रूस ने फिर जताया जस्टिस DY Chandrachud पर भरोसा, यूक्रेनी बैंक के अरबों डॉलर के निवेश विवाद में बनाया मध्यस्थ
News-Desk
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अंतरराष्ट्रीय कानून, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, अंतरराष्ट्रीय विवाद, इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन, ओश्चादबैंक, कानूनी खबर, केयर्न एनर्जी, ग्लोबल लीगल न्यूज, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, डीवाई चंद्रचूड़, निवेश ट्रिब्यूनल, निवेश विवाद, पूर्व CJI, बिज़नेस न्यूज़, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, यूक्रेन, रूस, रूस-यूक्रेन विवाद, वोडाफोन, सुप्रीम कोर्टDY Chandrachud एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कानूनी और निवेश विवाद के केंद्र में हैं। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को रूस ने यूक्रेन के सरकारी बैंक ओश्चादबैंक से जुड़े एक बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में अपनी ओर से मध्यस्थ यानी आर्बिट्रेटर नियुक्त किया है। यह मामला रूस और यूक्रेन के बीच हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते से जुड़ा बताया जा रहा है और इसमें बैंक की ओर से कई सौ मिलियन डॉलर के नुकसान का दावा किया गया है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे रूस-यूक्रेन संघर्ष की पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। ओश्चादबैंक का आरोप है कि 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले और उसके बाद कुछ क्षेत्रों पर रूसी कब्जे के चलते बैंक को अपनी संपत्तियों और कारोबार का इस्तेमाल करने से वंचित होना पड़ा। बैंक की जिन संपत्तियों पर असर पड़ने का दावा किया गया है, उनमें शाखाएं, एटीएम, कार्यालय, जमीन और दूसरे कारोबारी संसाधन शामिल हैं।
रूस की ओर से इस विवाद में डीवाई चंद्रचूड़ को अपनी तरफ से आर्बिट्रेटर बनाए जाने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय कानूनी जगत में भी ध्यान खींचा है। खास बात यह है कि इससे पहले भी रूस ने दो अलग-अलग निवेश विवादों में चंद्रचूड़ को अपनी ओर से मध्यस्थ बनने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने उन जिम्मेदारियों को स्वीकार नहीं किया था।
अब ओश्चादबैंक से जुड़े मामले में उनका नाम सामने आना इस पूरे विवाद को और महत्वपूर्ण बना देता है।
ओश्चादबैंक आखिर किस विवाद में पहुंचा अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल तक?
ओश्चादबैंक यूक्रेन का सरकारी बैंक है। बैंक का दावा है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उसे यूक्रेन के कुछ ऐसे क्षेत्रों में मौजूद अपनी संपत्तियों और व्यावसायिक गतिविधियों का नुकसान उठाना पड़ा, जो युद्ध और रूसी नियंत्रण के कारण उसके प्रभाव से बाहर हो गए।
जिन क्षेत्रों का उल्लेख मामले में किया गया है, उनमें दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया शामिल हैं।
बैंक के मुताबिक इन इलाकों में उसके बैंकिंग नेटवर्क का एक बड़ा हिस्सा मौजूद था। यहां शाखाएं, एटीएम, कार्यालय, जमीन और अन्य कारोबारी संपत्तियां थीं। युद्ध और रूसी कब्जे के बाद बैंक का कहना है कि वह इन संसाधनों का सामान्य रूप से इस्तेमाल नहीं कर सका।
कई शाखाओं के बंद होने और कारोबार प्रभावित होने के कारण बैंक को भारी आर्थिक नुकसान होने का दावा किया गया है।
इसी नुकसान की भरपाई के लिए ओश्चादबैंक ने रूस के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद की प्रक्रिया शुरू की।
रूस-यूक्रेन के 1998 के निवेश समझौते से जुड़ा है मामला
यह विवाद केवल दो कंपनियों के बीच सामान्य कारोबारी मुकदमे जैसा नहीं है। इसकी कानूनी पृष्ठभूमि रूस और यूक्रेन के बीच 1998 में हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते यानी Bilateral Investment Treaty से जुड़ी बताई गई है।
ऐसे समझौतों का उद्देश्य एक देश के निवेशकों या कंपनियों को दूसरे देश में निवेश के दौरान कुछ कानूनी सुरक्षा उपलब्ध कराना होता है। यदि निवेशक को लगता है कि उसके निवेश के साथ समझौते के तहत तय सुरक्षा के विपरीत व्यवहार हुआ है, तो कुछ परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय निवेश मध्यस्थता का रास्ता खुल सकता है।
ओश्चादबैंक ने इसी तरह के निवेश संरक्षण के आधार पर रूस के खिलाफ अपना दावा आगे बढ़ाया है।
यहां विवाद की वास्तविक कानूनी वैधता और दोनों पक्षों के दावों का आकलन ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया में होगा।
ओश्चादबैंक ने कितने नुकसान का दावा किया है?
बैंक ने इस विवाद में कई सौ मिलियन डॉलर के नुकसान का दावा किया है।
दावे का आधार उन संपत्तियों और कारोबारी गतिविधियों को बताया गया है, जिनका इस्तेमाल बैंक के अनुसार रूसी कब्जे के बाद संभव नहीं रहा।
बैंक की संपत्तियों में बैंक शाखाएं, एटीएम, कार्यालय, जमीन और दूसरे कारोबारी संसाधन शामिल थे। इन संपत्तियों के नुकसान या इस्तेमाल से वंचित होने को बैंक ने अपने आर्थिक नुकसान का आधार बनाया है।
हालांकि किसी भी अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में किसी पक्ष द्वारा किया गया दावा अपने आप में अंतिम देनदारी साबित नहीं करता। ट्रिब्यूनल दोनों पक्षों के तर्क, दस्तावेज, कानूनी आधार और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचता है।
जुलाई 2025 में रूस को भेजा गया था विवाद का नोटिस
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ओश्चादबैंक ने जुलाई 2025 में रूस को औपचारिक रूप से विवाद का नोटिस भेजा था।
बैंक की ओर से यह कदम उठाने के बाद रूस की तरफ से अपेक्षित जवाब नहीं मिलने पर बैंक ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू कर दी।
अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में अक्सर औपचारिक नोटिस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसके जरिए संबंधित पक्ष दूसरे पक्ष को यह बताता है कि विवाद किस आधार पर उठाया जा रहा है और किस प्रकार का समाधान मांगा जा रहा है।
जब बातचीत या अन्य निर्धारित प्रक्रिया से विवाद का समाधान नहीं होता, तो मामला आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल के सामने जा सकता है।
तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल करेगा मामले की सुनवाई
इस मामले की सुनवाई तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल द्वारा किए जाने की जानकारी सामने आई है।
आमतौर पर निवेश आर्बिट्रेशन में दोनों पक्ष अपनी ओर से एक-एक आर्बिट्रेटर चुनते हैं और तीसरे सदस्य का चयन दोनों पक्षों की सहमति से या निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाता है। यही पैनल विवाद के कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं पर विचार करता है।
इस मामले में डीवाई चंद्रचूड़ रूस की ओर से नामित आर्बिट्रेटर के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
उनकी जिम्मेदारी किसी एक पक्ष के वकील के रूप में काम करना नहीं होती। आर्बिट्रेटर का दायित्व स्वतंत्र रूप से मामले की सुनवाई करना और ट्रिब्यूनल के सदस्य के रूप में निष्पक्ष भूमिका निभाना होता है।
डीवाई चंद्रचूड़ को रूस ने पहले भी दो मामलों में चुना था
ओश्चादबैंक विवाद में डीवाई चंद्रचूड़ का नाम पहली बार रूस के साथ नहीं जुड़ा है। इससे पहले भी रूस ने दो अन्य बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में उन्हें अपनी ओर से आर्बिट्रेटर बनाने का अनुरोध किया था।
हालांकि उन दोनों मामलों में चंद्रचूड़ ने जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की थी।
इनमें पहला मामला जर्मनी की ऊर्जा कंपनी विंटरशाल डीया से संबंधित बताया गया है।
दूसरा विवाद यूक्रेन की सरकारी बिजली ट्रांसमिशन कंपनी उक्रएनरगो से जुड़ा था।
इन दोनों मामलों का अंतिम परिणाम अभी सामने नहीं आया है।
पहला मामला: विंटरशाल डीया बनाम रूस
विंटरशाल डीया जर्मनी की ऊर्जा कंपनी है। इस मामले में कंपनी की ओर से आरोप लगाया गया कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस में उसके गैस और तेल से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर कब्जा कर लिया गया या उनका इस्तेमाल उसके लिए संभव नहीं रहा।
कंपनी का दावा था कि इसके चलते उसे भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
इस विवाद में भी रूस ने डीवाई चंद्रचूड़ को अपनी ओर से आर्बिट्रेटर बनाए जाने का अनुरोध किया था। हालांकि उन्होंने इस जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं किया।
यह मामला भी अंतरराष्ट्रीय निवेश संरक्षण और युद्ध के कारण विदेशी निवेश पर पड़े प्रभाव जैसे जटिल कानूनी सवालों से जुड़ा है।
दूसरा मामला: यूक्रेन की बिजली कंपनी उक्रएनरगो
दूसरा विवाद यूक्रेन की सरकारी बिजली ट्रांसमिशन कंपनी उक्रएनरगो से जुड़ा बताया गया है।
कंपनी का आरोप है कि रूस के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में उसकी बिजली से जुड़ी संपत्तियों को नुकसान पहुंचा या उन पर कब्जा कर लिया गया।
इस मामले में भी रूस की ओर से डीवाई चंद्रचूड़ को अपना आर्बिट्रेटर बनाने का अनुरोध किया गया था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
अब ओश्चादबैंक के मामले में उनका नाम फिर सामने आने से यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में उनकी न्यायिक और कानूनी विशेषज्ञता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत के पूर्व CJI की अंतरराष्ट्रीय भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में डीवाई चंद्रचूड़ का कार्यकाल नवंबर 2024 में समाप्त हुआ था। इसके बाद उनका अंतरराष्ट्रीय कानूनी और अकादमिक क्षेत्र में सक्रिय होना स्वाभाविक रूप से वैश्विक कानूनी जगत का ध्यान खींचता है।
भारत के पूर्व न्यायाधीशों का अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन और ट्रिब्यूनल में जाना कोई बिल्कुल नया घटनाक्रम नहीं है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अंतरराष्ट्रीय विवादों में आर्बिट्रेटर या अन्य कानूनी भूमिकाएं निभा चुके हैं।
भारत की न्यायिक परंपरा और वरिष्ठ न्यायाधीशों के अनुभव को अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान में उपयोगी माना जाता है।
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता आखिर होती क्या है?
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को आसान भाषा में समझें तो यह सीमा-पार कारोबारी या निवेश विवादों को अदालत के बजाय विशेषज्ञों के एक स्वतंत्र पैनल के सामने सुलझाने की प्रक्रिया है।
मान लीजिए किसी देश की कंपनी ने दूसरे देश में करोड़ों डॉलर का निवेश किया। बाद में कंपनी का आरोप है कि उसके निवेश के साथ अनुचित व्यवहार हुआ या सरकार की किसी कार्रवाई से उसे भारी नुकसान हुआ।
ऐसी स्थिति में, यदि संबंधित निवेश समझौता इसकी अनुमति देता है, तो कंपनी अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन का रास्ता अपना सकती है।
दोनों पक्ष अपने-अपने आर्बिट्रेटर चुन सकते हैं और एक ट्रिब्यूनल बनाया जाता है। ट्रिब्यूनल दस्तावेजों, कानूनी दलीलों और साक्ष्यों को सुनकर फैसला करता है।
अदालत और अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन में क्या अंतर है?
अदालत और आर्बिट्रेशन दोनों में विवाद का समाधान किया जाता है, लेकिन दोनों की संरचना और प्रक्रिया अलग होती है।
अदालत सामान्यतः किसी देश की न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा होती है और उसके पास उस देश के कानूनों के तहत अधिकार क्षेत्र होता है।
इसके विपरीत अंतरराष्ट्रीय निवेश आर्बिट्रेशन अक्सर किसी संधि, निवेश समझौते या अनुबंध के आधार पर शुरू होता है।
इसमें पक्षकारों की ओर से चुने गए विशेषज्ञों का ट्रिब्यूनल बनाया जाता है। यह विशेषज्ञ अंतरराष्ट्रीय कानून, निवेश कानून, वाणिज्यिक कानून या संबंधित क्षेत्र में अनुभव रखने वाले हो सकते हैं।
क्या आर्बिट्रेटर किसी एक पक्ष के लिए फैसला करता है?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी पक्ष द्वारा आर्बिट्रेटर नियुक्त किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि वह आर्बिट्रेटर उस पक्ष के पक्ष में फैसला देगा।
आर्बिट्रेटर की भूमिका स्वतंत्र और निष्पक्ष होनी चाहिए। ट्रिब्यूनल के प्रत्येक सदस्य से अपेक्षा की जाती है कि वह मामले की कानूनी स्थिति और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर अपनी भूमिका निभाए।
इसलिए यदि रूस ने डीवाई चंद्रचूड़ को अपनी ओर से आर्बिट्रेटर चुना है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि ट्रिब्यूनल का फैसला रूस के पक्ष में ही आएगा।
अंतिम निर्णय मामले की सुनवाई और लागू कानूनी ढांचे के आधार पर होगा।
कई सौ मिलियन डॉलर का दावा, इसलिए दांव बड़ा
ओश्चादबैंक का दावा कई सौ मिलियन डॉलर का बताया गया है। इतनी बड़ी रकम के कारण यह विवाद केवल कानूनी ही नहीं, आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
यदि ट्रिब्यूनल बैंक के दावे को स्वीकार करता है तो रूस पर बड़ी वित्तीय देनदारी आ सकती है। वहीं यदि रूस अपने बचाव में सफल होता है तो बैंक का दावा पूरी तरह या आंशिक रूप से खारिज हो सकता है।
इसके अलावा ट्रिब्यूनल किसी दावे की राशि को पूरी तरह स्वीकार करने के बजाय उसे कम भी कर सकता है, यदि उसे उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी आधार के अनुसार वास्तविक नुकसान कम प्रतीत होता है।
युद्ध के बाद बढ़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद
रूस-यूक्रेन युद्ध ने केवल सैन्य और राजनीतिक समीकरण नहीं बदले हैं। इसके असर ने अंतरराष्ट्रीय कारोबार और निवेश के क्षेत्र में भी कई कानूनी विवाद पैदा किए हैं।
कई विदेशी कंपनियों की रूस में संपत्तियां थीं। दूसरी तरफ यूक्रेन की कंपनियों की संपत्तियां उन क्षेत्रों में थीं, जो युद्ध के कारण प्रभावित हुए।
ऐसे में निवेश संरक्षण, संपत्ति के नुकसान, जब्ती, सरकारी कार्रवाई और युद्ध के प्रभाव से जुड़े विवाद अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों तक पहुंचे हैं।
ओश्चादबैंक का मामला भी इसी व्यापक कानूनी परिदृश्य का हिस्सा है।
भारत के दो बड़े उदाहरण: केयर्न एनर्जी और भारत
भारत से जुड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों की बात करें तो केयर्न एनर्जी का मामला काफी चर्चित रहा है।
ब्रिटेन की कंपनी केयर्न एनर्जी ने 2006 में भारत में अपने कारोबार से जुड़ा एक बड़ा पुनर्गठन किया था। उस समय इस पर कर नहीं लगाया गया था।
बाद में 2012 में भारत सरकार ने पूर्व प्रभाव से कर कानून में बदलाव किया। इसके बाद केयर्न एनर्जी से बड़ी रकम के कर की मांग की गई और कंपनी की कुछ संपत्तियों पर भी कार्रवाई हुई।
कंपनी ने इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन तक पहुंचाया।
केयर्न मामले में ट्रिब्यूनल का फैसला क्या था?
2020 में अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल ने केयर्न एनर्जी के पक्ष में फैसला दिया और भारत सरकार की कर मांग को गलत ठहराया।
ट्रिब्यूनल ने भारत को कंपनी को करीब 1.2 अरब डॉलर लौटाने का आदेश दिया था।
इसके बाद भारत सरकार ने 2021 में पूर्व प्रभाव से लागू किए गए उस विवादित कर प्रावधान को वापस ले लिया।
आगे चलकर भारत और केयर्न के बीच समझौता हुआ और विवाद समाप्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
यह मामला इस बात का बड़ा उदाहरण बन गया कि अंतरराष्ट्रीय निवेश समझौतों के तहत किसी देश की नीतिगत कार्रवाई भी विदेशी निवेशक के साथ विवाद का कारण बन सकती है।
वोडाफोन बनाम भारत विवाद भी रहा बेहद चर्चित
भारत से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण वोडाफोन का है।
2007 में वोडाफोन ने भारत की एक मोबाइल कंपनी में हिस्सेदारी हासिल की थी। उस समय इस सौदे को लेकर कर विवाद खड़ा हुआ।
बाद में 2012 में कानून में बदलाव करते हुए सरकार ने पुराने लेन-देन पर भी कर लागू करने का प्रावधान किया।
इसके बाद वोडाफोन से बड़ी कर राशि की मांग की गई।
कंपनी ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन तक पहुंचाया।
वोडाफोन मामले में ट्रिब्यूनल का फैसला
2020 में अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल ने वोडाफोन के पक्ष में फैसला दिया और भारत सरकार की कर मांग को अनुचित बताया।
इसके बाद भारत सरकार ने 2021 में पूर्व प्रभाव वाले कर प्रावधान को वापस लेने की दिशा में कदम उठाया।
वोडाफोन और भारत के बीच विवाद भी इसके बाद समाप्त हुआ।
यह मामला भी अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून और सरकार की कर नीतियों के बीच संतुलन को लेकर लंबे समय तक चर्चा में रहा।
केयर्न और वोडाफोन मामलों से क्या समझ आता है?
इन दोनों मामलों से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—किसी देश की सरकार के पास अपने कानून बनाने और कर नीति तय करने का अधिकार जरूर होता है, लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय निवेश समझौते लागू हैं तो कुछ सरकारी कदम विदेशी निवेशकों के साथ कानूनी विवाद का आधार बन सकते हैं।
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय निवेश आर्बिट्रेशन का क्षेत्र पिछले कुछ दशकों में बेहद महत्वपूर्ण हुआ है।
निवेशक अपने निवेश की सुरक्षा के लिए केवल स्थानीय अदालतों पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि संबंधित संधियों में उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान तंत्र का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
ओश्चादबैंक मामले में असली कानूनी सवाल क्या होंगे?
ओश्चादबैंक विवाद में ट्रिब्यूनल के सामने कई जटिल प्रश्न आ सकते हैं।
सबसे पहला सवाल यह होगा कि क्या बैंक की जिन संपत्तियों और कारोबारी गतिविधियों का उल्लेख किया गया है, वे संबंधित निवेश समझौते के तहत संरक्षित निवेश की श्रेणी में आती हैं।
दूसरा सवाल यह हो सकता है कि बैंक को संपत्तियों का नुकसान किस परिस्थिति में हुआ और उसके लिए किस पक्ष की कानूनी जिम्मेदारी बनती है।
तीसरा सवाल नुकसान की वास्तविक राशि का होगा।
इसके अलावा युद्ध और सैन्य नियंत्रण जैसी परिस्थितियां भी कानूनी विश्लेषण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।
क्या रूस की जिम्मेदारी सीधे तय हो जाएगी?
ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
किसी युद्ध या सैन्य संघर्ष के दौरान संपत्ति के नुकसान और अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून के बीच संबंध बेहद जटिल हो सकता है। रूस और ओश्चादबैंक अपने-अपने कानूनी तर्क और साक्ष्य ट्रिब्यूनल के सामने रखेंगे।
ट्रिब्यूनल को यह तय करना होगा कि संबंधित निवेश समझौते की कौन-कौन सी धाराएं लागू होती हैं और उन धाराओं के तहत दोनों पक्षों के अधिकार तथा दायित्व क्या हैं।
अंतिम फैसला आने से पहले किसी पक्ष को कानूनी रूप से विजेता घोषित करना उचित नहीं होगा।
डीवाई चंद्रचूड़ के सामने होगी अंतरराष्ट्रीय कानून की जटिल चुनौती
भारत के पूर्व CJI के लिए भी यह भूमिका बेहद अलग प्रकार की जिम्मेदारी होगी। सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक और राष्ट्रीय कानूनों के जटिल मामलों की सुनवाई करने के बाद अंतरराष्ट्रीय निवेश आर्बिट्रेशन एक अलग कानूनी वातावरण प्रदान करता है।
यहां राष्ट्रीय कानूनों के साथ-साथ निवेश संधि, अंतरराष्ट्रीय कानून, संपत्ति अधिकार, सरकारी कार्रवाई और युद्ध से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों का भी विश्लेषण करना पड़ सकता है।
इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन में अनुभवी न्यायविदों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
रूस के लिए भी यह नियुक्ति क्यों महत्वपूर्ण है?
रूस की ओर से डीवाई चंद्रचूड़ को आर्बिट्रेटर चुना जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय विवादों में ट्रिब्यूनल के सदस्यों की विशेषज्ञता और प्रतिष्ठा पर दोनों पक्षों की नजर रहती है।
किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश का नाम अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में आना उस प्रक्रिया की गंभीरता को भी दर्शाता है।
हालांकि आर्बिट्रेटर का चयन अपने आप में किसी पक्ष की कानूनी जीत की गारंटी नहीं देता।
यूक्रेन के लिए दांव सिर्फ बैंक की संपत्तियों तक सीमित नहीं
ओश्चादबैंक यूक्रेन का सरकारी बैंक है। इसलिए उसके निवेश और संपत्तियों से जुड़ा विवाद व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ भी रखता है।
यदि किसी अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में यूक्रेनी सरकारी संस्थान को नुकसान के लिए मुआवजा मिलता है, तो उसका प्रभाव भविष्य में समान दावों पर भी पड़ सकता है।
दूसरी ओर रूस के लिए ऐसे मामलों में वित्तीय दायित्व और कानूनी मिसाल दोनों महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यही कारण है कि रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े निवेश विवाद केवल निजी कंपनियों के आर्थिक दावों तक सीमित नहीं हैं।
अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन में फैसला आने में समय क्यों लगता है?
बड़े निवेश विवादों में दस्तावेजों की संख्या बहुत अधिक होती है। दोनों पक्ष सैकड़ों या हजारों पन्नों के दस्तावेज, विशेषज्ञ रिपोर्ट, वित्तीय आकलन और कानूनी तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं।
इसके अलावा ट्रिब्यूनल को क्षेत्राधिकार, दावे की स्वीकार्यता, निवेश की परिभाषा, नुकसान की गणना और लागू कानून जैसे कई मुद्दों पर विचार करना पड़ सकता है।
इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों का अंतिम फैसला आने में लंबा समय लग सकता है।
ओश्चादबैंक मामले में भी तत्काल फैसला आने की उम्मीद करना उचित नहीं होगा।
एक तरफ युद्ध, दूसरी तरफ अरबों की कानूनी लड़ाई
रूस-यूक्रेन संघर्ष ने जमीन पर सैन्य स्थिति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में भी लंबी लड़ाई को जन्म दिया है।
जहां एक ओर युद्ध के मैदान में नियंत्रण को लेकर संघर्ष चलता रहा, वहीं दूसरी ओर संपत्ति, निवेश, कारोबार और वित्तीय नुकसान को लेकर अदालतों और ट्रिब्यूनलों में दावे सामने आए हैं।
ओश्चादबैंक का मामला इसी व्यापक तस्वीर का हिस्सा है।
बैंक अपने नुकसान की भरपाई चाहता है, जबकि रूस इस दावे के खिलाफ अपना कानूनी बचाव करेगा।
डीवाई चंद्रचूड़ के लिए यह भूमिका नई अंतरराष्ट्रीय पहचान भी बना सकती है
भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्ति के बाद किसी पूर्व CJI का अंतरराष्ट्रीय निवेश ट्रिब्यूनल में शामिल होना उनके न्यायिक अनुभव के वैश्विक इस्तेमाल का उदाहरण है।
यदि डीवाई चंद्रचूड़ की आर्बिट्रेशन भूमिका सफलतापूर्वक आगे बढ़ती है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान के क्षेत्र में उनकी सक्रियता और बढ़ सकती है।
भारत के वरिष्ठ न्यायाधीशों के लिए अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन एक ऐसा क्षेत्र है, जहां उनके वर्षों के न्यायिक अनुभव का उपयोग हो सकता है।
क्या इस मामले का फैसला रूस या यूक्रेन के लिए मिसाल बनेगा?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।
लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े निवेश विवादों की संख्या और प्रकृति को देखते हुए हर महत्वपूर्ण ट्रिब्यूनल फैसला भविष्य के मामलों में कानूनी बहस का हिस्सा बन सकता है।
यदि किसी मामले में ट्रिब्यूनल युद्ध के दौरान संपत्ति के नुकसान, कब्जे या निवेश सुरक्षा के बारे में कोई महत्वपूर्ण व्याख्या करता है, तो अन्य समान मामलों में दोनों पक्ष उस फैसले को अपने तर्क के समर्थन में इस्तेमाल कर सकते हैं।
इसी कारण ओश्चादबैंक विवाद का कानूनी महत्व उसके दावे की राशि से कहीं ज्यादा हो सकता है।
अब सबकी नजर तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल की कार्यवाही पर
इस मामले में तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल की सुनवाई आगे बढ़ेगी। दोनों पक्ष अपने-अपने कानूनी तर्क और साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे।
डीवाई चंद्रचूड़ रूस की ओर से नामित सदस्य के रूप में ट्रिब्यूनल का हिस्सा होंगे। अंतिम निर्णय पूरे ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया और उपलब्ध कानूनी सामग्री पर आधारित होगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि ओश्चादबैंक द्वारा मांगे गए कई सौ मिलियन डॉलर के नुकसान को ट्रिब्यूनल किस तरह देखता है और रूस अपने बचाव में कौन से कानूनी तर्क रखता है।
भारत से लेकर रूस-यूक्रेन तक, अंतरराष्ट्रीय कानून में बढ़ी भारतीय न्यायविदों की भूमिका
केयर्न और वोडाफोन जैसे भारत से जुड़े मामलों ने भारतीय नीति और अंतरराष्ट्रीय निवेश कानून के बीच संबंध को पहले ही व्यापक चर्चा का विषय बनाया था।
अब डीवाई चंद्रचूड़ का रूस-यूक्रेन से जुड़े निवेश विवाद में आर्बिट्रेटर के रूप में सामने आना भारतीय न्यायिक पृष्ठभूमि वाले विशेषज्ञों की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को एक और स्तर पर ले जाता है।
यह केवल किसी एक व्यक्ति की नियुक्ति की खबर नहीं है। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय निवेश, युद्ध, संपत्ति अधिकार, सरकारी कार्रवाई और विवाद समाधान की एक पूरी जटिल कानूनी दुनिया है।
ओश्चादबैंक मामले में आगे की सुनवाई और ट्रिब्यूनल के फैसले से यह स्पष्ट होगा कि इस विवाद में कानूनी रूप से किस पक्ष के दावे कितने मजबूत साबित होते हैं।

