उत्तर प्रदेश

Noida में ‘मौत के यूनिपोल’ पर किसका संरक्षण? छजारसी-खोड़ा में हादसे के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं, करोड़ों के राजस्व पर भी उठे सवाल

Noida  प्राधिकरण क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग की सीमा के बाहर छजारसी और खोड़ा के आसपास बड़ी संख्या में लगे कथित अवैध यूनिपोल विज्ञापन बोर्डों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। सवाल केवल यह नहीं है कि इन विज्ञापन संरचनाओं से प्राधिकरण को मिलने वाले करोड़ों रुपये के संभावित विज्ञापन शुल्क का नुकसान हो रहा है या नहीं, बल्कि सबसे बड़ा सवाल आम लोगों की सुरक्षा का है।

कुछ दिन पहले छजारसी के पास एक यूनिपोल गिरने से एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। घटना में एक बड़ा हादसा टल गया, लेकिन इस दुर्घटना ने क्षेत्र में लगे विशालकाय विज्ञापन बोर्डों की वैधता, संरचनात्मक सुरक्षा, अनुमति प्रक्रिया और संबंधित विभागों की जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि यदि संबंधित यूनिपोल नियमों और अनुमति के बिना लगाए गए हैं, तो उन्हें अब तक हटाया क्यों नहीं गया? यदि वे वैध हैं तो उनकी अनुमति, सुरक्षा जांच और विज्ञापन शुल्क से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं किए जा रहे? हादसे के बाद किस अधिकारी या एजेंसी की जिम्मेदारी तय की गई और भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए क्या कार्रवाई की गई?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

छजारसी में यूनिपोल गिरने से व्यक्ति गंभीर घायल, फिर भी नहीं टूटी जिम्मेदारों की नींद?

छजारसी क्षेत्र में कुछ दिन पहले एक विशालकाय यूनिपोल गिरने की घटना सामने आई थी। हादसे में एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। राहत की बात यह रही कि घटना और अधिक भयावह नहीं हुई, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?

व्यस्त सड़कों और आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास लगाए गए विशाल यूनिपोल यदि निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप स्थापित नहीं किए गए हों तो तेज हवा, बारिश या संरचनात्मक कमजोरी की स्थिति में गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकते हैं।

छजारसी की घटना ने इसी खतरे की ओर ध्यान खींचा है।

किसी यूनिपोल के गिरने और व्यक्ति के गंभीर रूप से घायल होने के बाद सामान्य परिस्थितियों में संबंधित संरचना की अनुमति, तकनीकी सुरक्षा प्रमाणपत्र, स्वामित्व, विज्ञापन अधिकार और निरीक्षण व्यवस्था की जांच अपेक्षित होती है।

अब सवाल उठ रहा है कि इस मामले में जांच कहां तक पहुंची? क्या किसी की जिम्मेदारी तय हुई? क्या क्षेत्र में लगे अन्य यूनिपोल की सुरक्षा जांच कराई गई? और यदि नहीं, तो क्यों?

छजारसी और खोड़ा में कथित अवैध यूनिपोल की भरमार, आखिर जिम्मेदार कौन?

नोएडा प्राधिकरण क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग की सीमा के बाहर छजारसी और खोड़ा के पास बड़ी संख्या में कथित अवैध यूनिपोल विज्ञापन बोर्ड लगे होने का मामला सामने आया है।

यदि ये विज्ञापन बोर्ड बिना आवश्यक अनुमति के लगाए गए हैं तो यह केवल नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं है। इससे सरकारी राजस्व को नुकसान और आम जनता की सुरक्षा, दोनों से जुड़े गंभीर प्रश्न पैदा होते हैं।

किसी भी बड़े विज्ञापन ढांचे को लगाने के लिए संबंधित प्राधिकरणों की अनुमति, निर्धारित शुल्क और सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक होता है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि छजारसी और खोड़ा के आसपास लगे यूनिपोल किसकी अनुमति से स्थापित किए गए।

क्या इनके लिए विज्ञापन शुल्क जमा किया गया?

क्या इनकी वैध अनुमति मौजूद है?

क्या इनकी संरचनात्मक सुरक्षा की नियमित जांच की गई?

क्या संबंधित विभाग के पास इन यूनिपोल का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है?

और सबसे बड़ा सवाल—यदि ये अवैध हैं तो इन्हें हटाया क्यों नहीं जा रहा?

करोड़ों के संभावित विज्ञापन शुल्क का नुकसान, राजस्व की जिम्मेदारी किसकी?

Noida Illegal Unipoles के मामले में दूसरा बड़ा मुद्दा सरकारी राजस्व का है। विशालकाय यूनिपोल और विज्ञापन बोर्डों से संबंधित एजेंसियों को निर्धारित शुल्क प्राप्त होता है।

यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में विज्ञापन बोर्ड बिना अनुमति या शुल्क जमा किए संचालित हो रहे हैं तो इससे संबंधित प्राधिकरण को भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है।

यही कारण है कि छजारसी और खोड़ा के आसपास लगे कथित अवैध यूनिपोल के मामले में विस्तृत वित्तीय जांच की मांग भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यह पता लगाया जाना चाहिए कि क्षेत्र में कुल कितने यूनिपोल लगे हैं, इनमें कितनों के पास वैध अनुमति है, कितने यूनिपोल का विज्ञापन शुल्क नियमित रूप से जमा हो रहा है और कितने विज्ञापन ढांचे नियमों के बाहर संचालित किए जा रहे हैं।

यदि किसी स्तर पर राजस्व की हानि हुई है तो इसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

सवाल बड़ा है—क्या बिना संरक्षण के इतने विशाल यूनिपोल लगना संभव है?

छजारसी और खोड़ा जैसे व्यस्त इलाकों में विशालकाय यूनिपोल कोई छोटी या छिपी हुई संरचना नहीं हैं। ये दूर से दिखाई देते हैं और इनके निर्माण तथा स्थापना के लिए बड़े स्तर पर संसाधनों की आवश्यकता होती है।

ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि यदि कोई यूनिपोल वास्तव में अवैध है तो वह संबंधित अधिकारियों की जानकारी के बिना इतने लंबे समय तक कैसे खड़ा रह सकता है?

क्या संबंधित विभागों द्वारा नियमित निरीक्षण नहीं किया जाता?

क्या अवैध विज्ञापन संरचनाओं की पहचान के लिए कोई निगरानी तंत्र मौजूद नहीं है?

क्या पहले शिकायतें मिलने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई?

और यदि कार्रवाई रुकी है तो इसके पीछे क्या कारण हैं?

इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच के जरिए सामने आना जरूरी है।

हादसे के बाद भी कार्रवाई नहीं तो व्यवस्था पर उठेंगे सवाल

छजारसी में यूनिपोल गिरने से एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल होने की घटना के बाद प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर लोगों की अपेक्षाएं बढ़ना स्वाभाविक है।

किसी भी हादसे के बाद केवल घटनास्थल का निरीक्षण कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। यह पता लगाना भी जरूरी है कि दुर्घटना क्यों हुई, यूनिपोल किसने लगाया, क्या उसके पास वैध अनुमति थी और उसकी तकनीकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी।

यदि किसी व्यक्ति की लापरवाही या नियमों की अनदेखी सामने आती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

इसके साथ ही क्षेत्र में मौजूद अन्य विशालकाय विज्ञापन ढांचों की भी जांच जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो।

बारिश और तेज हवा में और बढ़ सकता है खतरा

मानसून और तेज हवाओं के दौरान विशालकाय विज्ञापन बोर्डों की सुरक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि किसी यूनिपोल की नींव कमजोर हो, संरचना में तकनीकी कमी हो या निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन न किया गया हो तो खराब मौसम में उसके गिरने का खतरा बढ़ सकता है।

ऐसे विज्ञापन ढांचे यदि व्यस्त सड़क, बाजार या आबादी के पास लगे हों तो दुर्घटना बेहद गंभीर हो सकती है।

छजारसी की हालिया घटना को एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि एक यूनिपोल गिर सकता है तो क्षेत्र में मौजूद अन्य संदिग्ध संरचनाओं की सुरक्षा जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?

सवाल यह भी है कि क्या प्रशासन ने हादसे के बाद क्षेत्र के सभी यूनिपोल का तकनीकी ऑडिट कराया है?

वैध हैं तो दस्तावेज सामने आएं, अवैध हैं तो तत्काल हटाए जाएं

इस पूरे मामले का समाधान स्पष्ट और पारदर्शी कार्रवाई में है।

यदि छजारसी और खोड़ा क्षेत्र में लगे यूनिपोल वैध हैं तो संबंधित अनुमति, शुल्क भुगतान और सुरक्षा प्रमाणपत्रों की जांच कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

लेकिन यदि जांच में ये विज्ञापन संरचनाएं अवैध पाई जाती हैं तो इन्हें तत्काल हटाने की कार्रवाई होनी चाहिए।

किसी भी अवैध संरचना को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि उससे व्यावसायिक हित जुड़े हुए हैं।

आम नागरिकों की सुरक्षा किसी भी विज्ञापन राजस्व या व्यावसायिक हित से अधिक महत्वपूर्ण है।

जिम्मेदारी तय करने से क्यों बच रहा सिस्टम?

किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण होती है।

यदि क्षेत्र में अवैध यूनिपोल लगाए गए हैं तो उनकी निगरानी किस विभाग की जिम्मेदारी थी?

यदि विज्ञापन शुल्क जमा नहीं किया गया तो राजस्व वसूली की जिम्मेदारी किस अधिकारी या एजेंसी की थी?

यदि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हुआ तो तकनीकी निरीक्षण किसे करना था?

और यदि हादसा हो गया तो उसके बाद कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी है?

इन सवालों के जवाब तय किए बिना केवल औपचारिक कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

किसके दबाव में रुकी कार्रवाई? उठ रहा सबसे तीखा सवाल

इस पूरे मामले में अब सबसे गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि कथित अवैध यूनिपोल के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही।

यदि नियम स्पष्ट हैं और संरचनाएं अवैध हैं तो उन्हें हटाने में देरी क्यों?

क्या संबंधित विभागों के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर भ्रम है?

क्या जांच लंबित है?

क्या किसी स्तर पर प्रभाव या दबाव के कारण कार्रवाई प्रभावित हो रही है?

या फिर संबंधित अधिकारियों को अभी तक मामले की गंभीरता का अहसास नहीं हुआ?

इन सभी आशंकाओं को दूर करने के लिए निष्पक्ष और पारदर्शी जांच आवश्यक है।

सिर्फ यूनिपोल हटाना पर्याप्त नहीं, पूरे नेटवर्क की जांच जरूरी

यदि छजारसी और खोड़ा क्षेत्र में कथित अवैध यूनिपोल का मामला सही पाया जाता है तो केवल कुछ विज्ञापन बोर्ड हटाने से समस्या समाप्त नहीं होगी।

यह पता लगाना भी जरूरी होगा कि इन्हें किसने लगाया, किसकी अनुमति से लगाया, विज्ञापन से होने वाली आय किसे मिली और सरकारी राजस्व को कितना नुकसान हुआ।

इसके अलावा संबंधित अवधि में निरीक्षण और कार्रवाई की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

यदि किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो जिम्मेदारी तय किए बिना व्यवस्था में सुधार संभव नहीं होगा।

जनता की जान से बड़ा कोई विज्ञापन कारोबार नहीं

विशालकाय यूनिपोल और विज्ञापन बोर्डों से संबंधित विवाद को केवल राजस्व के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है।

यह सीधे तौर पर जनसुरक्षा से जुड़ा मामला है।

हर दिन इन सड़कों से हजारों वाहन चालक, दोपहिया सवार और पैदल यात्री गुजरते हैं। किसी कमजोर या असुरक्षित यूनिपोल के अचानक गिरने की स्थिति में गंभीर हादसा हो सकता है।

छजारसी की घटना में एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुआ है। यह घटना प्रशासन के लिए चेतावनी होनी चाहिए।

अगली बार परिणाम इससे अधिक भयावह भी हो सकते हैं।

निष्पक्ष जांच और विशेष अभियान की उठी जरूरत

इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। जांच के दौरान छजारसी और खोड़ा के आसपास लगे सभी यूनिपोल की सूची तैयार की जा सकती है।

इसके बाद प्रत्येक यूनिपोल की अनुमति, विज्ञापन शुल्क, संरचनात्मक सुरक्षा और संबंधित एजेंसी की जिम्मेदारी की जांच होनी चाहिए।

जो यूनिपोल नियमों के अनुरूप हैं, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और जो अवैध पाए जाएं, उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई हो।

इसके साथ ही सरकारी राजस्व के संभावित नुकसान का आकलन कर जिम्मेदार लोगों से वसूली और नियमानुसार कार्रवाई पर भी विचार किया जाना चाहिए।

नोएडा प्राधिकरण से जनता को कार्रवाई की उम्मीद

नोएडा उत्तर प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक और व्यावसायिक शहरों में शामिल है। ऐसे शहर में सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

छजारसी और खोड़ा में कथित अवैध यूनिपोल का मामला अब केवल कुछ विज्ञापन बोर्डों तक सीमित नहीं रहा है।

एक व्यक्ति के गंभीर रूप से घायल होने के बाद यह मामला सीधे तौर पर आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ गया है।

जनता को उम्मीद है कि संबंधित प्राधिकरण और विभाग मामले का संज्ञान लेते हुए निष्पक्ष जांच और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।

किसी की जान जाने के बाद जागने का इंतजार क्यों?

छजारसी में हुआ हादसा एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते पूरे क्षेत्र में लगे संदिग्ध और कथित अवैध यूनिपोल की जांच नहीं की गई तो भविष्य में बड़ा हादसा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि हादसे के बाद अब तक क्या कार्रवाई हुई, कितने यूनिपोल की जांच की गई और कितनी अवैध विज्ञापन संरचनाओं को चिह्नित किया गया।

यदि करोड़ों रुपये के संभावित राजस्व नुकसान के आरोप भी सामने आ रहे हैं तो वित्तीय जांच कर वास्तविक स्थिति जनता के सामने रखी जानी चाहिए।

सबसे जरूरी बात यह है कि कार्रवाई किसी बड़ी दुर्घटना के बाद नहीं, बल्कि दुर्घटना को रोकने के लिए होनी चाहिए।

 

छजारसी और खोड़ा के आसपास लगे कथित अवैध यूनिपोल अब केवल विज्ञापन शुल्क और संभावित राजस्व नुकसान का मामला नहीं रह गए हैं। एक यूनिपोल गिरने से व्यक्ति के गंभीर रूप से घायल होने के बाद सवाल सीधे आम जनता की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही पर खड़ा है। यदि ये यूनिपोल वैध हैं तो उनकी अनुमति और सुरक्षा स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए, और यदि अवैध हैं तो इन्हें तत्काल हटाकर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। निष्पक्ष जांच यह भी तय करे कि संभावित राजस्व नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है और प्रभावी कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई। आखिर किसी की जान जाने के बाद जागने का इंतजार क्यों किया जाए?

Shyama Charan Panwar

एस0सी0 पंवार (वरिष्ठ अधिवक्ता) टीम के निदेशक हैं, समाचार और विज्ञापन अनुभाग के लिए जिम्मेदार हैं। पंवार, सी.सी.एस. विश्वविद्यालय (मेरठ)से विज्ञान और कानून में स्नातक हैं. पंवार "पत्रकार पुरम सहकारी आवास समिति लि0" के पूर्व निदेशक हैं। उन्हें पत्रकारिता क्षेत्र में 29 से अधिक वर्षों का अनुभव है। संपर्क ई.मेल- panwar@poojanews.com

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