Taliban में टूट की आहट: अखुंदजादा बनाम हक्कानी, अफगानिस्तान की सत्ता पर मंडराने लगा ढहने का खतरा
Taliban internal conflict Afghanistan अब महज़ अफवाह नहीं रह गया है। अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज तालिबान संगठन के भीतर हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। अंदरूनी सत्ता संघर्ष इस स्तर तक पहुंच चुका है कि सरकार के भविष्य पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं। हाल ही में सामने आई एक वायरल ऑडियो क्लिप और लंबे समय से चल रही खींचतान ने यह साफ कर दिया है कि तालिबान की एकता में गहरी दरारें पड़ चुकी हैं।
⚠️ तालिबान के भीतर दो सत्ता केंद्र, एक संगठन—दो सोच
तालिबान के भीतर इस समय दो मजबूत गुट साफ तौर पर उभरकर सामने आए हैं। एक गुट का नेतृत्व कर रहे हैं तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा, जबकि दूसरा गुट अफगानिस्तान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
इन दोनों गुटों के बीच मतभेद सिर्फ सत्ता के बंटवारे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अफगानिस्तान को किस दिशा में ले जाया जाए—इस बुनियादी सवाल पर टकराव हो रहा है।
🏴 2021 की जीत के बाद उभरा अंदरूनी संकट
तालिबान ने अगस्त 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया था। उस समय दुनिया के सामने तालिबान एकजुट और मजबूत नजर आ रहा था। लेकिन सत्ता संभालने के कुछ ही समय बाद अंदरूनी मतभेद सतह पर आने लगे।
अब संकेत मिल रहे हैं कि सत्ता में बने रहने की लड़ाई तालिबान के भीतर ही लड़ी जा रही है, जिससे अफगानिस्तान की स्थिरता पर खतरा मंडराने लगा है।
🎧 लीक ऑडियो से हिला तालिबान नेतृत्व
BBC की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में सामने आई एक वायरल ऑडियो क्लिप ने तालिबान के भीतर चल रही उथल-पुथल को उजागर कर दिया। इस ऑडियो में सुप्रीम लीडर अखुंदजादा खुद यह स्वीकार करते सुने गए कि सरकार के भीतर लोग आपस में टकरा रहे हैं।
जनवरी 2025 में दक्षिणी शहर कंधार के एक मदरसे में दिए गए इस भाषण में उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह अंदरूनी टकराव जारी रहा, तो इस्लामिक अमीरात ढह सकता है और खत्म हो जाएगा।
🔍 एक साल की जांच, 100 से ज्यादा सूत्र
इस भाषण ने उन अफवाहों को और मजबूत किया, जो कई महीनों से तालिबान की शीर्ष लीडरशिप को लेकर चल रही थीं। हालांकि तालिबान ने हमेशा इन मतभेदों से इनकार किया, लेकिन बीबीसी ने एक साल तक गहन जांच की।
इस दौरान 100 से अधिक मौजूदा और पूर्व तालिबान सदस्यों, स्थानीय नागरिकों, अफगानिस्तान विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों से बातचीत की गई। सुरक्षा कारणों से इन सभी की पहचान गोपनीय रखी गई।
🏰 कंधार गुट बनाम काबुल गुट: विचारधाराओं की टक्कर
इस जांच में पहली बार स्पष्ट रूप से सामने आया कि तालिबान के शीर्ष पर दो अलग-अलग गुट मौजूद हैं। पहला गुट कंधार से संचालित होता है और अखुंदजादा के प्रति पूरी तरह वफादार है। यह गुट अफगानिस्तान को एक सख्त इस्लामिक अमीरात के रूप में चलाना चाहता है, जो दुनिया से लगभग कटकर रहे।
दूसरी ओर, काबुल में बैठा हक्कानी गुट भी इस्लाम की कठोर व्याख्या करता है, लेकिन वह चाहता है कि अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जुड़ा रहे, अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जाए और महिलाओं व लड़कियों को कम से कम शिक्षा का सीमित अधिकार मिले।
🌐 इंटरनेट बंद करने का आदेश बना टकराव की वजह
सितंबर के अंत में लिया गया एक फैसला इस सत्ता संघर्ष का प्रतीक बन गया। सुप्रीम लीडर अखुंदजादा ने पूरे अफगानिस्तान में इंटरनेट और फोन सेवाएं बंद करने का आदेश जारी किया। इससे देश पूरी तरह दुनिया से कट गया।
लेकिन तीन दिन बाद अचानक पूरे देश में इंटरनेट बहाल कर दिया गया, बिना किसी आधिकारिक घोषणा के। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक यह फैसला काबुल गुट ने अखुंदजादा के आदेश के खिलाफ जाकर करवाया।
📉 शासन और अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा
इंटरनेट बंद होना केवल सामाजिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और आर्थिक संकट भी पैदा कर सकता था। सरकार चलाने, व्यापार, बैंकिंग और संचार—सब कुछ इंटरनेट पर निर्भर हो चुका है। यदि यह बंद रहता, तो शासन व्यवस्था ठप हो सकती थी।
इसी वजह से काबुल गुट के नेताओं ने जोखिम उठाया और सीधे प्रधानमंत्री मुल्ला हसन अखुंद से मुलाकात कर आदेश वापस लेने पर जोर दिया।
🔥 क्या यह अंदरूनी बगावत थी?
अफगानिस्तान मामलों के जानकारों का कहना है कि तालिबान हमेशा अपने अनुशासन और एकता के लिए जाना जाता रहा है। संगठन के डीएनए में ऊपर से आए आदेश को मानना शामिल है। ऐसे में सुप्रीम लीडर के फैसले को पलटना बेहद असाधारण घटना मानी जा रही है।
एक तालिबान अंदरूनी सूत्र ने इसे सीधे तौर पर “बगावत” करार दिया।
🕌 ‘सुप्रीम लीडर सिर्फ अल्लाह के प्रति जवाबदेह’
तालिबान के अनुसार अखुंदजादा सुप्रीम लीडर हैं और वे सिर्फ अल्लाह के प्रति जवाबदेह हैं। 2016 में उन्हें इसलिए चुना गया था क्योंकि वे सहमति से फैसले लेने वाले माने जाते थे।
उनके पास प्रत्यक्ष युद्ध का अनुभव कम था, इसलिए उन्होंने हक्कानी को डिप्टी लीडर बनाया। उस समय हक्कानी अमेरिका की मोस्ट वॉन्टेड सूची में थे, जिन पर 1 करोड़ डॉलर का इनाम घोषित था।
🏛️ काबुल से कंधार तक सत्ता का केंद्रीकरण
सत्ता में आने के बाद अखुंदजादा ने काबुल की बजाय कंधार को पावर सेंटर बना लिया। हक्कानी और याकूब मुजाहिद जैसे नेताओं को डिप्टी लीडर पद से हटाकर मंत्री पद तक सीमित कर दिया गया।
यहां तक कि तालिबान के सह-संस्थापक अब्दुल गनी बरादर को भी प्रधानमंत्री की जगह उप प्रधानमंत्री बना दिया गया।
🎓 महिलाओं की शिक्षा बना सबसे बड़ा विवाद
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध दोनों गुटों के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह है। वर्तमान में अफगानिस्तान में लड़कियों को छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने की अनुमति नहीं है।
कंधार गुट इस प्रतिबंध को सख्ती से लागू करना चाहता है, जबकि काबुल गुट इसे नरम करने के पक्ष में माना जाता है।
🤐 अखुंदजादा से मिलना भी हुआ मुश्किल
अखुंदजादा बेहद गोपनीय जीवन जीते हैं। वे कम बोलते हैं, इशारों में बात करते हैं और उनकी तस्वीरें लेना प्रतिबंधित है। सिर्फ दो तस्वीरें ही सार्वजनिक रूप से मौजूद हैं।
काबुल के मंत्रियों को उनसे मिलने के लिए अब खास बुलावे का इंतजार करना पड़ता है, जिससे असंतोष और बढ़ गया है।
⚖️ आगे क्या? अफगानिस्तान के भविष्य पर संकट
तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इन सभी अटकलों को खारिज करते हुए कहा है कि संगठन के भीतर कोई बंटवारा नहीं है और मतभेद पारिवारिक स्तर के हैं।
लेकिन अंदरखाने की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

