Bangladesh में बिजली संकट से हाहाकार! रोज 10 घंटे तक कटौती, रात 8 बजे बाजार बंद; अब भारत से मांगा अतिरिक्त डीजल
Bangladesh के कई हिस्सों में रोजाना कई घंटे बिजली कटौती हो रही है। कुछ इलाकों में लोगों को 8 से 10 घंटे तक बिजली का इंतजार करना पड़ रहा है। राजधानी ढाका की स्थिति फिलहाल ग्रामीण इलाकों की तुलना में बेहतर बताई जा रही है, लेकिन ढाका के बाहर बिजली संकट का असर तेजी से बढ़ रहा है।
तेज गर्मी और हीटवेव के बीच लंबे समय तक बिजली गुल रहने से लोगों की परेशानी और बढ़ गई है। घरों में पंखे और कूलिंग उपकरण बंद रहने से आम लोगों को गर्मी से राहत नहीं मिल पा रही है। अस्पतालों, दुकानों और छोटे कारोबारों के सामने भी बिजली आपूर्ति की अनिश्चितता चुनौती बन रही है।
स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने बिजली की खपत कम करने के उद्देश्य से देशभर में शॉपिंग मॉल, बाजार और दुकानों को रात 8 बजे तक बंद करने का निर्देश दिया है। दूसरी तरफ बिजली उत्पादन में आई कमी को देखते हुए बांग्लादेश ने भारत से अतिरिक्त डीजल की आपूर्ति बढ़ाने का अनुरोध किया है।
बिजली संकट की मार सबसे ज्यादा ग्रामीण बांग्लादेश पर
बांग्लादेश में बिजली की उपलब्धता का संकट पूरे देश में समान नहीं है। राजधानी ढाका को फिलहाल उसकी जरूरत के मुताबिक बिजली मिलने की स्थिति बताई जा रही है, जबकि ग्रामीण और राजधानी से बाहर के क्षेत्रों में कटौती अधिक गंभीर है।
मयमनसिंह, बरिशाल, रंगपुर, सिलहट, राजशाही और खुलना जैसे क्षेत्रों में बिजली संकट का प्रभाव अधिक दिखाई दे रहा है।
कई इलाकों में रोजाना 3 से 5 घंटे तक बिजली कटौती की शिकायतें हैं, जबकि खुलना में कुछ लोगों ने 9 से 10 घंटे तक बिजली नहीं रहने की बात कही है।
गर्मी के मौसम में यह स्थिति लोगों के लिए और कठिन हो जाती है। बिजली जाने पर पंखे, कूलर और अन्य उपकरण बंद हो जाते हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और घरों में बुजुर्गों तथा बीमार लोगों के लिए परेशानी बढ़ जाती है।
बिजली उत्पादन में करीब 1,500 मेगावाट की कमी
मौजूदा संकट की बड़ी वजह ईंधन की कमी को बताया जा रहा है। विशेष रूप से प्राकृतिक गैस की उपलब्धता में कमी ने बिजली उत्पादन पर सीधा असर डाला है।
बांग्लादेश अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश अपने इस्तेमाल का 90 प्रतिशत से अधिक तेल और लगभग 30 प्रतिशत गैस दूसरे देशों से खरीदता है।
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।
वर्तमान संकट में बिजली उत्पादन लगभग 1,500 मेगावाट तक कम होने की बात सामने आई है।
LNG टर्मिनल में आग के बाद बढ़ी परेशानी
बिजली संकट की एक बड़ी वजह LNG यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में आई बाधा बताई जा रही है।
अमेरिकी कंपनी एक्सेलरेट एनर्जी के LNG टर्मिनल में 21 जुलाई को आग लगने की घटना के बाद टर्मिनल बंद हो गया था।
इस घटना का असर बांग्लादेश की गैस आपूर्ति पर पड़ा। इस सप्ताह की शुरुआत में टर्मिनल पर कुछ गतिविधियां दोबारा शुरू होने की बात सामने आई, लेकिन तब तक LNG की उपलब्धता पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी थी।
बिजली उत्पादन के लिए गैस पर निर्भरता के कारण LNG की कमी का असर बिजलीघरों तक पहुंचा।
समुद्र का खराब मौसम भी बना बड़ी बाधा
ईंधन संकट को और बढ़ाने वाला एक अन्य कारण समुद्र में खराब मौसम बताया जा रहा है।
कम से कम दो LNG जहाज खराब मौसम के कारण टर्मिनल तक नहीं पहुंच सके और अपना माल नहीं उतार पाए।
इस तरह गैस आपूर्ति में पहले से मौजूद दबाव और बढ़ गया।
ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के लिए LNG जहाजों के समय पर पहुंचना बेहद महत्वपूर्ण होता है। जहाजों के रुकने या देरी होने से बिजली उत्पादन की योजना प्रभावित हो सकती है।
दूसरे देशों से आने वाली बिजली की सप्लाई भी घटी
बांग्लादेश की समस्या सिर्फ घरेलू बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है।
दूसरे देशों से मिलने वाली बिजली की आपूर्ति में कमी की भी जानकारी सामने आई है। घरेलू उत्पादन घटने और आयातित बिजली में कमी के बीच बिजली की मांग और उपलब्धता का अंतर बढ़ गया।
यही अंतर कई क्षेत्रों में लंबी बिजली कटौती के रूप में दिखाई दे रहा है।
ढाका और ग्रामीण क्षेत्रों में क्यों अलग है स्थिति?
राजधानी ढाका को फिलहाल बिजली की आपूर्ति अपेक्षाकृत बेहतर मिल रही है। इसके विपरीत राजधानी से बाहर ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली कटौती अधिक गंभीर बताई गई है।
बांग्लादेश में छह वितरण कंपनियां बिजली आपूर्ति करती हैं। ढाका की वितरण व्यवस्था और ग्रामीण क्षेत्रों की व्यवस्था में अंतर होने के कारण संकट का असर भी अलग-अलग दिखाई देता है।
राजधानी के बाहर लगभग 80 बिजली सहकारी समितियां ग्रामीण क्षेत्रों में वितरण का काम संभालती हैं।
यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे पावर कट की शिकायतें अधिक सामने आ रही हैं।
मयमनसिंह से खुलना तक बिजली संकट
मयमनसिंह, बरिशाल, रंगपुर, सिलहट, राजशाही और खुलना जैसे क्षेत्रों में बिजली कटौती का असर अधिक बताया जा रहा है।
कई इलाकों में रोजाना कई घंटे बिजली गुल रहने से लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है।
खुलना में तो कुछ लोगों ने 9 से 10 घंटे तक बिजली कटौती की शिकायत की है।
इतनी लंबी कटौती का असर घरों से आगे बढ़कर व्यापार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।
बिजली कटौती से लोगों का गुस्सा भी बढ़ा
लंबे समय तक बिजली नहीं मिलने से कई इलाकों में लोगों में नाराजगी बढ़ने की खबरें सामने आई हैं।
कुछ जगहों पर नाराज लोगों द्वारा बिजली से जुड़ी सुविधाओं पर हमला करने, तोड़फोड़ और आगजनी जैसी घटनाओं की जानकारी भी सामने आई है।
स्थिति को देखते हुए बिजली विभाग ने सुरक्षा के लिए पुलिस की मदद मांगी है।
अगर बिजली संकट लंबे समय तक बना रहता है तो प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी अतिरिक्त चुनौती बन सकता है।
खेती पर भी पड़ रहा बिजली संकट का असर
बिजली की कमी का असर केवल शहरी घरों या दुकानों तक सीमित नहीं है।
कृषि क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा है। बिजली से चलने वाले पंप और दूसरी मशीनें बंद होने पर किसानों को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का सहारा लेना पड़ता है।
डीजल जनरेटर का इस्तेमाल करने पर लागत बढ़ जाती है।
पहले से लागत और बाजार संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे किसानों के लिए ईंधन पर अतिरिक्त खर्च उनकी परेशानी और बढ़ा सकता है।
झींगा किसानों के लिए बिजली कटौती और भी खतरनाक
बांग्लादेश का झींगा उद्योग बिजली संकट से विशेष रूप से प्रभावित हो सकता है।
झींगा पालन वाले तालाबों में पानी का ऑक्सीजन स्तर बनाए रखने के लिए मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। बिजली कटने पर ये मशीनें बंद हो सकती हैं।
अगर पानी में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरता है तो झींगों के मरने का खतरा बढ़ सकता है।
बांग्लादेश दुनिया के प्रमुख झींगा निर्यातकों में शामिल है, इसलिए बिजली संकट का असर केवल स्थानीय किसानों तक सीमित नहीं रह सकता।
गारमेंट उद्योग पर भी संकट की छाया
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में कपड़ा और गारमेंट उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका है।
कारखानों में मशीनें बिजली पर निर्भर हैं। बार-बार बिजली जाने से उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
अगर फैक्ट्रियों को जनरेटर चलाना पड़े तो उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
लंबी अवधि तक बिजली संकट रहने की स्थिति में उत्पादन, ऑर्डर और निर्यात से जुड़े दबाव बढ़ सकते हैं।
रेस्टोरेंट और छोटे कारोबार भी प्रभावित
रेस्टोरेंट, मेडिकल स्टोर, छोटी फैक्ट्रियां, दुकानदार और अन्य कारोबारी भी बिजली कटौती से प्रभावित हो रहे हैं।
रेफ्रिजरेशन, लाइटिंग, पानी की मोटर, कंप्यूटर सिस्टम और अन्य उपकरण बिजली पर निर्भर हैं।
लगातार बिजली कटने से कारोबारियों को वैकल्पिक बिजली व्यवस्था करनी पड़ सकती है।
जनरेटर चलाने का खर्च बढ़ने से छोटे कारोबारों की लागत पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
मेडिकल स्टोर तक मोमबत्ती की रोशनी में काम करने को मजबूर
बिजली संकट की गंभीरता का अंदाजा उन तस्वीरों और रिपोर्टों से लगाया जा सकता है जिनमें मेडिकल स्टोर और दुकानों में बिजली कटौती के दौरान मोमबत्ती या वैकल्पिक रोशनी का इस्तेमाल करते लोग दिखाई दे रहे हैं।
मेडिकल स्टोर जैसे जरूरी कारोबार में लंबे पावर कट की स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि कुछ दवाओं और मेडिकल उत्पादों के लिए उचित तापमान बनाए रखना आवश्यक होता है।
ऐसी स्थिति में बिजली आपूर्ति की निरंतरता महत्वपूर्ण हो जाती है।
सरकार ने रात 8 बजे बाजार बंद करने का फैसला क्यों लिया?
बिजली संकट के बीच सरकार का उद्देश्य बिजली की मांग को कम करना है।
इसी वजह से शॉपिंग मॉल, बाजार और दुकानों को रात 8 बजे तक बंद करने का निर्देश दिया गया है।
शाम के बाद व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में बड़ी मात्रा में बिजली खर्च होती है। इन्हें जल्दी बंद करने से पीक डिमांड को कम करने की कोशिश की जा सकती है।
हालांकि इसका सीधा असर कारोबारियों और ग्राहकों की गतिविधियों पर भी पड़ेगा।
बांग्लादेश में ऐसा कदम पहले भी उठाया जा चुका है
बिजली बचाने के लिए बांग्लादेश सरकार पहले भी बाजारों के समय को सीमित कर चुकी है।
कुछ महीने पहले अप्रैल में ऊर्जा संकट बढ़ने के दौरान दुकानों और शॉपिंग मॉल को शाम 6 बजे तक बंद करने का आदेश दिया गया था।
अब बिजली संकट के नए दौर में रात 8 बजे की समयसीमा लागू की गई है।
यह बताता है कि सरकार बिजली की मांग को नियंत्रित करने के लिए प्रशासनिक उपायों का सहारा ले रही है।
भारत से अतिरिक्त डीजल की मांग
बिजली उत्पादन और ईंधन आपूर्ति की समस्या के बीच बांग्लादेश ने भारत से अतिरिक्त डीजल की मांग की है।
बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन महमूद ने पिछले सप्ताह भारतीय हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात के दौरान डीजल आपूर्ति बढ़ाने का अनुरोध किया।
महमूद के अनुसार दोनों देशों के बीच डीजल आपूर्ति के लिए पाइपलाइन व्यवस्था मौजूद है।
अब बांग्लादेश चाहता है कि भारत इस माध्यम से डीजल की सप्लाई बढ़ाए।
इंडिया-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन से मिलती है डीजल सप्लाई
भारत और बांग्लादेश के बीच ऊर्जा सहयोग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इंडिया-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन है।
यह पाइपलाइन 2017 में शुरू हुई थी।
दोनों देशों के बीच 15 साल का समझौता है, जिसके तहत भारत को हर साल बांग्लादेश को 1.80 लाख मीट्रिक टन डीजल की आपूर्ति करनी है।
ऊर्जा संकट के मौजूदा दौर में यह पाइपलाइन बांग्लादेश के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत पहले ही भेज चुका है डीजल
पश्चिम एशिया में हालिया संकट के दौरान भारत ने मार्च और अप्रैल में बांग्लादेश को 30 हजार टन से अधिक डीजल भेजा था।
अब बांग्लादेश अतिरिक्त आपूर्ति चाहता है।
इससे दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग की भूमिका एक बार फिर सामने आई है।
भारत के लिए भी यह सहयोग पड़ोसी देश की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
बिजली संकट से बढ़ी महंगाई की चिंता
बिजली की कमी का असर अप्रत्यक्ष रूप से कीमतों पर भी पड़ सकता है।
जब उद्योगों को जनरेटर चलाने के लिए अधिक डीजल खर्च करना पड़ता है तो उत्पादन लागत बढ़ती है। किसान भी सिंचाई या अन्य कामों के लिए महंगा ईंधन इस्तेमाल करते हैं।
इन बढ़ी हुई लागतों का असर अंततः उत्पादों और सेवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
यदि बिजली संकट लंबा चलता है तो महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हीटवेव ने मुश्किल को और गंभीर बनाया
बांग्लादेश में बिजली संकट ऐसे समय में सामने आया है जब गर्मी और हीटवेव पहले से लोगों को परेशान कर रही है।
गर्मी के मौसम में बिजली की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है क्योंकि लोग पंखे, एयर कंडीशनर और कूलिंग उपकरणों का अधिक इस्तेमाल करते हैं।
लेकिन जब इसी समय बिजली की उपलब्धता घट जाए तो मांग और आपूर्ति का अंतर और बड़ा हो जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे पावर कट के कारण लोगों के पास वैकल्पिक साधन भी सीमित हो सकते हैं।
बिजली संकट और पानी की समस्या का भी संबंध
बिजली की कमी का असर पानी की आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
कई स्थानों पर पानी की मोटर और पंप बिजली से चलते हैं। लंबे पावर कट के दौरान घरेलू और व्यावसायिक जल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
गर्मी के मौसम में पानी की मांग पहले से अधिक होती है, इसलिए बिजली कटौती और जल आपूर्ति की समस्या एक-दूसरे को और गंभीर बना सकती हैं।
स्कूल और बच्चों की पढ़ाई पर असर
बिजली कटौती का असर छात्रों पर भी पड़ रहा है।
शाम और रात के समय पढ़ाई करने वाले बच्चों को पर्याप्त रोशनी और गर्मी से राहत नहीं मिल पाती।
ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट आधारित पढ़ाई या कंप्यूटर से जुड़े काम भी बिजली की कमी के कारण बाधित हो सकते हैं।
लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहती है तो शिक्षा पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
बिजली संकट ने सरकार के सामने बढ़ाई चुनौती
सरकार के सामने तत्काल चुनौती बिजली उत्पादन और मांग के बीच अंतर कम करने की है।
इसके लिए ईंधन आपूर्ति बढ़ाना, LNG व्यवस्था को सामान्य करना, बिजली आयात बढ़ाना और खपत नियंत्रित करना जैसे कई कदम एक साथ उठाने पड़ सकते हैं।
बाजार जल्दी बंद करने का निर्णय मांग घटाने की कोशिश है, जबकि भारत से अतिरिक्त डीजल मांगना ईंधन आपूर्ति को मजबूत करने की दिशा में कदम है।
क्या जल्दी सुधरेगी बिजली की स्थिति?
सरकार के सामने राहत का सबसे बड़ा रास्ता ईंधन आपूर्ति को सामान्य करना है।
यदि LNG की उपलब्धता बढ़ती है और बिजली उत्पादन करने वाले संयंत्रों को पर्याप्त गैस मिलती है तो उत्पादन में सुधार हो सकता है।
इसी तरह समुद्री मौसम सामान्य होने पर LNG जहाजों की आपूर्ति भी बेहतर हो सकती है।
लेकिन जब तक ये बाधाएं पूरी तरह दूर नहीं होतीं, तब तक बिजली कटौती का दबाव बना रहने की संभावना है।
ग्रामीण बांग्लादेश की सबसे बड़ी चिंता
राजधानी ढाका की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति इस संकट का सबसे संवेदनशील पहलू है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की सीमाएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे में अतिरिक्त उत्पादन की कमी का असर सबसे पहले और सबसे अधिक इन्हीं क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
कृषि, झींगा पालन, छोटे उद्योग और घरेलू जीवन—सभी बिजली की अनिश्चितता से प्रभावित हो रहे हैं।
भारत-बांग्लादेश ऊर्जा संबंधों की परीक्षा
मौजूदा संकट भारत और बांग्लादेश के ऊर्जा सहयोग के महत्व को भी सामने ला रहा है।
डीजल पाइपलाइन पहले से मौजूद है और दोनों देशों के बीच ऊर्जा आपूर्ति का समझौता भी है।
अब बांग्लादेश की अतिरिक्त मांग पर भारत की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
यदि अतिरिक्त डीजल उपलब्ध कराया जाता है तो इससे बांग्लादेश को तत्काल ईंधन संकट से कुछ राहत मिल सकती है।
क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा सवाल
बांग्लादेश की स्थिति यह भी दिखाती है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल बिजली उत्पादन की क्षमता पर निर्भर नहीं करती।
ईंधन आयात, LNG टर्मिनल, समुद्री परिवहन, अंतरराष्ट्रीय बाजार और पड़ोसी देशों से ऊर्जा सहयोग—इन सभी का असर किसी देश की बिजली व्यवस्था पर पड़ सकता है।
एक जगह की आग, खराब मौसम या आपूर्ति में देरी हजारों किलोमीटर दूर बिजलीघरों के उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।
अब नजर LNG सप्लाई और भारत की मदद पर
बांग्लादेश में फिलहाल दो मोर्चों पर नजर है।
पहला, LNG और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति कब सामान्य होती है और बिजली उत्पादन में कितनी तेजी से सुधार आता है।
दूसरा, भारत से अतिरिक्त डीजल की मांग पर क्या फैसला होता है।
अगर दोनों मोर्चों पर राहत मिलती है तो बिजली कटौती को कम करने में मदद मिल सकती है।
लेकिन तब तक सरकार को बिजली बचाने, बाजारों का समय सीमित करने और संकटग्रस्त इलाकों में आपूर्ति संतुलित करने जैसे कदम जारी रखने पड़ सकते हैं।
बांग्लादेश में बिजली संकट अब सिर्फ बत्ती गुल होने की समस्या नहीं
मौजूदा Bangladesh Power Crisis का असर घरों से निकलकर खेतों, दुकानों, कारखानों, गारमेंट उद्योग और झींगा पालन तक पहुंच गया है।
लंबी बिजली कटौती लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही है और ऊर्जा की कमी उत्पादन तथा कारोबार पर दबाव डाल रही है।
सरकार द्वारा बाजार रात 8 बजे बंद करने का फैसला बिजली की मांग कम करने का प्रयास है, जबकि भारत से अतिरिक्त डीजल की मांग तत्काल ईंधन जरूरत को पूरा करने की कोशिश है।
आने वाले दिनों में LNG आपूर्ति की स्थिति, बिजली उत्पादन और भारत से मिलने वाली अतिरिक्त ऊर्जा सहायता यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि बांग्लादेश इस बिजली संकट से कितनी जल्दी बाहर निकल पाता है।

