Muzaffarnagar खतौली के ऐतिहासिक दिगंबर जैन मंदिर में त्रिलोक विधान का भव्य शुभारंभ: मंगल कलश यात्रा, ध्वजारोहण और ज्ञानवर्षा से भक्तिमय हुआ वातावरण
Khatauli Trilok Vidhan के शुभारंभ के साथ ही कस्बे के पिसनोपाड़ा स्थित ऐतिहासिक श्री दिगंबर जैन मंदिर का वातावरण पूरी तरह धर्ममय और भक्तिमय हो उठा। श्रुत सप्ताह महोत्सव के अंतर्गत आयोजित होने वाले त्रिदिवसीय त्रिलोक विधान का गुरुवार को अत्यंत हर्षोल्लास, वैदिक परंपराओं और धार्मिक गरिमा के बीच शुभारंभ किया गया। मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और पूरे दिन धार्मिक अनुष्ठानों, मंत्रोच्चारण तथा आध्यात्मिक प्रवचनों का सिलसिला चलता रहा।
Muzaffarnagar जैन समाज के लिए यह आयोजन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि त्रिलोक विधान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, ज्ञानार्जन और आध्यात्मिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। कार्यक्रम में शामिल श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धाभाव के साथ धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता की।
मंगल कलश यात्रा ने बांधा श्रद्धा का अनुपम समां
Shrut Saptah Mahotsav के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत भव्य मंगल कलश यात्रा के साथ हुई। सुबह के समय निकाली गई इस शोभायात्रा ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया।
मंगल कलश यात्रा स्थानीय श्रद्धालु मुकेश आढ़ती के निवास स्थान से प्रारंभ हुई। यात्रा में बड़ी संख्या में महिलाओं, पुरुषों और युवाओं ने भाग लिया। जैन समाज की महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सिर पर मंगल कलश धारण किए हुए भजन-कीर्तन करती हुई चल रही थीं। केसरिया और लाल रंग के वस्त्रों में सजी महिलाओं की उपस्थिति यात्रा का विशेष आकर्षण बनी रही।
भक्तिमय भजनों और जयकारों के बीच यात्रा नगर के विभिन्न मार्गों से गुजरती हुई ऐतिहासिक श्री दिगंबर जैन मंदिर पहुंची। पूरे मार्ग पर श्रद्धालुओं ने यात्रा का स्वागत किया और धार्मिक वातावरण का आनंद लिया।
ध्वजारोहण के साथ हुआ धार्मिक अनुष्ठान का विधिवत शुभारंभ
मंगल कलश यात्रा के मंदिर पहुंचने के बाद मुख्य वेदी के समक्ष धार्मिक परंपराओं के अनुसार जैन ध्वजारोहण का कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस अवसर पर शशांक सर्राफ परिवार द्वारा पूर्ण श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ ध्वजारोहण किया गया।
जैसे ही ध्वज फहराया गया, पूरा मंदिर परिसर गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने भगवान के जयघोष करते हुए वातावरण को भक्तिरस से भर दिया।
ध्वजारोहण को जैन परंपरा में शुभता, धर्म विजय और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने धर्म के मार्ग पर चलने और आत्मकल्याण के लिए प्रयासरत रहने का संकल्प लिया।
राजस्थान से पधारे विधानाचार्य हिमालय शास्त्री ने संपन्न कराईं मांगलिक क्रियाएं
Digambar Jain Temple Khatauli में आयोजित इस महाविधान का संचालन राजस्थान के उदयपुर से विशेष रूप से पधारे प्रसिद्ध विधानाचार्य हिमालय शास्त्री द्वारा किया गया। उन्होंने जैन आगम परंपरा के अनुसार सभी धार्मिक अनुष्ठानों को पूर्ण विधि-विधान और शुद्धता के साथ संपन्न कराया।
मंत्रोच्चारण, जाप्य अनुष्ठान, कलश स्थापना और अन्य मांगलिक क्रियाओं के दौरान श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ सहभागिता की। विधानाचार्य के निर्देशन में पूरे कार्यक्रम को धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप संपन्न कराया गया।
उपस्थित श्रद्धालुओं ने बताया कि इतने व्यवस्थित और गरिमामय आयोजन का हिस्सा बनना उनके लिए एक आध्यात्मिक अनुभव जैसा रहा।
पंच परमागम और पवित्र कलशों की स्थापना से दिव्य बना मंदिर परिसर
कार्यक्रम के दौरान मुख्य यज्ञ मंडप के चारों कोनों पर पवित्र कलश स्थापित किए गए। इसके साथ ही पंच परमागम की प्रतिष्ठा भी अत्यंत श्रद्धापूर्वक संपन्न हुई।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पंच परमागम जैन धर्म के मूल ज्ञान और आध्यात्मिक सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी स्थापना के समय श्रद्धालुओं ने मंत्रोच्चारण के साथ धर्मग्रंथों के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।
कलश स्थापना के बाद पूरा मंडप धार्मिक ऊर्जा और आध्यात्मिक वातावरण से परिपूर्ण दिखाई दिया।
सोने के अक्षरों में लिखित तत्त्वार्थ सूत्र बना आकर्षण का केंद्र
त्रिलोक विधान के दौरान एक अत्यंत विशेष और दुर्लभ दृश्य भी देखने को मिला। जैन दर्शन के महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘तत्त्वार्थ सूत्र’ को विशेष सम्मान के साथ वेदी पर स्थापित किया गया।
सोने के अक्षरों में लिखित इस अलौकिक ग्रंथ को बाल ब्रह्मचारी श्रेणिक जी द्वारा पूर्ण विनम्रता और धार्मिक मर्यादा के साथ वेदी पर विराजमान कराया गया। जैसे ही यह प्रक्रिया पूरी हुई, मंदिर परिसर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण जयकारों के साथ इसका स्वागत किया।
धर्मप्रेमियों के लिए यह दृश्य अत्यंत प्रेरणादायक और स्मरणीय रहा। कई श्रद्धालुओं ने इसे कार्यक्रम का सबसे विशेष क्षण बताया।
पांच मेरु, आठ मंगल द्रव्य और आठ प्रातिहार्यों की हुई स्थापना
त्रिलोक विधान के अंतर्गत मंडप में पांच मेरु, आठ मंगल द्रव्य और आठ प्रातिहार्यों की भव्य स्थापना की गई। इन धार्मिक प्रतीकों की स्थापना से पूरा मंदिर परिसर दिव्यता और आध्यात्मिक आभा से आलोकित हो उठा।
सजावट, धार्मिक प्रतीकों और वैदिक विधानों के कारण मंदिर का दृश्य अत्यंत आकर्षक दिखाई दे रहा था। श्रद्धालुओं ने इस अवसर को अपने जीवन का सौभाग्य बताते हुए बड़ी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की।
विधान के पात्रों का मनोनयन, विभिन्न इंद्र पदों की जिम्मेदारी सौंपी गई
महाविधान के दौरान विभिन्न धार्मिक पात्रों और पदाधिकारियों का मनोनयन भी किया गया। धार्मिक परंपरा के अनुसार सौधर्म इंद्र के रूप में शशांक जैन, यज्ञ नायक के रूप में राहुल जैन, कुबेर इंद्र के रूप में शशांक जैन तथा चक्रवर्ती सम्राट के रूप में मुकेश जैन को मनोनीत कर तिलक लगाया गया।
इसके अतिरिक्त कुलदीप जैन, राजकुमार जैन, अनंतवीर्य जैन, गौरव सर्राफ, नवीन जैन, संदीप जैन और प्रतीक जैन सहित अनेक श्रद्धालुओं ने विभिन्न इंद्र पदों का दायित्व संभाला।
इन सभी श्रद्धालुओं ने धार्मिक परंपरा के अनुरूप अष्टद्रव्य से अर्घ्य समर्पित कर पूजा-अर्चना में सहभागिता की।
डॉ. वीर सागर जैन ने अहंकार त्याग और आत्मकल्याण का दिया संदेश
कार्यक्रम में दिल्ली से पधारे जैन दर्शन के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान डॉ. वीर सागर जैन ने अपने प्रवचनों से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है। अहंकार वह दुर्गुण है जो व्यक्ति द्वारा किए गए अनेक पुण्य कार्यों के प्रभाव को भी समाप्त कर सकता है। इसलिए जीवन में विनम्रता, संयम और आत्मचिंतन को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जैन दर्शन प्रत्येक जीव को मूल रूप से ज्ञाता और द्रष्टा मानता है। मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचानना और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए।
भौतिक चकाचौंध से ऊपर उठकर आत्मज्ञान की ओर बढ़ने का आह्वान
अपने प्रेरक प्रवचन में डॉ. वीर सागर जैन ने कहा कि आधुनिक जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ ने मनुष्य को उसके वास्तविक उद्देश्य से दूर कर दिया है। उन्होंने लोगों से आत्मचिंतन, धर्म अध्ययन और आध्यात्मिक साधना को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानता, तब तक उसे स्थायी शांति और संतोष प्राप्त नहीं हो सकता। आत्मज्ञान ही वह मार्ग है जो जीवन को सार्थक बनाता है।
उनके विचारों को उपस्थित श्रद्धालुओं ने अत्यंत ध्यानपूर्वक सुना और धर्म तथा आत्मविकास के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
श्रुत सप्ताह महोत्सव ने बढ़ाई धार्मिक चेतना
खतौली में आयोजित यह धार्मिक आयोजन केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जैन दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार का भी महत्वपूर्ण माध्यम बना।
श्रुत सप्ताह महोत्सव के अंतर्गत चल रहे कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग ले रहे हैं। आयोजकों का कहना है कि आगामी दिनों में भी विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें समाज के लोग बढ़-चढ़कर भाग लेंगे।

