बाब अल-मंदेब में Houthi का कहर: सऊदी से जुड़े जहाज पर मिसाइल हमला, 4 की मौत; होर्मुज के बाद अब लाल सागर में बढ़ा खतरा
Bab al-Mandeb यानी बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में एक बार फिर समुद्री सुरक्षा का संकट गहरा गया है। यमन के Houthi विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब से जुड़े एक कारोबारी जहाज को निशाना बनाए जाने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग जगत की चिंता बढ़ा दी है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक हमले में जहाज के चार क्रू मेंबर मारे गए, जिनमें तीन पाकिस्तानी और एक इंडोनेशियाई नागरिक बताया गया है।
रिपोर्टों के अनुसार तंजानिया के झंडे वाला जहाज ‘तिहामा’ ओमान के सलालाह पोर्ट से जिबूती की ओर जा रहा था। इसी दौरान बाब अल-मंदेब के आसपास उसे मिसाइल हमले का सामना करना पड़ा।
यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब मध्य पूर्व के समुद्री मार्ग पहले ही गंभीर दबाव में हैं। होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी बाधाओं और तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा तथा समुद्री कारोबार प्रभावित है। अब लाल सागर और बाब अल-मंदेब में जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं बढ़ने से शिपिंग कंपनियों के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
अगर लाल सागर का यह महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता भी लंबे समय तक असुरक्षित बना रहता है, तो इसका असर केवल जहाजों तक सीमित नहीं रहेगा। ईंधन की कीमत, माल ढुलाई, बीमा प्रीमियम, सप्लाई चेन और यूरोप-एशिया के बीच सामान पहुंचने में लगने वाला समय भी प्रभावित हो सकता है।
बाब अल-मंदेब में मिसाइल हमला, जहाज के चार क्रू मेंबर मारे गए
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को सऊदी अरब से जुड़े जहाज को निशाना बनाया। जहाज तंजानिया के झंडे के तहत चल रहा था और उसका नाम ‘तिहामा’ बताया गया है।
यह जहाज ओमान के सलालाह बंदरगाह से जिबूती की ओर जा रहा था। यात्रा के दौरान उस पर मिसाइल हमला किया गया।
हमले में चार क्रू सदस्यों की मौत की खबर है। इनमें तीन पाकिस्तान और एक इंडोनेशिया का नागरिक बताया गया है।
यदि इस घटना की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार होती है, तो यह सऊदी से जुड़े जहाजों पर हूतियों के हालिया हमलों में सबसे गंभीर घटनाओं में से एक है, क्योंकि इसमें पहली बार जान जाने की बात सामने आई है।
समुद्री जहाजों पर हमले का असर केवल उस जहाज और उसके चालक दल तक सीमित नहीं रहता। ऐसी घटनाएं पूरी शिपिंग इंडस्ट्री के लिए जोखिम का संकेत बन जाती हैं और दूसरे जहाजों के ऑपरेटर भी अपने मार्ग पर दोबारा विचार करने लगते हैं।
20 जुलाई से सऊदी जहाजों को निशाना बनाने का अभियान
रिपोर्टों के मुताबिक हूती विद्रोहियों ने 20 जुलाई से सऊदी से जुड़े जहाजों की नाकाबंदी शुरू करने की बात कही थी।
इसके बाद लाल सागर में सऊदी से जुड़े कई जहाजों को निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई। इनमें एनसिलिया, लायला, गजल और वफा जैसे जहाजों का उल्लेख किया गया है।
इन घटनाओं ने सऊदी अरब से जुड़े समुद्री कारोबार के लिए खतरा बढ़ा दिया है।
समुद्र में चलने वाले व्यापारिक जहाजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक सुरक्षा की पूर्वानुमेयता होती है। यदि किसी समुद्री मार्ग पर यह भरोसा खत्म हो जाए कि जहाज सुरक्षित रूप से गुजर पाएगा, तो कंपनियां वैकल्पिक मार्ग तलाशना शुरू कर देती हैं।
यही स्थिति अब बाब अल-मंदेब के आसपास बनती दिखाई दे रही है।
एक हमले से क्यों बढ़ जाती है पूरी शिपिंग इंडस्ट्री की चिंता?
समुद्री परिवहन में एक जहाज का रास्ता बदलना सुनने में मामूली लग सकता है, लेकिन वैश्विक सप्लाई चेन के लिए इसका प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।
यदि कोई जहाज लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते से बचता है तो उसे अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप के आसपास से होकर लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है।
इससे यात्रा की दूरी बढ़ती है।
दूरी बढ़ने का मतलब है ज्यादा ईंधन, ज्यादा समय, ज्यादा चालक दल लागत और कई मामलों में ज्यादा बीमा खर्च।
अगर एक साथ बड़ी संख्या में जहाज ऐसा करने लगें तो वैश्विक माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है।
होर्मुज के बाद अब बाब अल-मंदेब की चिंता
मध्य पूर्व के समुद्री व्यापार के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता यह है कि एक ही क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट पहले से ही वैश्विक ऊर्जा कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अब लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार बाब अल-मंदेब में भी जहाजों पर हमलों की खबरें सामने आ रही हैं।
इसका मतलब यह है कि ऊर्जा और माल परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले दो महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग एक साथ सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहे हैं।
शिपिंग कंपनियों के लिए यह स्थिति बेहद कठिन हो सकती है क्योंकि हर वैकल्पिक रास्ते की अपनी आर्थिक और भौगोलिक सीमाएं होती हैं।
बाब अल-मंदेब इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
बाब अल-मंदेब लाल सागर के दक्षिणी हिस्से में स्थित एक महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य है।
इसके एक तरफ यमन है, जबकि दूसरी ओर अफ्रीकी महाद्वीप के जिबूती और इरिट्रिया जैसे देश स्थित हैं।
यह जलमार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है।
यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार के लिए इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि लाल सागर से गुजरने वाले जहाज आगे स्वेज नहर के जरिए भूमध्य सागर तक पहुंच सकते हैं।
यानी एशिया से यूरोप जाने वाले कई समुद्री मार्गों में बाब अल-मंदेब शुरुआती महत्वपूर्ण कड़ी है।
बाब अल-मंदेब के बाद सीधे स्वेज नहर का रास्ता
बाब अल-मंदेब से गुजरने के बाद जहाज लाल सागर के उत्तर की ओर बढ़ते हैं और आगे स्वेज नहर के रास्ते भूमध्य सागर तक पहुंच सकते हैं।
स्वेज नहर वैश्विक समुद्री व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण मार्गों में से एक है।
यूरोप और एशिया के बीच समुद्री दूरी कम करने में इसकी भूमिका बेहद बड़ी है।
यदि जहाज बाब अल-मंदेब या लाल सागर से बचते हैं, तो उन्हें स्वेज नहर का लाभ नहीं मिल पाता और उन्हें अफ्रीका के चारों ओर लंबा रास्ता अपनाना पड़ता है।
यही कारण है कि बाब अल-मंदेब में अस्थिरता का असर हजारों किलोमीटर दूर यूरोप के बाजारों तक पहुंच सकता है।
रोज 50 से घटकर करीब 32 जहाज पहुंचने का दावा
केप्लर के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि पिछले सप्ताह बाब अल-मंदेब से रोजाना औसतन करीब 32 जहाज गुजरे।
इसके मुकाबले सामान्य परिस्थितियों में यहां लगभग 50 जहाज प्रतिदिन गुजरते थे।
यानी रोजाना करीब 18 जहाजों की कमी दर्ज की गई।
यह बदलाव केवल एक संख्या नहीं है। यह बताता है कि शिपिंग कंपनियां जोखिम को लेकर अपने संचालन में बदलाव कर रही हैं।
यदि जहाजों की संख्या लगातार घटती है तो इसका सीधा असर लाल सागर, स्वेज नहर और यूरोप-एशिया व्यापार के पूरे नेटवर्क पर पड़ सकता है।
कई जहाज अब अफ्रीका के चक्कर से जा रहे हैं
बाब अल-मंदेब से बचने वाले कई जहाज अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से के चारों ओर से यात्रा कर रहे हैं।
इस वैकल्पिक मार्ग को आमतौर पर केप ऑफ गुड होप के रास्ते के रूप में जाना जाता है।
समस्या यह है कि यह रास्ता काफी लंबा है।
जहाज को अधिक दूरी तय करनी पड़ती है और यात्रा का समय कई दिनों तक बढ़ सकता है।
इससे कंपनियों को ज्यादा ईंधन खर्च करना पड़ता है और माल की डिलीवरी में भी देरी हो सकती है।
लंबा रास्ता मतलब महंगा सामान
समुद्री परिवहन की लागत बढ़ने का असर अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
यदि किसी कंटेनर को यूरोप पहुंचने में ज्यादा समय लगता है तो उसके परिवहन, ईंधन, बीमा और संचालन का खर्च बढ़ सकता है।
इसके अलावा जहाजों की उपलब्धता और कंटेनर की आवाजाही में भी असंतुलन पैदा हो सकता है।
यदि समस्या लंबे समय तक बनी रही तो कंपनियां अपनी लॉजिस्टिक्स लागत को वस्तुओं की कीमत में शामिल कर सकती हैं।
इससे रोजमर्रा के कई सामान महंगे हो सकते हैं।
सप्लाई चेन पर बढ़ता दबाव सबसे बड़ा खतरा
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी हुई है।
एशिया में बनने वाला कोई उत्पाद यूरोप में बिकता है, उसका कच्चा माल किसी तीसरे देश से आता है और उसके पुर्जे कई अलग-अलग देशों में तैयार होते हैं।
ऐसे में एक प्रमुख समुद्री मार्ग में रुकावट पूरी सप्लाई चेन में देरी पैदा कर सकती है।
बाब अल-मंदेब में लगातार तनाव रहने पर कंपनियों को वैकल्पिक समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करना पड़ेगा।
इससे समय और लागत दोनों बढ़ सकते हैं।
तेल कारोबार पर भी पड़ सकता है असर
लाल सागर और बाब अल-मंदेब केवल कंटेनर जहाजों के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं।
ऊर्जा उत्पादों की समुद्री आवाजाही के लिए भी यह क्षेत्र रणनीतिक महत्व रखता है।
सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। यदि उसके तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों को ले जाने वाले जहाजों को सुरक्षा जोखिम महसूस होता है, तो समुद्री लॉजिस्टिक्स पर असर पड़ सकता है।
सऊदी तेल निर्यात की दिशा और मात्रा कई कारकों पर निर्भर करती है, लेकिन समुद्री मार्गों की सुरक्षा उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हूतियों के हमलों से सऊदी समुद्री कारोबार पर दबाव
रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सऊदी से जुड़े जहाजों पर हाल के हमलों ने समुद्री आवाजाही को प्रभावित किया है।
जहाज मालिक और ऑपरेटर किसी भी ऐसे मार्ग से बचना चाहते हैं जहां मिसाइल, ड्रोन या अन्य हमले का खतरा मौजूद हो।
सुरक्षा जोखिम बढ़ने पर जहाजों का बीमा भी महंगा हो सकता है।
यह अतिरिक्त लागत अंततः माल ढुलाई की कीमत में जुड़ सकती है।
यमन संघर्ष की जड़ें कहीं ज्यादा पुरानी हैं
लाल सागर में हूतियों की गतिविधियों को केवल हालिया जहाज हमलों के संदर्भ में समझना पूरी तस्वीर नहीं देता।
यमन लंबे समय से राजनीतिक और सैन्य संघर्ष से जूझ रहा है।
हूती आंदोलन ने यमन के बड़े हिस्से पर अपना प्रभाव स्थापित किया है और वह देश की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के विरोध में है।
सऊदी अरब ने लंबे समय तक यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन किया है, जबकि ईरान पर हूतियों को राजनीतिक, सैन्य और अन्य प्रकार का समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं।
इसलिए यमन का संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता से भी जुड़ा हुआ है।
ईरान और सऊदी अरब की प्रतिद्वंद्विता का यमन पर असर
ईरान और सऊदी अरब लंबे समय तक पश्चिम एशिया की प्रमुख क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं में आमने-सामने रहे हैं।
यमन में दोनों पक्षों का प्रभाव अलग-अलग धड़ों के साथ जुड़ा रहा।
हालांकि इसे सीधे तौर पर ऐसा कहना कि ईरान और सऊदी अरब स्वयं यमन में एक-दूसरे से पारंपरिक युद्ध लड़ रहे हैं, स्थिति को जरूरत से ज्यादा सरल बना देगा।
असल तस्वीर में स्थानीय यमनी संघर्ष, हूती आंदोलन, अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त यमनी सरकार और क्षेत्रीय शक्तियों के हित आपस में जुड़े हुए हैं।
हूती कौन हैं और उनका प्रभाव कितना है?
हूती आंदोलन यमन का एक शक्तिशाली राजनीतिक-सैन्य संगठन है।
उन्होंने यमन की राजधानी सना समेत देश के बड़े हिस्से पर नियंत्रण या प्रभाव कायम किया है।
संगठन का नाम अंसार अल्लाह भी है और इसका नेतृत्व अब्दुल-मलिक अल-हूती के हाथों में है।
हूती लंबे समय से यमन की राजनीतिक व्यवस्था में एक प्रमुख शक्ति रहे हैं।
उनके पास मिसाइल और ड्रोन क्षमताएं हैं, जिनका इस्तेमाल उन्होंने क्षेत्रीय लक्ष्यों के खिलाफ करने का दावा किया है।
रेड सी में पहले भी जहाजों पर हमले कर चुके हैं हूती
हूतियों ने 2023 और 2024 के दौरान भी लाल सागर से गुजरने वाले कई वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया था।
इन हमलों ने वैश्विक शिपिंग कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने के लिए मजबूर किया था।
कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने उस दौरान लाल सागर से दूरी बनाई और अफ्रीका के आसपास से जहाज भेजने शुरू किए।
इससे यूरोप-एशिया समुद्री व्यापार में यात्रा का समय और लागत बढ़ी थी।
अब अगर उसी तरह की स्थिति दोबारा लंबे समय तक बनती है, तो वैश्विक व्यापार पर उसका प्रभाव और ज्यादा महसूस हो सकता है।
अब खतरा इसलिए बड़ा है क्योंकि होर्मुज भी दबाव में है
रेड सी संकट पहले भी गंभीर था, लेकिन वर्तमान परिस्थिति में इसका महत्व और बढ़ गया है।
होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ा संकट वैश्विक ऊर्जा बाजार को पहले से प्रभावित कर रहा है।
होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस परिवहन मार्गों में से एक है।
यदि होर्मुज और बाब अल-मंदेब दोनों में समुद्री यातायात प्रभावित होता है, तो कंपनियों के पास सुरक्षित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प कम हो सकते हैं।
यही स्थिति ऊर्जा और माल बाजारों में अस्थिरता को बढ़ा सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट का वैश्विक ऊर्जा कारोबार में बड़ा हिस्सा
सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति से जुड़ी समुद्री आवाजाही होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती है।
इसलिए होर्मुज में किसी भी बड़ी बाधा का असर तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक महंगाई तक महसूस किया जा सकता है।
इसके विपरीत बाब अल-मंदेब और लाल सागर का महत्व मुख्य रूप से यूरोप-एशिया समुद्री व्यापार, कंटेनर परिवहन और ऊर्जा के कुछ समुद्री मार्गों से जुड़ा है।
दोनों मार्गों में संकट एक साथ बढ़ने पर प्रभाव कई गुना हो सकता है।
क्या दुनिया की 25% ऊर्जा आपूर्ति सीधे खतरे में है?
इस तरह के आंकड़ों को समझते समय सावधानी जरूरी है।
होर्मुज और बाब अल-मंदेब दोनों की वैश्विक ऊर्जा और व्यापार में बड़ी भूमिका है, लेकिन दोनों मार्गों से गुजरने वाले हर प्रकार के ऊर्जा उत्पाद को जोड़कर यह कहना कि दुनिया की एक निश्चित प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति सीधे खतरे में है, संदर्भ के बिना भ्रामक हो सकता है।
असल प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि कितने जहाज प्रभावित होते हैं, कितने समय तक मार्ग बाधित रहता है और कंपनियां कितनी तेजी से वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल कर पाती हैं।
फिर भी दोनों क्षेत्रों में एक साथ बढ़ता जोखिम वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए गंभीर चिंता का विषय जरूर है।
बाब अल-मंदेब के सबसे संकरे हिस्से की चौड़ाई करीब 29 किलोमीटर
बाब अल-मंदेब अपने सबसे संकरे हिस्से में करीब 29 किलोमीटर चौड़ा बताया जाता है।
इस भौगोलिक स्थिति के कारण समुद्री यातायात के लिए निर्धारित लेन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
यहां गुजरने वाले बड़े कारोबारी जहाजों के लिए समुद्री मार्ग सीमित है।
इसी वजह से किसी हमले, समुद्री मलबे या सुरक्षा खतरे की स्थिति में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
सिर्फ एक जहाज पर हमला नहीं, पूरे कॉरिडोर पर असर
जब किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर एक जहाज पर हमला होता है तो बाकी जहाजों के कप्तान और कंपनियां भी खतरे का पुनर्मूल्यांकन करते हैं।
बीमा कंपनियां जोखिम की कीमत बढ़ा सकती हैं।
जहाज मालिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर सकते हैं।
कंपनियां वैकल्पिक मार्ग चुन सकती हैं।
और अगर ऐसा लगातार होता है तो पूरा समुद्री कॉरिडोर आर्थिक रूप से कम आकर्षक बन सकता है।
बाब अल-मंदेब में मौजूदा घटनाक्रम इसी कारण गंभीर माना जा रहा है।
हूतियों पर जहाजों से शुल्क वसूलने की तैयारी का दावा
इस संकट को और गंभीर बनाने वाली एक अन्य खबर भी सामने आई है।
रिपोर्टों के अनुसार हूती विद्रोही लाल सागर के दक्षिणी हिस्से से गुजरने वाले कारोबारी जहाजों से शुल्क या टैक्स वसूलने की योजना पर विचार कर रहे हैं।
इसकी कोई निश्चित समयसीमा सामने नहीं आई है।
यदि ऐसा होता है तो समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ व्यापारिक जहाजों के लिए एक नया आर्थिक जोखिम भी पैदा हो सकता है।
ईरानी सलाह का भी दावा
रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि जुलाई में ईरान में एक महत्वपूर्ण अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए हूती नेता वहां गए थे।
इसी दौरान ईरानी अधिकारियों की ओर से जहाजों पर शुल्क लगाने का विचार सामने आने की बात कही गई है।
इसके बाद ईरानी सलाहकारों द्वारा हूती अधिकारियों के साथ मिलकर संभावित शुल्क वसूली व्यवस्था पर काम करने का दावा भी रिपोर्टों में किया गया है।
हालांकि ऐसे दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए बिना अंतिम तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
यदि शुल्क वसूली की कोई व्यवस्थित व्यवस्था वास्तव में लागू होती है, तो इसका मतलब होगा कि लाल सागर में गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों के लिए सुरक्षा जोखिम के साथ आर्थिक दबाव भी जुड़ सकता है।
क्या चीनी जहाजों को मिल सकती है छूट?
रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि प्रस्तावित व्यवस्था में चीनी जहाजों को शुल्क से छूट दी जा सकती है।
इसके पीछे चीन और सऊदी अरब के बीच बड़े ऊर्जा व्यापार को संभावित कारण के तौर पर देखा जा रहा है।
चीन सऊदी अरब के प्रमुख तेल खरीदारों में से एक है और दोनों देशों के बीच ऊर्जा तथा व्यापारिक संबंध काफी महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि किसी संभावित शुल्क व्यवस्था को लेकर अंतिम निर्णय या आधिकारिक नियम सामने आने तक इसे एक रिपोर्टेड प्रस्ताव के रूप में ही देखना अधिक उचित होगा।
अगर जहाजों पर टैक्स लगा तो क्या होगा?
यदि लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों पर किसी गैर-राज्य सशस्त्र संगठन की ओर से शुल्क लगाया जाता है, तो शिपिंग कंपनियों के सामने कठिन फैसला होगा।
एक विकल्प शुल्क देकर आगे बढ़ना हो सकता है, जबकि दूसरा विकल्प रास्ता बदलना।
लेकिन किसी शुल्क का भुगतान करना भी कंपनियों के लिए कानूनी और सुरक्षा संबंधी सवाल खड़े कर सकता है।
वहीं लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाने पर ईंधन और समय की लागत बढ़ेगी।
इसलिए किसी भी ऐसी व्यवस्था का वैश्विक शिपिंग बाजार पर व्यापक प्रभाव हो सकता है।
चीन के लिए भी बाब अल-मंदेब बेहद अहम
चीन दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक देश होने के कारण समुद्री मार्गों की सुरक्षा में विशेष रुचि रखता है।
एशिया से यूरोप तक जाने वाले बड़ी मात्रा में माल की आवाजाही समुद्री रास्तों से होती है।
लाल सागर और स्वेज नहर का मार्ग एशिया-यूरोप व्यापार को अफ्रीका के चारों ओर लंबी यात्रा से बचाता है।
यदि यह मार्ग असुरक्षित हो जाता है तो चीनी निर्यातकों और यूरोपीय आयातकों दोनों की लागत बढ़ सकती है।
स्वेज नहर पर भी दबाव बढ़ सकता है
बाब अल-मंदेब में खतरा बढ़ने का सीधा असर स्वेज नहर पर पड़ सकता है।
यदि जहाज लाल सागर में प्रवेश ही नहीं करेंगे तो स्वेज नहर से गुजरने वाले जहाजों की संख्या घट सकती है।
इससे मिस्र की नहर से होने वाली आय पर भी असर पड़ सकता है।
स्वेज नहर मिस्र के लिए विदेशी मुद्रा कमाने का एक प्रमुख स्रोत है।
इसलिए लाल सागर का संकट केवल यमन, सऊदी अरब या शिपिंग कंपनियों का मुद्दा नहीं है।
इसका असर मिस्र जैसे देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
यूरोप के लिए लंबी सप्लाई लाइन का खतरा
यूरोप की कई कंपनियां एशिया से आने वाले सामान पर निर्भर हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, कपड़ा, ऑटो पार्ट्स, रसायन और उपभोक्ता वस्तुओं की बड़ी मात्रा समुद्री रास्तों से आती है।
यदि जहाज अफ्रीका के चारों ओर से जाएंगे तो माल की डिलीवरी में देरी हो सकती है।
इससे कंपनियों को अतिरिक्त स्टॉक रखना पड़ सकता है।
अतिरिक्त स्टॉक का मतलब अतिरिक्त पूंजी।
इस तरह समुद्री सुरक्षा संकट धीरे-धीरे कारोबारी लागत में बदल सकता है।
क्या इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है?
भारत एशिया और यूरोप के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापारिक कड़ी है।
भारत से यूरोप और पश्चिमी देशों को जाने वाले कई समुद्री मार्ग लाल सागर और स्वेज नहर के क्षेत्र से जुड़े हैं।
यदि शिपिंग कंपनियां बाब अल-मंदेब और लाल सागर से बचती हैं, तो भारत-यूरोप समुद्री परिवहन में भी यात्रा समय बढ़ सकता है।
इसका असर माल ढुलाई, बीमा और डिलीवरी लागत पर पड़ सकता है।
हालांकि वास्तविक प्रभाव वस्तु, जहाज, कंपनी और इस्तेमाल किए गए मार्ग पर निर्भर करेगा।
समुद्री बीमा कंपनियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
किसी समुद्री मार्ग में सैन्य या मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ने पर बीमा कंपनियां जोखिम का आकलन बदल सकती हैं।
उच्च जोखिम वाले क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए अतिरिक्त युद्ध जोखिम बीमा की जरूरत पड़ सकती है।
इससे जहाज मालिकों की लागत बढ़ जाती है।
और जब शिपिंग लागत बढ़ती है तो उसका कुछ हिस्सा माल की अंतिम कीमत में शामिल हो सकता है।
यही कारण है कि समुद्री संघर्ष का प्रभाव कई बार युद्ध क्षेत्र से हजारों किलोमीटर दूर बैठे उपभोक्ता तक पहुंच जाता है।
एक तरफ जहाज कम, दूसरी तरफ लागत ज्यादा
बाब अल-मंदेब से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में कमी और वैकल्पिक मार्गों का बढ़ता इस्तेमाल यह संकेत देता है कि कंपनियां जोखिम को गंभीरता से ले रही हैं।
यदि यह प्रवृत्ति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक कंटेनर क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है।
जहाजों को लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा।
एक जहाज ज्यादा समय तक समुद्र में रहेगा।
इसका अर्थ यह भी होगा कि वही जहाज कम यात्राएं कर पाएगा।
नतीजतन उपलब्ध परिवहन क्षमता पर असर पड़ सकता है।
सिर्फ तेल नहीं, कंटेनर कारोबार भी प्रभावित
लाल सागर का संकट अक्सर तेल और ऊर्जा के संदर्भ में देखा जाता है, लेकिन कंटेनर शिपिंग के लिए इसका महत्व भी बहुत बड़ा है।
एशिया से यूरोप जाने वाले कंटेनर जहाजों के लिए स्वेज नहर वाला रास्ता बेहद महत्वपूर्ण है।
अगर वे जहाज केप ऑफ गुड होप से जाते हैं तो यात्रा का समय बढ़ता है।
इससे कंटेनर की उपलब्धता में असंतुलन पैदा हो सकता है।
किसी बंदरगाह पर कंटेनर समय पर नहीं पहुंचने से दूसरे बंदरगाहों की पूरी लॉजिस्टिक्स व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
क्या लाल सागर फिर से वैश्विक संकट का केंद्र बन रहा है?
पिछले कुछ वर्षों में लाल सागर पहले भी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और व्यापार की सुर्खियों में रहा है।
लेकिन अब होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव के साथ बाब अल-मंदेब में भी हमले बढ़ने से स्थिति अधिक जटिल हो गई है।
एक समुद्री मार्ग पर दबाव हो तो कंपनियां दूसरे मार्ग का इस्तेमाल कर सकती हैं।
लेकिन जब एक ही व्यापक क्षेत्र के कई रणनीतिक समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ जाए तो विकल्प सीमित हो जाते हैं।
यही वह स्थिति है जिससे वैश्विक बाजार चिंतित हैं।
हूतियों के लिए समुद्री मार्ग क्यों रणनीतिक है?
हूतियों के पास समुद्र के आसपास मौजूद भौगोलिक स्थिति का लाभ है।
यमन की पश्चिमी और दक्षिणी दिशा में समुद्री क्षेत्र लाल सागर और अदन की खाड़ी से जुड़ते हैं।
दुनिया के महत्वपूर्ण व्यापारिक जहाज इन समुद्री रास्तों से गुजरते हैं।
इस कारण समुद्री यातायात पर दबाव बनाना हूतियों के लिए राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव पैदा करने का एक तरीका बन सकता है।
सऊदी अरब के लिए खतरा केवल जमीन तक सीमित नहीं
यमन के साथ सऊदी अरब की लंबी सीमा है और दोनों देशों के बीच संघर्ष का इतिहास भी रहा है।
लेकिन समुद्री मार्गों पर बढ़ती हूती गतिविधियां सऊदी हितों के लिए एक अलग प्रकार का जोखिम पैदा करती हैं।
सऊदी तेल निर्यात और लाल सागर के बंदरगाहों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है।
यदि समुद्री रास्ते लंबे समय तक असुरक्षित रहते हैं तो सऊदी अरब को अपने निर्यात और शिपिंग रणनीति में बदलाव करने पड़ सकते हैं।
पाकिस्तान और इंडोनेशिया के लिए भी यह घटना गंभीर
तिहामा जहाज पर मारे गए चार क्रू सदस्यों में तीन पाकिस्तानी और एक इंडोनेशियाई नागरिक बताए गए हैं।
इससे घटना का मानवीय पक्ष और गंभीर हो जाता है।
समुद्री जहाजों पर काम करने वाले क्रू सदस्य किसी क्षेत्रीय राजनीतिक विवाद का हिस्सा नहीं होते, लेकिन युद्ध और संघर्ष का जोखिम सबसे पहले इन्हीं लोगों तक पहुंचता है।
अंतरराष्ट्रीय शिपिंग उद्योग में बड़ी संख्या में एशियाई देशों के नागरिक काम करते हैं।
इसलिए लाल सागर में सुरक्षा संकट का सीधा मानवीय असर भी है।
अब समुद्री कंपनियां क्या करेंगी?
शिपिंग कंपनियों के पास सामान्यतः कुछ विकल्प होते हैं—जोखिम वाले मार्ग से बचना, सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाना, काफिले या एस्कॉर्ट की व्यवस्था करना अथवा वैकल्पिक मार्ग चुनना।
लेकिन हर विकल्प महंगा है।
लंबा रास्ता अधिक ईंधन मांगता है।
सुरक्षा व्यवस्था अधिक लागत मांगती है।
बीमा प्रीमियम बढ़ सकता है।
और किसी भी देरी का असर ग्राहक तक पहुंचता है।
यही कारण है कि कंपनियां हर घटना के बाद अपने जोखिम मॉडल को अपडेट करती हैं।
बाब अल-मंदेब में आने वाले दिन निर्णायक हो सकते हैं
तिहामा पर हमले की रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब पहले से ही लाल सागर की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है।
यदि हमले जारी रहते हैं तो और अधिक जहाज वैकल्पिक रास्तों पर जा सकते हैं।
यदि हमलों की तीव्रता कम होती है तो कंपनियां धीरे-धीरे सामान्य मार्ग पर लौट सकती हैं।
इसलिए अगले कुछ सप्ताह समुद्री व्यापार के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
क्या वैश्विक बाजार में महंगाई फिर बढ़ सकती है?
समुद्री मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान होने पर महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि किसी एक हमले को सीधे वैश्विक महंगाई का कारण बताना उचित नहीं होगा।
महंगाई पर तेल की कीमत, मुद्रा विनिमय दर, उत्पादन लागत, मांग, सप्लाई और कई अन्य कारकों का असर होता है।
लेकिन यदि शिपिंग लागत लंबे समय तक बढ़ती है तो वह वैश्विक वस्तु कीमतों पर अतिरिक्त दबाव जरूर डाल सकती है।
लाल सागर की सुरक्षा अब वैश्विक आर्थिक मुद्दा
बाब अल-मंदेब की भौगोलिक स्थिति ने इसे केवल मध्य पूर्व की सुरक्षा का मुद्दा नहीं रहने दिया है।
यह वैश्विक व्यापार का हिस्सा है।
यूरोप का बाजार, एशिया की फैक्ट्रियां, मध्य पूर्व का तेल और अफ्रीका के बंदरगाह—सभी किसी न किसी रूप में इस समुद्री नेटवर्क से जुड़े हैं।
इसलिए यहां होने वाला कोई बड़ा सुरक्षा संकट दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी आर्थिक प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है।
हूती टैक्स की खबर ने बढ़ाई चिंता
यदि जहाजों पर शुल्क लगाने की खबरें आगे चलकर किसी औपचारिक व्यवस्था में बदलती हैं, तो यह समुद्री सुरक्षा के परिदृश्य को और जटिल बना सकती है।
इसका मतलब यह होगा कि जहाजों को केवल मिसाइल या ड्रोन के खतरे का सामना नहीं करना पड़ेगा, बल्कि एक गैर-राज्य सशस्त्र संगठन द्वारा लगाए गए आर्थिक दबाव का भी सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि अभी इस प्रस्ताव की वास्तविक स्थिति और लागू होने की समयसीमा स्पष्ट नहीं है।
इसलिए इसे फिलहाल रिपोर्ट किए गए प्रस्ताव के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
चीन को छूट की संभावना क्यों चर्चा में है?
चीन और सऊदी अरब के बीच ऊर्जा व्यापार बड़ा है। यदि किसी संभावित हूती शुल्क व्यवस्था में चीनी जहाजों को छूट मिलती है, तो इसका क्षेत्रीय और भू-राजनीतिक महत्व हो सकता है।
लेकिन यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी कथित प्रस्ताव को अंतिम नीति मान लेना जल्दबाजी होगी।
जब तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं होती, तब तक यह केवल रिपोर्टों में सामने आया संभावित विचार है।
समुद्र में बढ़ते खतरे का सबसे बड़ा संदेश
तिहामा पर हमला एक बार फिर यह दिखाता है कि आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी हद तक सुरक्षित समुद्री मार्गों पर निर्भर है।
एक संकीर्ण जलडमरूमध्य में कुछ हमले हजारों किलोमीटर दूर मौजूद बाजारों की कीमतों और डिलीवरी टाइम को प्रभावित कर सकते हैं।
बाब अल-मंदेब इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
यह छोटा सा समुद्री रास्ता एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाली विशाल व्यापारिक श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
होर्मुज और बाब अल-मंदेब दोनों पर नजर
अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों की नजर केवल होर्मुज स्ट्रेट पर नहीं रहेगी।
बाब अल-मंदेब में जहाजों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।
यदि दोनों समुद्री मार्गों पर तनाव बना रहता है तो ऊर्जा और व्यापार दोनों के लिए जोखिम बढ़ेगा।
वहीं अगर क्षेत्रीय तनाव कम होता है और जहाज सामान्य रूप से आवाजाही शुरू करते हैं तो शिपिंग लागत और यात्रा समय में धीरे-धीरे स्थिरता लौट सकती है।
आगे क्या होगा, इस पर दुनिया की नजर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तिहामा पर हमला एक अलग घटना है या सऊदी से जुड़े जहाजों के खिलाफ हूतियों की कार्रवाई का नया और ज्यादा खतरनाक चरण शुरू हो चुका है।
चार क्रू सदस्यों की मौत ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।
अगर ऐसे हमले दोहराए जाते हैं तो समुद्री कंपनियों का भरोसा और कमजोर हो सकता है।
इसके बाद अधिक जहाज लाल सागर से बच सकते हैं, स्वेज नहर के इस्तेमाल में कमी आ सकती है और अफ्रीका के रास्ते से समुद्री यातायात बढ़ सकता है।
यानी बाब अल-मंदेब में शुरू हुआ सुरक्षा संकट वैश्विक सप्लाई चेन के लिए एक लंबी आर्थिक चुनौती में बदल सकता है।

