Uganda चुनाव में लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा: इंटरनेट बंदी, मतदान में देरी और भारी सुरक्षा के बीच मुसेवेनी बनाम बॉबी वाइन
Uganda presidential election के साथ ही अफ्रीकी देश युगांडा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है। गुरुवार को राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान शुरू हुआ, लेकिन वोटिंग के पहले ही दिन हालात ने लोकतंत्र की मजबूती पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। देशभर में इंटरनेट सेवाएं बंद हैं, कई मतदान केंद्रों पर भारी अव्यवस्था देखने को मिली और सुरक्षा बलों की जबरदस्त मौजूदगी ने आम मतदाताओं के बीच डर और बेचैनी का माहौल बना दिया।
राजधानी कंपाला समेत कई इलाकों में हालात तनावपूर्ण रहे। विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि यह चुनाव एक स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रक्रिया से ज्यादा, नियंत्रण और दबाव के माहौल में कराया जा रहा है।
🌐 इंटरनेट बंदी से ठप हुआ जनजीवन, लोकतंत्र पर सवाल
युगांडा में बीते कई दिनों से इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह बंद हैं। सरकार का तर्क है कि यह कदम अफवाहों, चुनावी गड़बड़ियों और हिंसा भड़काने से रोकने के लिए उठाया गया है। लेकिन विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इंटरनेट बंदी मतदाताओं की आवाज दबाने और चुनावी निगरानी को कमजोर करने का जरिया बन गई है।
इंटरनेट बंद होने से सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और जरूरी संचार सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। आम लोगों का कहना है कि चुनाव के दिन ऐसी पाबंदियां उनके रोजमर्रा के जीवन पर सीधा असर डाल रही हैं।
🗳️ मतदान में देरी और मशीनों की खराबी
सुबह सात बजे मतदान शुरू होना था, लेकिन राजधानी कंपाला समेत कई शहरों और कस्बों में मतदान सामग्री समय पर नहीं पहुंच सकी। कई मतदान केंद्रों पर वोटिंग मशीनों में तकनीकी खराबी सामने आई, जिससे लंबी कतारें लग गईं।
कंपाला के एक मतदान केंद्र के बाहर खड़े उमरु मुत्याबा ने नाराजगी जताते हुए कहा कि घंटों इंतजार करना बेहद परेशान करने वाला है। उनके मुताबिक, लोग सिर्फ वोट डालने नहीं आए हैं, सबके अपने काम और जिम्मेदारियां हैं।
⏳ विपक्षी नेताओं को भी घंटों इंतजार
विपक्ष के वरिष्ठ नेता और सांसद सेमुज्जु नगांडा ने बताया कि उन्हें वोट डालने के लिए तीन घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा। उनका कहना है कि मशीनों की खराबी और प्रशासनिक देरी से शहरी इलाकों में मतदान प्रतिशत गिर सकता है, जहां विपक्ष को मजबूत समर्थन मिलता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हालात ऐसे ही रहे, तो लोगों का गुस्सा सड़कों पर भी दिख सकता है और अराजकता फैलने का खतरा बढ़ जाएगा।
👤 आठवीं बार चुनावी मैदान में राष्ट्रपति मुसेवेनी
इस चुनाव में 81 वर्षीय राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी लगातार आठवीं बार सत्ता की दौड़ में हैं। वे 1986 से युगांडा की सत्ता पर काबिज हैं और अफ्रीका के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले नेताओं में गिने जाते हैं।
उनके खिलाफ कुल सात उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें सबसे चर्चित नाम गायक से नेता बने रॉबर्ट क्यागुलान्यी (बॉबी वाइन) का है। बॉबी वाइन लंबे समय से राजनीतिक बदलाव की आवाज उठाते रहे हैं और युवाओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।
📊 मतदाता और चुनावी प्रक्रिया
युगांडा की आबादी लगभग साढ़े चार करोड़ है, जिसमें से 2 करोड़ 16 लाख से ज्यादा मतदाता पंजीकृत हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, शाम चार बजे मतदान समाप्त होगा और नतीजे 48 घंटे के भीतर घोषित किए जाएंगे।
हालांकि, मतदान प्रक्रिया में आई दिक्कतों ने नतीजों की विश्वसनीयता को लेकर पहले ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
🔙 2021 का चुनाव और विवाद
युगांडा के इतिहास में सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण कभी नहीं हुआ है। आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति मुसेवेनी की सत्ता अब काफी हद तक सेना के सहारे टिकी है, जिसका नेतृत्व उनके बेटे मुहोजी काइनरुगाबा करते हैं। इससे सत्ता को परिवार में बनाए रखने की आशंका भी जताई जाती रही है।
2021 के चुनाव में भी मुसेवेनी और बॉबी वाइन आमने-सामने थे। उस चुनाव में मुसेवेनी को 58 फीसदी और बॉबी वाइन को 35 फीसदी वोट मिले थे, जिसे मुसेवेनी का अब तक का सबसे कमजोर प्रदर्शन माना गया।
🚔 भारी सुरक्षा और मानवाधिकारों के आरोप
चुनाव से पहले और मतदान के दिन सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त कर दी गई है। प्रमुख सड़कों पर सेना और पुलिस की भारी तैनाती देखी जा रही है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने आरोप लगाया है कि सुरक्षा बलों ने विपक्षी समर्थकों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई की है।
एक चुनावी रैली के दौरान गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत का दावा भी किया गया है, जिसने चुनावी माहौल को और ज्यादा तनावपूर्ण बना दिया है।
🌍 अंतरराष्ट्रीय नजरें युगांडा पर टिकीं
युगांडा कभी तानाशाह ईदी अमीन के दौर में भारतीय समुदाय के निष्कासन जैसी घटनाओं के कारण भी दुनिया में चर्चा में रहा है। मौजूदा हालात ने एक बार फिर देश की लोकतांत्रिक साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इंटरनेट बंदी, मतदान में देरी और सुरक्षा बलों की सख्ती—ये सभी संकेत दे रहे हैं कि यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि युगांडा के लोकतांत्रिक भविष्य की परीक्षा है।

