उत्तर प्रदेश

काशी में शंकराचार्य का तीखा प्रहार: बटुकों के अपमान से यूजीसी नियमों तक, Swami Avimukteshwaranand ने सरकार और व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल

Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand ने काशी की धार्मिक और राजनीतिक फिज़ा में नई हलचल पैदा कर दी है। गुरुवार को काशी पहुंचकर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान न केवल हालिया घटनाओं पर अपनी नाराजगी जाहिर की, बल्कि यूजीसी के नए नियमों को लेकर भी तीखा विरोध दर्ज कराया। उनके शब्दों में भावनात्मक तीव्रता, सामाजिक चिंता और धार्मिक चेतावनी तीनों का संगम साफ नजर आया, जिसने पूरे देश में चर्चा का नया दौर शुरू कर दिया है।


🔴 बटुकों के अपमान पर कड़ा संदेश

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि पूरे देश ने वीडियो में देखा है कि कैसे बटुकों को उनकी चोटी पकड़कर अपमानित किया गया। उन्होंने इसे केवल एक घटना नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और धार्मिक मर्यादा पर सीधा आघात बताया। उनके अनुसार, गलती को गलती न मानना और अपराध को स्वीकार न करना व्यक्ति और सत्ता दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि “जो अपराध किया गया, वह सबके सामने आ गया है। अपने लोगों ने संयम से 11 दिन तक प्रयागराज में रहकर उन्हें मौका दिया कि वे अपनी गलती सुधार लें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।” इसके बाद उन्होंने काशी लौटने का फैसला लिया, जो उनके अनुसार एक संदेश है कि मौजूदा व्यवस्था में न्याय की उम्मीद कम होती जा रही है।


🔴 प्रयागराज से काशी तक का प्रतीकात्मक सफर

Shankaracharya Avimukteshwaranand statement के अनुसार, प्रयागराज में 11 दिन का ठहराव केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं था, बल्कि एक नैतिक और सामाजिक संदेश भी था। उनका कहना था कि यह समय आत्मसुधार और संवाद का अवसर था। लेकिन जब उन्हें लगा कि सुधार की कोई कोशिश नहीं हो रही, तो उन्होंने काशी लौटकर अपने विचारों को सार्वजनिक रूप से रखने का निर्णय लिया।

उनके समर्थकों का मानना है कि यह यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति असंतोष का प्रतीक है।


🔴 यूजीसी के नए नियमों पर तीखा विरोध

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यूजीसी के नए नियमों को सनातन धर्म के लिए “घातक” बताया। उन्होंने कहा कि ये नियम केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं हैं, बल्कि सामाजिक संरचना पर सीधा प्रभाव डालने वाले कदम हैं।

उनके अनुसार, सनातन परंपरा में जातियों की व्यवस्था आपसी संघर्ष के लिए नहीं, बल्कि आजीविका और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए बनाई गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि नए नियमों के माध्यम से एक जाति को दूसरी के सामने खड़ा कर दिया जा रहा है, जिससे समाज में टकराव और विघटन की स्थिति पैदा हो सकती है।


🔴 “सनातन को कमजोर करने की मशीन” का आरोप

Shankaracharya Avimukteshwaranand statement में सबसे तीखा वाक्य यही था कि यूजीसी के नियम पूरे सनातन धर्म को समाप्त करने की दिशा में एक “मशीन” की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल शिक्षा नीति का सवाल नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का भी मुद्दा है।

उनका मानना है कि इन नियमों के जरिए समाज की परंपरागत संरचना को तोड़ा जा रहा है, जिससे लंबे समय में सामाजिक अस्थिरता बढ़ सकती है।


🔴 काशी में आगमन और सुरक्षा व्यवस्था

बुधवार रात करीब साढ़े नौ बजे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद केदार घाट स्थित श्रीविद्या मठ पहुंचे। माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर उन्होंने गंगा स्नान नहीं किया, लेकिन उनकी मौजूदगी ने पूरे क्षेत्र में हलचल पैदा कर दी।

उनकी सुरक्षा को लेकर भेलूपुर पुलिस पूरी तरह सतर्क रही। मठ के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।


🔴 धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक संदेश

Swami Avimukteshwaranand के बयान को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे एक राजनीतिक संदेश के रूप में भी समझा जा रहा है। उन्होंने जिस तरह “इस पार्टी की सरकार में न्याय की कोई आशा न करें” जैसी टिप्पणी की, उसने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है।

विश्लेषकों का कहना है कि यह बयान आने वाले समय में धार्मिक और राजनीतिक विमर्श को और तेज कर सकता है।


🔴 समर्थकों और आलोचकों की प्रतिक्रियाएं

उनके समर्थकों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बयान को साहसी और स्पष्ट बताया। उनका कहना है कि उन्होंने समाज के उन मुद्दों को उठाया है, जिन पर लंबे समय से खुलकर बात नहीं हो रही थी।

वहीं, आलोचकों का मानना है कि यूजीसी नियमों पर इस तरह की टिप्पणी से शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक सुधारों पर गलत संदेश जा सकता है। उनके अनुसार, नियमों का उद्देश्य समानता और समावेशिता बढ़ाना है, न कि समाज को बांटना।


🔴 शिक्षा, धर्म और समाज का संगम

Shankaracharya Avimukteshwaranand statement ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि शिक्षा नीति, धार्मिक परंपरा और सामाजिक संरचना के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। क्या आधुनिक नियमों के साथ परंपरागत मूल्यों को सुरक्षित रखा जा सकता है, या दोनों के बीच टकराव अपरिहार्य है?

इस बहस ने काशी से लेकर देश के अन्य हिस्सों तक संवाद का नया मंच खोल दिया है।


🔴 आगे की रणनीति और आंदोलन की संभावना

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने संकेत दिए कि यूजीसी नियमों के खिलाफ उनका विरोध यहीं खत्म नहीं होगा। उन्होंने कहा कि वे देशभर में सनातन परंपरा से जुड़े लोगों को जागरूक करेंगे और संवाद के जरिए अपनी बात रखेंगे।

उनके अनुयायियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर धार्मिक सभाएं, विमर्श और संभवतः आंदोलन भी देखने को मिल सकते हैं।


🔴 काशी की धरती से उठी गूंज, देशभर में चर्चा

काशी हमेशा से धार्मिक, सांस्कृतिक और वैचारिक आंदोलनों का केंद्र रही है। Shankaracharya Avimukteshwaranand statement ने एक बार फिर इस ऐतिहासिक नगरी को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

यह मामला अब केवल एक बयान नहीं, बल्कि धर्म, शिक्षा और राजनीति के त्रिकोण में फंसी एक बड़ी बहस का रूप ले चुका है।


काशी से उठी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की आवाज़ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सनातन परंपरा, शिक्षा नीति और सामाजिक संरचना के बीच चल रही बहस आने वाले समय में और गहराने वाली है। सवाल यह है कि संवाद और संतुलन का रास्ता चुना जाएगा या टकराव की दिशा में कदम बढ़ेंगे। देश की नजर अब इस बहस के अगले अध्याय पर टिकी है।

 

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