डिएगो गार्सिया पर Trump का तीखा हमला: ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते से भड़के अमेरिकी राष्ट्रपति, हिंद महासागर में नई जियोपॉलिटिक्स की आहट
Diego Garcia island dispute एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड Trump ने ब्रिटेन पर तीखा हमला बोलते हुए मॉरीशस को यह द्वीप सौंपने की योजना को “हैरान करने वाला और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक” बताया। ट्रुथ सोशल पर दिए गए बयान में ट्रम्प ने इस फैसले को न केवल रणनीतिक भूल कहा, बल्कि इसे चीन और रूस जैसी वैश्विक शक्तियों के लिए अवसर करार दिया।
हिंद महासागर के बीच स्थित यह द्वीप केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण सैन्य और समुद्री रणनीतिक केंद्रों में से एक माना जाता है। इसी वजह से ट्रम्प की प्रतिक्रिया ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई बहस को जन्म दे दिया है।
🔴 ट्रुथ सोशल पर ट्रम्प का तीखा बयान
डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि यह “हैरानी की बात है कि हमारा शानदार नाटो सहयोगी ब्रिटेन, डिएगो गार्सिया जैसे अहम द्वीप को बिना किसी ठोस कारण के मॉरीशस को सौंपने की योजना बना रहा है।”
उन्होंने यह भी दावा किया कि चीन और रूस इस फैसले को कमजोरी के संकेत के रूप में देख रहे हैं। ट्रम्प के अनुसार, ये देश केवल ताकत की भाषा समझते हैं और इसी वजह से उनकी लीडरशिप में अमेरिका को वैश्विक मंच पर पहले से ज्यादा सम्मान मिला है।
🔴 क्यों अहम है डिएगो गार्सिया द्वीप
Diego Garcia island dispute को समझने के लिए इसके भौगोलिक और रणनीतिक महत्व को जानना जरूरी है। यह द्वीप चागोस आइलैंड समूह का हिस्सा है, जो हिंद महासागर में स्थित है। यह ब्रिटेन से लगभग 9,300 किलोमीटर दूर और मॉरीशस से करीब 2,000 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है।
यहां ब्रिटेन और अमेरिका का संयुक्त सैन्य अड्डा मौजूद है, जिसे हिंद महासागर क्षेत्र में सबसे अहम रणनीतिक ठिकानों में गिना जाता है। इस बेस से अमेरिका और उसके सहयोगी देश एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व तक सैन्य और निगरानी गतिविधियां संचालित करते हैं।
🔴 इतिहास की जड़ें: नेपोलियन से लेकर आधुनिक दौर तक
1814 में नेपोलियन की हार के बाद पेरिस संधि के तहत चागोस आइलैंड और मॉरीशस ब्रिटेन के कब्जे में आए। 1965 में इन द्वीपों को “ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र” घोषित कर मॉरीशस से अलग कर दिया गया।
1968 में मॉरीशस को स्वतंत्रता मिली, लेकिन उस समय यह शर्त रखी गई थी कि जब ये द्वीप ब्रिटेन की रक्षा जरूरतों के लिए जरूरी नहीं रहेंगे, तब उन्हें मॉरीशस को लौटा दिया जाएगा।
डिएगो गार्सिया पर संयुक्त ब्रिटेन-अमेरिका सैन्य अड्डा बनाए जाने के बाद वहां रहने वाले लोगों को मॉरीशस और सेशेल्स में बसाया गया, जबकि कुछ को 2002 में ब्रिटेन लाया गया।
🔴 अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला और ब्रिटेन की रणनीति
मॉरीशस ने 1980 के दशक से इन द्वीपों पर अपना दावा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया। 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा कि मॉरीशस को आजादी देते समय उपनिवेश खत्म करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी और ब्रिटेन को चागोस आइलैंड्स का प्रशासन समाप्त करना चाहिए।
इसके बाद ब्रिटेन की कंजरवेटिव सरकार ने 2022 में घोषणा की कि वह मॉरीशस के साथ संप्रभुता को लेकर बातचीत शुरू करेगी। उद्देश्य था कानूनी चुनौतियों से बचना और डिएगो गार्सिया पर सैन्य अड्डे की स्थिति को सुरक्षित रखना।
🔴 समझौते पर हस्ताक्षर और नई सरकार का रुख
2024 में लेबर पार्टी के सत्ता में आने के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम ने मई 2025 में संधि पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत मॉरीशस को द्वीपों की संप्रभुता मिलेगी, जबकि ब्रिटेन डिएगो गार्सिया को 99 साल की लीज पर अपने पास रखेगा, जिसे आगे बढ़ाने का विकल्प भी होगा।
ब्रिटिश सरकार के अनुसार, इससे अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा सुरक्षित और सुचारू रूप से चलता रहेगा।
🔴 विपक्ष का विरोध और आर्थिक बहस
ब्रिटेन की विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी ने इस समझौते को “आत्मसमर्पण” करार दिया है। पार्टी का दावा है कि ब्रिटेन अपनी ही जमीन को वापस किराए पर लेने के लिए अरबों पाउंड खर्च करेगा।
अनुमान है कि शुरुआती 99 वर्षों में ब्रिटेन को हर साल औसतन 101 मिलियन पाउंड का भुगतान करना होगा, जिससे कुल खर्च करीब 3.4 अरब पाउंड तक पहुंच सकता है।
🔴 अमेरिका का बदला हुआ रुख और ट्रम्प की नाराजगी
हालांकि फरवरी 2025 में ट्रम्प ने खुद इस समझौते को आगे बढ़ाने के पक्ष में बयान दिया था, लेकिन अब उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। उन्होंने यहां तक कहा कि इस फैसले जैसे मुद्दों की वजह से अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड जैसे रणनीतिक क्षेत्रों का महत्व और बढ़ जाता है।
🔴 बदलती जियोपॉलिटिक्स में भारत की भूमिका
Diego Garcia island dispute के बीच भारत के लिए मॉरीशस और चागोस आइलैंड का महत्व तेजी से बढ़ा है। भारत सरकार ने 2025 में ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते का स्वागत किया था।
भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र के लिए अलग डिवीजन बनाया है, जिसमें मॉरीशस, सेशेल्स, मेडागास्कर, श्रीलंका और मालदीव जैसे देश शामिल हैं। इससे साफ है कि भारत इस क्षेत्र को रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानता है।
🔴 चीन की बढ़ती मौजूदगी और वैश्विक चिंता
पिछले एक दशक में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सैन्य और आर्थिक मौजूदगी तेजी से बढ़ाई है। उसने कई बंदरगाहों में निवेश किया है, जहां सैन्य जहाज भी रुक सकते हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने मॉरीशस के अगालेगा द्वीप पर हवाई पट्टी बनाई है, ताकि क्षेत्र में चीनी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।
🔴 मॉरीशस बना महाशक्तियों का केंद्र
मॉरीशस अब केवल एक द्वीपीय देश नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीति का अहम केंद्र बनता जा रहा है। भारत, चीन और अमेरिका—तीनों यहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत ने मेट्रो, अस्पताल और न्यायिक भवन जैसे प्रोजेक्ट बनाए हैं, जबकि चीन ने एयरपोर्ट टर्मिनल, बांध और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में निवेश किया है।
🔴 वैश्विक समुद्री मार्गों की धड़कन है हिंद महासागर
हिंद महासागर के जरिए दुनिया का लगभग 40% समुद्री तेल और बड़ा हिस्सा व्यापारिक माल गुजरता है। यह महासागर यूरोप, एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व को जोड़ने वाले सबसे अहम समुद्री मार्गों का केंद्र है।
इसी वजह से डिएगो गार्सिया जैसे द्वीप केवल सैन्य नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

