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Lahore में लौट रही ऐतिहासिक पहचान! इस्लामी नाम हटाकर फिर रखे जा रहे हिंदू विरासत वाले नाम, पाकिस्तान में नई बहस शुरू

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की राजधानी Lahore इन दिनों एक बड़े सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बदलाव को लेकर चर्चा में है। दशकों तक इस्लामीकरण की राजनीति और पहचान की बहस के बीच अब लाहौर अपनी पुरानी ऐतिहासिक जड़ों की ओर लौटता दिखाई दे रहा है। शहर में कई इलाकों और चौकों के इस्लामी नाम हटाकर उन्हें फिर से उनके मूल हिंदू और ब्रिटिश कालीन नाम दिए जा रहे हैं।

इस बदलाव ने न केवल पाकिस्तान में बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में नई बहस छेड़ दी है। खास बात यह है कि जिन नामों को दोबारा बहाल किया गया है, वे केवल भौगोलिक पहचान नहीं बल्कि लाहौर की बहुसांस्कृतिक विरासत और साझा इतिहास का प्रतीक माने जा रहे हैं।


इस्लामपुरा फिर बना कृष्णनगर, बाबरी मस्जिद चौक का नाम बदला

दो महीने के भीतर लाहौर में नौ स्थानों के नाम बदल दिए गए हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा इस्लामपुरा के पुराने नाम “कृष्णनगर” और बाबरी मस्जिद चौक के पुराने “जैन मंदिर चौक” नाम को लेकर हो रही है।

प्रशासन ने इन स्थानों पर नए साइन बोर्ड भी लगा दिए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार कई बुजुर्ग आज भी इन इलाकों को उनके पुराने नामों से ही जानते और पुकारते रहे हैं।

दिलचस्प बात यह भी रही कि इन बदलावों के खिलाफ पाकिस्तान में किसी बड़े कट्टरपंथी विरोध का माहौल देखने को नहीं मिला। आमतौर पर ऐसे मुद्दों पर विवाद की आशंका रहती है, लेकिन इस बार स्थिति अपेक्षाकृत शांत रही।


‘जिन्ने लाहौर नहीं वेख्या…’ कहावत के पीछे छिपा इतिहास

पाकिस्तान के पंजाब सूबे में मशहूर कहावत है — “जिन्ने लाहौर नहीं वेख्या, ओ जमिया ही नहीं” यानी जिसने लाहौर नहीं देखा, उसका जन्म ही नहीं हुआ। यह कहावत लाहौर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वास्तुशिल्पीय भव्यता को दर्शाती है।

अमृतसर से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित लाहौर कभी हिंदू, सिख, मुस्लिम और ब्रिटिश संस्कृति का बड़ा केंद्र हुआ करता था। विभाजन से पहले शहर की गलियों, चौकों और बाजारों के नाम विभिन्न समुदायों की साझा विरासत को दर्शाते थे।

लेकिन 1990 के दशक में बाबरी मस्जिद विवाद के बाद पाकिस्तान में कई स्थानों के नाम बदले गए और उनकी पहचान को इस्लामी स्वरूप देने की कोशिश हुई।


मरियम नवाज सरकार का बड़ा कदम

पंजाब सूबे की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने लाहौर की ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए विशेष परियोजना शुरू की है। “लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल प्रोजेक्ट” के तहत पुराने नामों और ऐतिहासिक धरोहरों को फिर से बहाल करने का निर्णय लिया गया।

मरियम नवाज ने कहा कि लाहौर का इतिहास ही उसकी असली पहचान है और पुराने नाम तथा इमारतें उसी गौरवशाली विरासत का हिस्सा हैं। उन्होंने यह भी ऐलान किया कि परकोटा शहर लाहौर के ऐतिहासिक आठों दरवाजों का जीर्णोद्धार कराया जाएगा, जिनमें प्रसिद्ध दिल्ली गेट भी शामिल है।


नवाज शरीफ बोले- इतिहास से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी इस पहल का समर्थन किया। उनका कहना था कि यूरोप की तरह पाकिस्तान को भी अपने ऐतिहासिक नामों और धरोहरों को संरक्षित करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि लाहौर के पुराने नाम केवल शब्द नहीं बल्कि इतिहास और संस्कृति का हिस्सा हैं। इन्हें बदलना नहीं बल्कि सहेजना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान पाकिस्तान की राजनीति में एक नई सोच को दर्शाता है, जहां ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत को लेकर अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण देखने को मिल रहा है।


‘लक्ष्मी चौक हमारी विरासत है’ — स्थानीय लोगों की भावनाएं

लाहौर की बीकनहाउस यूनिवर्सिटी के लेक्चरर साद मलिक ने इस बदलाव को सकारात्मक बताया। उनका कहना है कि वे हमेशा से “लक्ष्मी चौक” नाम का इस्तेमाल करते रहे हैं, क्योंकि उनके पिता भी इसी नाम से उस इलाके को पुकारते थे।

साद मलिक के अनुसार, भले ही सरकारी रिकॉर्ड में इसका नाम “मौलाना जफर अली चौक” कर दिया गया था, लेकिन आम लोगों की स्मृतियों में यह हमेशा लक्ष्मी चौक ही बना रहा।

उन्होंने कहा कि यह केवल एक नाम नहीं बल्कि पीढ़ियों से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान और विरासत का हिस्सा है।


जैन मंदिर चौक को लेकर भी सामने आई अलग सोच

अनारकली इलाके के मौलाना वाजिद कादरी ने भी नाम बहाली को लेकर संतुलित और उदार राय रखी। उनका कहना था कि इस्लाम को किसी मंदिर, गुरुद्वारे या दूसरे धार्मिक स्थल के नाम से कोई खतरा नहीं है।

उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में “जैन मंदिर चौक” का नाम बदलकर “बाबरी मस्जिद चौक” करना राजनीतिक फैसला था। आम लोग आज भी इसे जैन मंदिर चौक के नाम से ही जानते हैं।

मौलाना कादरी के अनुसार, जिन मुस्लिम पूर्वजों ने ये नाम रखे थे, उनके ईमान पर कभी कोई असर नहीं पड़ा। इसलिए इतिहास को स्वीकार करना किसी धर्म के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए।


कट्टरपंथी संगठनों की चुप्पी बनी चर्चा का विषय

आमतौर पर पाकिस्तान में धार्मिक और पहचान से जुड़े मुद्दों पर कट्टरपंथी संगठनों का विरोध देखने को मिलता रहा है। लेकिन इस बार ऐसा माहौल नजर नहीं आया।

जानकारों के अनुसार तहरीक-लब्बैक-पाकिस्तान (TLP) जैसे संगठनों पर पंजाब सरकार की सख्ती और प्रतिबंध के कारण कोई बड़ा विरोध सामने नहीं आया। वहीं लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों ने भी सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे का विरोध नहीं किया।

राजनीतिक विश्लेषक इसे पाकिस्तान में बदलते सामाजिक और राजनीतिक माहौल का संकेत मान रहे हैं।


अब सिंध और खैबर पख्तूनख्वाह में भी बदल सकते हैं नाम

सूत्रों के अनुसार लाहौर के बाद पाकिस्तान के सिंध और खैबर पख्तूनख्वाह प्रांतों में भी पुराने ऐतिहासिक नामों को बहाल करने पर विचार किया जा रहा है।

यदि ऐसा होता है तो यह पाकिस्तान के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान को लेकर एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे विभाजन से पहले की साझा विरासत और सांस्कृतिक इतिहास को फिर से चर्चा में आने का अवसर मिलेगा।


1990 के दशक में शुरू हुई थी नाम बदलने की राजनीति

लाहौर में नाम बदलने का दौर 1990 के दशक में तेज हुआ था, जब बाबरी मस्जिद विवाद के बाद पाकिस्तान में कई स्थानों के हिंदू और सिख विरासत से जुड़े नाम बदल दिए गए थे।

उस दौरान नवाज शरीफ, बेनजीर भुट्टो और बाद में परवेज मुशर्रफ की सरकारें सत्ता में रहीं। हालांकि 2018 से 2022 तक प्रधानमंत्री रहे इमरान खान के दौर में इस प्रकार की नाम बदलने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी रही।

अब मरियम नवाज सरकार द्वारा पुराने नामों की बहाली को उसी ऐतिहासिक प्रक्रिया के उलट कदम के रूप में देखा जा रहा है।


लाहौर की पहचान केवल एक शहर नहीं, एक सभ्यता की कहानी

इतिहासकारों के अनुसार लाहौर केवल पाकिस्तान का एक प्रमुख शहर नहीं बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता, संस्कृति और साझा विरासत की जीवित मिसाल है।

मुगलकाल, सिख शासन, ब्रिटिश राज और उससे पहले के दौर की छाप आज भी शहर की गलियों, इमारतों और सांस्कृतिक परंपराओं में दिखाई देती है। ऐसे में पुराने नामों की वापसी केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि इतिहास को स्वीकार करने की प्रक्रिया के रूप में देखी जा रही है।


लाहौर में पुराने हिंदू और ऐतिहासिक नामों की वापसी ने पाकिस्तान में सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और विरासत को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। कृष्णनगर, जैन मंदिर चौक और लक्ष्मी चौक जैसे नाम केवल स्थानों की पहचान नहीं बल्कि उस साझा इतिहास की याद दिलाते हैं, जिसने कभी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को सांस्कृतिक रूप से जोड़ रखा था। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान के अन्य प्रांतों में भी यह बदलाव कितना आगे बढ़ता है और समाज इसे किस रूप में स्वीकार करता है।

P.K. Tyagi

प्रमोद त्यागी (अधिवक्ता) विश्व हिंदू महासंघ के राष्ट्रीय स्तर के समिति सदस्य हैं। वे टीम समन्वय, प्रकाशित समाचार सामग्री, और भविष्य की संबद्धता/पंजीकरण के लिए जिम्मेदार हैं। सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक जागरूकता और धार्मिक समन्वय के प्रति प्रतिबद्ध, पूर्व संपादक के रूप में, उन्होंने समाचार सामग्री की गुणवत्ता और सटीकता सुनिश्चित की है।

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