Poland में संवैधानिक संकट गहराया: जज ने ट्रिब्यूनल प्रमुख को एक महीने के लिए हटाया, राष्ट्रपति ने बीच रास्ते से लौटाई फ्लाइट
वारसॉ। Poland में प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार और राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की के बीच न्यायपालिका के नियंत्रण और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर जारी टकराव अब गंभीर संकट में बदलता दिखाई दे रहा है। देश के संवैधानिक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान श्विएंत्सकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तलोमिए सोचान्स्की को एक महीने के लिए उनके आधिकारिक दायित्वों से अलग करने के आदेश के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया। यह आदेश ट्रिब्यूनल की जज अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने जारी किया और स्वयं अदालत के कामकाज की जिम्मेदारी संभालने की घोषणा की।
इस फैसले का विपक्ष और ट्रिब्यूनल के मौजूदा नेतृत्व ने विरोध किया है। विपक्षी नेताओं ने इसे अदालत पर अवैध कब्जे की कोशिश बताते हुए सरकार पर तख्तापलट जैसे गंभीर आरोप लगाए। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने इसे कानून का राज बहाल करने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। विवाद के बीच राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की सेनेगल की यात्रा पर जाते समय अपना विमान वापस पोलैंड ले आए। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में राष्ट्रपति का देश में रहना जरूरी है।
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच टकराव की वजह क्या है?
पोलैंड में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क सरकार का नेतृत्व करते हैं, जबकि राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की देश के संवैधानिक प्रमुख हैं। दोनों के बीच न्यायपालिका में नियुक्तियों, अदालतों की स्वतंत्रता और पिछली सरकार के समय किए गए न्यायिक बदलावों को लेकर लंबे समय से मतभेद हैं।
टस्क की गठबंधन सरकार का कहना है कि पिछली सरकार के कार्यकाल में न्यायिक संस्थाओं में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा और अदालतों की स्वतंत्रता प्रभावित हुई। सरकार उन नियुक्तियों और व्यवस्थाओं में बदलाव करना चाहती है। वहीं राष्ट्रपति नावरोत्स्की और विपक्षी लॉ एंड जस्टिस (PiS) पार्टी का आरोप है कि मौजूदा सरकार न्यायिक संस्थाओं में बदलाव के नाम पर संवैधानिक प्रक्रिया और नियमों की अनदेखी कर रही है।
2015 में शुरू हुआ था न्यायपालिका को लेकर विवाद
पोलैंड में अदालतों की स्वतंत्रता को लेकर विवाद की शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी, जब लॉ एंड जस्टिस (PiS) पार्टी सत्ता में आई। उसके शासनकाल में न्यायपालिका से जुड़े कई बदलाव किए गए। इनमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 70 से घटाकर 65 वर्ष करना, अदालतों के प्रमुखों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका बढ़ाना और न्यायाधीशों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अलग व्यवस्था बनाना शामिल था।
इन बदलावों का विपक्ष और यूरोपीय संघ ने विरोध किया था। आलोचकों का आरोप था कि इनसे न्यायपालिका पर राजनीतिक नियंत्रण बढ़ सकता है और न्यायाधीशों की स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है। यूरोपीय संघ ने भी पोलैंड में कानून के शासन और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई थी।
वर्ष 2023 में डोनाल्ड टस्क के नेतृत्व में गठबंधन सरकार सत्ता में आई। उसने न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और कानून का राज बहाल करने का वादा किया था। हालांकि, सरकार बदलने के बाद भी न्यायिक व्यवस्था से जुड़े विवाद खत्म नहीं हुए। पिछली सरकार के समय नियुक्त कई न्यायाधीश अब भी महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए हैं। राष्ट्रपति नावरोत्स्की और PiS इन बदलावों का विरोध कर रहे हैं।
छह नए न्यायाधीशों की नियुक्ति से बढ़ा विवाद
इस वर्ष मार्च में पोलैंड की संसद ने संवैधानिक ट्रिब्यूनल के लिए छह नए न्यायाधीश चुने थे। राष्ट्रपति नावरोत्स्की ने इनमें से केवल दो न्यायाधीशों को अपने सामने शपथ दिलाई। बाकी चार न्यायाधीशों को शपथ दिलाने से इनकार कर दिया। इसके बाद इन चारों ने 9 अप्रैल को संसद में शपथ ली और राष्ट्रपति कार्यालय को इसकी जानकारी दी।
राष्ट्रपति कार्यालय ने संसद में ली गई शपथ को मान्यता नहीं दी। ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान श्विएंत्सकोव्स्की ने भी इन न्यायाधीशों को अदालत में काम करने की अनुमति नहीं दी। इनमें अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का भी शामिल थीं। सरकार का पक्ष है कि संसद द्वारा चुने गए न्यायाधीशों को काम करने से रोकना उचित नहीं है। वहीं राष्ट्रपति और PiS का कहना है कि नियुक्ति और शपथ की प्रक्रिया में संवैधानिक नियमों का पालन अनिवार्य है।
अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने क्यों निलंबित किए ट्रिब्यूनल के प्रमुख?
विवाद के केंद्र में संवैधानिक ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान श्विएंत्सकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तलोमिए सोचान्स्की हैं। अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का का आरोप है कि ट्रिब्यूनल का मौजूदा नेतृत्व नए चुने गए न्यायाधीशों को काम करने से रोक रहा था, जिससे अदालत का कामकाज प्रभावित हो रहा था।
शुक्रवार, 30 अक्टूबर को अन्ना ने दोनों वरिष्ठ पदाधिकारियों को एक महीने के लिए उनके आधिकारिक दायित्वों से अलग करने का आदेश जारी किया। इसके बाद उन्होंने सबसे लंबे न्यायिक अनुभव वाली जज के रूप में ट्रिब्यूनल के कामकाज की जिम्मेदारी संभालने की घोषणा की। उनके अनुसार, यह कदम अदालत के नियमित कामकाज को बनाए रखने के लिए जरूरी था।
हालांकि, इस आदेश की वैधता को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। ट्रिब्यूनल के मौजूदा नेतृत्व और राष्ट्रपति पक्ष का कहना है कि अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का को न्यायाधीश के रूप में राष्ट्रपति के सामने शपथ दिलाई ही नहीं गई थी। ऐसे में उन्हें अदालत का नेतृत्व संभालने का अधिकार नहीं है। ट्रिब्यूनल ने भी अपने आधिकारिक रुख में श्विएंत्सकोव्स्की को अध्यक्ष और सोचान्स्की को उपाध्यक्ष मानना जारी रखा।
वारसॉ में प्रदर्शन, पुलिस पर फेंकी गईं वस्तुएं
ट्रिब्यूनल के नेतृत्व में बदलाव के आदेश के बाद राजधानी वारसॉ में अदालत के बाहर प्रदर्शन शुरू हो गए। सैकड़ों लोग विरोध जताने के लिए इकट्ठा हुए। प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों की ओर वस्तुएं फेंकीं और कुछ प्रदर्शनकारियों ने अदालत परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की। हालात को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया। समाचार एजेंसियों के मुताबिक, पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया।
प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं ने सरकार के खिलाफ नारे लगाए। कुछ पोस्टरों पर टस्क सरकार को हटाने और देश को बर्बाद करने से रोकने जैसे संदेश लिखे थे। विपक्ष ने न्यायिक संस्थाओं के नेतृत्व में हुए इस बदलाव को असंवैधानिक बताते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।
राष्ट्रपति नावरोत्स्की ने सेनेगल की यात्रा बीच में छोड़ी
विवाद के दौरान राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की सेनेगल की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे थे। घटनाक्रम की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने अपना विमान वापस पोलैंड लौटाने का फैसला किया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने कहा कि ऐसे समय में राष्ट्रपति का पोलैंड में रहना जरूरी है और इसलिए वह सेनेगल की यात्रा बीच में छोड़कर लौट रहे हैं।
राष्ट्रपति की वापसी ने इस विवाद की गंभीरता को और उजागर किया। यह घटनाक्रम केवल अदालत के दो वरिष्ठ पदाधिकारियों के निलंबन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे देश की संवैधानिक व्यवस्था और न्यायपालिका के अधिकारों को लेकर राजनीतिक टकराव और गहरा गया।
टस्क बोले- कानून का राज बहाल करना हमारी जिम्मेदारी
प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अपनी सरकार के रुख का बचाव करते हुए एक्स पर लिखा कि कानून का राज बहाल करना उनकी सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि PiS के शासनकाल में वर्षों तक कानून का उल्लंघन हुआ और अब व्यवस्था को ठीक करने की प्रक्रिया कठिन तथा कभी-कभी पीड़ादायक हो सकती है। इसके लिए निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है और दूसरा कोई रास्ता नहीं है।
टस्क का कहना है कि उनकी सरकार पिछली सरकार के दौरान न्यायपालिका में हुए राजनीतिक हस्तक्षेप को दूर करने का प्रयास कर रही है। वहीं विपक्ष और राष्ट्रपति पक्ष इसे संवैधानिक व्यवस्था में अनुचित दखल के रूप में देख रहे हैं। इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि संवैधानिक ट्रिब्यूनल का वैध नेतृत्व किसके पास है और न्यायपालिका में सुधार की प्रक्रिया किस संवैधानिक रास्ते से आगे बढ़ेगी।
पोलैंड का मौजूदा विवाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायाधीशों की नियुक्ति और संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों से जुड़ा है। ट्रिब्यूनल के नेतृत्व को लेकर दोनों पक्षों के दावों के बीच अब देश की संवैधानिक व्यवस्था की वैधता और भविष्य को लेकर बहस तेज हो गई है।

