ट्रंप बनाम कार्नी: दावोस की चिंगारी से भड़की US-Canada तनातनी, ‘कनाडा किसी के रहमो-करम पर नहीं’ — पीएम कार्नी का करारा जवाब
US Canada tensions एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गई हैं। पड़ोसी और लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहे अमेरिका और कनाडा के रिश्तों में इस बार तीखी बयानबाज़ी ने नई गर्मी भर दी है। दावोस में शुरू हुई यह कूटनीतिक चिंगारी अब सीधे दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच सार्वजनिक टकराव में बदलती नजर आ रही है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का तीखा दावा, दूसरी ओर कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का आत्मसम्मान से भरा जवाब—इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई बहस छेड़ दी है।
🔴 दावोस से उठी लहर: बयान जिसने माहौल बदल दिया
स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना बैठक हमेशा से वैश्विक नेताओं के बड़े संदेशों का मंच रही है। इसी मंच से प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने एक भाषण दिया, जिसने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का तूफान खड़ा कर दिया।
कार्नी ने बिना किसी देश या नेता का नाम लिए कहा कि अमेरिका के नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था में अब दरारें दिखने लगी हैं। उन्होंने मध्यम शक्तियों—जैसे कनाडा—को सलाह दी कि वे अब किसी एक महाशक्ति की हेजेमनी पर पूरी तरह निर्भर न रहें। उनका संदेश साफ था: दुनिया को नई राह चुननी होगी, जहां अंतरराष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा साझा जिम्मेदारी बने।
🔴 ट्रंप का पलटवार: ‘कनाडा अमेरिका की वजह से जिंदा है’
कार्नी के इस बयान के एक दिन बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में मंच से जवाबी हमला किया। उन्होंने कहा कि कनाडा अमेरिका की वजह से ही “जिंदा” है और सुरक्षा से लेकर व्यापार तक, हर मोर्चे पर उसे अमेरिका का सहारा मिला है।
ट्रंप के इस बयान को सीधे तौर पर कनाडा की भूमिका और आत्मनिर्भरता पर सवाल के रूप में देखा गया। यह टिप्पणी न केवल कूटनीतिक हलकों में बल्कि कनाडा के आम नागरिकों के बीच भी तेजी से फैल गई।
🔴 क्यूबेक सिटी से आया करारा जवाब
US Canada tensions के इस दौर में गुरुवार को क्यूबेक सिटी में एक राष्ट्रीय संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री कार्नी ने ट्रंप के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका ने मिलकर एक शानदार साझेदारी बनाई है। लेकिन कनाडा अमेरिका की वजह से जिंदा नहीं है। हम इसलिए आगे बढ़ते हैं क्योंकि हम कनाडाई हैं।”
कार्नी का यह बयान न केवल ट्रंप को जवाब था, बल्कि घरेलू दर्शकों के लिए भी एक मजबूत संदेश—राष्ट्रीय पहचान और आत्मसम्मान पर जोर।
🔴 लोकतंत्र और वैश्विक मूल्यों पर कार्नी की अपील
अपने संबोधन में कार्नी ने कहा कि दुनिया इस समय लोकतंत्र की गिरावट और बढ़ती तानाशाही के दौर से गुजर रही है। उन्होंने कनाडा को एक ऐसे मॉडल के रूप में पेश किया, जो दिखा सकता है कि दूसरा रास्ता भी संभव है।
उनके शब्दों में, “हम दुनिया की सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते, लेकिन हम यह जरूर दिखा सकते हैं कि इतिहास का चाप जरूरी नहीं कि तानाशाही और बहिष्कार की ओर ही मुड़े।”
यह बयान सीधे तौर पर उन वैश्विक रुझानों पर टिप्पणी माना गया, जहां कई देश आक्रामक राष्ट्रवाद और सख्त नीतियों की ओर बढ़ रहे हैं।
🔴 ट्रंप की नाराजगी और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का निमंत्रण वापस
कार्नी के इस जवाब के बाद ट्रंप की नाराजगी खुलकर सामने आ गई। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कनाडा को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का निमंत्रण वापस ले लिया। यह संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए काम करता है।
इस कदम को राजनीतिक विश्लेषकों ने एक प्रतीकात्मक लेकिन मजबूत संदेश के रूप में देखा—कि ट्रंप इस बयानबाज़ी को हल्के में नहीं ले रहे हैं।
🔴 अमेरिका-कनाडा रिश्तों का इतिहास: साझेदारी और मतभेद
अमेरिका और कनाडा के बीच दुनिया के सबसे लंबे और शांतिपूर्ण सीमा संबंधों में से एक है। व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में दोनों देश गहराई से जुड़े हुए हैं।
लेकिन ट्रंप के कार्यकाल के दौरान पहले भी कई मुद्दों पर तनाव देखने को मिला है—चाहे वह व्यापार समझौते हों, टैरिफ नीति या रक्षा खर्च का सवाल। इस बार विवाद व्यक्तिगत बयानबाज़ी तक पहुंच गया है, जो रिश्तों में नई जटिलता जोड़ता है।
🔴 घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों नेताओं के बयान केवल अंतरराष्ट्रीय मंच के लिए नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति के लिए भी अहम हैं। कार्नी ने कनाडाई जनता के बीच राष्ट्रीय आत्मसम्मान और स्वतंत्र पहचान को मजबूत करने की कोशिश की, जबकि ट्रंप ने अमेरिका की वैश्विक भूमिका और प्रभाव को रेखांकित किया।
इस टकराव ने यह भी दिखाया कि वैश्विक राजनीति में अब कूटनीति केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया के जरिए सीधे जनता तक पहुंच रही है।
🔴 वैश्विक असर: मध्यम शक्तियों की भूमिका पर बहस
US Canada tensions के इस नए अध्याय ने एक बड़ी बहस को जन्म दिया है—क्या मध्यम शक्तियां अब महाशक्तियों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी स्वतंत्र रणनीति बना सकती हैं? कार्नी के दावोस भाषण ने इसी सवाल को केंद्र में ला दिया।
कई देशों के लिए यह एक संकेत है कि वैश्विक व्यवस्था बहुध्रुवीय होती जा रही है, जहां कई ताकतें मिलकर दिशा तय करेंगी।
🔴 आगे की राह: संवाद या टकराव?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बयानबाज़ी का असर केवल प्रतीकात्मक नहीं रहेगा। आने वाले समय में व्यापार वार्ताओं, सुरक्षा सहयोग और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों देशों के रुख में बदलाव दिख सकता है।
हालांकि, यह भी सच है कि अमेरिका और कनाडा के बीच गहरे आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं, जिन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करना दोनों के लिए आसान नहीं होगा।
🔴 सोशल मीडिया और सार्वजनिक प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर दोनों देशों के नागरिकों की प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। कनाडा में कार्नी के बयान को राष्ट्रीय गर्व के रूप में देखा जा रहा है, जबकि अमेरिका में ट्रंप समर्थकों ने उनके रुख को मजबूत नेतृत्व की मिसाल बताया है।

