ब्रिटेन ने Palestine को मान्यता दी: पीएम कीर स्टार्मर का ऐतिहासिक फैसला और टू-स्टेट सॉल्यूशन की उम्मीद
ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने रविवार को लंदन में 10 डाउनिंग स्ट्रीट से ऐलान किया कि ब्रिटेन अब Palestine को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देगा। यह ऐतिहासिक फैसला कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल के समानांतर आया, जिन्होंने भी फिलिस्तीन को औपचारिक रूप से मान्यता दी।Hamas
इस कदम के साथ फिलिस्तीन को मान्यता देने वाले देशों की संख्या लगभग 150 तक पहुंच गई है। पीएम कीर स्टार्मर ने इस फैसले को दो राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) की दिशा में अहम कदम बताया और कहा कि यही स्थायी शांति का रास्ता है।
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कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल का समर्थन
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि यह कदम मध्य पूर्व में शांति और टू-स्टेट सॉल्यूशन को बचाने के लिए उठाया गया है। उनका कहना है कि फिलिस्तीन एक आजाद और लोकतांत्रिक देश बनेगा और इजराइल के साथ शांति से रहेगा।
ऑस्ट्रेलिया के पीएम एंथनी अल्बानीज ने कहा कि यह कदम फिलिस्तीनी लोगों की आजादी और इच्छा का सम्मान करता है। पुर्तगाल के विदेश मंत्री ने भी इसे स्थायी शांति की दिशा में एक आवश्यक कदम बताया।
इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की प्रतिक्रिया
इजराइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने इस कदम की कड़ी आलोचना की। उनका कहना था कि यह आतंकवाद को इनाम देने जैसा है और जॉर्डन नदी के पश्चिम में फिलिस्तीनी देश नहीं बनेगा।
नेतन्याहू ने वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों को दोगुना करने की योजना का भी ऐलान किया और चेतावनी दी कि वह इस मान्यता का जवाब अमेरिका लौटने के बाद देंगे।
ब्रिटेन के पीछे की रणनीति
ब्रिटिश पीएम ने कहा कि यह कदम इजराइल को सजा देने के लिए नहीं उठाया गया। लेकिन अगर इजराइली सेना ने गाजा में सैन्य कार्रवाई को कम हिंसक और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप किया होता, तो यह कदम संभवतः नहीं लिया जाता।
पूर्व ब्रिटिश डिप्टी पीएम डेविड लैमी ने कहा कि फिलिस्तीन को मान्यता देने का मतलब यह नहीं है कि नया देश तुरंत बन जाएगा। यह केवल शांति प्रक्रिया का हिस्सा है और टू-स्टेट सॉल्यूशन की उम्मीद बनाए रखने के लिए जरूरी है।
टू स्टेट सॉल्यूशन: लंबे संघर्ष का प्रस्तावित हल
टू स्टेट सॉल्यूशन का अर्थ है कि इजराइल और फिलिस्तीन दोनों स्वतंत्र देशों के रूप में मौजूद होंगे। यह प्रस्तावित समाधान लंबे समय से चल रहे संघर्ष को सुलझाने की कोशिश है।
ब्रिटेन और कनाडा का मानना है कि यह कदम फिलिस्तीन और इजराइल दोनों के लिए शांति, सुरक्षा और स्थायित्व सुनिश्चित कर सकता है।
फिलिस्तीन का स्वागत और अमेरिका की अनिच्छा
फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के फैसले का स्वागत किया और इसे क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए जरूरी बताया।
हालांकि, अमेरिका फिलिस्तीन को अभी तक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देता, और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी कहा था कि वे ब्रिटेन के इस कदम से सहमत नहीं हैं।
फिलिस्तीन ने अमेरिका और अन्य देशों से भी मान्यता की अपील की है। उनका कहना है कि यह कदम टू-स्टेट सॉल्यूशन को बचाने और शांति लाने में मदद करेगा।
इजराइल-हमास संघर्ष और मानवीय संकट
इजराइल-हमास जंग में अब तक 60,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि गाजा में 20 लाख से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा।
ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया का मान्यता का कदम इजराइल पर गाजा में मानवीय संकट को कम करने का दबाव बढ़ा सकता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ब्रिटेन और फिलिस्तीन
ब्रिटेन और फ्रांस की भूमिका मध्य पूर्व की राजनीति में ऐतिहासिक रही है। पहले विश्व युद्ध के बाद ओटोमन साम्राज्य के क्षेत्र को विभाजित किया गया, और ब्रिटेन को फिलिस्तीन पर अधिकार मिला।
1917 में ब्रिटेन ने बाल्फोर घोषणापत्र जारी किया, जिसमें यहूदियों के लिए देश बनाने का समर्थन किया गया, लेकिन फिलिस्तीनी अधिकारों की सुरक्षा की बात को गंभीरता से लागू नहीं किया गया।
ब्रिटेन लंबे समय से टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन करता रहा है, लेकिन इसकी शर्त थी कि फिलिस्तीन की मान्यता शांति प्रक्रिया का हिस्सा हो। अब ब्रिटेन के अधिकारियों को डर है कि यह समाधान लगभग नामुमकिन होता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और शांति की दिशा
ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया का कदम यह दर्शाता है कि दो राष्ट्र समाधान ही मध्य पूर्व में स्थायी शांति लाने का मार्ग है।
फिलिस्तीन की मान्यता केवल एक औपचारिक कदम नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक, कानूनी और मानवीय दृष्टि से एक महत्वपूर्ण संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय संघर्ष को सुलझाने और शांति स्थापित करने के लिए गंभीर है।

