आम बजट पर Rakesh Tikait का तीखा वार: ‘कागजों में चमक, ज़मीन पर सन्नाटा’, किसानों ने बताया उद्योगपतियों का बजट
Rakesh Tikait की आवाज अब सिर्फ एक जिले या संगठन की नहीं, बल्कि उस व्यापक बहस की प्रतीक बन गई है, जिसमें देश की कृषि नीति और बजटीय प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े हो रहे हैं। गांव और शहर के बीच बढ़ते इस फासले को पाटने की जिम्मेदारी अब नीतियों और उनके क्रियान्वयन पर टिकी है—क्योंकि कागजों पर लिखी योजनाओं की असली परीक्षा खेतों की मिट्टी में ही होती है।
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