Muzaffarnagar में आर्किप्लग उज्ज्वाला बायो एनर्जी सॉल्यूशंस का शुभारम्भ, 2037 तक भारत में 5,000 बायो-सीएनजी प्लांट लगाने का लक्ष्य
Muzaffarnagar । भारत में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने और बायो-सीएनजी के क्षेत्र में उन्नत तकनीक के विस्तार की दिशा में एक नई पहल की गई है। भारत की उज्ज्वाला बायो एनर्जी सॉल्यूशंस और फिनलैंड की आर्किप्लग के सहयोग से स्थापित आर्किप्लग उज्ज्वाला बायो एनर्जी सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड का 21 अक्टूबर 2026 को मुजफ्फरनगर के पलासा होटल में शुभारम्भ किया गया। इस अवसर पर आयोजित प्रेसवार्ता में कंपनी के प्रतिनिधियों ने एडवांस्ड ड्राई तकनीक, बायो-सीएनजी उत्पादन, पराली प्रबंधन और भारत में भविष्य की विस्तार योजनाओं की जानकारी दी।
कंपनी का उद्देश्य उन्नत ड्राई तकनीक के माध्यम से भारत में बायो-सीएनजी परियोजनाओं का विस्तार करना और जैविक संसाधनों से स्वच्छ ऊर्जा तैयार करने को प्रोत्साहित करना है। कंपनी के प्रतिनिधियों के अनुसार, इस तकनीक से पानी की खपत कम करने और विभिन्न प्रकार के जैविक कच्चे माल का उपयोग करने की संभावनाएं बढ़ती हैं। इससे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के आधार पर बायो-सीएनजी परियोजनाएं विकसित की जा सकती हैं।
भारत में अब तक 48 प्लांट स्थापित होने का दावा
प्रेसवार्ता में फिनलैंड की कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर नीका ने बताया कि कंपनी वर्ष 2019 से भारत में काम कर रही है। उनके अनुसार, अब तक 48 प्लांट स्थापित किए जा चुके हैं और आने वाले समय में इनकी संख्या 100 तक पहुंचाने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि परियोजनाओं में फिनलैंड की तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका है।
नीका ने बताया कि बायोगैस आधारित तकनीक से तैयार गैस का उपयोग सीएनजी के विकल्प के रूप में किया जा सकता है। इसके माध्यम से घरों, उद्योगों और वाहनों के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराने की संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि घरेलू स्तर पर बायो-सीएनजी का उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने यह भी बताया कि बायो-सीएनजी उत्पादन के बाद बचने वाले जैविक अवशेषों का उपयोग खाद के रूप में किया जा सकता है। इससे ऊर्जा उत्पादन के साथ कृषि के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार करने की संभावना भी बनती है। हालांकि, गैस की गुणवत्ता, उत्सर्जन और अवशेषों की उपयोगिता वास्तविक संयंत्रों की तकनीक तथा संचालन पर निर्भर करेगी।
2037 तक 5,000 प्लांट लगाने की योजना
नीका ने भारत में कंपनी की दीर्घकालिक योजनाओं की जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष 2037 तक देश में 5,000 प्लांट स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि भारत में सीएनजी की मांग को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भरता कम करना ऊर्जा क्षेत्र की महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल है। घरेलू स्तर पर बायो-सीएनजी उत्पादन बढ़ने से इस दिशा में योगदान मिल सकता है।
उनके अनुसार, बायो-सीएनजी परियोजनाओं का विस्तार केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है। इससे कृषि अवशेषों और अन्य जैविक सामग्रियों के बेहतर उपयोग, स्थानीय संसाधनों के मूल्यवर्धन तथा स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों को बढ़ावा देने के अवसर भी पैदा हो सकते हैं। कंपनी ने आगामी वर्षों में भारत में अपनी तकनीक के विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही।
पराली की समस्या के समाधान में भी तकनीक का उपयोग
प्रेसवार्ता में पंजाब और हरियाणा में पराली प्रबंधन का मुद्दा भी उठाया गया। नीका ने बताया कि पराली आधारित संयंत्र अम्बाला में काम कर रहा है। कृषि अवशेषों को ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल करना पराली के उचित प्रबंधन का एक विकल्प हो सकता है। इससे खेतों में अवशेषों के निपटान की समस्या कम करने और जैविक सामग्री को उपयोगी संसाधन में बदलने की संभावनाएं बनती हैं।
भारत के कई कृषि क्षेत्रों में फसल कटाई के बाद बचने वाले अवशेषों का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती रहा है। ऐसे में बायो-सीएनजी संयंत्रों के लिए पराली और दूसरे जैविक कच्चे माल का उपयोग किसानों, उद्योगों और ऊर्जा क्षेत्र के बीच सहयोग के नए अवसर पैदा कर सकता है। हालांकि, इन परियोजनाओं की सफलता कच्चे माल की नियमित उपलब्धता, संग्रहण, परिवहन और संयंत्र की आर्थिक व्यवहार्यता पर भी निर्भर करेगी।
एडवांस्ड ड्राई तकनीक से पानी की खपत कम करने पर जोर
प्रेसवार्ता के दौरान किरीट प्रजापति ने कहा कि उन्नत जैव-ऊर्जा तकनीक भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने बायो-सीएनजी परियोजनाओं का विस्तार करने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. आलोक अग्रवाल ने कहा कि भारत में बायो-सीएनजी क्षेत्र के विकास के लिए एडवांस्ड मल्टी-फीड तकनीक की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि इसी उद्देश्य से आर्किप्लग के साथ मिलकर एडवांस्ड ड्राई तकनीक पर आधारित परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की पहल की गई है। इस सहयोग के माध्यम से विभिन्न जैविक सामग्रियों के उपयोग और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की संभावनाओं को विकसित करने पर ध्यान दिया जाएगा।
नीरज कुमार सिंह ने बताया कि कंपनी एडवांस्ड ड्राई तकनीक पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रही है। उनके अनुसार, इस तकनीक का एक प्रमुख लाभ पानी की खपत को कम करना है। मल्टी-फीड व्यवस्था के माध्यम से विभिन्न प्रकार की जैविक सामग्रियों को उपयोग में लाने की संभावना भी बढ़ती है। इससे किसी क्षेत्र में उपलब्ध कच्चे माल के अनुसार परियोजना की योजना तैयार की जा सकती है।
स्वच्छ ऊर्जा और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में पहल
कंपनी के प्रतिनिधियों ने कहा कि भारत में बायो-सीएनजी क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए उन्नत तकनीक का विस्तार महत्वपूर्ण है। जैविक कचरे, कृषि अवशेषों और अन्य उपयुक्त सामग्रियों से ऊर्जा तैयार करने की परियोजनाएं संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद कर सकती हैं। इसके साथ ही, ऐसी परियोजनाओं से स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण, परिवहन और संयंत्र संचालन से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।
कार्यक्रम के दौरान कंपनी ने अपने तकनीकी दृष्टिकोण, भविष्य की योजनाओं और भारत में एडवांस्ड ड्राई तकनीक के विस्तार की संभावनाओं को साझा किया। कंपनी के निदेशकों ने बायो-सीएनजी उत्पादन बढ़ाने, उन्नत तकनीक को प्रोत्साहित करने और देश में हरित ऊर्जा के विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।
प्रेसवार्ता में उज्ज्वाला की मीडिया प्रमुख लवी अग्रवाल, किरीट प्रजापति, डॉ. आलोक अग्रवाल और नीरज कुमार सिंह सहित अन्य प्रतिनिधि मौजूद रहे। कंपनी की ओर से घोषित लक्ष्यों के अनुसार, आने वाले वर्षों में भारत में बायो-सीएनजी संयंत्रों का विस्तार इस पहल का प्रमुख केंद्र रहेगा।
मुजफ्फरनगर में शुरू हुई यह पहल भारत में बायो-सीएनजी उत्पादन और उन्नत जैव-ऊर्जा तकनीक के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि घोषित योजनाएं निर्धारित समयसीमा में लागू होती हैं, तो कृषि अवशेषों के उपयोग, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को गति मिल सकती है।

