Muzaffarnagar में किसानों का आंदोलन: ज़मीन पर कब्ज़ा और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच गरमाया माहौल
Muzaffarnagar में किसानों और डीएस कंपनी के बीच चल रहा ज़मीन विवाद अब गरमाता जा रहा है। 26 जून 2024 से शुरू हुआ यह मामला तब गंभीर हो गया जब किसानों ने चंदन फार्म पर लंबा धरना प्रदर्शन शुरू किया। भारतीय किसान यूनियन (तोमर) के प्रदेश प्रभारी अजय त्यागी और जिलाध्यक्ष निखिल चौधरी की अगुवाई में किसान लगातार अपनी जमीनों की रक्षा के लिए आवाज़ उठा रहे हैं।
किसानों का आरोप है कि डीएस कंपनी ने जबरन उनकी और ग्राम समाज की जमीन पर कब्जा कर लिया है। किसानों का कहना है कि कंपनी ने ज़मीन पर अवैध रूप से प्लॉटिंग का काम शुरू कर दिया और यहां तक कि एक पॉली हाउस भी तैयार कर लिया। इससे नाराज़ किसानों ने चार महीने तक आंदोलन किया और इस दौरान जिला प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई।
प्रशासन की कार्रवाई और हाईकोर्ट का आदेश
किसानों के दबाव के बाद, प्रशासन हरकत में आया और एसडीएम परमानंद झा ने जमीन की पैमाइश करवाई। हाईकोर्ट के आदेश के तहत विवादित जमीन पर स्टे लगने के बाद डीएस कंपनी को चेतावनी दी गई कि जब तक कोई नया आदेश नहीं आता, तब तक यहां कोई निर्माण कार्य नहीं किया जाएगा।
हालांकि, किसानों का आरोप है कि प्रशासन ने उनकी मांगों को अनसुना कर धरने को समाप्त कराने के लिए बल का इस्तेमाल किया। धरने पर बैठे किसानों को न केवल हटाया गया बल्कि उनका चालान भी कर दिया गया। इससे किसानों में रोष फैल गया और इसे उन्होंने लोकतंत्र की हत्या करार दिया।
किसानों की चेतावनी: “आवश्यकता पड़ी तो विधानसभा कूच करेंगे”
जिलाध्यक्ष निखिल चौधरी ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर किसानों की मांगें नहीं मानी गईं, तो संगठन 24 दिसंबर को सहारनपुर कमिश्नर कार्यालय के सामने बड़ा प्रदर्शन करेगा। इसके बाद भी न्याय नहीं मिला, तो भारतीय किसान यूनियन (तोमर) लखनऊ विधानसभा तक कूच करेगी।
अजय त्यागी ने कहा कि यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि किसानों की अस्मिता और अधिकारों का है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश होने के बावजूद डीएस कंपनी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई न होना प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाता है।
विरोध प्रदर्शन में जुटे सैकड़ों किसान
किसानों का यह विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे बड़ा रूप लेता जा रहा है। जिले भर से किसान संगठन के नेता और कार्यकर्ता इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्रवण त्यागी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रभारी मनीष गुर्जर, जिला उपाध्यक्ष शमशाद अहमद, और अन्य कई प्रमुख नेता इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।
धरने के दौरान किसानों ने कहा कि यह मामला सिर्फ एक संगठन का नहीं है, बल्कि हर उस किसान का है, जिसकी जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की जाती है। इस आंदोलन ने ग्रामीण इलाकों में प्रशासन के रवैये पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
डीएस कंपनी की प्रतिक्रिया पर सस्पेंस
किसानों द्वारा लगाए गए आरोपों के बावजूद, डीएस कंपनी की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कंपनी ने जमीन पर अवैध निर्माण किया, लेकिन अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज कर दिया। कंपनी के अधिकारियों की चुप्पी ने मामले को और पेचीदा बना दिया है।
प्रशासन की चुप्पी और कंपनी की गतिविधियों पर सवाल उठाते हुए किसान नेताओं ने कहा कि वे अपनी जमीन की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश
इस विवाद ने ग्रामीण इलाकों में भारी तनाव पैदा कर दिया है। चंदन फार्म के आसपास के गांवों के किसान अब एकजुट होकर आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। गांवों में पंचायतें आयोजित की जा रही हैं, जहां आंदोलन को और तेज़ करने की रणनीति बनाई जा रही है।
किसानों ने कहा कि जमीन सिर्फ उनकी रोज़ी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान भी है। उन्होंने प्रशासन पर आरोप लगाया कि वह बड़े उद्योगपतियों के दबाव में काम कर रहा है।
प्रदर्शन के असर और भविष्य की योजनाएं
इस आंदोलन ने स्थानीय राजनीति को भी गर्मा दिया है। कई विपक्षी दलों ने भी किसानों का समर्थन किया है और प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। किसानों का कहना है कि वे अपने हक के लिए लड़ते रहेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कितना भी लंबा संघर्ष करना पड़े।
24 दिसंबर को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले किसान संगठन अपने आंदोलन को धार देने के लिए हर स्तर पर प्रयास कर रहा है। धरने और पंचायतों के जरिए किसानों को आंदोलन में शामिल करने का काम हो रहा है।
“किसान बनाम प्रशासन” की लड़ाई जारी
मुजफ्फरनगर का यह मामला न सिर्फ जमीन विवाद की कहानी है, बल्कि यह किसानों के अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बन गया है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और किसान संगठन के बीच का यह टकराव किस दिशा में जाता है।
किसानों की यह लड़ाई सिर्फ एक स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए एक संदेश है कि उनके हक और जमीन की रक्षा के लिए उन्हें संगठित और सशक्त रहना होगा।

