खेल जगत

संघर्ष से शिखर तक—कोलकाता के Aranyak Ghosh बने भारत के 95वें ग्रैंडमास्टर, बीमारी और आर्थिक चुनौतियों पर पाई जीत

कोलकाता के युवा खिलाड़ी Aranyak Ghosh ने बैंकॉक चेस क्लब ओपन में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के 95वें ग्रैंडमास्टर बनने का ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया।

इस उपलब्धि के साथ भारतीय शतरंज की नई पीढ़ी ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। इससे पहले R Vaishali ने महिला वर्ल्ड चैम्पियनशिप के लिए क्वालिफाई कर इतिहास रचा था और युवा खिलाड़ी A S Shravanika ने अंडर-12 रैपिड खिताब जीतकर देश का नाम रोशन किया था।


बैंकॉक चेस क्लब ओपन में शानदार प्रदर्शन से हासिल किया अंतिम नॉर्म

अरण्यक घोष ने बैंकॉक चेस क्लब ओपन में 9 में से 7 अंक हासिल कर अपना तीसरा और अंतिम ग्रैंडमास्टर नॉर्म पूरा किया। इससे पहले वे 2023 में सैंट्स ओपन और 2024 में एनेमासे मास्टर्स में दो नॉर्म हासिल कर चुके थे।

तीसरे नॉर्म के साथ उनका वर्षों का सपना साकार हुआ और वे आधिकारिक रूप से भारत के 95वें ग्रैंडमास्टर बन गए। यह उपलब्धि भारतीय शतरंज इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है।


फिडे वर्ल्ड कप में पोलैंड के शीर्ष खिलाड़ी को हराकर पहले ही दिखा चुके थे दम

अरण्यक ने पिछले वर्ष फिडे वर्ल्ड कप में पोलैंड के अनुभवी ग्रैंडमास्टर Mateusz Bartel को हराकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की थी। इस जीत ने उन्हें वैश्विक मंच पर उभरती प्रतिभा के रूप में स्थापित किया।

वर्तमान में वे विश्व रैंकिंग में 401वें स्थान पर हैं और आने वाले वर्षों में इससे बेहतर स्थान हासिल करने की संभावना जताई जा रही है।


बचपन में मिली पुरानी शतरंज पेटी से शुरू हुआ सफर

अरण्यक का शतरंज से रिश्ता बेहद रोचक तरीके से शुरू हुआ। जब वे करीब साढ़े चार वर्ष के थे, तब घर की सफाई के दौरान उनकी मां संचिता घोष को पिता मृणाल घोष की पुरानी शतरंज पेटी मिली।

नन्हे अरण्यक ने उसी से गोटियां सजाकर खेलना शुरू किया और धीरे-धीरे यह खेल उनकी जिंदगी का लक्ष्य बन गया। बेटे की रुचि देखकर पिता ने उन्हें पेशेवर प्रशिक्षण दिलाने का निर्णय लिया।


कोच सौमेन मजूमदार ने बिना फीस के दिया प्रशिक्षण

अरण्यक के करियर में उनके कोच Soumen Majumdar की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। आर्थिक कठिनाइयों को देखते हुए उन्होंने उन्हें मुफ्त प्रशिक्षण दिया और अपने स्तर पर शीर्ष ग्रैंडमास्टर्स के साथ अभ्यास सत्र भी करवाए।

यह सहयोग उनके खेल विकास में निर्णायक साबित हुआ।


पिता ने बेटे के सपने के लिए बेच दी पुश्तैनी जमीन

शतरंज जैसे महंगे खेल में आगे बढ़ना आसान नहीं था। कॉर्पोरेट स्पॉन्सर की कमी के कारण अरण्यक को कई बार इनामी राशि से ही टूर्नामेंट फीस, यात्रा और अन्य खर्च उठाने पड़े।

साल 2019 में उनके पिता मृणाल घोष ने बेटे के करियर को आगे बढ़ाने के लिए पुश्तैनी जमीन और संपत्तियां तक बेच दीं। इस त्याग ने अरण्यक को हर मैच को निर्णायक मानकर खेलने की प्रेरणा दी।


मां ने बेटे के करियर के लिए छोड़ी वकालत

अरण्यक की सफलता में उनकी मां संचिता घोष का योगदान भी बेहद अहम रहा। उन्होंने बेटे के साथ विदेशी टूर्नामेंटों में जाने के लिए अपनी वकालत तक छोड़ दी।

यूरोप दौरों के दौरान खर्च बचाने के लिए वे सस्ते कमरों में रहते और स्वयं खाना बनाकर खर्च नियंत्रित करते थे। यह संघर्ष आज उनकी सफलता की मजबूत नींव बन चुका है।


कार्टून वाली हुडी पहनकर खेलते हैं बड़े टूर्नामेंट

जहां अधिकांश खिलाड़ी औपचारिक पोशाक में खेलते हैं, वहीं अरण्यक कार्टून थीम वाली हुडी पहनकर शतरंज खेलते हैं। उनका मानना है कि इससे उन्हें मानसिक दबाव कम करने में मदद मिलती है और वे सहज महसूस करते हैं।

यह उनकी अलग पहचान भी बन चुकी है 😊


थैलेसीमिया जैसी बीमारी से लड़ते हुए हासिल की सफलता

अरण्यक बचपन से ही थैलेसीमिया से जूझ रहे हैं, जिससे शरीर में कमजोरी और थकान बनी रहती है। इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और कई बार बुखार तथा दर्द की स्थिति में भी प्रतियोगिताओं में भाग लिया।

उन्होंने खुद कहा है कि बिस्तर पर पड़े रहने से बेहतर उन्हें शतरंज की चालें सोचते रहना पसंद है। यही मानसिक दृढ़ता उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई।


9 साल की उम्र में एशियन यूथ चैम्पियनशिप में जीता था सिल्वर

साल 2013 में ईरान में आयोजित एशियन यूथ चेस चैम्पियनशिप में अंडर-10 वर्ग में उन्होंने रजत पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया था।

यह उनकी शुरुआती उपलब्धियों में से एक थी, जिसने उनके करियर की दिशा तय कर दी।


भारतीय शतरंज के भविष्य के सितारे के रूप में उभरे अरण्यक घोष

अरण्यक घोष की उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि भारतीय शतरंज की नई पीढ़ी की क्षमता का प्रतीक भी है। लगातार उभरते युवा खिलाड़ियों की सफलता से संकेत मिलता है कि भारत आने वाले समय में विश्व शतरंज का प्रमुख केंद्र बन सकता है ♟️

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उन्हें निरंतर समर्थन और अवसर मिलते रहे तो वे विश्व स्तर पर बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।


कोलकाता के अरण्यक घोष की ग्रैंडमास्टर बनने की उपलब्धि केवल एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और परिवार के त्याग की प्रेरक यात्रा है। सीमित संसाधनों, बीमारी और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने जिस दृढ़ता से यह मुकाम हासिल किया है, वह भारतीय खेल जगत के लिए नई ऊर्जा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।

 

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