उत्तर प्रदेश

High Court में गवाह के रूप में मृतक को पेश करना, डीएम Fatehpur की कार्यशैली पर उठे सवाल

Fatehpur उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक बेहद अजीब मामला सामने आया है, जिसे सुनकर हर कोई चौंक गया। कोर्ट में पेश किया गया गवाह, जिसकी मृत्यु 2011 में हो चुकी थी, को 2024 में एक सरकारी जमीन के निरीक्षण में शामिल कर दिया गया। यह मामला न केवल न्यायालय की ओर से उठाए गए सवालों का कारण बना, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस तरह सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और कागजी हेरफेर की गहरी जड़ें हैं। आइए, विस्तार से जानते हैं इस दिलचस्प और हैरान कर देने वाली कानूनी जंग के बारे में।

कोर्ट में मृतक को गवाह क्यों बनाया गया?

इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक ऐसे मामले की सुनवाई हो रही थी जिसमें याची जगदीश शरण सिंह ने मंझनपुर गांव के तालाब की जमीन पर अतिक्रमण के आरोप में लगाए गए जुर्माने के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। याची का कहना था कि उसने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा नहीं किया है, बल्कि उसके खिलाफ लगाई गई अतिक्रमण की रिपोर्ट झूठी और बिना आधार के है। याची ने यह आरोप भी लगाया कि जिन लोगों ने वास्तव में अतिक्रमण किया है, प्रशासन उन पर कार्रवाई करने के बजाय उसे ही निशाना बना रहा है।

इसी मामले में, डीएम फतेहपुर ने 26 अक्टूबर 2024 की मुआयना रिपोर्ट पेश की थी जिसमें यह दावा किया गया था कि याची ने सरकारी तालाब की भूमि पर अवैध कब्जा किया है। इस रिपोर्ट में गवाहों के रूप में दो नाम सामने आए थे—छेदीलाल और मिथुन। लेकिन याची के अधिवक्ता जगदीश सिंह बुंदेला ने कोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य पेश किया। उन्होंने बताया कि एक गवाह, छेदीलाल, की मृत्यु 2011 में हो चुकी है। यह तथ्य सामने आते ही अदालत ने डीएम से सवाल पूछा कि जिनका मृत्यु प्रमाण पत्र है, वह गवाह कैसे बने और 2024 में कैसे मौके पर मौजूद थे? इसके अलावा, दूसरा गवाह मिथुन भी मंझनपुर गांव का निवासी नहीं था, इस पर भी सवाल उठाए गए।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और सरकारी व्यवस्था पर सवाल

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जेजे मुनीर ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और डीएम फतेहपुर से सात मई तक स्पष्टीकरण मांगा। कोर्ट ने डीएम से पूछा कि यदि छेदीलाल की मृत्यु 2011 में हो चुकी थी, तो वह कैसे गवाही दे सकता है? कोर्ट ने इस मामले को सरकारी व्यवस्था और तंत्र में फैली गड़बड़ी का उदाहरण माना। इस पूरे प्रकरण से यह साफ हो गया कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और कागजी हेरफेर की जड़ें गहरी हो चुकी हैं। जब एक मृत व्यक्ति को गवाह के रूप में पेश किया जाता है, तो यह सवाल उठता है कि क्या यह केवल एक व्यक्तिगत गलती है या फिर पूरे प्रशासनिक तंत्र की विफलता का परिणाम है?

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह पूरी सरकारी व्यवस्था और उसके कामकाज की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। कोर्ट ने डीएम फतेहपुर से स्पष्ट जानकारी मांगी कि मुआयना रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया क्या थी और किन-किन अधिकारियों ने इस रिपोर्ट को तैयार किया।

सरकारी तंत्र की जवाबदेही पर बड़ा सवाल

यह मामला एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है कि कैसे सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता फैली हुई है। सरकारी दस्तावेजों में फेरबदल, गवाहों के नाम में हेरफेर और ऐसी ही अन्य गतिविधियाँ सीधे-सीधे सरकारी अधिकारियों के कार्यकलापों की ईमानदारी पर सवाल खड़ा करती हैं। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि कागजी कारवाई में गड़बड़ियां किस हद तक हो सकती हैं। क्या यह महज एक गलती थी, या फिर कुछ बड़े भ्रष्टाचार का संकेत?

इस मामले से यह भी जाहिर होता है कि प्रशासनिक तंत्र में जब तक जांच और जवाबदेही की मजबूत प्रक्रिया नहीं होगी, तब तक इस तरह के भ्रष्टाचार की घटनाएं बढ़ती रहेंगी। अगर एक गवाह के रूप में मृत व्यक्ति को पेश किया जा सकता है, तो फिर कितनी और ऐसी गड़बड़ियां चल रही होंगी जो आम लोगों की नजर से बच जाती हैं।

इस मामले से क्या सिख सकते हैं?

यह मामला सिर्फ एक अदालत की सुनवाई तक सीमित नहीं है। यह हमें यह सिखाता है कि सरकारी तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना, भ्रष्टाचार को न केवल बढ़ावा मिलता है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों का भी हनन होता है। उच्च न्यायालय की इस कड़ी टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि न्याय व्यवस्था का मकसद सिर्फ कानून लागू करना ही नहीं, बल्कि हर किसी के साथ समान और निष्पक्ष व्यवहार करना भी है।

अब यह सरकार और संबंधित अधिकारियों पर निर्भर करता है कि वे इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या यह केवल एक बार की घटना थी, या फिर इसका कुछ और बड़ा संदर्भ है।

किसी भी संस्था की ईमानदारी उसकी जवाबदेही में है। अगर हमारी संस्थाएं ईमानदारी से काम करें, तो कोई भी गड़बड़ी सामने नहीं आ सकती।

यह मामला निश्चित रूप से ध्यान देने योग्य है और यह हमें एक कड़ा संदेश देता है कि प्रशासन में सुधार की दिशा में हमें और अधिक सतर्क रहना होगा। यदि भविष्य में ऐसे मामलों को रोका नहीं गया, तो यह पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है।

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