Iran की करेंसी रियाल फिर धड़ाम, 1 डॉलर के लिए 25 लाख रियाल; 7 महीने में करीब 50% गिरावट, महंगाई से आम लोग बेहाल
News-Desk
13 min read
Abbas Araghchi, Donald Trump, Hormuz Strait, Inflation, international news, iran, Iran Currency, Iran Economy, Iran news, Iranian Rial, US sanctions, US-Iran War, World NewsIran की अर्थव्यवस्था पर युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव अब उसकी करेंसी पर भी साफ दिखाई दे रहा है। मंगलवार को ईरान की करेंसी रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई। बाजार में 1 अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए करीब 25 लाख रियाल चुकाने पड़ रहे हैं।
जंग शुरू होने से ठीक पहले, 27 फरवरी को करीब 17 लाख रियाल में 1 डॉलर मिल रहा था। यानी लगभग सात महीने के भीतर बाजार दर पर रियाल की कीमत में करीब 50% की गिरावट दर्ज हुई है।
ईरान के केंद्रीय बैंक की आधिकारिक विनिमय दर इससे अलग है। आधिकारिक दर करीब 16.5 लाख रियाल प्रति डॉलर बताई जा रही है, लेकिन आम लोगों और कारोबारियों के लिए वास्तविक बाजार दर ज्यादा मायने रखती है। यही वजह है कि डॉलर की ऊंची कीमत का सीधा असर ईरान में रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है।
रियाल क्यों लगातार कमजोर हो रहा है?
ईरानी करेंसी के कमजोर होने के पीछे एक साथ कई आर्थिक और भू-राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा दबाव अमेरिका-ईरान युद्ध, अमेरिकी प्रतिबंध और ईरानी तेल पर अमेरिकी कार्रवाई का है।
ईरान की अर्थव्यवस्था में तेल निर्यात से होने वाली विदेशी मुद्रा आय बेहद महत्वपूर्ण है। जब तेल बेचकर डॉलर की आमद घटती है और दूसरी तरफ देश को आयात के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा की जरूरत होती है, तो स्थानीय करेंसी पर दबाव बढ़ता है।
मौजूदा हालात में अमेरिका ईरान की तेल आय और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क तक उसकी पहुंच को सीमित करने की कोशिश कर रहा है। इसका असर डॉलर की उपलब्धता और ईरान की विदेशी कमाई पर पड़ रहा है।
अमेरिका ईरान की कमाई के तीन बड़े रास्तों पर दबाव बना रहा
ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक दबाव को मुख्य रूप से तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। पहला तेल की कमाई को प्रभावित करना, दूसरा तेल से मिले पैसे को ईरान तक पहुंचने में मुश्किल पैदा करना और तीसरा ईरान से जुड़े विदेशी बैंकों तथा कंपनियों पर कार्रवाई करना।
1. ईरान की तेल कमाई पर सीधा दबाव
ईरान की विदेशी मुद्रा आय का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात से आता है। इसलिए अमेरिका लंबे समय से ईरानी तेल की बिक्री को प्रभावित करने के लिए प्रतिबंधों का इस्तेमाल करता रहा है।
अमेरिकी कार्रवाई में ईरानी तेल खरीदने वाली कंपनियां, टैंकर और शिपिंग नेटवर्क भी शामिल हैं। ईरान के तेल का बड़ा हिस्सा चीन जाता है। अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार चीन ईरान के करीब 90% तेल निर्यात का खरीदार है।
इसी वजह से अमेरिकी प्रतिबंधों का एक हिस्सा उन चीनी रिफाइनरियों और कारोबारियों पर भी केंद्रित रहा है जो ईरानी तेल खरीदते हैं।
तेल की बिक्री में मुश्किल का सीधा असर ईरान की विदेशी मुद्रा आय पर पड़ता है। जब देश में डॉलर की उपलब्धता कम होती है तो स्थानीय मुद्रा पर दबाव बढ़ता है और डॉलर की कीमत तेजी से ऊपर जाती है।
2. तेल बेचने के बाद पैसा ईरान तक पहुंचाना भी मुश्किल
सिर्फ ईरानी तेल की बिक्री को निशाना बनाना पर्याप्त नहीं है। तेल बिकने के बाद उससे हासिल रकम ईरान तक पहुंचे, यह भी जरूरी है।
इसीलिए अमेरिकी प्रतिबंधों का एक और हिस्सा ईरानी बैंकों, करेंसी एक्सचेंज और उन वित्तीय नेटवर्क को निशाना बनाता है जिनके जरिए प्रतिबंधों से बचते हुए ईरानी धन को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में घुमाने की कोशिश की जाती है।
इन नेटवर्क को अक्सर ‘शैडो बैंकिंग’ नेटवर्क कहा जाता है। इनमें अलग-अलग देशों की कंपनियों, बैंकों, बिचौलियों और वित्तीय संस्थाओं के जरिए पैसा एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता है।
अमेरिका ने अगस्त में भी ऐसे नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की थी। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार इन नेटवर्क पर ईरान के लिए बड़ी रकम को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के जरिए इधर-उधर करने में मदद करने का आरोप था।
3. अमेरिकी दबाव ईरान की सीमा पर नहीं रुकता
अमेरिकी प्रतिबंधों की एक खासियत यह भी है कि उनका असर सिर्फ ईरानी कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। यदि कोई विदेशी बैंक या कंपनी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले ईरानी कारोबार में मदद करती है, तो उस पर भी अमेरिकी कार्रवाई का खतरा रहता है।
इसे सेकेंडरी सैंक्शंस कहा जाता है। यानी ईरान के साथ कारोबार करने वाली किसी तीसरे देश की कंपनी या वित्तीय संस्था भी अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ सकती है।
इस तरह के दबाव के कारण कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां ईरान से जुड़े कारोबार में अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं। इसका असर ईरान की विदेशी मुद्रा तक पहुंच, व्यापार और निवेश पर पड़ सकता है।
रियाल गिरा तो आम लोगों की जिंदगी पर सीधा असर
ईरानी रियाल की कीमत में भारी गिरावट का सबसे बड़ा असर आम लोगों की खरीद क्षमता पर पड़ा है। डॉलर महंगा होने के साथ आयातित सामान और उन स्थानीय उत्पादों की लागत भी बढ़ती है, जिनके उत्पादन में आयातित कच्चा माल या मशीनरी इस्तेमाल होती है।
महंगाई पहले से ही ईरान की बड़ी समस्या है और युद्ध तथा प्रतिबंधों के बाद दबाव और बढ़ा है।
खाने-पीने की चीजों की कीमतों में भारी उछाल
रॉयटर्स के मुताबिक जुलाई में ईरान की सालाना महंगाई दर करीब 66% थी। इसी अवधि में खाने-पीने की चीजों की कीमतों में सालाना आधार पर लगभग 128% की वृद्धि हुई।
इसका मतलब है कि आम परिवारों के लिए भोजन का खर्च तेजी से बढ़ गया है। जिन परिवारों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ी, उनकी वास्तविक खरीद क्षमता और कमजोर हुई है।
रियाल के और कमजोर होने से आने वाले समय में आयात पर निर्भर वस्तुओं और जरूरी सामान की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
20 लाख रियाल में पहले जितना सामान मिलता था, अब आधा
ईरानी करेंसी की गिरती कीमत का असर समझने के लिए रोजमर्रा की खरीदारी का उदाहरण काफी है।
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध शुरू होने के समय 20 लाख रियाल में लगभग 4 किलो टमाटर, आधा किलो चिकन और करीब 1 लीटर खाना पकाने का तेल खरीदा जा सकता था।
लेकिन अगस्त तक इसी रकम में इन चीजों की लगभग आधी मात्रा ही मिल रही थी।
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक टमाटर की कीमत करीब 71%, चिकन की कीमत 74% और खाना पकाने के तेल की कीमत लगभग 177% बढ़ चुकी थी।
यानी लोगों की जेब में मौजूद रकम वही है, लेकिन उससे खरीदा जाने वाला सामान लगातार कम होता जा रहा है।
दवाओं की कीमत बढ़ी, करीब 800 दवाओं की कमी
रियाल की कमजोरी का एक गंभीर असर स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है। ईरान में करीब 800 दवाओं की कमी बताई जा रही है। इनमें करीब 90 ऐसी दवाएं शामिल हैं जिन्हें जरूरी और जीवन रक्षक दवाओं की श्रेणी में रखा जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक इंसुलिन की कीमत एक साल में करीब छह गुना तक बढ़ गई। पैरासिटामोल की कीमत में भी करीब 93% की वृद्धि हुई है।
दवाओं की कमी और कीमत बढ़ने का सबसे ज्यादा असर उन मरीजों पर पड़ता है जिन्हें लंबे समय तक नियमित दवाओं की जरूरत होती है। प्रतिबंधों और विदेशी मुद्रा की कमी के बीच दवाओं और मेडिकल सामान की उपलब्धता बनाए रखना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है।
रोजगार पर भी पड़ा युद्ध और आर्थिक संकट का असर
आर्थिक संकट का असर रोजगार बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। रॉयटर्स के मुताबिक वसंत में ईरान की बेरोजगारी दर 9.1% थी। एक साल के भीतर काम करने वालों की संख्या करीब 4.5 लाख कम हुई।
युद्ध के कारण निर्माण, उद्योग और अन्य कारोबारों की गतिविधियों पर असर पड़ा है। आर्थिक अनिश्चितता बढ़ने से कंपनियों के लिए उत्पादन, निवेश और नए कर्मचारियों की नियुक्ति मुश्किल हो सकती है।
इस तरह रियाल की गिरती कीमत केवल विदेशी मुद्रा बाजार की समस्या नहीं रह गई है। इसका असर खाद्य पदार्थों, दवाओं, रोजगार और परिवारों के मासिक बजट तक पहुंच चुका है।
ईरान कई साल से प्रतिबंधों के दबाव में
ईरान की मौजूदा आर्थिक परेशानी केवल हालिया युद्ध की वजह से नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था कई वर्षों से अमेरिकी और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव में रही है।
हालांकि मौजूदा युद्ध ने इस संकट को और गंभीर कर दिया है। नए प्रतिबंधों के साथ ईरानी तेल की बिक्री और उससे होने वाली विदेशी मुद्रा आय पर दबाव बढ़ा है।
रियाल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के पीछे इसलिए युद्ध, प्रतिबंध, तेल आय में अनिश्चितता और विदेशी मुद्रा की कमी को एक साथ महत्वपूर्ण कारकों के रूप में देखा जा रहा है।
अब पूरा ध्यान होर्मुज स्ट्रेट पर
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोमवार देर रात ईरानी मीडिया से कहा कि इस समय पूरा ध्यान होर्मुज स्ट्रेट पर है।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य तनाव के बीच यह जलमार्ग युद्ध के केंद्र में आ गया है।
ईरान ने संकेत दिया है कि होर्मुज को लेकर बातचीत अब ज्यादा गंभीर चरण में पहुंच गई है। दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थों के जरिए संघर्ष रोकने और होर्मुज को दोबारा खोलने के संभावित समझौते पर बातचीत की कोशिशें चल रही हैं।
ईरान ने अमेरिका को दिया था 7 दिन का रोडमैप
ईरान ने विदेश मंत्री अब्बास अराघची के जरिए कतर के माध्यम से अमेरिका को सात दिन का रोडमैप भेजा था। प्रस्ताव में लड़ाई रोकने और कुछ शर्तें पूरी होने की स्थिति में होर्मुज स्ट्रेट को खोलने की बात कही गई थी।
ईरान की ओर से इस प्रस्ताव के तहत अपने तेल की बिक्री पर लगाए गए प्रतिबंधों में राहत की मांग की गई थी।
इसके अलावा ईरान ने अमेरिका से अपने बंदरगाहों पर लागू नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और विदेशों में फ्रीज की गई करीब 12 अरब डॉलर की संपत्ति जारी करने की मांग भी की थी।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने कहा है कि अब यह अमेरिका पर निर्भर है कि वह संघर्ष को खत्म करना चाहता है या नहीं।
ट्रम्प ने ईरान का प्रस्ताव ठुकराया
अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से AP की रिपोर्ट में बताया गया कि बातचीत की कोशिशें जारी हैं, हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के युद्ध खत्म करने और होर्मुज खोलने से जुड़े प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
ट्रम्प ने शनिवार को कहा था कि ईरान मुश्किल स्थिति में है और इसी वजह से वह तुरंत होर्मुज को खोलना चाहता है।
इस घटनाक्रम से यह साफ है कि युद्ध खत्म करने की कोशिशों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच शर्तों को लेकर बड़ा अंतर बना हुआ है।
28 फरवरी से जारी है अमेरिका-ईरान की लड़ाई
अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल के साथ-साथ उन खाड़ी देशों में भी हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।
अमेरिका का कहना है कि उसके सैन्य अभियान का उद्देश्य ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर करना है।
दूसरी ओर ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार हासिल है।
युद्ध के साथ आर्थिक प्रतिबंधों का दबाव बढ़ने से ईरान की अर्थव्यवस्था पर दोहरा असर पड़ा है। एक तरफ सैन्य संघर्ष के कारण आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ तेल निर्यात और विदेशी मुद्रा तक पहुंच पर प्रतिबंधों का असर पड़ रहा है।
रियाल की गिरावट सिर्फ एक करेंसी संकट नहीं
ईरानी रियाल का 25 लाख प्रति डॉलर तक पहुंचना महज विदेशी मुद्रा बाजार में एक नया रिकॉर्ड नहीं है। इसके पीछे ईरान की अर्थव्यवस्था पर जमा कई स्तरों के दबाव दिखाई देते हैं।
तेल से होने वाली विदेशी कमाई पर दबाव, डॉलर की सीमित उपलब्धता, अमेरिकी प्रतिबंध, बैंकिंग नेटवर्क पर कार्रवाई, महंगाई और युद्ध के कारण कारोबार में रुकावट—इन सभी का असर एक साथ रियाल पर पड़ रहा है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि करेंसी कमजोर होने का बोझ अंततः आम लोगों पर पड़ता है। भोजन, दवाएं और दूसरी जरूरी वस्तुएं महंगी होने के साथ उनकी खरीद क्षमता कम होती जाती है।
अब ईरान के लिए आगे की आर्थिक स्थिति काफी हद तक युद्ध की दिशा, तेल निर्यात, अमेरिकी प्रतिबंधों और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर होने वाली बातचीत पर निर्भर करेगी।

