेन के राजनीतिक बदलावों को ‘इस्लामिक’ पहचान और परमाणु हथियारों के संदर्भ में व्यंग्यात्मक तरीके से जोड़ा।
वेंस की टिप्पणी ब्रिटेन में लेबर सरकार और प्रवासन नीति को लेकर थी।
नेतन्याहू की टिप्पणी में यूरोप की जनसांख्यिकी, इजराइल के प्रति बदलते रवैये और ईरान के परमाणु कार्यक्रम का संदर्भ शामिल था।
दोनों बयानों के राजनीतिक संदर्भ अलग हैं, लेकिन भाषा और व्यंग्य का ढांचा मिलता-जुलता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्दों का असर भी बड़ा होता है
किसी राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री की टिप्पणी सामान्य राजनीतिक बयान से अधिक प्रभाव डाल सकती है।
नेतन्याहू का ब्रिटेन पर ताजा बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिटेन इजराइल का पारंपरिक पश्चिमी साझेदार रहा है।
ऐसे में ब्रिटेन की सामाजिक संरचना और उसकी सरकार की नीतियों पर इतनी तीखी टिप्पणी दोनों देशों के बीच राजनीतिक मतभेदों की ओर भी संकेत करती है।
अब सवाल—क्या ब्रिटेन सच में बदल रहा है?
ब्रिटेन में सामाजिक और जनसांख्यिकीय बदलाव वास्तविक हैं। देश में अलग-अलग समुदायों की संख्या और राजनीतिक भागीदारी समय के साथ बदली है।
लेकिन इन बदलावों को सीधे किसी धार्मिक शासन में परिवर्तन के बराबर रखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
ब्रिटेन की संवैधानिक व्यवस्था, संसद, न्यायपालिका और राजनीतिक संस्थाएं अब भी उसी संवैधानिक ढांचे में काम करती हैं।
इसलिए ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ वाला संबोधन नेतन्याहू की राजनीतिक भाषा है, ब्रिटेन की आधिकारिक पहचान नहीं।
नेतन्याहू की टिप्पणी से फिर गरम हुई इजराइल-यूरोप बहस
गाजा युद्ध के बाद इजराइल और यूरोपीय देशों के बीच संबंध पहले से अधिक जटिल हो चुके हैं।
जहां कुछ देश इजराइल की सुरक्षा चिंताओं और हमास के हमले की निंदा करते हैं, वहीं वे गाजा में नागरिकों की स्थिति और इजराइली सैन्य कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाते हैं।
नेतन्याहू इन आलोचनाओं को कई बार पश्चिमी समाजों में बदलते राजनीतिक समीकरणों से जोड़ते हैं।
उनका ताजा बयान इसी बहस को फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ले आया है।

