Firozabad मंदिर की खुदाई में मिले 45 किलो कुषाणकालीन सिक्के रहस्यमय ढंग से गायब! इतिहास का अनमोल खजाना लापता, जांच के आदेश से मचा हड़कंप
News-Desk
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मामले के सामने आने के बाद अब विभिन्न विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। कोई विभाग सीधे तौर पर जिम्मेदारी स्वीकार करने को तैयार नहीं दिख रहा, जबकि दूसरी ओर इतिहास और पुरातत्व से जुड़े जानकार इसे एक बड़ी क्षति मान रहे हैं। जिला प्रशासन ने पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं।
मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य के दौरान मिला था ऐतिहासिक खजाना
फिरोजाबाद के थाना नारखी क्षेत्र स्थित कोटला गांव का वनखंडेश्वर महादेव मंदिर क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। वर्ष 2025 में मंदिर परिसर के पर्यटन विकास और जीर्णोद्धार कार्य के अंतर्गत नींव की खुदाई कराई जा रही थी।
खुदाई के दौरान मजदूरों को मिट्टी के भीतर दबे दो बड़े मटके मिले। जब उन्हें खोला गया तो उनमें बड़ी संख्या में प्राचीन तांबे के सिक्के पाए गए। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार सिक्कों का कुल वजन लगभग 40 से 45 किलोग्राम था।
स्थानीय लोगों और मंदिर प्रबंधन ने इसे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक खोज माना। सूचना मिलने के बाद क्षेत्र में उत्सुकता का माहौल बन गया और बड़ी संख्या में लोग इस दुर्लभ खोज को देखने के लिए पहुंचने लगे।
पुरातत्व विभाग ने बताया था कुषाणकालीन धरोहर
मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष शैलेंद्र प्रताप ने इस खोज की जानकारी राज्य पुरातत्व विभाग की आगरा इकाई को दी। सूचना मिलने पर 22 मई 2025 को विभाग की एक टीम मौके पर पहुंची और सिक्कों का निरीक्षण किया।
प्रारंभिक जांच में विशेषज्ञों ने बताया कि ये उच्च गुणवत्ता वाले तांबे के सिक्के हैं और उनका संबंध उत्तर कुषाण काल से माना जा सकता है। विशेषज्ञों का आकलन था कि ये सिक्के भारतीय इतिहास के उस महत्वपूर्ण दौर से जुड़े हो सकते हैं, जब उत्तर भारत में कुषाण साम्राज्य का प्रभाव था।
इतिहासकारों का मानना है कि ऐसे सिक्के केवल आर्थिक गतिविधियों का प्रमाण नहीं होते, बल्कि उस समय की संस्कृति, व्यापारिक व्यवस्था, धातु विज्ञान, शिल्पकला और राजनीतिक संरचना के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
नमूने लेकर चली गई टीम, बाकी सिक्कों को बोरी में भरकर छोड़ दिया गया
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह बताया जा रहा है कि प्रारंभिक निरीक्षण के बाद पुरातत्व विभाग की टीम कुछ सिक्कों को नमूने के तौर पर अपने साथ ले गई, लेकिन शेष बड़ी मात्रा में मौजूद सिक्कों को वहीं छोड़ दिया गया।
बताया गया कि शेष सिक्कों को मंदिर परिसर की एक कोठरी में बोरी में भरकर रख दिया गया और उनकी निगरानी की जिम्मेदारी स्थानीय स्तर पर छोड़ दी गई। इतने महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेषों को किसी विशेष सुरक्षा व्यवस्था के बिना रखना अब पूरे मामले का सबसे विवादित पहलू बन गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक खोज के बाद उसका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, सूचीकरण और सुरक्षित संरक्षण तत्काल किया जाना चाहिए था।
जब लेने पहुंचे अधिकारी तो पूरी बोरी ही गायब थी
घटना ने तब गंभीर रूप ले लिया जब जून 2025 में विभागीय टीम दोबारा सिक्कों को अपने कब्जे में लेने पहुंची। अधिकारियों के अनुसार जिस स्थान पर सिक्कों की बोरी रखी गई थी, वहां से पूरी बोरी ही गायब मिली।
इस जानकारी के बाद क्षेत्र में हड़कंप मच गया। करोड़ों रुपये के ऐतिहासिक महत्व वाले इन सिक्कों के गायब होने से कई सवाल खड़े हो गए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने भारी वजन की बोरी आखिर कैसे गायब हो गई और उस दौरान निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी।
जिम्मेदारी तय करने में उलझा पूरा मामला
सिक्कों के गायब होने के बाद अब विभिन्न विभागों और संबंधित पक्षों के बयान सामने आ रहे हैं, लेकिन किसी भी स्तर पर स्पष्ट जवाब नहीं मिल पा रहा है।
मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष शैलेंद्र प्रताप का कहना है कि सिक्कों के गायब होने की जानकारी पुलिस को दी गई थी। उनका दावा है कि सिक्कों को अस्थायी रूप से एक ठेकेदार की निगरानी में रखा गया था ताकि ग्रामीण भी इस ऐतिहासिक खोज को देख सकें।
वहीं दूसरी ओर पुरातत्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उनका कार्य केवल सिक्कों की प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व का मूल्यांकन करना था। उनके अनुसार संरक्षण और सुरक्षित रखरखाव की जिम्मेदारी किसी अन्य एजेंसी की होनी चाहिए थी।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सिक्के कभी पुलिस मालखाने में जमा नहीं कराए गए और उन्हें आधिकारिक रूप से सुपुर्द भी नहीं किया गया था।
राजस्व विभाग ने भी खुद को बताया अनभिज्ञ
मामले में नया मोड़ तब आया जब एसडीएम सदर सत्येंद्र सिंह ने स्पष्ट कहा कि इस पूरे घटनाक्रम की कोई सूचना उस समय राजस्व विभाग को नहीं दी गई थी।
उन्होंने बताया कि न तो किसी अधिकारी को लिखित सूचना मिली और न ही मौखिक रूप से कोई जानकारी साझा की गई थी। वर्तमान में राजस्व विभाग के पास एक भी सिक्का मौजूद नहीं है।
इस बयान के बाद सवाल और गहरे हो गए हैं कि आखिर इतनी महत्वपूर्ण खोज के बावजूद विभिन्न विभागों के बीच समन्वय क्यों नहीं बनाया गया।
भारतीय इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण अवसर खो गया?
इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संग्रह सुरक्षित रखा जाता तो भारतीय इतिहास के कई अनछुए पहलुओं पर नई रोशनी डाली जा सकती थी।
कुषाण काल भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इस काल में व्यापार, संस्कृति, कला और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ था। ऐसे सिक्कों के अध्ययन से उस समय की आर्थिक व्यवस्था, धातु निर्माण तकनीक, राजकीय प्रतीकों और व्यापार मार्गों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हो सकती थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल सिक्कों का मामला नहीं है, बल्कि देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा विषय है।
डीएम ने दिए जांच के आदेश, दोषियों पर हो सकती है कार्रवाई
फिरोजाबाद के जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा है कि पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही, कर्तव्य में चूक या गबन जैसी स्थिति सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
जिलाधिकारी ने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच में किसी व्यक्ति या संस्था की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी सामने आती है तो उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने सहित आवश्यक कानूनी कदम उठाए जाएंगे। आवश्यकता पड़ने पर शासन को भी विस्तृत रिपोर्ट भेजी जाएगी।
इतिहास, आस्था और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा मामला
वनखंडेश्वर महादेव मंदिर में मिले Kushan Era Coins Missing प्रकरण ने केवल एक संभावित चोरी या लापरवाही का मामला नहीं खड़ा किया है, बल्कि यह सवाल भी पैदा किया है कि देशभर में मिलने वाली पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण की व्यवस्था कितनी मजबूत है। जब किसी ऐतिहासिक खोज का उचित संरक्षण नहीं हो पाता, तो उससे केवल वस्तुएं ही नहीं खोतीं, बल्कि इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारियां भी हमेशा के लिए विलुप्त हो सकती हैं।

