Strait of Hormuz पर किसका राज? 148 जहाजों का रास्ता गायब, ईरानी रूट से बढ़ी आवाजाही; ट्रम्प की धमकी के बीच अमेरिका-ईरान में समुद्री दबदबे की जंग
News-Desk
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1 से 19 अगस्त के बीच होर्मुज स्ट्रेट से कुल 236 जहाज गुजरे। लेकिन इनमें से 148 जहाजों की वास्तविक आवाजाही का रास्ता स्पष्ट रूप से पता नहीं चल सका। यानी बड़ी संख्या में जहाजों ने अपनी गतिविधि को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं रखा या उनकी ट्रैकिंग उपलब्ध आंकड़ों से स्पष्ट नहीं हो सकी।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन जहाजों का रास्ता स्पष्ट रूप से पहचाना जा सका, उनमें ईरानी समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करने वाले जहाजों की संख्या ओमानी रूट से गुजरने वाले जहाजों की तुलना में काफी ज्यादा रही।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी प्रभाव और समुद्री यातायात को लेकर सख्त रुख दिखा रहे हैं, जबकि ईरान का दावा है कि उसकी अनुमति के बिना इस क्षेत्र से जहाजों की आवाजाही संभव नहीं है।
होर्मुज स्ट्रेट में चल रही है दो दावों की टक्कर
अमेरिका और ईरान दोनों इस समुद्री मार्ग को लेकर अलग-अलग दावे कर रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संकेत दिया है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर अमेरिकी सैन्य प्रभाव मौजूद है और अमेरिका इस इलाके की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने की कोशिश कर सकता है।
दूसरी ओर ईरान का रुख बिल्कुल अलग है। तेहरान का कहना है कि उसकी मंजूरी के बिना कोई जहाज होर्मुज से नहीं गुजर सकता।
यही विरोधाभास इस पूरे संकट को बेहद संवेदनशील बनाता है।
एक तरफ अमेरिकी सैन्य शक्ति और नौसैनिक मौजूदगी है, दूसरी तरफ ईरान का भौगोलिक लाभ और स्ट्रेट के उत्तरी हिस्से पर उसका नियंत्रण है।
236 जहाजों की आवाजाही ने बढ़ाया रहस्य
1 से 19 अगस्त के बीच 236 जहाजों के होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की जानकारी सामने आई है।
इन जहाजों में तेल और गैस ले जाने वाले टैंकरों के अलावा सूखा माल और रसायन ढोने वाले जहाज भी शामिल थे।
उपलब्ध ट्रैकिंग आंकड़ों के अनुसार:
- 83 जहाज ईरानी रूट से गुजरे
- 3 जहाज ओमानी रूट से गुजरे
- 2 जहाज पुराने समुद्री रास्ते से गए
- 148 जहाजों का वास्तविक रास्ता स्पष्ट नहीं हो सका
यानी 236 में से 148 जहाजों को लेकर यह साफ तौर पर निर्धारित नहीं किया जा सका कि उन्होंने किस रूट का इस्तेमाल किया।
यह संख्या कुल आवाजाही का बड़ा हिस्सा है और इसी वजह से होर्मुज में वास्तविक समुद्री गतिविधियों की तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पा रही है।
तेल और गैस वाले जहाजों में तस्वीर और ज्यादा चौंकाने वाली
यदि केवल तेल, LPG और LNG जैसे ऊर्जा उत्पाद ले जाने वाले जहाजों को देखें तो तस्वीर और ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।
1 से 19 अगस्त के बीच ऐसे 112 जहाज होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे।
इनमें से:
- 21 जहाज खुले तौर पर ईरानी रूट से गए।
- केवल 2 जहाज ओमानी रूट से गुजरे।
- 89 जहाजों का रास्ता स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं हो सका।
यानी ऊर्जा से जुड़े जहाजों के मामले में भी बड़ी संख्या ऐसी रही जिनकी वास्तविक समुद्री राह उपलब्ध ट्रैकिंग से साफ नहीं हुई।
यह स्थिति बताती है कि तनावपूर्ण माहौल में जहाज कंपनियां अपनी आवाजाही को लेकर बेहद सावधानी बरत रही हैं।
AIS बंद करने से गायब हो जाती है जहाज की डिजिटल पहचान
समुद्री जहाजों में आमतौर पर Automatic Identification System यानी AIS का इस्तेमाल किया जाता है।
यह प्रणाली जहाज की पहचान, उसकी स्थिति, दिशा और गति जैसी जानकारी उपलब्ध करा सकती है।
लेकिन किसी जहाज का AIS ट्रांसपोंडर बंद कर दिया जाए तो उसकी सार्वजनिक ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है।
युद्ध या सैन्य तनाव की स्थिति में कुछ जहाज ऐसा कर सकते हैं ताकि उनकी वास्तविक स्थिति या यात्रा मार्ग आसानी से सार्वजनिक न हो।
हालांकि, AIS बंद करने का एक गंभीर दूसरा पहलू भी है—इससे समुद्री सुरक्षा प्रभावित हो सकती है और दूसरे जहाजों के लिए उस जहाज की स्थिति का पता लगाना मुश्किल हो सकता है।
जहाज अपना रास्ता क्यों छिपा रहे हैं?
होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ने के साथ समुद्री परिवहन कंपनियों के सामने बड़ा जोखिम खड़ा हो गया है।
यदि कोई जहाज अमेरिकी समर्थित रूट से जाता है तो ईरान की प्रतिक्रिया का डर हो सकता है। वहीं यदि कोई जहाज ईरान के करीब वाले समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करता है तो अमेरिकी कार्रवाई या निगरानी का जोखिम पैदा हो सकता है।
ऐसे माहौल में कुछ कंपनियां अपने जहाजों की वास्तविक गतिविधि सार्वजनिक रूप से कम दिखाने की कोशिश कर सकती हैं।
ब्रिटेन के थिंक टैंक चैथम हाउस के एसोसिएट फेलो नील क्विलियम ने भी इसी तरह की स्थिति की ओर संकेत किया है।
उनके मुताबिक ट्रांसपोंडर बंद करने से जहाज की गतिविधि कम दिखाई देती है, लेकिन इससे समुद्री सुरक्षा का खतरा भी बढ़ सकता है।
व्यापार बंद नहीं करना चाहते जहाज मालिक
तनाव चाहे कितना भी बढ़ जाए, दुनिया का ऊर्जा कारोबार पूरी तरह रुक जाना आसान नहीं है।
खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला तेल और गैस दुनिया के कई देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
ऐसे में शिपिंग कंपनियों के सामने एक कठिन गणित है—एक तरफ सुरक्षा का खतरा और दूसरी तरफ अरबों डॉलर का व्यापार।
कुछ कंपनियां जोखिम उठाकर अपना कारोबार जारी रखना चाहती हैं, क्योंकि उनके लिए पूरी तरह जहाज रोक देना भी आर्थिक रूप से भारी नुकसान का कारण बन सकता है।
यही वजह है कि होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री गतिविधियां तनाव के बावजूद पूरी तरह बंद नहीं हुई हैं।
ईरानी रूट और ओमानी रूट में क्या अंतर है?
तनाव बढ़ने से पहले होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही के लिए निर्धारित समुद्री मार्गों का इस्तेमाल होता था।
लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसे मोटे तौर पर दो प्रमुख रास्तों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
ईरानी रूट: यह स्ट्रेट के उत्तरी हिस्से में ईरानी तट के करीब से गुजरता है। यह लारक और किश्म जैसे द्वीपों के आसपास के क्षेत्र से जुड़ा है और ईरानी तट तथा संबंधित बंदरगाहों के करीब है।
ओमानी रूट: यह स्ट्रेट के दक्षिणी हिस्से में ओमान की ओर है और ईरानी तट से अपेक्षाकृत दूर है। अमेरिकी प्रभाव वाले समुद्री यातायात के लिए इस रास्ते को प्राथमिकता देने की बात सामने आई है।
यही भौगोलिक अंतर आज रणनीतिक विवाद का हिस्सा बन गया है।
ईरानी रूट का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं जहाज?
उपलब्ध आंकड़ों में खुले तौर पर पहचाने गए जहाजों में ईरानी रूट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या अधिक दिखाई देती है।
इसका एक कारण यह हो सकता है कि कुछ जहाज अपने गंतव्य और व्यापारिक समझौतों के कारण ईरान के करीब वाले समुद्री मार्ग को अधिक व्यावहारिक मानते हों।
दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि जहाज कंपनियां ईरानी अधिकारियों के साथ किसी तरह के परिचालन समन्वय के आधार पर यात्रा कर रही हों।
लेकिन 148 जहाजों की अस्पष्ट ट्रैकिंग के कारण पूरे समुद्री यातायात का सटीक अनुपात निर्धारित करना मुश्किल है।
ओमान का रूट क्यों महत्वपूर्ण है?
ओमान होर्मुज स्ट्रेट के दक्षिणी हिस्से में स्थित है।
अमेरिका के लिए ओमानी समुद्री मार्ग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ईरानी तट से अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखता है।
अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा में चलने वाले कुछ वाणिज्यिक जहाजों के इसी दिशा में जाने की बात सामने आई है।
लेकिन उपलब्ध आंकड़ों में 1 से 19 अगस्त के बीच केवल 3 जहाजों का रास्ता स्पष्ट रूप से ओमानी रूट से जुड़ा दिखाई देता है।
इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि जमीन पर और समुद्र में घोषित अमेरिकी रणनीति वास्तव में व्यापारिक जहाजों के व्यवहार को कितना प्रभावित कर रही है।
ट्रम्प की ओमान को चेतावनी भी चर्चा में
होर्मुज संकट के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से ओमान को लेकर धमकी की बात भी सामने आई है।
ओमान अमेरिका का सहयोगी देश है और होर्मुज स्ट्रेट के दूसरी ओर ईरान के सामने स्थित है।
स्ट्रेट का समुद्री क्षेत्र ईरान और ओमान दोनों के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है।
रिपोर्टों के मुताबिक ट्रम्प की चेतावनी का उद्देश्य मस्कट को तेहरान के साथ होर्मुज स्ट्रेट के संयुक्त संचालन से जुड़े किसी समझौते से पीछे रखने का दबाव बनाना बताया जा रहा है।
अगर ऐसा कोई समझौता आगे बढ़ता है तो अमेरिका के लिए यह रणनीतिक चुनौती हो सकती है।
युद्ध से पहले होर्मुज का महत्व क्या था?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है।
युद्ध और मौजूदा संकट से पहले दुनिया की बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और LNG की आवाजाही इसी संकरे समुद्री मार्ग से होती थी।
रिपोर्ट के मुताबिक पहले प्रतिदिन लगभग 130 जहाज इस क्षेत्र से गुजरते थे।
इसके मुकाबले 1 से 19 अगस्त के 19 दिनों में केवल 236 जहाजों के गुजरने का आंकड़ा सामने आया है।
इससे यह संकेत मिलता है कि मौजूदा तनाव ने सामान्य समुद्री आवाजाही को काफी प्रभावित किया है।
दुनिया के तेल बाजार की धड़कन क्यों है होर्मुज?
होर्मुज स्ट्रेट की भौगोलिक स्थिति इसे असाधारण रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।
फारस की खाड़ी से निकलने वाले कई बड़े तेल उत्पादक देशों की समुद्री ऊर्जा आपूर्ति इसी मार्ग पर निर्भर करती है।
सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देशों के लिए यह समुद्री रास्ता वैश्विक बाजार तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम है।
अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित होता है तो केवल खाड़ी के देशों पर नहीं बल्कि एशिया, यूरोप और दुनिया के ऊर्जा बाजारों पर असर पड़ सकता है।
तेल की कीमतों पर सीधा असर
होर्मुज में तनाव बढ़ने के साथ अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला।
संघर्ष शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 66 डॉलर प्रति बैरल बताई गई थी।
इसके बाद मार्च में कीमत लगभग 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
बाद में इसमें गिरावट आई, लेकिन क्षेत्रीय तनाव दोबारा बढ़ने पर कीमतों में फिर तेजी देखने को मिली।
गुरुवार सुबह ब्रेंट क्रूड करीब 92.9 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
इस तरह समुद्री सुरक्षा का सवाल सीधे पेट्रोल, डीजल, गैस और परिवहन लागत से जुड़ जाता है।
अगर होर्मुज में तनाव बढ़ा तो दुनिया पर क्या असर होगा?
यदि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही और ज्यादा बाधित होती है तो सबसे पहले ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा।
तेल और गैस की उपलब्धता कम होने की आशंका से अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आ सकती है।
महंगा तेल परिवहन लागत बढ़ा सकता है। इसका असर उद्योग, विमानन, शिपिंग और रोजमर्रा की वस्तुओं तक पहुंच सकता है।
एशियाई अर्थव्यवस्थाएं विशेष रूप से संवेदनशील हो सकती हैं क्योंकि खाड़ी क्षेत्र से बड़ी मात्रा में ऊर्जा एशिया की ओर जाती है।
क्या ईरान वास्तव में होर्मुज बंद कर सकता है?
ईरान लंबे समय से यह संकेत देता रहा है कि जरूरत पड़ने पर वह होर्मुज स्ट्रेट को बाधित कर सकता है।
लेकिन पूर्ण रूप से समुद्री मार्ग बंद करना ईरान के लिए भी बेहद बड़ा फैसला होगा।
इसका असर केवल अमेरिका या उसके सहयोगियों पर नहीं पड़ेगा। खाड़ी के कई ऐसे देश भी प्रभावित होंगे जिनके साथ ईरान के आर्थिक और राजनीतिक संबंध हैं।
इसके अलावा वैश्विक तेल बाजार में कीमतों का उछाल भी ईरान के लिए आर्थिक और राजनीतिक दबाव पैदा कर सकता है।
इसलिए ‘होर्मुज बंद करना’ केवल सैन्य शक्ति का सवाल नहीं बल्कि बेहद जटिल रणनीतिक फैसला है।
ईरान के लिए जहाजों पर नियंत्रण क्यों महत्वपूर्ण है?
यदि ईरान यह साबित कर सके कि उसके प्रभाव वाले समुद्री मार्ग से बड़ी संख्या में वाणिज्यिक जहाज गुजर रहे हैं, तो इससे तेहरान को रणनीतिक लाभ मिल सकता है।
वह अमेरिका के सामने यह संदेश दे सकता है कि सैन्य धमकियों के बावजूद समुद्री व्यापार पूरी तरह अमेरिकी नियंत्रण में नहीं है।
इसके विपरीत यदि अमेरिकी समर्थित रूट पर जहाजों की संख्या लगातार बढ़ती है तो यह अमेरिकी दबदबे का संकेत माना जा सकता है।
यानी जहाजों का रूट इस समय सिर्फ व्यापारिक फैसला नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी बन गया है।
148 जहाजों का ‘अस्पष्ट’ रास्ता सबसे बड़ा सवाल
पूरे आंकड़े में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली संख्या 148 है।
236 जहाजों में से 148 की यात्रा का मार्ग साफ तौर पर निर्धारित नहीं हो सका।
इसका मतलब यह नहीं कि ये सभी जहाज निश्चित रूप से ईरानी रास्ते से गए या उन्होंने अमेरिकी रास्ता छोड़ा।
लेकिन इतना जरूर है कि उपलब्ध सार्वजनिक ट्रैकिंग के आधार पर होर्मुज की वास्तविक समुद्री गतिविधियों की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ रही है।
यही अस्पष्टता इस समय समुद्री विश्लेषकों के लिए सबसे बड़ा सवाल है।
समुद्र में सामान का ट्रांसफर भी बन रहा है रणनीति
होर्मुज संकट में केवल जहाजों के रास्ते ही नहीं बदले हैं, बल्कि कुछ मामलों में समुद्र के भीतर एक जहाज से दूसरे जहाज में माल ट्रांसफर किए जाने की बात भी सामने आई है।
ऊर्जा विशेषज्ञ मार्क अयूब के मुताबिक, सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देशों से आने वाली कुछ खेपों के लिए ओमानी रूट का इस्तेमाल किया गया।
कुछ मामलों में जहाजों की ट्रैकिंग बंद रखकर समुद्र में माल दूसरे जहाज को सौंपने की बात भी सामने आई है।
ऐसी प्रक्रिया को सामान्य समुद्री व्यापार की तुलना में अधिक जोखिमपूर्ण माना जाता है और इसके लिए सुरक्षा तथा नियामकीय चुनौतियां भी होती हैं।
प्रतिबंधों से बचने की कोशिश भी एक कारण
कुछ ईरानी जहाजों के ओमानी रूट का इस्तेमाल करने की बात भी सामने आई है।
यदि ऐसा हो रहा है तो इसके पीछे अमेरिकी प्रतिबंधों और निगरानी से बचने की रणनीति हो सकती है।
इससे पता चलता है कि समुद्री मार्गों का चुनाव केवल भौगोलिक दूरी के आधार पर नहीं हो रहा।
व्यापारिक हित, प्रतिबंध, सैन्य सुरक्षा और राजनीतिक दबाव सभी एक साथ काम कर रहे हैं।
क्या आंकड़े ईरान के दबदबे का संकेत देते हैं?
इस सवाल का सीधा जवाब देना फिलहाल मुश्किल है।
क्योंकि 148 जहाजों की वास्तविक राह स्पष्ट नहीं है।
फिर भी उपलब्ध आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर है—जिन जहाजों की राह स्पष्ट रूप से पहचानी गई, उनमें ईरानी रूट का इस्तेमाल करने वाले जहाज ओमानी रूट से गुजरने वाले जहाजों से कहीं अधिक हैं।
सभी प्रकार के जहाजों में 83 का ईरानी रूट और केवल 3 का ओमानी रूट से जुड़ा होना इस अंतर को दिखाता है।
लेकिन इसे सीधे यह प्रमाण नहीं माना जा सकता कि ईरान का पूरे होर्मुज पर सैन्य नियंत्रण है।
अमेरिका का सैन्य दबदबा भी वास्तविक है
दूसरी ओर अमेरिका की नौसैनिक शक्ति को नजरअंदाज करना भी संभव नहीं है।
अमेरिका के पास क्षेत्र में मजबूत सैन्य और नौसैनिक क्षमता है। अमेरिकी नौसेना लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र में सक्रिय रही है।
वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षा उपलब्ध कराने की उसकी क्षमता भी महत्वपूर्ण है।
इसलिए होर्मुज को ‘पूरी तरह ईरान के नियंत्रण में’ या ‘पूरी तरह अमेरिका के नियंत्रण में’ बताना दोनों ही स्थितियों को अत्यधिक सरल बना देगा।
वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है।
होर्मुज में असली लड़ाई नियंत्रण से ज्यादा प्रभाव की है
इस समय सबसे सही तस्वीर यह है कि अमेरिका और ईरान दोनों अपने-अपने तरीके से समुद्री यातायात पर प्रभाव स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।
ईरान को भौगोलिक लाभ हासिल है क्योंकि उसका तट स्ट्रेट के उत्तरी हिस्से के साथ लगा है।
अमेरिका के पास अत्याधुनिक नौसैनिक शक्ति और क्षेत्रीय सहयोगियों का नेटवर्क है।
वाणिज्यिक जहाज इन दोनों शक्तियों के बीच जोखिम और लाभ का हिसाब लगाकर अपनी यात्रा तय कर रहे हैं।
जहाज कंपनियां किसके साथ जाएंगी?
जहाज मालिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल है—सुरक्षा किस रूट पर ज्यादा है?
यदि ईरानी रूट छोटा या परिचालन की दृष्टि से सुविधाजनक है लेकिन अमेरिकी कार्रवाई का जोखिम अधिक है, तो कंपनी को बड़ा फैसला लेना होगा।
यदि ओमानी रूट अपेक्षाकृत सुरक्षित है लेकिन वहां सैन्य निगरानी ज्यादा है, तब भी कंपनी को जोखिम का आकलन करना होगा।
यही कारण है कि जहाजों की वास्तविक गतिविधि आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण संकेत बन सकती है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था की नजर अब होर्मुज पर
होर्मुज की स्थिति अब केवल मध्य पूर्व की क्षेत्रीय खबर नहीं रह गई है।
तेल की कीमतें बढ़ीं तो उसका असर भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।
ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे महंगाई पर दबाव बन सकता है।
एयरलाइंस, ट्रकिंग कंपनियां, समुद्री परिवहन और ऊर्जा-निर्भर उद्योग सभी प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए दुनिया के बड़े बाजारों की नजर होर्मुज से गुजरने वाले हर बड़े तेल और गैस टैंकर पर बनी हुई है।
भारत के लिए भी होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण
भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है और खाड़ी क्षेत्र उसके लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत है।
इसलिए होर्मुज स्ट्रेट में लंबे समय तक किसी भी तरह की गंभीर बाधा भारत के लिए भी चिंता का विषय बन सकती है।
तेल और गैस की कीमतों में तेजी का असर आयात बिल, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और व्यापक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
हालांकि किसी भी प्रभाव की वास्तविक गंभीरता इस बात पर निर्भर करेगी कि समुद्री आवाजाही कितने समय तक प्रभावित होती है और वैकल्पिक आपूर्ति कितनी उपलब्ध रहती है।
क्या होर्मुज फिर से सामान्य होगा?
इसका जवाब सीधे तौर पर देना फिलहाल संभव नहीं है।
यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होता है और समुद्री सुरक्षा को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनती है तो जहाजों की आवाजाही सामान्य हो सकती है।
लेकिन यदि सैन्य तनाव बढ़ता है तो अधिक जहाज AIS बंद कर सकते हैं, वैकल्पिक मार्ग तलाश सकते हैं या अपनी यात्राएं टाल सकते हैं।
ऐसे में तेल और गैस बाजार पर दबाव और बढ़ सकता है।
अभी सबसे बड़ा सवाल यही—कंट्रोल किसका?
होर्मुज स्ट्रेट की मौजूदा तस्वीर को देखें तो न तो अमेरिका का दावा पूरी तरह साबित होता है कि वह समुद्री यातायात पर पूर्ण नियंत्रण रखता है और न ही ईरान का यह दावा कि उसकी अनुमति के बिना कोई जहाज गुजर ही नहीं सकता।
236 जहाजों में से 148 की स्पष्ट ट्रैकिंग नहीं हो पाना बताता है कि समुद्र में वास्तविक गतिविधियां सार्वजनिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा जटिल हैं।
ईरानी रूट का खुलकर इस्तेमाल करने वाले जहाजों की संख्या अमेरिकी दबाव के बावजूद तेहरान के प्रभाव की ओर संकेत जरूर करती है।
लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि अस्पष्ट ट्रैकिंग वाले 148 जहाजों की वास्तविक राह अज्ञात है।
इसलिए फिलहाल होर्मुज को किसी एक देश के पूर्ण नियंत्रण वाला समुद्री मार्ग बताना जल्दबाजी होगी।
आने वाले दिनों में जहाजों की दिशा बताएगी शक्ति संतुलन
होर्मुज स्ट्रेट में अब जहाजों की आवाजाही खुद एक रणनीतिक संकेत बन गई है।
कितने जहाज ईरानी रूट चुनते हैं, कितने ओमानी रूट से जाते हैं, कितने AIS बंद करते हैं और कितने अपनी यात्रा रोकते हैं—इन सभी आंकड़ों से यह समझने में मदद मिलेगी कि अमेरिका और ईरान में से किसका प्रभाव जमीन पर नहीं बल्कि समुद्र में ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।
फिलहाल तस्वीर इतनी जरूर साफ है कि होर्मुज पर नियंत्रण की जंग केवल युद्धपोतों की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों वाणिज्यिक जहाजों की भी है जो हर दिन दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाते हैं।

