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Muzaffarnagar- धूमधाम से मनाया गया दशहरा पर्व – भाईयों के कानों पर रखे गए नौरते, रावण वध के साथ रामलीला का भव्य आयोजन

Muzaffarnagar: विजयदशमी का पर्व, जो भगवान राम की रावण पर विजय का प्रतीक है, देशभर में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर हर घर में पायता पूजन की प्राचीन परंपरा निभाई गई, जहां शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्रों की भी पूजा की गई। विशेष रूप से बहनों द्वारा भाईयों के कानों पर विजय के प्रतीक नौरते रखने की रस्म ने इस पर्व को और भी भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप दिया।

दशहरे का ऐतिहासिक महत्व और पायता पूजन की परंपरा

दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान राम द्वारा रावण का वध कर जानकी (माता सीता) को लंका से अयोध्या वापस लाने की विजय यात्रा का पर्व है। इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। हर साल दशहरे के दिन भगवान राम की विजय यात्रा का प्रतीक पायता (गृह देवता की मूर्ति) को आंगन में गोबर और आटे से बनाया जाता है। इस पायते पर शस्त्र और शास्त्र दोनों रखकर पूजा की जाती है, जो कि भगवान राम की शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माने जाते हैं।

नौरते, जो नवरात्र के दौरान बोए जाते हैं, विशेष रूप से दशहरे के दिन श्रीराम पर चढ़ाए जाते हैं। यह प्रतीकात्मक नौरते भाई-बहन के रिश्ते को और भी गहरा करते हैं। भाई की विजय की कामना करते हुए बहनें यह नौरते अपने भाइयों के कान पर रखती हैं, जिससे यह परंपरा न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक महत्व भी रखती है।

पर्व का सांस्कृतिक महत्व और विद्या आरंभ का उत्सव

दशहरा सिर्फ रावण वध का पर्व नहीं है, बल्कि इसे विद्या आरंभ का भी दिन माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से शिक्षा प्राप्ति की कामना से पायता पूजन के बाद विद्या अध्ययन की शुरूआत की जाती है। पुराने समय में बहनें अपने भाइयों को शुभ और विजय के प्रतीक स्वरूप नौरते कान पर रखकर उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए विदा करती थीं। यह परंपरा आज भी कई जगहों पर निभाई जाती है। पुरोहित इस दिन नौरते लेकर अपने यजमानों के घर पहुंचते हैं और दक्षिणा प्राप्त करते हैं। भाइयों द्वारा बहनों को विजय पर्व की दक्षिणा दी जाती है, जो इस रिश्ते के महत्व को और भी गहराई से दर्शाता है।

रामलीला का आयोजन और रावण वध का दृश्य

मुजफ्फरनगर के रामलीला मैदान में शाम के समय रावण वध का दृश्य प्रस्तुत किया गया, जिसमें भगवान राम और रावण के बीच हुए भयंकर युद्ध का सजीव चित्रण किया गया। रामलीला टिल्ला, नुमाइश मैदान और पटेलनगर जैसे स्थानों पर भव्य मेले का आयोजन किया गया, जहां चाट, पकोड़ी, जलेबी, खिलौने और मिट्टी के बर्तन बेचने वाले दुकानदार अपनी दुकानें सजाकर बैठे थे। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से हजारों लोग इस मेले का हिस्सा बनने आए और जमकर खरीदारी की।

रामलीला का यह आयोजन बच्चों और बड़ों दोनों के लिए एक अद्भुत अनुभव रहा। भगवान राम के आदर्शों पर चलने और बुराई को छोड़ने का संकल्प लेते हुए लोगों ने जोरदार जयकारे लगाए। रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन कर असत्य पर सत्य की विजय का संदेश दिया गया।

दशहरे के पीछे छिपी गहरी शिक्षा

दशहरे का पर्व सिर्फ धार्मिक महत्व तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देता है। भगवान राम की तरह हमें भी अपने जीवन में धैर्य, साहस, और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा लेनी चाहिए। यह पर्व हमें सिखाता है कि चाहे कितनी भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सत्य और धर्म के मार्ग पर हैं, तो अंततः हमारी विजय होगी।

देशभर में उत्सव का जश्न

मुजफ्फरनगर ही नहीं, बल्कि पूरे देश में दशहरे का पर्व धूमधाम से मनाया गया। काशी, अयोध्या, लखनऊ, वाराणसी, और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में रावण वध के बाद आतिशबाजी और भव्य रामलीला का आयोजन हुआ। इस दिन विद्या आरंभ करने की परंपरा का निर्वाह करते हुए कई जगहों पर बच्चों को उनकी पढ़ाई की नई शुरुआत के लिए आशीर्वाद दिया गया। यह परंपरा आज भी विद्या अध्ययन की महानता को दर्शाती है।

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के कईं इलाकों में महिलाओं ने अपने भाइयों के कानों पर नौरते रखने की प्रथा निभाई। यह नौरते भाई की विजय और उसकी लंबी आयु के प्रतीक माने जाते हैं। पुरोहितों ने भी अपने यजमानों के घर-घर जाकर विजय पर्व की कामना की और दक्षिणा प्राप्त की।

आधुनिक युग में दशहरे की प्रासंगिकता

वर्तमान युग में भी दशहरे का महत्व कम नहीं हुआ है। भले ही समाज में तकनीकी और सांस्कृतिक परिवर्तन हो रहे हों, लेकिन यह पर्व हमें हमारे सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों से जोड़े रखता है। यह एक ऐसा पर्व है जो न केवल धार्मिकता को बढ़ावा देता है, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते को और भी मजबूत करता है।

आज के समय में जब परिवार टूटते जा रहे हैं, इस तरह के पर्व हमारी पारिवारिक एकता को फिर से जीवित करने में सहायक होते हैं। दशहरे का पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, हमें सत्य और धर्म के मार्ग पर डटे रहना चाहिए।

दशहरा के साथ जुड़े रीति-रिवाज और मेले का आनंद

दशहरे के मेले में आने वाले लोग पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते हैं। चाट-पकोड़ी, जलेबी, खिलौने और मिट्टी के बर्तनों की दुकानें यहां की खासियत होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोग इस मेले में अपनी आवश्यकताओं के अनुसार खरीदारी करते हैं और बच्चों के लिए खिलौने और मिठाइयां खरीदते हैं।

मेले में बच्चों के लिए झूले, तोप-तमंचे के खिलौने, और कईं तरह के खेल उपलब्ध होते हैं, जो उनकी उत्सुकता को और बढ़ाते हैं। मेले की रौनक और भी बढ़ जाती है जब लोग परंपरागत परिधानों में सज-धजकर वहां आते हैं। मेले में ग्रामीण और शहरी जीवन का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

दशहरा पर्व केवल भगवान राम की विजय यात्रा का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह पर्व हमें सत्य, धर्म, और पारिवारिक मूल्यों की महत्वपूर्ण शिक्षा भी देता है। भाई-बहन का प्यार, विद्या का महत्व, और सत्य की विजय के संदेश से भरा यह पर्व हमें अपनी संस्कृति और परंपराओं के साथ जोड़े रखता है।

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