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PoK में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा जनआंदोलन! महंगाई से शुरू हुआ विरोध अब स्वायत्तता की मांग तक पहुंचा, मुजफ्फराबाद से रावलकोट तक बढ़ा तनाव

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में पिछले दो वर्षों से जारी जनआंदोलन अब एक नए और अधिक संवेदनशील चरण में पहुंच गया है। शुरुआत महंगाई, बिजली की ऊंची दरों और आटे की बढ़ती कीमतों के विरोध से हुई थी, लेकिन अब यह आंदोलन स्थानीय राजनीतिक अधिकारों, अधिक स्वायत्तता और संवैधानिक बदलाव की मांग तक पहुंच चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि यह हाल के वर्षों में पाकिस्तान सरकार के सामने PoK से उभरी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है।

वर्तमान में PoK में तीन चरणों में स्थानीय चुनाव कराए जा रहे हैं। इसी बीच राजधानी मुजफ्फराबाद सहित कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। प्रमुख सड़कों पर पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई है तथा संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार गश्त की जा रही है।


PoK आंदोलन की कमान किसके हाथ में है?

इस आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। वर्ष 2023 में गठित इस संगठन में व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता, स्थानीय संगठनों के प्रतिनिधि और विभिन्न क्षेत्रों के नागरिक शामिल हैं।

शुरुआत में संगठन ने आम लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों—विशेषकर बिजली की बढ़ती दरों और महंगे आटे—को लेकर आंदोलन शुरू किया था। वर्ष 2024 और 2025 में हुए व्यापक प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को कुछ मांगें स्वीकार करनी पड़ीं।

सरकार ने बिजली की दरों में कमी की और आटे पर सब्सिडी देने की घोषणा की। इसके बाद PoK में आटे की कीमतें पाकिस्तान के कई अन्य हिस्सों की तुलना में कम हो गईं। इन शुरुआती सफलताओं के बाद JAAC का जनसमर्थन तेजी से बढ़ा।


महंगाई से आगे बढ़कर अब राजनीतिक अधिकारों की मांग

समय के साथ आंदोलन केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहा। अब JAAC स्थानीय शासन व्यवस्था में व्यापक बदलाव और अधिक स्वायत्तता की मांग कर रही है।

संगठन की सबसे प्रमुख मांग PoK विधानसभा की कुल 45 सीटों में शामिल 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की है। ये सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं जो पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहते हैं।

JAAC का तर्क है कि जो लोग PoK में स्थायी रूप से नहीं रहते, उन्हें स्थानीय सरकार के गठन में निर्णायक भूमिका नहीं मिलनी चाहिए। संगठन का कहना है कि इन आरक्षित सीटों के कारण स्थानीय मतदाताओं की राजनीतिक इच्छा कमजोर पड़ जाती है और केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को लाभ मिलता है।


लॉन्ग मार्च से पहले संगठन पर प्रतिबंध, नेताओं की गिरफ्तारी

JAAC ने 9 जून को रावलकोट से राजधानी मुजफ्फराबाद तक एक बड़े लॉन्ग मार्च की घोषणा की थी। रावलकोट को संगठन का मजबूत आधार क्षेत्र माना जाता है और यह नियंत्रण रेखा (LoC) से लगभग 20 मील की दूरी पर स्थित है।

हालांकि मार्च शुरू होने से पहले ही 5 जून को पाकिस्तान सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत JAAC पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही संगठन के कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार भी किया गया।

सरकारी कार्रवाई के बावजूद आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। रावलकोट में समर्थकों ने कई सप्ताह तक धरना जारी रखा और समानांतर रूप से सरकार तथा आंदोलनकारियों के बीच बातचीत भी चलती रही।


हिंसा और झड़पों में कई लोगों की मौत

स्थानीय अधिकारियों के अनुसार जून की शुरुआत से लेकर 27 जुलाई तक आंदोलन से जुड़ी घटनाओं में प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों सहित कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है।

इन घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है और कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया है।


इंटरनेट बंद, सुरक्षा चौकियां और प्रभावित जनजीवन

रिपोर्टों के अनुसार हाल के सप्ताहों में पाकिस्तान सरकार ने PoK के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त कर दिया।

क्षेत्र के अनेक हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं लंबे समय तक बाधित रहीं। इसका प्रभाव केवल सोशल मीडिया या मोबाइल संचार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बैंकिंग सेवाएं, एटीएम और डिजिटल भुगतान व्यवस्था भी प्रभावित हुई।

मुजफ्फराबाद जाने वाले प्रमुख मार्गों पर अतिरिक्त पुलिस चौकियां स्थापित की गईं। सुरक्षा जांच बढ़ने के कारण लोगों की आवाजाही भी प्रभावित हुई।


पर्यटन पर भी पड़ा असर

PoK की नीलम और झेलम नदी के आसपास की खूबसूरत घाटियां सामान्यतः गर्मियों में बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करती हैं।

लेकिन इस बार सुरक्षा स्थिति, आंदोलन और इंटरनेट प्रतिबंधों के कारण पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय कमी देखी गई। कई स्थानीय व्यवसायों पर भी इसका असर पड़ा।

मुजफ्फराबाद में बैंकिंग सेवाओं के बाधित होने के कारण लोगों को नकदी निकालने के लिए लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ा।


पाकिस्तान पहले से कई सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा

PoK में बढ़ता आंदोलन ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान पहले से ही कई आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है।

देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा, में सुरक्षा बल लंबे समय से उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि PoK को लंबे समय तक अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र माना जाता था, लेकिन हालिया घटनाओं ने इस धारणा को चुनौती दी है।


सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत बेनतीजा

पाकिस्तान सरकार और JAAC के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की वार्ता हुई, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।

पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी का कहना है कि सरकार ने संगठन की अधिकांश आर्थिक मांगों को स्वीकार कर लिया था, लेकिन संवैधानिक बदलाव की मांग को मंजूर नहीं किया जा सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार के अनुसार आंदोलन अब केवल विरोध प्रदर्शन नहीं रह गया है और प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है।


12 आरक्षित सीटों पर सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि PoK की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था कश्मीर मुद्दे से जुड़ी उसकी आधिकारिक नीति का हिस्सा है।

सरकारी पक्ष के अनुसार यदि विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें समाप्त कर दी जाती हैं, तो पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों का प्रतिनिधित्व प्रभावित होगा। साथ ही सरकार का मानना है कि इस प्रकार के संवैधानिक बदलाव से कश्मीर मुद्दे पर उसकी कूटनीतिक स्थिति पर भी असर पड़ सकता है।


2019 के बाद बदला राजनीतिक माहौल

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि PoK में बढ़ती राजनीतिक सक्रियता की पृष्ठभूमि वर्ष 2019 के बाद तैयार हुई।

भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव के बाद PoK में भी प्रदर्शन हुए थे। उस समय कई लोगों ने नियंत्रण रेखा के उस पार रहने वाले कश्मीरियों के समर्थन में रैलियां निकाली थीं।

मुजफ्फराबाद के राजनीतिक कार्यकर्ता जाहिद अमीन के अनुसार, लोगों की नाराजगी केवल क्षेत्रीय घटनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि समय के साथ स्थानीय शासन और नीतियों को लेकर भी असंतोष बढ़ता गया।


JAAC का दावा- अलगाव नहीं, अधिक स्थानीय अधिकार चाहिए

JAAC का कहना है कि उसका उद्देश्य न तो पाकिस्तान से अलग होना है और न ही किसी अन्य देश में विलय की मांग करना।

संगठन के नेताओं का कहना है कि उनकी प्रमुख मांग स्थानीय प्रशासन को अधिक अधिकार देना, संवैधानिक सुधार करना और क्षेत्र के लोगों को अपने मामलों में अधिक निर्णय लेने का अवसर प्रदान करना है।

PoK की वर्तमान व्यवस्था के तहत यहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा, सुप्रीम कोर्ट और अलग झंडा मौजूद है, लेकिन रक्षा, विदेश नीति और कई प्रमुख मामलों पर अंतिम अधिकार पाकिस्तान की केंद्र सरकार के पास है।


सेना ने कानूनी प्रक्रिया अपनाने की अपील की

पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा कि सरकार ने आंदोलनकारियों के प्रति संयम बरता है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने JAAC से स्थानीय चुनावों में भाग लेने और अपनी मांगें संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से रखने की अपील की थी।

हालांकि JAAC ने चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया। संगठन का आरोप है कि आंदोलन से जुड़े कई उम्मीदवारों के नामांकन पत्र बिना स्पष्ट कारण बताए खारिज किए गए, जबकि सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है।


विशेषज्ञ क्या मानते हैं?

इस्लामाबाद के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा का मानना है कि पिछले आंदोलनों के दौरान सरकार द्वारा बिजली सस्ती करने और आटे पर सब्सिडी देने जैसे फैसलों ने लोगों में यह धारणा बनाई कि संगठित जनदबाव से सरकार अपनी नीतियों में बदलाव कर सकती है।

उनके अनुसार अब यही विश्वास आंदोलन को आर्थिक मुद्दों से आगे बढ़ाकर राजनीतिक और संवैधानिक मांगों तक ले आया है।


आने वाले समय पर रहेगी नजर

PoK में मौजूदा स्थिति आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति और स्थानीय प्रशासन दोनों के लिए महत्वपूर्ण बनी रह सकती है। स्थानीय चुनाव, सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संभावित संवाद तथा प्रशासनिक फैसलों पर सभी पक्षों की नजर रहेगी।

साथ ही यह घटनाक्रम दक्षिण एशिया के व्यापक राजनीतिक और सुरक्षा परिदृश्य के संदर्भ में भी लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।


 

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में चल रहा आंदोलन आर्थिक मुद्दों से शुरू होकर अब स्थानीय राजनीतिक अधिकारों और संवैधानिक बदलाव की मांग तक पहुंच चुका है। एक ओर सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने और मौजूदा संवैधानिक ढांचे को आवश्यक बता रही है, वहीं आंदोलनकारी अधिक स्थानीय अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग पर कायम हैं। आने वाले दिनों में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच होने वाली बातचीत, स्थानीय चुनावों के परिणाम तथा प्रशासनिक कदम इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

 

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