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Muzaffarnagar खतौली में ई-रजिस्ट्री और रजिस्ट्री कार्यालयों के निजीकरण के विरोध में उबाल, अधिवक्ताओं ने बंद रखे चैंबर, तहसील परिसर में दिनभर चला धरना

E-Registry को लेकर Muzaffarnagar जनपद की खतौली तहसील में बुधवार को भी विरोध के स्वर बुलंद रहे। प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित ई-रजिस्ट्री व्यवस्था और रजिस्ट्री कार्यालयों के निजीकरण के विरोध में तहसील बार एसोसिएशन, दस्तावेज लेखक संघ तथा स्टाम्प विक्रेता संघ ने संयुक्त रूप से आंदोलन जारी रखा। आंदोलनकारियों ने तहसील परिसर में अपने चैंबर बंद रखे, रजिस्ट्री कार्यालय के सामने धरना दिया और सरकार के प्रस्तावित निर्णय के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

दिनभर चली कलमबंद हड़ताल के कारण तहसील परिसर में सामान्य कामकाज प्रभावित रहा। रजिस्ट्री और कई न्यायिक कार्य बाधित होने से दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले लोगों को भी असुविधा का सामना करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह आंदोलन केवल उनके पेशेगत हितों की रक्षा के लिए नहीं बल्कि आम जनता के अधिकारों और पारदर्शी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भी किया जा रहा है।


तहसील बार एसोसिएशन ने निजीकरण को बताया जनहित के विरुद्ध

धरना प्रदर्शन के दौरान तहसील बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सुभाष चन्द ने कहा कि रजिस्ट्री कार्य को निजी हाथों में सौंपने का निर्णय दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में अधिवक्ता, दस्तावेज लेखक और स्टाम्प विक्रेता मिलकर लोगों को कानूनी प्रक्रियाओं के संबंध में मार्गदर्शन देते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि रजिस्ट्री संबंधी कार्य विधिक नियमों के अनुरूप संपन्न हों।

उन्होंने आशंका व्यक्त की कि यदि रजिस्ट्री व्यवस्था का संचालन निजी संस्थाओं के माध्यम से किया गया तो आम नागरिकों की पहुंच और सुविधा प्रभावित हो सकती है। साथ ही सेवाओं की लागत बढ़ने और प्रक्रिया में व्यावसायिक हितों के हावी होने की संभावना भी बढ़ सकती है।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार को इस विषय पर व्यापक स्तर पर संबंधित पक्षों से संवाद करना चाहिए और किसी भी बड़े बदलाव से पहले सभी पहलुओं का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए।


महासचिव सत्यप्रकाश सैनी बोले— वर्तमान व्यवस्था में जनता को मिलता है कानूनी संरक्षण

तहसील बार एसोसिएशन के महासचिव सत्यप्रकाश सैनी ने कहा कि मौजूदा प्रणाली में अधिवक्ता और दस्तावेज लेखक आम लोगों को कानूनी प्रक्रिया समझाने, दस्तावेजों की वैधता सुनिश्चित करने और संभावित विवादों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि रजिस्ट्री केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक कानूनी प्रक्रिया भी है, जिसमें छोटी सी त्रुटि भविष्य में बड़े विवादों का कारण बन सकती है। इसलिए ऐसी व्यवस्था में प्रशिक्षित और अनुभवी विधिक पेशेवरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रहती है।

सत्यप्रकाश सैनी ने कहा कि प्रस्तावित ई-रजिस्ट्री मॉडल और निजीकरण व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं को लेकर अधिवक्ताओं के बीच गंभीर चिंताएं हैं, जिन्हें सरकार के समक्ष रखा जा रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि शासन स्तर पर इन चिंताओं को गंभीरता से सुना जाएगा।


तहसील परिसर में रहा आंदोलन का असर, प्रभावित हुआ रजिस्ट्री कार्य

बुधवार को आंदोलन के चलते तहसील परिसर का माहौल सामान्य दिनों की तुलना में अलग दिखाई दिया। बड़ी संख्या में अधिवक्ता, दस्तावेज लेखक, टाइपिस्ट, स्टाम्प विक्रेता और अन्य संबंधित लोग धरने में शामिल हुए।

धरना स्थल पर वक्ताओं ने कहा कि यदि रजिस्ट्री कार्यालयों के संचालन में किसी प्रकार का निजी हस्तक्षेप बढ़ता है तो इससे पारंपरिक व्यवस्था में जुड़े हजारों लोगों की आजीविका पर भी प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए कानूनी सहायता प्राप्त करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

हड़ताल के कारण कई लोग अपने निर्धारित कार्य नहीं करा सके। हालांकि आंदोलनकारियों ने कहा कि जनता को हो रही असुविधा के लिए वे खेद व्यक्त करते हैं, लेकिन उनका संघर्ष लंबे समय के जनहित से जुड़ा हुआ है।


दस्तावेज लेखक संघ ने सरकार से पुनर्विचार की मांग की

दस्तावेज लेखक संघ के तहसील अध्यक्ष सुशील वर्मा ने कहा कि सरकार को प्रस्तावित व्यवस्था पर पुनर्विचार करना चाहिए और रजिस्ट्री कार्य को पूर्व की भांति सरकारी नियंत्रण में ही बनाए रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था वर्षों से संचालित हो रही है और इसमें सुधार की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन निजीकरण इसका समाधान नहीं है। उनके अनुसार किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले संबंधित संगठनों, अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों और आम जनता के सुझावों को शामिल किया जाना चाहिए।

सुशील वर्मा ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि मांगों पर विचार नहीं किया गया तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा तथा भविष्य में बड़े स्तर पर विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।


अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट रहने का आह्वान

धरना स्थल पर मौजूद वक्ताओं ने सभी अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों और स्टाम्प विक्रेताओं से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि किसी भी पेशे से जुड़े लोगों के अधिकारों की रक्षा संगठनात्मक एकता से ही संभव है।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार का टकराव पैदा करना नहीं बल्कि अपनी चिंताओं को लोकतांत्रिक तरीके से सरकार तक पहुंचाना है। उन्होंने भरोसा जताया कि सरकार उनकी बात सुनेगी और जनहित को ध्यान में रखते हुए उचित निर्णय लेगी।


सैकड़ों लोगों की रही मौजूदगी, आंदोलन को मिला व्यापक समर्थन

धरने और विरोध प्रदर्शन में दस्तावेज लेखक संघ के जिलाध्यक्ष आदेश मोतला सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारी और सदस्य मौजूद रहे। कार्यक्रम में सरदार जितेंद्र सिंह, शकुन्तला देवी, राजवीर सिंह, जितेंद्र त्यागी, दिमाग सिंह, नवीन उपाध्याय, अंकलक जैन, मनीष कुमार, राम चंद्र सैनी, प्रमोद शर्मा, अभिषेक गोयल, राजगृही यादव, कदम सिंह, नवाब सिंह, प्रदीप कुमार, राजेश कुमार, सुमित कुमार, सचिन आर्य, मोहम्मद अरशद, जगबीर सिंह, संजय कुमार, रामकुमार, आनंद उपाध्याय, रतन सिंह, रोशनी सैनी, राम रोशन दास, इकबाल अहमद, इमरान त्यागी, ललित कुमार, पंकज गुप्ता, युगांक मित्तल, सीता राम, अंकुश कुमार, विनीत गौतम, निकुंज कुमार, अनुज जैन, सूर्यकांत मौतला, आशीष राणा, मज़ाहिर काजी, प्रोनू कुमार, राजन राणा, पंकज कुमार, सुमित गुप्ता, महताब अली, अनस चौधरी, अर्जुन कुमार समेत सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।

तहसील परिसर में दिनभर चले इस प्रदर्शन ने स्पष्ट संकेत दिया कि प्रस्तावित ई-रजिस्ट्री व्यवस्था और रजिस्ट्री कार्यालयों के निजीकरण को लेकर संबंधित वर्गों में व्यापक असंतोष व्याप्त है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।


 

खतौली तहसील में ई-रजिस्ट्री व्यवस्था और रजिस्ट्री कार्यालयों के निजीकरण के विरोध में जारी आंदोलन ने स्थानीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों और स्टाम्प विक्रेताओं का कहना है कि किसी भी नई व्यवस्था का उद्देश्य जनसुविधा और पारदर्शिता बढ़ाना होना चाहिए, जबकि उनके अनुसार प्रस्तावित बदलावों को लेकर अभी कई सवाल अनुत्तरित हैं। फिलहाल सभी की नजरें सरकार की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हैं, क्योंकि आंदोलनकारी संगठनों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक विचार नहीं किया गया तो विरोध प्रदर्शन को और व्यापक रूप दिया जा सकता है।

 

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