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मोरना Muzaffarnagar में गूंजी ‘या हुसैन’ की सदाएं: मोहर्रम की दूसरी तारीख पर भावुक मजलिस, करबला की याद में छलके आंसू

मोरना Muzaffarnagar स्थित इमामबारगाह बदरुल हसन में अंजुमने अब्बासिया की ओर से आयोजित हुसैनी मजलिस में बड़ी संख्या में अजादारों ने शिरकत की। मजलिस के दौरान करबला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश की गई और ‘या हुसैन’ की सदाओं से पूरा माहौल गूंज उठा।

फरशे अजा पर बैठे अजादारों ने इमाम हुसैन और उनके वफादार साथियों की कुर्बानियों को याद करते हुए दरूद पेश किया। मजलिस का माहौल पूरी तरह आध्यात्मिक, भावनात्मक और श्रद्धा से ओतप्रोत दिखाई दिया। मोहर्रम के शुरुआती दिनों में आयोजित इस कार्यक्रम ने लोगों को करबला के संदेश और इंसानियत की राह पर चलने की प्रेरणा दी।


मौलाना गुलाम इमाम अमरोही ने इंसानियत, सच्चाई और किरदार की अहमियत पर डाला प्रकाश

मजलिस को संबोधित करते हुए प्रसिद्ध धर्मगुरु मौलाना गुलाम इमाम अमरोही ने अपने प्रभावशाली और भावपूर्ण बयान में इंसान के चरित्र, सच्चाई और ईमानदारी के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का अतीत कितना साधारण या कठिन रहा, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उसका वर्तमान व्यक्तित्व और उसका सामाजिक सम्मान। उन्होंने कहा कि इंसान की असली पहचान उसके किरदार और उसके व्यवहार से होती है।

मौलाना ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन की शिक्षाएं इंसान को आत्मसम्मान, सच्चाई और न्याय का रास्ता दिखाती हैं। जो लोग इमाम हुसैन की शिक्षाओं को अपनाते हैं, वे कभी वास्तव में गरीब नहीं हो सकते, क्योंकि उनका सबसे बड़ा धन ईमान, इंसानियत और आत्मिक समृद्धि होती है।


‘किरदार ऊंचा होगा तो समाज में सम्मान अपने आप मिलेगा’

अपने संबोधन के दौरान मौलाना गुलाम इमाम अमरोही ने कहा कि केवल बाहरी दिखावे या कपड़े बदल लेने से किसी को सम्मान नहीं मिलता। सम्मान पाने के लिए व्यक्ति को अपना चरित्र और व्यवहार ऊंचा करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का किरदार बुलंद है, तो उसकी बात लोगों के दिलों तक पहुंचती है और समाज में उसका प्रभाव स्वतः बढ़ जाता है। उन्होंने युवाओं से विशेष रूप से अपील की कि वे अपने जीवन में सच्चाई, ईमानदारी और अच्छे आचरण को अपनाएं।

मौलाना ने कुरआन शरीफ की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इंसान को अपने ऊपर भी एहसान करना चाहिए। सच सुनने के साथ-साथ सच बोलने की आदत भी विकसित करनी चाहिए। यही गुण व्यक्ति को दुनिया और आखिरत दोनों में सफलता की ओर ले जाते हैं।


रोजी देने वाला केवल अल्लाह, उसी पर भरोसा रखने की दी नसीहत

मजलिस के दौरान मौलाना ने लोगों को भरोसे और तवक्कुल का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि इंसान को उसी की तलाश करनी चाहिए जो सभी को रोजी देता है और पूरी कायनात का पालनहार है।

उन्होंने कहा कि दुनिया में अनेक ऐसे जीव हैं जिनके हाथ नहीं होते, फिर भी उनका पालन-पोषण होता है। इससे स्पष्ट है कि रोजी का वास्तविक मालिक केवल अल्लाह है। इसलिए इंसान को हमेशा ईमानदारी और मेहनत के साथ जीवन जीना चाहिए तथा अपने पालनहार पर पूरा भरोसा रखना चाहिए।

उनके इन शब्दों ने मजलिस में मौजूद लोगों को गहराई से प्रभावित किया और उपस्थित अजादारों ने श्रद्धा के साथ उनके विचारों को सुना।


करबला का दर्दनाक मंज़र सुनकर भावुक हुए अजादार

मजलिस के अंतिम चरण में मौलाना गुलाम इमाम अमरोही ने करबला के ऐतिहासिक घटनाक्रम को अत्यंत भावुक अंदाज में बयान किया। उन्होंने शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानियों का वर्णन करते हुए उस दर्द और संघर्ष को सामने रखा, जिसने इस्लामी इतिहास में हमेशा के लिए एक अमिट छाप छोड़ दी।

जैसे-जैसे करबला के घटनाक्रम का वर्णन आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे मजलिस का माहौल गमगीन होता चला गया। फरशे अजा पर मौजूद अनेक अजादार अपने आंसुओं को रोक नहीं सके और करबला के शहीदों की याद में जार-जार होकर रो पड़े।

मजलिस में मौजूद लोगों ने इसे केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सब्र, कुर्बानी और सत्य की रक्षा के लिए दी गई महानतम मिसाल की याद बताया।


मर्सिया और नौहाख्वानी ने बनाया आध्यात्मिक वातावरण

कार्यक्रम में मर्सिया और नौहाख्वानी का भी विशेष आयोजन किया गया। मर्सियाख्वानों ने अपने अंदाज में करबला की घटनाओं को प्रस्तुत कर माहौल को और अधिक भावुक बना दिया।

इस दौरान शबाब हैदर, गाजी अब्बास, मंजर अब्बास, शाम हैदर, जलाल हैदर, मोहम्मद शोएब और मौलाना लारेब जैदी सहित कई लोगों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। उनकी आवाजों में करबला की याद और अहलेबैत की मोहब्बत साफ झलक रही थी।

मजलिस में उपस्थित लोगों ने बड़ी श्रद्धा और सम्मान के साथ इन प्रस्तुतियों को सुना।


क्षेत्र के विभिन्न इमामबारगाहों में भी जारी हैं मजलिसों के सिलसिले

Muharram Majlis Morna के साथ-साथ क्षेत्र के अन्य कस्बों और गांवों में भी मोहर्रम की मजलिसों का सिलसिला जारी है। मोरना, तिस्सा, जौली, बेलड़ा, बेहड़ा सादात और ककरौली स्थित विभिन्न इमामबारगाहों में रोजाना मजलिसों का आयोजन किया जा रहा है।

इन कार्यक्रमों में स्थानीय लोगों के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। मोहर्रम के अवसर पर पूरे क्षेत्र में धार्मिक और आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिल रहा है।


देशभर से आने वाले विद्वानों ने भी किया संबोधित

मोरना और आसपास के क्षेत्रों में आयोजित विभिन्न मजलिसों में कई प्रतिष्ठित धर्मगुरुओं ने भी अपने विचार रखे। इनमें मौलाना रजा अब्बास, मौलाना मोहम्मद खतीब हैदर, मौलाना अकील तुराबी मुंबई, मौलाना शाहिद रिजवी मुंबई और मौलाना रजा अब्बास मूसी जौली प्रमुख रूप से शामिल रहे।

इन विद्वानों ने अपने संबोधनों में इमाम हुसैन की कुर्बानी, इंसाफ, मानवता और सत्य के लिए संघर्ष के संदेश को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि करबला का संदेश किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


दुआ, मातम और तबर्रुक वितरण के साथ सम्पन्न हुई मजलिस

मजलिस के समापन पर शहीद-ए-करबला की याद में मातम किया गया। अजादारों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए गम और अकीदत का इजहार किया।

इसके बाद देश में अमन, भाईचारे, खुशहाली और मानवता की भलाई के लिए विशेष दुआ कराई गई। कार्यक्रम में शामिल सभी लोगों के बीच तबर्रुक भी वितरित किया गया।

मोहर्रम के दिनों में आयोजित हो रही ये मजलिसें न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बनी हुई हैं, बल्कि समाज को सच्चाई, न्याय, धैर्य और मानवता का संदेश भी दे रही हैं।

 

मोरना और आसपास के क्षेत्रों में जारी मोहर्रम की मजलिसें करबला के अमर संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही हैं। इमाम हुसैन की कुर्बानी आज भी अन्याय के खिलाफ संघर्ष, सत्य के समर्थन और मानवता की रक्षा का प्रतीक मानी जाती है। मोहर्रम के इन आयोजनों में उमड़ रही श्रद्धा और अकीदत यह दर्शाती है कि करबला का संदेश सदियों बाद भी लोगों के दिलों में उतनी ही मजबूती से जीवित है।

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