Kuril Islands पर पुतिन की दस्तक से जापान में खलबली! पहली बार विवादित इलाके पहुंचे रूसी राष्ट्रपति, कैवियार चखा; 80 साल पुराने विवाद में फिर बढ़ा तनाव
News-Desk
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पुतिन के इस दौरे पर जापान ने कड़ा विरोध जताया है। जापानी पक्ष का कहना है कि जिन द्वीपों पर रूसी राष्ट्रपति पहुंचे, वे जापान के क्षेत्र का हिस्सा हैं।
रूस इन द्वीपों को कुरील द्वीप समूह का हिस्सा मानता है, जबकि जापान इन्हें ‘नॉर्दर्न टेरिटरीज’ यानी उत्तरी क्षेत्र कहता है। दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र को लेकर विवाद द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों से चला आ रहा है।
करीब आठ दशक पुराने इस विवाद के बीच पुतिन का विवादित द्वीप पर पहुंचना केवल एक सामान्य प्रशासनिक या औद्योगिक दौरे के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसे रूस की ओर से अपने क्षेत्रीय दावे को दोहराने वाले महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
इतुरुप द्वीप पहुंचे पुतिन, फिश प्रोसेसिंग प्लांट का किया दौरा
रूसी राष्ट्रपति ने कुरील द्वीप समूह के इतुरुप द्वीप पर एक फिश प्रोसेसिंग प्लांट का दौरा किया।
क्रेमलिन द्वारा जारी वीडियो में पुतिन को प्लांट का निरीक्षण करते और वहां की गतिविधियों के बारे में जानकारी लेते हुए दिखाया गया है।
दौरे के दौरान उन्होंने कैवियार का स्वाद भी लिया। कैवियार स्टर्जन मछली के अंडों से तैयार किया जाने वाला महंगा खाद्य पदार्थ है और दुनिया के सबसे महंगे व्यंजनों में इसकी गिनती होती है।
रूसी राष्ट्रपति का इस तरह विवादित क्षेत्र में स्थानीय आर्थिक गतिविधि से जुड़े संस्थान का दौरा करना भी राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
जापान ने जताया कड़ा विरोध
पुतिन की यात्रा सामने आने के बाद जापान ने रूस के सामने अपना विरोध दर्ज कराया।
जापान लंबे समय से इन द्वीपों पर अपना संप्रभु दावा करता रहा है। जापानी सरकार इन्हें ‘नॉर्दर्न टेरिटरीज’ के नाम से संबोधित करती है।
टोक्यो का कहना है कि इन द्वीपों पर रूस का नियंत्रण उसके क्षेत्रीय दावे को खत्म नहीं करता।
दूसरी तरफ मॉस्को इन द्वीपों को रूस के कुरील द्वीप समूह का अभिन्न हिस्सा मानता है।
यही विरोधाभास दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे विवाद की सबसे बड़ी वजह है।
चार द्वीपों को लेकर है रूस और जापान का विवाद
विवाद मुख्य रूप से चार द्वीपों को लेकर है।
रूस इन्हें कुनाशिर, इतुरुप, शिकोतान और हाबोमाई के नाम से पहचानता है।
जापान में इनके नाम क्रमशः कुनाशिरी, एतोरोफू, शिकोतान और हाबोमाई के रूप में प्रचलित हैं।
भौगोलिक रूप से ये द्वीप प्रशांत महासागर के रणनीतिक क्षेत्र में स्थित हैं और रूस के सुदूर पूर्वी हिस्से तथा जापान के उत्तरी क्षेत्र के बीच महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
इनकी स्थिति ही इन्हें सैन्य और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।
1945 में सोवियत सेना ने किया था कब्जा
विवाद की जड़ द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों तक जाती है।
1945 में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। युद्ध समाप्त होने के बाद यहां रहने वाले करीब 17 हजार जापानी नागरिकों को क्षेत्र से हटाया गया।
इसके बाद सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया और वहां सैन्य ढांचे का विस्तार शुरू किया।
समय के साथ यहां हवाई अड्डे और नौसैनिक सुविधाएं विकसित की गईं।
प्रशांत महासागर में रणनीतिक लोकेशन सबसे बड़ी ताकत
कुरील द्वीप केवल जमीन के कुछ टुकड़े नहीं हैं। इनकी भौगोलिक स्थिति इन्हें सैन्य दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।
ये द्वीप प्रशांत महासागर और रूस के सुदूर पूर्व के समुद्री क्षेत्र के बीच महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान पर स्थित हैं।
रूस के लिए यहां सैन्य मौजूदगी का मतलब प्रशांत क्षेत्र में अपनी नौसैनिक और हवाई गतिविधियों को मजबूत करना है।
यही वजह है कि रूस ने इन द्वीपों पर सैन्य बुनियादी ढांचे को लगातार मजबूत किया है।
आज भी रूस की मजबूत सैन्य मौजूदगी
द्वीपों पर रूस की सैन्य मौजूदगी लंबे समय से बनी हुई है।
रूस यहां सैनिकों के साथ आधुनिक सैन्य उपकरण भी तैनात रखता है।
इन क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियों का विस्तार जापान के लिए चिंता का विषय रहा है।
टोक्यो लगातार यह दावा करता रहा है कि इन द्वीपों पर उसका ऐतिहासिक और कानूनी अधिकार है।
वहीं रूस अपने नियंत्रण को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित व्यवस्था का हिस्सा मानता है।
80 साल पुराना विवाद अब तक क्यों नहीं सुलझा?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया के अधिकांश देशों ने आपसी शांति समझौतों के जरिए युद्धकालीन विवादों को खत्म करने की कोशिश की।
रूस और जापान के संबंध भी समय के साथ सामान्य हुए, लेकिन कुरील द्वीप विवाद का समाधान नहीं हो सका।
यही कारण है कि दोनों देशों के बीच आज तक व्यापक शांति संधि का सवाल अधूरा रहा है।
क्षेत्रीय दावे पर दोनों पक्षों की अलग-अलग स्थिति ने समझौते की राह कठिन बना दी।
1956 में हुई थी विवाद सुलझाने की बड़ी कोशिश
1956 में सोवियत संघ और जापान के बीच राजनयिक संबंध बहाल हुए।
उस समय सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव के दौर में विवाद के समाधान की कोशिश की गई।
सोवियत संघ ने शांति समझौते के बाद शिकोतान और हाबोमाई द्वीप जापान को देने का प्रस्ताव रखा था।
लेकिन जापान केवल दो द्वीप स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुआ।
जापानी पक्ष चारों विवादित द्वीपों पर अपना दावा करता रहा।
इस वजह से बातचीत से अंतिम समाधान नहीं निकल सका।
सोवियत संघ टूट गया, लेकिन विवाद नहीं टूटा
1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया।
इसके बाद रूस और जापान के बीच भी कई दौर की बातचीत हुई। दोनों देशों ने विवाद सुलझाने की कोशिश की, लेकिन क्षेत्रीय दावे पर सहमति नहीं बन पाई।
कई बार लगा कि दोनों देश समझौते के करीब पहुंच सकते हैं, लेकिन राजनीतिक और रणनीतिक परिस्थितियां रास्ते में आती रहीं।
इस विवाद ने रूस-जापान संबंधों पर लंबे समय तक असर डाला।
2010 में मेदवेदेव पहुंचे थे विवादित द्वीप
रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव 2010 में विवादित कुरील द्वीपों का दौरा करने वाले पहले रूसी राष्ट्रपति बने थे।
अगस्त 2010 में उन्होंने इतुरुप द्वीप का भी दौरा किया।
उस समय भी जापान ने रूस के इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी।
मेदवेदेव की यात्रा के बाद रूस ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत करने के संकेत दिए थे।
अब पुतिन का दौरा उस सिलसिले की अगली महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
पुतिन का दौरा क्यों है खास?
मेदवेदेव के बाद पुतिन का विवादित क्षेत्र का दौरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस के मौजूदा राष्ट्रपति ने स्वयं वहां पहुंचकर स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का निरीक्षण किया है।
किसी विवादित क्षेत्र में राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं मानी जाती।
यह अक्सर संप्रभुता, प्रशासनिक नियंत्रण और राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रतीक भी बन जाती है।
पुतिन के दौरे से रूस ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि मॉस्को इन द्वीपों पर अपने नियंत्रण को लेकर किसी तरह की अस्पष्टता नहीं देखता।
यूक्रेन युद्ध के बाद और बिगड़े रूस-जापान संबंध
रूस और जापान के संबंधों में पहले से मौजूद मतभेद यूक्रेन युद्ध के बाद और बढ़ गए।
जापान ने रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों के साथ कई प्रतिबंधात्मक कदमों का समर्थन किया।
मॉस्को ने भी जापान को मित्रवत देशों की श्रेणी में नहीं रखा।
ऐसे माहौल में कुरील द्वीपों पर पुतिन की यात्रा का राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है।
रूस का संदेश: कुरील द्वीपों पर नियंत्रण कायम
पुतिन की यात्रा को रूस के दावे के स्पष्ट राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
द्वीप पर फिश प्रोसेसिंग प्लांट का दौरा करना इस बात को भी दर्शाता है कि रूस वहां केवल सैन्य मौजूदगी तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि आर्थिक और प्रशासनिक गतिविधियों को भी प्रदर्शित करना चाहता है।
मॉस्को के लिए यह अपने नियंत्रण को सामान्य और स्थायी रूप में प्रस्तुत करने का एक तरीका भी हो सकता है।
द्वीपों की आर्थिक अहमियत भी कम नहीं
कुरील द्वीपों की अहमियत केवल सैन्य दृष्टि से नहीं है।
इन क्षेत्रों के आसपास समुद्री संसाधन और मछलियों के बड़े भंडार पाए जाते हैं।
इसके अलावा यहां खनिज संसाधनों की मौजूदगी भी बताई जाती है।
मछली पकड़ने और समुद्री संसाधनों की वजह से यह क्षेत्र स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
यही कारण है कि विवाद में आर्थिक हित भी जुड़े हुए हैं।
करीब 20 हजार लोग रहते हैं इन चार द्वीपों पर
इन चार विवादित द्वीपों पर करीब 20 हजार लोगों के रहने की जानकारी दी जाती है।
इलाके में मौसम बेहद ठंडा रहता है और भौगोलिक परिस्थितियां भी चुनौतीपूर्ण हैं।
इसके बावजूद स्थानीय संसाधनों और रणनीतिक महत्व के कारण यहां बस्तियां और आर्थिक गतिविधियां बनी हुई हैं।
रूस इन द्वीपों को अपने सुदूर पूर्वी क्षेत्र के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में विकसित करने की कोशिश करता रहा है।
सोना-चांदी और समुद्री संसाधनों का आकर्षण
इन द्वीपों की आर्थिक संभावनाओं में खनिज संसाधनों और समुद्री संपदा का महत्वपूर्ण स्थान है।
मछली उद्योग पहले से ही स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा है।
फिश प्रोसेसिंग प्लांट का पुतिन द्वारा दौरा भी इसी आर्थिक गतिविधि को दर्शाता है।
समुद्र से मिलने वाले संसाधन रूस के लिए इस क्षेत्र को आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं।
जापान का दावा आज भी कायम
रूस के नियंत्रण और सैन्य मौजूदगी के बावजूद जापान ने अपने दावे को कभी छोड़ा नहीं है।
जापान इन चारों द्वीपों को अपनी ‘नॉर्दर्न टेरिटरीज’ के रूप में देखता है।
टोक्यो के लिए यह मामला केवल इतिहास का विषय नहीं है। यह उसकी क्षेत्रीय संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
इसलिए रूसी राष्ट्रपति का दौरा जापान के लिए संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन गया।
नाम लगभग समान, लेकिन दावे पूरी तरह अलग
कुरील विवाद की एक दिलचस्प बात यह है कि दोनों देशों में चारों द्वीपों के नाम लगभग समान सुनाई देते हैं।
रूस इन्हें कुनाशिर, इतुरुप, शिकोतान और हाबोमाई कहता है।
जापान में इनके नाम कुनाशिरी, एतोरोफू, शिकोतान और हाबोमाई हैं।
भाषा और उच्चारण में मामूली अंतर के बावजूद राजनीतिक दावा पूरी तरह अलग है।
यानी नामों में समानता है, लेकिन स्वामित्व पर दोनों देशों की स्थिति बिल्कुल विपरीत है।
शांति संधि का रास्ता फिर मुश्किल
रूस और जापान के बीच कुरील विवाद के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्ण शांति समझौते का मुद्दा लंबे समय से अटका रहा है।
कई दशकों में बातचीत के कई प्रयास हुए, लेकिन अंतिम समाधान नहीं निकला।
यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव और बढ़ने से भविष्य में समझौते की संभावना और जटिल हो गई है।
पुतिन की ताजा यात्रा के बाद भी तत्काल किसी समझौते की संभावना फिलहाल दूर दिखाई देती है।
पुतिन की यात्रा से जापान की चिंता क्यों बढ़ी?
जापान के लिए चिंता का सबसे बड़ा कारण यह है कि रूस अपने नियंत्रण को केवल सैन्य स्तर पर नहीं बल्कि प्रशासनिक और आर्थिक स्तर पर भी प्रदर्शित कर रहा है।
राष्ट्रपति का दौरा इस संदेश को और मजबूत करता है।
अगर रूस इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा और सैन्य क्षमता बढ़ाता रहता है, तो जापान की सुरक्षा रणनीति पर भी इसका असर पड़ सकता है।
खासकर जापान के उत्तरी क्षेत्र और रूस के सुदूर पूर्व के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियां टोक्यो के लिए महत्वपूर्ण हैं।
प्रशांत महासागर में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
कुरील द्वीप विवाद को व्यापक प्रशांत शक्ति संतुलन से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
रूस, जापान, अमेरिका और चीन सभी इस क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े हुए हैं।
रूस के पास प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण नौसैनिक क्षमता है, जबकि जापान अमेरिका का प्रमुख सुरक्षा सहयोगी है।
ऐसे में कुरील द्वीपों पर सैन्य मौजूदगी का सवाल केवल रूस-जापान संबंधों तक सीमित नहीं रहता।
पुतिन का दौरा एक रणनीतिक संदेश भी
राष्ट्रपति पुतिन का दौरा ऐसे समय हुआ है जब रूस और जापान के रिश्ते पहले ही तनावपूर्ण हैं।
इसलिए यात्रा को केवल स्थानीय आर्थिक परियोजना के निरीक्षण के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा।
यह रूस के लिए अपने क्षेत्रीय दावे, प्रशासनिक नियंत्रण और प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक मौजूदगी का संदेश देने का अवसर भी है।
जापान का विरोध बताता है कि टोक्यो इस संदेश को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
अब कुरील विवाद किस दिशा में जाएगा?
पुतिन की यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच कुरील द्वीप विवाद फिर से चर्चा में है।
रूस अपने नियंत्रण को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा है, जबकि जापान अपने दावे को दोहराता रहेगा।
दोनों देशों के बीच वर्तमान राजनीतिक संबंधों को देखते हुए तत्काल समझौते की संभावना कम दिखाई देती है।
लेकिन यह विवाद आने वाले वर्षों में भी रूस-जापान संबंधों और प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा।
जापान के लिए कुरील द्वीप सिर्फ इतिहास नहीं
टोक्यो की नजर में यह चार द्वीपों का विवाद केवल 1945 की घटनाओं की याद नहीं है।
यह राष्ट्रीय संप्रभुता, समुद्री सीमाओं, संसाधनों और सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
इसी वजह से जापानी सरकार रूसी नेताओं की इन क्षेत्रों की यात्राओं पर नियमित रूप से विरोध दर्ज कराती रही है।
पुतिन की ताजा यात्रा ने इसी पुराने विवाद को फिर राजनीतिक केंद्र में ला दिया है।
कुरील विवाद के बीच जापान में ‘डॉल्फिन’ तूफान की दस्तक
इसी बीच जापान एक अलग गंभीर चुनौती से भी जूझ रहा है। जापान की ओर करीब 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ‘डॉल्फिन’ तूफान बढ़ने की खबर है।
तूफान के खतरे को देखते हुए करीब 2.6 लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के आदेश दिए गए हैं।
प्राकृतिक आपदा की इस चुनौती के बीच जापान के लिए सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव है।
रिपोर्टों के मुताबिक, तूफान के प्रभाव से औद्योगिक गतिविधियां भी प्रभावित हुई हैं।
टोयोटा की 9 फैक्ट्रियों में काम रोकने की खबर
तूफान के चलते जापान की प्रमुख वाहन कंपनी टोयोटा ने नौ फैक्ट्रियों में काम रोकने का फैसला किया है।
तेज हवाओं और खराब मौसम के दौरान कर्मचारियों की सुरक्षा और सप्लाई चेन को ध्यान में रखते हुए औद्योगिक इकाइयों का संचालन रोकना कई बार जरूरी हो जाता है।
इससे जापान के सामने एक ही समय में भू-राजनीतिक और प्राकृतिक दोनों तरह की चुनौतियां दिखाई दे रही हैं।
कुरील विवाद और तूफान—जापान के लिए दो अलग चुनौतियां
एक तरफ रूस के साथ दशकों पुराना क्षेत्रीय विवाद फिर चर्चा में है, दूसरी ओर जापान को तेज तूफान के खतरे का सामना करना पड़ रहा है।
कुरील द्वीपों का मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा है, जबकि डॉल्फिन तूफान का असर नागरिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
दोनों घटनाएं अलग हैं, लेकिन एक ही समय पर सामने आने से जापान के लिए परिस्थितियां और चुनौतीपूर्ण हो गई हैं।
अब नजर रूस-जापान के अगले कदम पर
पुतिन की यात्रा के बाद जापान के विरोध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कुरील द्वीप विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है।
रूस अपने नियंत्रण और दावे को लगातार प्रदर्शित कर रहा है, जबकि जापान अपने क्षेत्रीय अधिकार की बात दोहरा रहा है।
80 साल पुराने इस विवाद का कोई आसान समाधान नहीं है। चार द्वीपों की रणनीतिक स्थिति, समुद्री संसाधन, सैन्य महत्व और दोनों देशों की ऐतिहासिक व्याख्याएं इसे और जटिल बनाती हैं।
पुतिन का दौरा इसलिए महज एक राष्ट्रपति यात्रा नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय विवाद में रूस की स्थिति को फिर से जोरदार तरीके से सामने रखने वाला कदम माना जा रहा है।

