Aligarh के 13 साल पुराने गोलीकांड में फैसला, दो भाइयों को 7-7 साल की जेल; तीसरे आरोपी की मुकदमे के दौरान मौत
News-Desk
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अदालत का फैसला, अपराध समाचार, अलीगढ, अलीगढ़ गोलीकांड, उत्तर प्रदेश, कुशल वार्ष्णेय, कोर्ट फैसला, गांधीपार्क थाना, गोलीकांड, देवेंद्र वार्ष्णेय, नीरज वार्ष्णेयAligarh के गांधीपार्क थाना क्षेत्र में करीब 13 साल पहले हुए गोलीकांड के मामले में आखिरकार अदालत का फैसला आ गया है। लंबे समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अपर सत्र न्यायाधीश तोष कुमार शर्मा की अदालत ने मामले में आरोपी दो भाइयों नीरज वार्ष्णेय और कुशल वार्ष्णेय को दोषी ठहराया है। अदालत ने दोनों को सात-सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोनों पर कुल 22 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।
यह मामला वर्ष 2013 का है और गांधीपार्क थाना क्षेत्र में हुई फायरिंग से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, विवाद के दौरान तीन आरोपी एक घर पहुंचे थे और वहां गाली-गलौज के बाद फायरिंग की गई थी। इस घटना में वादी के बेटे ललित को गोली लगने से गंभीर चोट आई थी। मामले की सुनवाई के दौरान परिस्थितियां भी बदलीं और तीन आरोपियों में से एक देवेंद्र वार्ष्णेय की 26 नवंबर 2025 को मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद उसके खिलाफ चल रही न्यायिक कार्यवाही समाप्त कर दी गई।
12 मई 2013 की शाम हुआ था विवाद
अभियोजन के मुताबिक, घटना 12 मई 2013 की है। गांधीपार्क थाना क्षेत्र निवासी मुकेश शर्मा ने घटना के बाद पुलिस को तहरीर दी थी। शिकायत के अनुसार, उस दिन शाम करीब सात बजे तीनों भाई—नीरज वार्ष्णेय, कुशल वार्ष्णेय और देवेंद्र वार्ष्णेय—मुकेश शर्मा के घर पहुंचे थे।
आरोप था कि घर पहुंचने के बाद तीनों ने वहां गाली-गलौज शुरू कर दी। स्थिति बिगड़ती देख मुकेश शर्मा के बेटे ललित और भुवनेश ने उन्हें समझाने की कोशिश की। अभियोजन पक्ष के अनुसार, समझाने के प्रयास के बावजूद विवाद शांत नहीं हुआ और आरोपियों ने कथित तौर पर जान से मारने की नीयत से फायरिंग कर दी।
फायरिंग की इस घटना में ललित गंभीर रूप से घायल हो गया था। गोली लगने के बाद उसे उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। घटना के बाद परिवार की ओर से पुलिस को सूचना दी गई और मामले की कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।
तीन भाइयों के खिलाफ दर्ज हुआ था मुकदमा
घटना के बाद पुलिस ने नीरज वार्ष्णेय, कुशल वार्ष्णेय और देवेंद्र वार्ष्णेय के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। अभियोजन के अनुसार, आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 307 और 504 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
धारा 307 हत्या के प्रयास से संबंधित थी, जबकि धारा 504 जानबूझकर अपमान कर शांति भंग कराने से संबंधित प्रावधान था। पुलिस ने मामले की जांच पूरी करने के बाद आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया। इसके बाद अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई।
करीब 13 साल पहले शुरू हुई यह कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग चरणों से गुजरती रही। इस दौरान मामले से जुड़े गवाहों के बयान दर्ज किए गए और अभियोजन की ओर से उपलब्ध दस्तावेज एवं अन्य साक्ष्य अदालत के सामने रखे गए।
मुकदमे के दौरान एक आरोपी की हो गई मौत
मामले की सुनवाई पूरी होने से पहले ही तीन आरोपियों में से एक की मृत्यु हो गई। देवेंद्र वार्ष्णेय का 26 नवंबर 2025 को निधन हो गया। किसी आरोपी की मृत्यु होने के बाद उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रह सकती। इसी कारण अदालत ने देवेंद्र वार्ष्णेय के खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही समाप्त कर दी।
इसके बाद मामले में नीरज वार्ष्णेय और कुशल वार्ष्णेय के खिलाफ सुनवाई आगे जारी रही। अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से अदालत में रखे गए पक्षों तथा उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार किया गया।
गवाहों के बयान और मेडिकल रिपोर्ट बनीं अहम कड़ी
अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयान और चिकित्सकीय रिपोर्ट समेत अन्य दस्तावेजों पर विचार किया। अभियोजन की ओर से प्रस्तुत सामग्री और घटना से जुड़े रिकॉर्ड के आधार पर अदालत ने नीरज वार्ष्णेय और कुशल वार्ष्णेय को दोषी माना।
अदालत के फैसले में दोनों आरोपियों को सात-सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। इसके अलावा दोनों पर कुल 22 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।
इस तरह करीब 13 साल पहले दर्ज हुए इस मामले में अब न्यायिक स्तर पर फैसला सामने आया है। घटना के समय दर्ज मुकदमे से लेकर आरोप पत्र, गवाहों की सुनवाई और दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच तक की प्रक्रिया के बाद अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया।
जुर्माना नहीं भरा तो छह महीने और जेल
अदालत ने अर्थदंड को लेकर भी स्पष्ट आदेश दिया है। यदि दोनों दोषी निर्धारित अर्थदंड की राशि जमा नहीं करते हैं तो उन्हें छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
अदालत ने कुल 22 हजार रुपये की अर्थदंड राशि के इस्तेमाल को लेकर भी निर्देश दिया है। आदेश के अनुसार, जमा की जाने वाली कुल राशि में से आधी रकम वादी को दी जाएगी, जबकि शेष आधी राशि राज्य कोष में जमा की जाएगी।
इस आदेश के जरिए अदालत ने न केवल दोषियों की सजा निर्धारित की, बल्कि अर्थदंड की राशि के वितरण को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था कर दी है।
13 साल बाद आया फैसला, बदली कई परिस्थितियां
इस मामले की सबसे खास बात इसकी लंबी न्यायिक अवधि है। वर्ष 2013 में हुई फायरिंग के मामले में अदालत का फैसला वर्ष 2026 में आया है। इस दौरान मामले के आरोपियों और संबंधित पक्षों की परिस्थितियों में भी बदलाव आया।
मुकदमे के दौरान तीसरे आरोपी देवेंद्र वार्ष्णेय की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के कारण उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त करनी पड़ी, जबकि नीरज और कुशल के खिलाफ मुकदमा चलता रहा। अंततः अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोनों को दोषी ठहराते हुए सात-सात वर्ष की सजा सुनाई।
घर पहुंचकर गाली-गलौज से शुरू हुआ था मामला
अभियोजन की कहानी के अनुसार, 12 मई 2013 की शाम शुरू हुआ विवाद कुछ ही समय में हिंसक हो गया था। तीनों भाइयों के घर पहुंचने, गाली-गलौज करने और फिर ललित तथा भुवनेश द्वारा उन्हें समझाने की कोशिश के बाद फायरिंग की स्थिति बनी।
अभियोजन का आरोप था कि फायरिंग जान से मारने की नीयत से की गई थी और इसी दौरान ललित गंभीर रूप से घायल हुआ। घटना के बाद पुलिस कार्रवाई शुरू हुई और मामला अदालत तक पहुंचा।
अब अदालत के फैसले के बाद इस 13 साल पुराने मामले में नीरज वार्ष्णेय और कुशल वार्ष्णेय के खिलाफ दोषसिद्धि और सजा का आदेश सामने आ चुका है।

