UNGA में Balen Shah का बड़ा संदेश: ‘हिमालय खतरे में है’, भारत-चीन के साथ साझा अलर्ट सिस्टम का प्रस्ताव; बोले- नेपाल को कर्ज नहीं, ग्रांट चाहिए
News-Desk
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नेपाल के प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भारत और चीन को आपदा के बाद मदद के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जोखिम से निपटने के लिए नेपाल, भारत और चीन को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने एक ऐसे क्षेत्रीय तंत्र का प्रस्ताव रखा, जिसमें सैटेलाइट डेटा साझा करने, ग्लेशियर झीलों की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने और आपदा के समय संयुक्त राहत एवं बचाव जैसी व्यवस्थाएं शामिल हों।
शाह ने जलवायु संकट के वित्तीय पहलू को भी जोरदार तरीके से उठाया। उनका कहना था कि जलवायु आपदाओं से बुरी तरह प्रभावित गरीब और संवेदनशील देशों को पुनर्निर्माण के लिए और कर्ज के बोझ में नहीं धकेला जाना चाहिए। ऐसे देशों को पर्याप्त ग्रांट आधारित सहायता की जरूरत है।
यह बालेन्द्र शाह का मार्च 2026 में प्रधानमंत्री बनने के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहला भाषण था और उन्होंने अपने संबोधन का बड़ा हिस्सा नेपाल की हालिया आपदा, हिमालयी पर्यावरण और जलवायु न्याय पर केंद्रित रखा।
‘भोटेकोशी की बाढ़ सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं, पूरी दुनिया के लिए चेतावनी’
बालेन शाह ने संयुक्त राष्ट्र में अपने भाषण की शुरुआत नेपाल की मौजूदा त्रासदी के संदर्भ से की। उन्होंने कहा कि वह हिमालय से दुनिया के सामने एक ऐसी चेतावनी लेकर आए हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भोटेकोशी-त्रिशूली क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़ी संख्या में लोगों की जान ली और हजारों लोगों के लापता होने की स्थिति पैदा की। सड़कों, पुलों, घरों, स्कूलों, कारोबार, ऊर्जा ढांचे और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा।
नेपाल सरकार की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा समेत नदी के निचले हिस्सों में व्यापक तबाही मचाई थी। सरकार ने तत्काल खोज, बचाव, राहत और पुनर्वास अभियान शुरू किया था।
शाह ने संयुक्त राष्ट्र में इस त्रासदी को जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हुए कहा कि ग्लेशियरों के पीछे हटने, पहाड़ी ढलानों के अस्थिर होने और नदियों के व्यवहार में बदलाव का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहेगा।
हिमालय की सीमा नहीं होती, आपदा भी पासपोर्ट नहीं देखती
बालेन शाह के भाषण का एक महत्वपूर्ण संदेश यह था कि जलवायु परिवर्तन राजनीतिक सीमाओं का पालन नहीं करता।
उन्होंने कहा कि ग्लेशियर और बाढ़ किसी देश की सीमा पर रुकते नहीं हैं। हिमालयी क्षेत्र में एक जगह होने वाला पर्यावरणीय बदलाव नीचे की ओर बसे दूसरे देशों को भी प्रभावित कर सकता है।
इसी वजह से नेपाल ने भारत और चीन के साथ क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत पर जोर दिया। हिमालय का बड़ा हिस्सा नेपाल, भारत और चीन से जुड़ा है और यहां से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों के जीवन, कृषि, जल आपूर्ति और ऊर्जा व्यवस्था से जुड़ी हैं।
इस दृष्टि से नेपाल का प्रस्ताव केवल किसी एक बाढ़ की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक आपदा तैयारी और जलवायु सहयोग की मांग के रूप में सामने आया है।
भारत और चीन को बालेन शाह ने क्यों दिया धन्यवाद?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में बालेन शाह ने नेपाल की आपदा के बाद मदद के लिए अपने दोनों बड़े पड़ोसियों—भारत और चीन—का धन्यवाद किया।
उन्होंने कहा कि आपदा के बाद दोनों देशों ने नेपाल को सहायता दी। शाह ने इसके लिए दोनों पड़ोसी देशों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र प्रणाली, मानवीय संगठनों, परोपकारी संस्थाओं और दुनिया के अन्य देशों का भी आभार जताया।
नेपाल के लिए भारत और चीन दोनों रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पड़ोसी हैं। ऐसे में आपदा प्रबंधन को लेकर दोनों देशों के बीच डेटा और तकनीकी सहयोग की बात करना क्षेत्रीय कूटनीति के स्तर पर भी महत्वपूर्ण है।
भारत-चीन-नेपाल के लिए साझा अलर्ट सिस्टम का प्रस्ताव
Balen Shah UNGA Speech का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र से जुड़ा रहा।
शाह ने नेपाल, भारत और चीन के बीच सहयोग के लिए एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत बताई जिसमें तीनों देश हिमालय से जुड़े जलवायु और आपदा जोखिमों की जानकारी साझा करें।
प्रस्तावित सहयोग में कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं।
सैटेलाइट डेटा साझा करना:
हिमालय के बड़े और दुर्गम हिस्सों में जमीन पर लगातार निगरानी करना मुश्किल है। सैटेलाइट से मिलने वाले डेटा के जरिए ग्लेशियर, बर्फ, झीलों और पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाले बदलावों की निगरानी को बेहतर किया जा सकता है।
खतरनाक ग्लेशियर झीलों की निगरानी:
हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों में पानी का स्तर बढ़ने पर अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है। ऐसी झीलों की निगरानी से संभावित जोखिम का पहले पता लगाने में मदद मिल सकती है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम:
बाढ़ आने से पहले प्रभावित इलाकों तक चेतावनी पहुंचाना जान बचाने में बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
संयुक्त राहत और बचाव:
आपदा के समय पड़ोसी देशों के बीच समन्वय होने से राहत सामग्री, विशेषज्ञ दल, तकनीकी सहायता और बचाव संसाधनों की तैनाती अधिक तेजी से की जा सकती है।
शाह का प्रस्ताव इन्हीं क्षेत्रों में क्षेत्रीय सहयोग को संस्थागत रूप देने की दिशा में है।
भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ ने दिखाई हिमालय की कमजोरी
26 अगस्त 2026 को भोटेकोशी नदी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने नेपाल के कई हिस्सों को प्रभावित किया। नेपाल सरकार ने इसे बड़े पैमाने की प्राकृतिक आपदा के रूप में दर्ज किया और खोज एवं बचाव अभियान शुरू किया।
बाढ़ से नदी किनारे के क्षेत्रों में घरों, सड़कों और पुलों के अलावा जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने शुरुआती दिनों में बड़ी संख्या में मौतों और लापता लोगों की जानकारी दी थी तथा राहत और खोज अभियान जारी रहने की बात कही थी।
बाद के आकलनों में प्रधानमंत्री शाह ने संयुक्त राष्ट्र में कम से कम 1,400 मौतों और 6,000 से ज्यादा लोगों के लापता होने का आंकड़ा बताया। अलग-अलग समय पर जारी आंकड़ों में बदलाव संभव है क्योंकि खोज एवं बचाव अभियान जारी रहा और आंकड़ों का सत्यापन किया जाता रहा।
6 हजार से ज्यादा लोग लापता, कई के कभी न मिलने की आशंका
संयुक्त राष्ट्र में शाह ने कहा कि हजारों लोग अब भी लापता हैं और इनमें से कई शायद कभी वापस न मिल सकें।
किसी आपदा में मृतकों की संख्या से कहीं अधिक जटिल स्थिति तब बनती है जब बड़ी संख्या में लोग लापता हों। परिवार लंबे समय तक अपने प्रियजनों की तलाश में रहते हैं और प्रशासन के लिए भी मलबे, नदी और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में खोज अभियान चलाना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
भोटेकोशी आपदा में भी राहत और खोज अभियान लंबे समय तक जारी रहने की जानकारी सामने आई है। नेपाल सरकार ने घरेलू संसाधनों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सहायता की अपील भी की थी।
नेपाल के लिए पुनर्निर्माण का खर्च GDP के करीब 10 फीसदी तक
बालेन शाह ने UNGA में बताया कि शुरुआती आकलनों के अनुसार नेपाल को भौतिक पुनर्निर्माण के लिए अपनी GDP के लगभग 10 प्रतिशत के बराबर संसाधनों की जरूरत पड़ सकती है।
इसमें सड़कें, पुल, घर, स्कूल, ऊर्जा ढांचा और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं का पुनर्निर्माण शामिल है।
उन्होंने कहा कि किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का प्रभाव केवल उस समय हुई मौतों और तत्काल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहता। यदि सड़कें, पुल, स्कूल और उत्पादन से जुड़े ढांचे नष्ट हो जाएं तो वर्षों की विकास प्रक्रिया पीछे जा सकती है।
इसी वजह से नेपाल इस आपदा को केवल राहत का विषय नहीं, बल्कि विकास और पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती के रूप में देख रहा है।
‘गरीब देशों को पुनर्निर्माण के लिए और कर्ज नहीं चाहिए’
बालेन शाह ने जलवायु वित्त व्यवस्था पर भी सवाल उठाया।
उनका तर्क था कि जिन देशों ने जलवायु संकट पैदा करने में अपेक्षाकृत कम योगदान दिया है, वे ही कई बार उसके सबसे गंभीर प्रभाव झेल रहे हैं। ऐसी स्थिति में यदि आपदा के बाद पुनर्निर्माण के लिए उन्हें फिर बड़े कर्ज लेने पड़ें तो उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।
शाह ने दुनिया से ग्रांट आधारित सहायता उपलब्ध कराने की अपील की।
उनके अनुसार, जलवायु आपदा से तबाह हुए गरीब देश को पुनर्निर्माण के नाम पर ऐसा वित्तीय बोझ नहीं दिया जाना चाहिए जिसे वह आने वाले वर्षों तक चुकाता रहे।
‘जब घर जल रहा हो तो 50 फॉर्म नहीं भरवाए जाते’
जलवायु वित्त की धीमी प्रक्रिया पर भी बालेन शाह ने तीखी टिप्पणी की।
उन्होंने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्रों को अधिक तेज और सरल बनाने की जरूरत बताई। उनका संदेश था कि जब कोई देश आपदा से जूझ रहा हो तो सहायता पाने की प्रक्रिया इतनी जटिल नहीं होनी चाहिए कि राहत मिलने में लंबा समय लग जाए।
शाह ने इसी संदर्भ में कहा कि जब घर में आग लगी हो तो परिवार से दर्जनों फॉर्म भरने के लिए नहीं कहा जाता। यह टिप्पणी जलवायु आपदाओं के बाद वित्तीय सहायता को तेजी से उपलब्ध कराने की उनकी मांग का हिस्सा थी।
नेपाल ने Loss and Damage Fund से 20 मिलियन डॉलर मांगे
नेपाल ने जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान और क्षति के लिए बनाए गए Fund for Responding to Loss and Damage से 20 मिलियन डॉलर की आपात सहायता की मांग की थी।
नेपाल ने 31 अगस्त के आसपास इस आपदा के बाद फंड से तत्काल सहायता की मांग की थी। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक यह उस व्यवस्था के तहत एक अनुरोधित अधिकतम राशि थी।
यहां एक महत्वपूर्ण अपडेट भी है: सितंबर की शुरुआत में नेपाल को इस फंड के तहत 20 मिलियन डॉलर की एक अलग स्वीकृति मिलने की खबर सामने आई थी, जो पहले प्रस्तुत प्रस्तावों से जुड़ी थी; जबकि 26 अगस्त की भोटेकोशी आपदा के बाद की अलग आपात अपील पर निर्णय अलग प्रक्रिया का विषय था। इसलिए दोनों रकमों को एक ही भुगतान मानना सही नहीं होगा।
5 अरब डॉलर के नुकसान के सामने 20 मिलियन डॉलर कितना?
नेपाल की प्रारंभिक सरकारी गणना के अनुसार आपदा से कुल नुकसान लगभग 5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। ऐसे में 20 मिलियन डॉलर की सहायता बहुत छोटी राशि दिखाई देती है।
एक विश्लेषण के मुताबिक 20 मिलियन डॉलर नेपाल द्वारा अनुमानित लगभग 2.7 अरब डॉलर के भौतिक नुकसान और आर्थिक क्षति के मुकाबले करीब 0.7 प्रतिशत बैठता है। हालांकि नुकसान के अंतिम आंकड़े समय के साथ बदल सकते हैं क्योंकि पुनर्निर्माण और आर्थिक क्षति का विस्तृत आकलन जारी रहता है।
यही कारण है कि नेपाल केवल एकमुश्त राहत राशि नहीं, बल्कि जलवायु वित्त की बड़ी और दीर्घकालिक व्यवस्था की मांग कर रहा है।
Loss and Damage Fund की विश्वसनीयता भी चर्चा में
Loss and Damage Fund का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से प्रभावित कमजोर देशों को सहायता उपलब्ध कराना है।
यह व्यवस्था वैश्विक जलवायु वार्ताओं में लंबे समय से उठती रही मांगों के बाद विकसित हुई। नेपाल की मौजूदा अपील इस फंड की वास्तविक उपयोगिता और तेजी से सहायता पहुंचाने की क्षमता की परीक्षा के रूप में भी देखी जा रही है।
सितंबर में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार फंड ने अपनी शुरुआती फंडिंग विंडो के तहत संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में कदम बढ़ाए थे, लेकिन आपदा प्रभावित देशों को वास्तविक भुगतान और आपात जरूरतों तक धन पहुंचाने की प्रक्रिया अभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है।
नेपाल का तर्क—जलवायु संकट में जिम्मेदारी और नुकसान का संतुलन
बालेन शाह ने संयुक्त राष्ट्र में जलवायु न्याय की बहस को भी सामने रखा।
नेपाल का योगदान वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बहुत कम है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। शाह ने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि जलवायु संकट की कीमत उन देशों और समुदायों को नहीं चुकानी चाहिए, जिन्होंने इसके निर्माण में अपेक्षाकृत कम योगदान दिया।
यह तर्क केवल नेपाल का नहीं है। विकासशील और जलवायु-संवेदनशील देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में लंबे समय से अधिक वित्तीय और तकनीकी सहायता की मांग की जाती रही है।
हिमालय से भारत, भूटान और बांग्लादेश तक असर
बालेन शाह ने अपने भाषण में यह भी संकेत दिया कि हिमालयी आपदा का असर नेपाल की सीमा से आगे जा सकता है।
हिमालय और हिंदूकुश क्षेत्र से निकलने वाली नदियां भारत, बांग्लादेश, भूटान और पाकिस्तान सहित कई देशों की जल व्यवस्था से जुड़ी हैं। पहाड़ों में ग्लेशियर, बर्फ और वर्षा के पैटर्न में बदलाव का प्रभाव नीचे के नदी तंत्र में दिखाई दे सकता है।
इसलिए नेपाल का तर्क है कि हिमालयी आपदाओं को केवल राष्ट्रीय आपदा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए क्षेत्रीय डेटा, वैज्ञानिक सहयोग और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों का साझा नेटवर्क जरूरी है।
भारत-चीन के साथ सहयोग आसान नहीं, लेकिन जरूरी क्यों?
नेपाल का भारत और चीन के साथ प्रस्तावित सहयोग भौगोलिक वास्तविकता पर आधारित है। हिमालय का बड़ा हिस्सा इन तीनों देशों के भूभाग से जुड़ा हुआ है।
लेकिन सीमा, डेटा साझेदारी, सुरक्षा और रणनीतिक हितों जैसे विषयों के कारण क्षेत्रीय सहयोग हमेशा सरल नहीं होता।
बालेन शाह का प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब हिमालयी क्षेत्र में जलवायु जोखिम बढ़ रहे हैं। यदि तीनों देशों के वैज्ञानिक और आपदा प्रबंधन संस्थान सीमित लेकिन व्यावहारिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाते हैं—जैसे मौसम डेटा, ग्लेशियर झीलों की निगरानी और शुरुआती चेतावनी—तो आपदा से पहले तैयारी बेहतर हो सकती है।
बाढ़ के पीछे सिर्फ बारिश नहीं, बदलता हिमालय भी चिंता का कारण
हिमालयी क्षेत्र में बाढ़ और भूस्खलन नई घटनाएं नहीं हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का पीछे हटना, बर्फ पिघलने के पैटर्न में बदलाव, अस्थिर ढलान और चरम मौसम की घटनाओं का बढ़ता जोखिम वैज्ञानिकों और सरकारों के लिए चिंता का विषय है।
इसीलिए बालेन शाह ने संयुक्त राष्ट्र में केवल राहत की मांग नहीं की, बल्कि पूर्व चेतावनी और जोखिम कम करने की दिशा में भी सहयोग का प्रस्ताव रखा।
यानी संदेश साफ था—आपदा आने के बाद पैसा खर्च करने के बजाय पहले से तैयारी पर निवेश किया जाए।
बाढ़ ने नेपाल की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को झकझोर दिया
किसी पर्वतीय देश के लिए सड़क और पुल केवल यातायात का साधन नहीं होते। वे दूरदराज के गांवों को अस्पतालों, बाजारों और प्रशासनिक केंद्रों से जोड़ते हैं।
जब बाढ़ पुल और सड़कें बहा देती है तो प्रभावित इलाकों में राहत पहुंचाना भी मुश्किल हो जाता है। स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों को नुकसान पहुंचने से सामान्य जीवन और प्रभावित होता है।
जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान नेपाल के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश की बिजली व्यवस्था में जलविद्युत की बड़ी भूमिका है। शाह ने संयुक्त राष्ट्र में इसी व्यापक नुकसान को विकास पर पड़े प्रभाव से जोड़कर रखा।
आपदा के बाद राहत से ज्यादा बड़ी चुनौती पुनर्निर्माण की
बाढ़ के बाद तत्काल राहत पहुंचाना पहला चरण होता है। लेकिन असली चुनौती उसके बाद शुरू होती है।
लोगों के घर दोबारा बनाने होते हैं। सड़कें और पुल खड़े करने होते हैं। स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र फिर से शुरू करने होते हैं। किसानों और कारोबारियों को आजीविका वापस दिलानी होती है।
यही वजह है कि नेपाल की सरकार पुनर्निर्माण के लिए दीर्घकालिक वित्तीय सहायता चाहती है। प्रधानमंत्री शाह का कहना है कि ऐसी सहायता ऋण के रूप में आने के बजाय पर्याप्त ग्रांट के रूप में उपलब्ध होनी चाहिए।
UNGA में नेपाल का संदेश सिर्फ मदद की अपील नहीं था
बालेन शाह के भाषण की खास बात यह रही कि उन्होंने केवल आर्थिक मदद नहीं मांगी। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र के लिए एक संस्थागत सहयोग की जरूरत पर जोर दिया।
भारत और चीन के साथ साझा डेटा, ग्लेशियरों की निगरानी, अर्ली वार्निंग और आपदा प्रतिक्रिया का प्रस्ताव इसी सोच का हिस्सा है।
इससे नेपाल अपनी भूमिका केवल आपदा पीड़ित देश के रूप में नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र के लिए एक क्षेत्रीय जलवायु सहयोग की पहल करने वाले देश के रूप में भी प्रस्तुत कर रहा है।
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भी UNGA में उठाया अलग मुद्दा
संयुक्त राष्ट्र महासभा के इसी सत्र में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भी अपने देश से जुड़े कई मुद्दे उठाए।
उन्होंने 2024 में हुए राजनीतिक बदलाव का उल्लेख करते हुए कहा कि बांग्लादेश उस समय की सत्ता व्यवस्था से मुक्त हुआ और अब उनकी सरकार देश को फिर से मजबूत करने के लिए काम कर रही है।
यह उनका राजनीतिक आकलन और सरकार की अपनी व्याख्या है। ऐसे बयानों को बांग्लादेश के आंतरिक राजनीतिक घटनाक्रम के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
रोहिंग्या संकट पर बांग्लादेश का रुख
तारिक रहमान ने संयुक्त राष्ट्र में रोहिंग्या संकट का भी मुद्दा उठाया।
उन्होंने कहा कि संकट की जड़ म्यांमार में है और इसका स्थायी समाधान भी वहीं होना चाहिए। उनके अनुसार विस्थापित रोहिंग्या लोगों की सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी ही समस्या का दीर्घकालिक समाधान है।
बांग्लादेश लंबे समय से म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों की सुरक्षित वापसी की मांग करता रहा है। इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर उठाना ढाका की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
UNGA में दुनिया के सामने हिमालय का मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण?
हिमालय केवल नेपाल, भारत या चीन की भौगोलिक सीमा नहीं है। यह एशिया की बड़ी नदी प्रणालियों, जल संसाधनों, कृषि, ऊर्जा और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ क्षेत्र है।
इसीलिए हिमालय में जलवायु परिवर्तन का असर स्थानीय आपदा से आगे जा सकता है।
ग्लेशियरों में बदलाव, बर्फ पिघलने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ की घटनाएं नदी घाटियों में रहने वाली बड़ी आबादी को प्रभावित कर सकती हैं।
बालेन शाह ने UNGA में इसी व्यापक जोखिम को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखा।
अब दुनिया की नजर नेपाल की पुनर्निर्माण चुनौती पर
भोटेकोशी आपदा के बाद नेपाल के सामने एक साथ दो चुनौतियां हैं—लापता लोगों की तलाश और प्रभावित परिवारों की सहायता, तथा लंबे समय के लिए पुनर्निर्माण।
शाह ने संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहयोग मांगा है। लेकिन उनके प्रस्ताव का दूसरा हिस्सा भी उतना ही महत्वपूर्ण है—भविष्य में ऐसी आपदाओं से नुकसान कम करने के लिए पहले से तैयारी।
अगर नेपाल, भारत और चीन के बीच बेहतर डेटा साझेदारी और अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित होता है तो भविष्य में लोगों को पहले चेतावनी दी जा सकती है और संवेदनशील इलाकों से समय रहते निकासी संभव हो सकती है।
हिमालयी देशों के लिए बालेन शाह का संदेश
बालेन शाह का UNGA संबोधन मूल रूप से तीन बड़े संदेशों में देखा जा सकता है।
पहला—हिमालय में जलवायु जोखिम तेजी से बढ़ रहे हैं और इन्हें नजरअंदाज करना महंगा पड़ेगा।
दूसरा—नेपाल, भारत और चीन को आपदा जोखिम कम करने के लिए डेटा और तकनीक साझा करनी चाहिए।
तीसरा—जलवायु आपदाओं के बाद गरीब और संवेदनशील देशों को अतिरिक्त कर्ज में धकेलने के बजाय पर्याप्त ग्रांट आधारित वित्त उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
इन तीनों मुद्दों को उन्होंने भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा के अनुभव से जोड़कर दुनिया के सामने रखा।
नेपाल की त्रासदी ने दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा किया
भोटेकोशी की बाढ़ ने नेपाल को भारी मानवीय और आर्थिक नुकसान पहुंचाया। लेकिन इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्र की साझा कमजोरी भी सामने रखी है।
अगर ग्लेशियर और पहाड़ी ढलान अस्थिर होते हैं, तो उसका असर केवल उसी पहाड़ या देश तक सीमित नहीं रहता। नदियों के जरिए खतरा सीमाओं के पार पहुंच सकता है।
यही कारण है कि बालेन शाह ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत और चीन के साथ मिलकर एक साझा हिमालयी जलवायु तंत्र बनाने की बात रखी।
अब यह प्रस्ताव कितना आगे बढ़ता है, यह आने वाले महीनों में क्षेत्रीय कूटनीति और संबंधित देशों की सहमति पर निर्भर करेगा।

