Prayagraj मेला नोटिस विवाद: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर स्थायी प्रतिबंध की चेतावनी, मेला प्रशासन और शंकराचार्य आमने-सामने
News-Desk
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administration news, Law and Order, legal notice, Mela Authority, Prayagraj, Prayagraj News, religious dispute, Sangam Snan, Swami AvimukteshwaranandPrayagraj Mela notice controversy ने माघ मेला क्षेत्र में प्रशासन और धार्मिक नेतृत्व के बीच एक तीखा टकराव खड़ा कर दिया है। प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा ज्योतिष पीठ से जुड़े स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को जारी किए गए दूसरे नोटिस ने न केवल मेले की सुरक्षा व्यवस्था बल्कि न्यायिक और प्रशासनिक सीमाओं को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ दी है। इस नोटिस में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि उनके कृत्यों को भीड़ नियंत्रण और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माना गया, तो उन्हें मेला क्षेत्र में हमेशा के लिए प्रवेश से प्रतिबंधित किया जा सकता है।
🔴 नोटिस की पृष्ठभूमि और चस्पा होने का मामला
प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने 18 जनवरी को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के नाम एक औपचारिक नोटिस जारी किया, जिसमें 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया था। यह नोटिस उनके शिविर के पीछे वाले हिस्से पर चस्पा किया गया। मेला प्रशासन के कर्मचारियों के शिविर में पहुंचने पर ही इस नोटिस की जानकारी सामने आई। इस दौरान तीन दिन बीत चुके थे, जिससे प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी सवाल उठने लगे।
यह नोटिस अधिकृत हस्ताक्षरी के नाम से जारी किया गया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि यह कदम मौनी अमावस्या के दौरान उत्पन्न हुई कथित आपात स्थिति और भीड़ नियंत्रण में बाधा को लेकर उठाया गया है।
🔴 मौनी अमावस्या और संगम मार्ग पर विवाद
Prayagraj Mela notice controversy की जड़ मौनी अमावस्या के पावन स्नान से जुड़ी है। मेला प्राधिकरण के अनुसार, उस दिन त्रिवेणी पांटून पुल नंबर दो पर लगे बैरियर को तोड़ते हुए संगम अपर मार्ग से बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बग्घी पर सवार होकर भीड़ के साथ आगे बढ़े।
मेला पुलिस और प्रशासन का दावा है कि उस समय लगातार लाउडस्पीकर और वायरलेस सेट के माध्यम से यह घोषणा की जा रही थी कि संगम क्षेत्र में किसी भी प्रकार के वाहन की अनुमति नहीं है। केवल पैदल आवागमन की अनुमति दी गई थी, क्योंकि उस क्षेत्र को अत्यंत संवेदनशील घोषित किया गया था।
🔴 भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था पर प्रभाव
प्रशासन के अनुसार, उस समय लाखों की संख्या में श्रद्धालु संगम स्नान के लिए मौजूद थे। ऐसे में किसी भी वाहन या बग्घी का प्रवेश भगदड़ की स्थिति पैदा कर सकता था। नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया कि इस कदम के कारण मेला पुलिस और प्रशासन को भीड़ नियंत्रण में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
Prayagraj Mela notice controversy में प्रशासन का तर्क है कि इस तरह के कृत्य से जनहानि की आशंका बढ़ जाती है और संपूर्ण मेला व्यवस्था पर गंभीर खतरा उत्पन्न होता है।
🔴 संगम नोज तक जाने का आरोप
मेला प्राधिकरण के अनुसार, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने वाहन निषिद्ध क्षेत्र संगम नोज तक अपनी बग्घी ले जाने का प्रयास किया, जहां उस समय भारी संख्या में श्रद्धालु स्नान कर रहे थे। जब उन्हें रोका गया, तो कथित तौर पर विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई।
प्रशासन का दावा है कि यह स्थिति भगदड़ को जन्म दे सकती थी, जिससे व्यापक जनहानि की आशंका बनी हुई थी। इसी आधार पर नोटिस में स्थायी प्रतिबंध तक की चेतावनी दी गई है।
🔴 शंकराचार्य पद और सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ
नोटिस में एक और गंभीर आरोप यह लगाया गया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर और मेला क्षेत्र में स्वयं को शंकराचार्य बताते हुए बोर्ड लगाए हैं, जबकि इस पद को लेकर मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। प्रशासन का कहना है कि इस तरह की प्रस्तुति न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ सकती है।
Prayagraj Mela notice controversy में यह बिंदु कानूनी रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि इसमें न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बीच की रेखा पर सवाल उठते हैं।
🔴 24 घंटे का अल्टीमेटम और संभावित कार्रवाई
नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि यदि 24 घंटे के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तो यह मान लिया जाएगा कि संबंधित पक्ष को कुछ नहीं कहना है और इसके आधार पर भूमि, सुविधाएं और मेला क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति रद्द की जा सकती है।
इस चेतावनी के बाद मेला क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है और धार्मिक संगठनों से लेकर प्रशासनिक हलकों तक इस फैसले पर चर्चा हो रही है।
🔴 शंकराचार्य की ओर से कानूनी पलटवार
Prayagraj Mela notice controversy में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को कानूनी नोटिस भेजकर 24 घंटे में जवाब मांगा है। उनके अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्र की ओर से जारी इस नोटिस में प्रशासन पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का आरोप लगाया गया है।
नोटिस में कहा गया है कि शंकराचार्य पद से जुड़ा पूरा मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है, ऐसे में प्रशासन का हस्तक्षेप न्यायिक प्रक्रिया में दखल माना जा सकता है।
#Prayagraj मेला प्राधिकरण ने बैक डेट में दूसरा नोटिस भेजा. नोटिस में लिखा– “आपके कृत्य से मौनी अमावस्या पर व्यवस्था छिन्न–भिन्न हुई। लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा को खतरा पैदा हुआ। 24 घंटे में बताएं कि इस कृत्य के कारण आपको दी गई जमीन और सुविधाएं निरस्त करके सदैव के लिए मेले में… pic.twitter.com/akFiUvo2Ku
— News & Features Network | World & Local News (@newsnetmzn) January 22, 2026
🔴 नोटिस वापस लेने की मांग और मानहानि की चेतावनी
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से जारी आठ पन्नों के कानूनी नोटिस में मांग की गई है कि 19 जनवरी को जारी किया गया प्रशासनिक नोटिस तत्काल वापस लिया जाए। ऐसा न होने की स्थिति में मानहानि और अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी दी गई है।
यह नोटिस मेला प्राधिकरण के कार्यालय के बाहर चस्पा करने के साथ-साथ कार्यालय में रिसीव कराया गया और ईमेल के माध्यम से भी भेजा गया।
🔴 वरिष्ठ अधिकारियों पर लगाए गए आरोप
Prayagraj Mela notice controversy ने तब और तूल पकड़ लिया जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गृह सचिव मोहित गुप्ता, मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल, पुलिस आयुक्त जोगेंद्र कुमार और जिलाधिकारी मनीष वर्मा पर गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने पोस्टर जारी कर दावा किया कि उन्हें संगम स्नान से रोका गया और उनके बटुकों के साथ पुलिस ने मारपीट की। आरोप है कि पुलिस ने चोटी और शिखा पकड़कर उन्हें गिराया और लात-घूंसे मारे।
🔴 अपहरण और हत्या की साजिश का दावा
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें पांच घंटे तक अगवा करके रखा गया और बाद में शाम को उनके शिविर के सामने छोड़ दिया गया। उन्होंने इसे अपनी हत्या की साजिश करार दिया और कहा कि तब से वे वहीं बैठे हुए हैं।
प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है, लेकिन यह मामला अब कानून, प्रशासन और धार्मिक नेतृत्व के बीच एक बड़े टकराव के रूप में देखा जा रहा है।
🔴 मेला प्रशासन की जिम्मेदारी और सार्वजनिक सुरक्षा
Prayagraj Mela notice controversy के बीच प्रशासन का कहना है कि माघ मेला जैसे विशाल आयोजन में प्राथमिक जिम्मेदारी श्रद्धालुओं की सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण की होती है। लाखों लोगों की मौजूदगी में किसी भी तरह की अव्यवस्था गंभीर हादसे को जन्म दे सकती है।
इसी कारण संगम क्षेत्र को संवेदनशील घोषित किया गया था और वाहनों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगाई गई थी।
🔴 सामाजिक और धार्मिक प्रतिक्रिया
इस विवाद पर धार्मिक संगठनों और आम श्रद्धालुओं की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे प्रशासनिक सख्ती का उदाहरण मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला बताकर संत के पक्ष में खड़े हैं।
Prayagraj Mela notice controversy ने यह स्पष्ट कर दिया है कि माघ मेला केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्रशासनिक, कानूनी और सामाजिक संतुलन की भी एक बड़ी परीक्षा है।

