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Nevada में जमीन के 900 फीट नीचे अमेरिका का बड़ा विस्फोट, परमाणु बम नहीं फिर भी मचा कंपन; जानिए किस खतरे का पता लगाने की तैयारी

अमेरिका ने बुधवार को Nevada में जमीन के करीब 900 फीट नीचे एक बड़ा भूमिगत विस्फोट किया। सुनने में यह किसी परमाणु परीक्षण जैसा लग सकता है, लेकिन इस प्रयोग में परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं किया गया। वैज्ञानिकों ने शक्तिशाली रासायनिक विस्फोटकों का इस्तेमाल किया और विस्फोट से पैदा होने वाले कंपन, ध्वनि और दूसरे संकेतों को अत्याधुनिक सेंसरों के जरिए रिकॉर्ड किया।

इस पूरे प्रयोग का मकसद विस्फोट करना नहीं, बल्कि यह समझना था कि अगर भविष्य में कोई देश जमीन के भीतर छोटे परमाणु विस्फोट को इस तरह छिपाने की कोशिश करे कि उसके संकेत सामान्य निगरानी प्रणालियों तक कमजोर रूप में पहुंचें, तो उसे कैसे पहचाना जा सकता है।

यानी अमेरिका का यह प्रयोग सीधे तौर पर परमाणु हथियार का परीक्षण नहीं था, बल्कि परमाणु परीक्षण का पता लगाने वाली तकनीक को मजबूत करने की कोशिश था।

नेवादा में 900 फीट नीचे क्यों किया गया प्रयोग?

यह प्रयोग Nevada National Security Site (NNSS) के P-Tunnel इलाके में किया गया। यह क्षेत्र जमीन की सतह से लगभग 900 फीट नीचे स्थित है और लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा तथा वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए इस्तेमाल होता रहा है।

वैज्ञानिकों ने भूमिगत सुरंग के अंदर रासायनिक विस्फोटक लगाए। विस्फोट के दौरान पैदा होने वाले विभिन्न संकेतों को रिकॉर्ड करने के लिए कई प्रकार के सेंसर लगाए गए थे।

इन सेंसरों का उद्देश्य केवल जमीन के कंपन को रिकॉर्ड करना नहीं था। विस्फोट के दौरान पैदा होने वाली ध्वनि, कंपन और अन्य भौतिक संकेतों का भी अध्ययन किया गया।

बाद में इन आंकड़ों का इस्तेमाल कंप्यूटर मॉडल तैयार करने और ऐसे निगरानी सिस्टम को बेहतर बनाने में किया जाएगा, जो दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाले संभावित भूमिगत परमाणु विस्फोट का पता लगाने में मदद कर सकें।

परमाणु बम की जगह रासायनिक विस्फोटक क्यों इस्तेमाल किए गए?

यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है कि जब प्रयोग का संबंध परमाणु विस्फोट का पता लगाने से था, तो अमेरिका ने खुद परमाणु बम का इस्तेमाल क्यों नहीं किया?

इसका सीधा कारण प्रयोग का उद्देश्य है।

अमेरिका यह परीक्षण करने नहीं गया था कि परमाणु बम कितना शक्तिशाली है। वैज्ञानिकों को यह समझना था कि भूमिगत विस्फोट के संकेत सेंसरों तक किस तरह पहुंचते हैं और उन्हें किस तरह पहचाना जा सकता है।

इसलिए परमाणु सामग्री का इस्तेमाल करने के बजाय रासायनिक विस्फोटकों से नियंत्रित भूमिगत विस्फोट किया गया। इसके बाद सेंसरों से मिले आंकड़ों का अध्ययन किया गया।

इस तरह प्रयोग में परमाणु विस्फोट किए बिना उस तरह के भौतिक संकेतों को समझने की कोशिश की गई, जो किसी भूमिगत विस्फोट के दौरान पैदा हो सकते हैं।

जमीन के नीचे परमाणु विस्फोट का पता कैसे चलता है?

जमीन के अंदर कोई बड़ा विस्फोट होने पर आसपास की चट्टानों और मिट्टी में ऊर्जा फैलती है। इससे जमीन में कंपन पैदा होता है। यह कंपन कई मामलों में भूकंप से पैदा होने वाले भूकंपीय संकेतों जैसा दिखाई दे सकता है।

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लगे निगरानी सेंसर ऐसे संकेतों को रिकॉर्ड करते हैं। वैज्ञानिक इन आंकड़ों का विश्लेषण करके विस्फोट की जगह, उसकी प्रकृति और उसकी संभावित ताकत के बारे में जानकारी निकालने की कोशिश करते हैं।

परमाणु परीक्षण का पता लगाने के लिए केवल एक सेंसर पर निर्भर नहीं रहा जाता। अलग-अलग स्रोतों से मिले संकेतों और आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है।

यही वजह है कि अमेरिका का नया प्रयोग महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य ऐसे संकेतों को बेहतर ढंग से समझना है, जो किसी छिपे हुए या छोटे भूमिगत विस्फोट के दौरान पैदा हो सकते हैं।

‘डिकपलिंग’ क्या है? आसान भाषा में समझिए

यहीं से कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शुरू होता है। भूमिगत परमाणु विस्फोट के संकेतों को कमजोर करने की कोशिश को तकनीकी भाषा में ‘डिकपलिंग’ (Decoupling) कहा जाता है।

आसान भाषा में समझें तो किसी विस्फोट से पैदा होने वाली ऊर्जा का एक हिस्सा जमीन के आसपास के हिस्से में कंपन पैदा करता है। अगर विस्फोट को ऐसी भूमिगत संरचना में किया जाए, जहां आसपास की चट्टानों तक ऊर्जा का स्थानांतरण कम हो, तो बाहर तक पहुंचने वाला भूकंपीय संकेत अपेक्षाकृत कमजोर हो सकता है।

ऐसे में निगरानी करने वाले सेंसरों को विस्फोट का संकेत सामान्य परिस्थितियों की तुलना में कम स्पष्ट मिल सकता है।

यही वह चुनौती है जिसे अमेरिका अपने नए प्रयोगों के जरिए बेहतर तरीके से समझना चाहता है।

अमेरिका का नया प्रयोग इसी मुश्किल को समझने की कोशिश

नेवादा में किया गया प्रयोग इसी सवाल पर केंद्रित था कि अगर जमीन के अंदर होने वाले किसी विस्फोट के संकेत सामान्य से कमजोर हों, तो उन्हें कैसे पहचाना जाए।

वैज्ञानिकों ने नियंत्रित परिस्थितियों में रासायनिक विस्फोट किया और उसके बाद सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों को रिकॉर्ड किया। इन आंकड़ों से यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग परिस्थितियों में भूमिगत विस्फोट किस तरह के संकेत पैदा करता है।

आगे चलकर इन आंकड़ों को कंप्यूटर मॉडल में शामिल किया जा सकता है। इससे परमाणु परीक्षणों की निगरानी करने वाले सिस्टम को उन परिस्थितियों में भी बेहतर बनाया जा सकता है, जहां विस्फोट के संकेत जानबूझकर कमजोर करने की कोशिश की गई हो।

चीन पर अमेरिका लगा चुका है गुप्त परमाणु परीक्षण का आरोप

अमेरिका का यह प्रयोग ऐसे समय में हुआ है, जब वॉशिंगटन पहले चीन पर गुप्त परमाणु परीक्षण करने की कोशिश का आरोप लगा चुका है।

अमेरिका ने वर्ष 2020 में चीन के शिनजियांग स्थित लोप नूर परमाणु परीक्षण केंद्र को लेकर आरोप लगाए थे। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, 22 जून 2020 को वहां ऐसा भूमिगत परीक्षण किए जाने की आशंका थी, जिसे सामान्य निगरानी से छिपाने की कोशिश की गई।

अमेरिकी पक्ष ने उस समय लगभग 2.75 तीव्रता का भूकंपीय झटका दर्ज होने का हवाला दिया था। अमेरिकी अधिकारियों का दावा था कि यह सामान्य भूकंप या खनन गतिविधि से हुआ विस्फोट नहीं था।

हालांकि, चीन ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया था।

चीन ने कहा था- कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया

चीन ने अमेरिका के आरोपों को स्वीकार नहीं किया था। उसका कहना था कि उसने कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया और अमेरिका बिना पर्याप्त सबूत के इस तरह के आरोप लगा रहा है।

यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। CTBTO यानी Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty Organization के निगरानी नेटवर्क को उस दिन परमाणु परीक्षण का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला था।

उस समय दो छोटे भूकंपीय झटके जरूर रिकॉर्ड किए गए थे, लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निश्चित नहीं किया जा सका था कि उनकी वजह सामान्य भूकंप थी, कोई अन्य विस्फोट था या परमाणु गतिविधि।

यही अनिश्चितता भूमिगत विस्फोटों की निगरानी की तकनीकी चुनौती को सामने लाती है।

लोप नूर विवाद और ‘डिकपलिंग’ का कनेक्शन

अमेरिका के आरोपों में डिकपलिंग तकनीक का भी जिक्र आया था। अमेरिकी अधिकारियों का कहना था कि संभावित विस्फोट को जमीन के भीतर एक बड़ी भूमिगत संरचना या गुफा में किया गया हो सकता है।

सैद्धांतिक रूप से ऐसी व्यवस्था विस्फोट से पैदा होने वाली ऊर्जा के एक हिस्से को आसपास की चट्टानों तक पहुंचने से कम कर सकती है। इससे भूकंपीय संकेत अपेक्षाकृत कमजोर हो सकते हैं और निगरानी प्रणाली के लिए घटना की पहचान अधिक कठिन हो सकती है।

लेकिन किसी विशेष घटना में वास्तव में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल हुआ था या नहीं, यह अलग वैज्ञानिक और खुफिया जांच का विषय है। चीन ने 2020 के आरोपों से इनकार किया था और CTBTO नेटवर्क को भी उस समय परमाणु परीक्षण का स्पष्ट संकेत नहीं मिला था।

अमेरिका को इस प्रयोग से क्या फायदा होगा?

नेवादा में किया गया प्रयोग अमेरिका के लिए मुख्य रूप से न्यूक्लियर टेस्ट डिटेक्शन सिस्टम को बेहतर बनाने से जुड़ा है।

अगर किसी देश द्वारा भूमिगत परमाणु परीक्षण किया जाता है, तो उसकी पहचान के लिए भूकंपीय और अन्य संकेत महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन छोटे विस्फोट, जटिल भूगर्भीय परिस्थितियां या संकेतों को कमजोर करने की कोशिश निगरानी को कठिन बना सकती है।

नए प्रयोग से मिलने वाले डेटा का इस्तेमाल ऐसे कंप्यूटर मॉडल विकसित करने में किया जा सकता है, जो विभिन्न प्रकार के भूमिगत विस्फोटों के संकेतों को अलग-अलग परिस्थितियों में समझने में मदद करें।

इसका इस्तेमाल भविष्य में किसी संदिग्ध घटना के विश्लेषण के दौरान यह तय करने में मदद मिल सकता है कि रिकॉर्ड किया गया संकेत प्राकृतिक भूकंप से जुड़ा है या किसी मानव निर्मित विस्फोट से।

यह परमाणु परीक्षण नहीं, परमाणु परीक्षण पकड़ने की तैयारी थी

नेवादा में हुए विस्फोट को लेकर सबसे अहम बात यही है कि इसे परमाणु हथियार परीक्षण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। प्रयोग में परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं किया गया था।

वैज्ञानिकों ने रासायनिक विस्फोटकों के जरिए नियंत्रित भूमिगत विस्फोट किया और उससे पैदा होने वाले संकेतों को रिकॉर्ड किया। इसका लक्ष्य परमाणु विस्फोट के संभावित संकेतों को बेहतर ढंग से समझना और निगरानी प्रणाली की क्षमता बढ़ाना था।

इस प्रयोग का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि दुनिया में परमाणु परीक्षणों की निगरानी केवल खुले तौर पर घोषित परीक्षणों तक सीमित नहीं है। संभावित गुप्त परीक्षणों का पता लगाना भी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अमेरिका-चीन आरोपों की पृष्ठभूमि में प्रयोग पर नजर

नेवादा का यह प्रयोग ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से ही कई क्षेत्रों में बनी हुई है। हालांकि इस प्रयोग को सीधे चीन के खिलाफ किसी कार्रवाई के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा, लेकिन अमेरिका की परमाणु परीक्षण निगरानी क्षमता को मजबूत करने की कोशिश का रणनीतिक महत्व जरूर है।

विशेष रूप से 2020 में लोप नूर को लेकर लगे आरोपों और उनके चीनी खंडन के बाद भूमिगत विस्फोटों की पहचान का मुद्दा चर्चा में रहा है।

वैज्ञानिकों के लिए चुनौती यह है कि प्राकृतिक भूकंप, औद्योगिक विस्फोट और संभावित परमाणु विस्फोट से पैदा होने वाले संकेतों में अंतर को अधिक सटीकता से पहचाना जा सके।

नेवादा में किया गया यह प्रयोग इसी वैज्ञानिक चुनौती को समझने की दिशा में एक और कदम है।

नेवादा में अमेरिका का यह भूमिगत विस्फोट परमाणु बम का परीक्षण नहीं था। वैज्ञानिकों ने रासायनिक विस्फोटकों के जरिए जमीन के करीब 900 फीट नीचे नियंत्रित विस्फोट किया, ताकि कंपन और दूसरे संकेतों का अध्ययन किया जा सके। मकसद ऐसी तकनीक विकसित करना है, जिससे भविष्य में कोई देश छोटे या कमजोर संकेत वाले भूमिगत परमाणु विस्फोट को छिपाने की कोशिश करे तो उसका पता लगाने की क्षमता बेहतर हो सके।

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