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G20 बैठक में रूस पर घमासान: लावरोव के साथ फोटो खिंचवाने से कई देशों का इनकार, ग्रुप फोटो रद्द

अटलांटा। अमेरिका के अटलांटा में आयोजित G20 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के पहले ही दिन रूस को लेकर बड़ा कूटनीतिक विवाद खड़ा हो गया। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की मौजूदगी पर यूरोपीय देशों समेत कई प्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई और उनके साथ ग्रुप फोटो खिंचवाने से इनकार कर दिया। स्थिति ऐसी बनी कि अमेरिका को बैठक का पारंपरिक ग्रुप फोटो सेशन ही रद्द करना पड़ा। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, करीब एक-तिहाई प्रतिभागियों ने लावरोव के साथ तस्वीर में शामिल होने पर आपत्ति जताई थी। इनमें ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के प्रतिनिधि भी शामिल थे।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मेजबानी में यह दो दिवसीय बैठक 30 और 31 अक्टूबर को हो रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संघर्ष, अमेरिकी टैरिफ, चीन की गतिविधियां और वैश्विक व्यापार जैसे मुद्दों पर देशों के बीच मतभेद सामने आए हैं। हालांकि, फोटो विवाद के बावजूद बैठक की अन्य कार्यवाही तय कार्यक्रम के अनुसार जारी रही। भारत की ओर से विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी इसमें शामिल हुए हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश विभाग ने विवाद को बैठक से ध्यान भटकाने वाला मानते हुए फोटो सेशन को एजेंडे से हटा दिया।

लावरोव के साथ तस्वीर से क्यों पीछे हटे कई देश?

G20 की बैठकों में विदेश मंत्रियों का सामूहिक फोटो सेशन एक पारंपरिक औपचारिक कार्यक्रम होता है। इस बार रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की मौजूदगी ने इस परंपरा को विवाद में डाल दिया। यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर यूरोपीय देशों और मॉस्को के बीच तनाव बना हुआ है। ऐसे में कई देशों के प्रतिनिधियों ने लावरोव के साथ एक ही तस्वीर में शामिल होने पर आपत्ति जताई।

जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने कहा कि यूरोपीय साझेदारों और लावरोव के साथ कोई साझा तस्वीर नहीं हो सकती, क्योंकि रूस के साथ सामान्य संबंधों जैसी स्थिति नहीं है। पोलैंड के विदेश मंत्री रादोस्लाव सिकोरस्की ने भी कहा कि वह अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जो लावरोव के साथ तस्वीर नहीं खिंचवाना चाहते। यूरोपीय अधिकारियों ने अलग-अलग तस्वीरें लेने का विकल्प भी सुझाया था, लेकिन अंततः अमेरिका ने पूरा फोटो सेशन ही रद्द कर दिया।

दक्षिण अफ्रीका को न्योता नहीं देने पर भी विवाद

इस बैठक को लेकर विवाद केवल रूस की मौजूदगी तक सीमित नहीं रहा। दक्षिण अफ्रीका G20 का संस्थापक सदस्य है, लेकिन अमेरिका ने उसे अटलांटा की विदेश मंत्रियों की बैठक में आमंत्रित नहीं किया। दक्षिण अफ्रीका और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के बीच गाजा युद्ध, ईरान के साथ संबंध, नस्लीय नीतियों और व्यापार जैसे मुद्दों पर मतभेद रहे हैं।

दक्षिण अफ्रीका ने स्पष्ट किया कि बैठक में उसकी गैर-मौजूदगी स्वैच्छिक नहीं थी। देश के विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि दक्षिण अफ्रीका G20 के सदस्य के रूप में समान आधार पर भाग लेने के लिए तैयार है। इस फैसले पर कुछ अन्य G20 देशों ने भी आपत्ति जताई है।

यूक्रेन को न्योता नहीं, रूस की मौजूदगी पर यूरोप नाराज

यूक्रेन G20 का औपचारिक सदस्य नहीं है, लेकिन इससे पहले समूह की कुछ बैठकों में उसे अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया जाता रहा है। इस बार अमेरिकी प्रशासन ने यूक्रेन को न्योता नहीं दिया। अमेरिका ने इसके पीछे यह तर्क दिया कि अटलांटा की बैठक में केवल G20 के औपचारिक सदस्यों को आमंत्रित करने का फैसला किया गया है।

रूस के विदेश मंत्री लावरोव को आमंत्रित किए जाने और यूक्रेन को बाहर रखे जाने के फैसले पर यूरोपीय देशों ने नाराजगी जताई। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पहले से तनावपूर्ण संबंधों के बीच इस फैसले ने बैठक के माहौल को और संवेदनशील बना दिया।

पोलैंड को अतिथि के रूप में बुलाने पर रूस ने जताया विरोध

अमेरिका ने पोलैंड को G20 की बैठक में अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया है। पोलैंड G20 का औपचारिक सदस्य नहीं है, लेकिन अमेरिकी प्रशासन उसके समूह में शामिल होने का समर्थन कर रहा है। दूसरी ओर, रूस पोलैंड की सदस्यता का विरोध कर रहा है।

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का कहना है कि G20 में नए सदस्यों या अतिथि देशों को शामिल करने के लिए सभी सदस्य देशों की सहमति जरूरी है। इस मुद्दे पर भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद सामने आए हैं। इस तरह बैठक में रूस की मौजूदगी, यूक्रेन और दक्षिण अफ्रीका को न्योता नहीं दिए जाने तथा पोलैंड को आमंत्रित करने जैसे मुद्दे अलग-अलग स्तर पर विवाद का कारण बने हुए हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर ईरान और चीन तक कई मुद्दों पर मतभेद

बैठक में देशों के बीच कई बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण रहा। रूस-यूक्रेन युद्ध के अलावा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, अमेरिका के टैरिफ, दक्षिण चीन सागर में चीन की गतिविधियों और वैश्विक व्यापार पर चर्चा हुई। होर्मुज जलडमरूमध्य सहित प्रमुख समुद्री रास्तों से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही और ऊर्जा आपूर्ति भी महत्वपूर्ण मुद्दे रहे।

इन मतभेदों के कारण बैठक के अंत में सभी देशों की सहमति से साझा बयान जारी होने की संभावना कमजोर पड़ गई। एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद संयुक्त विज्ञप्ति के बजाय अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की ओर से अध्यक्षीय वक्तव्य जारी किए जाने की संभावना है। हालांकि, देशों ने दिसंबर में होने वाले नेताओं के शिखर सम्मेलन को सफल बनाने के लिए बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है।

जयशंकर बोले- वैश्विक चुनौतियों का समाधान कूटनीति से निकले

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बैठक में वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों का हल सैन्य उपायों से नहीं निकल सकता और बातचीत को मौका दिया जाना चाहिए। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ा हुआ है।

जयशंकर ने समुद्री रास्तों पर नागरिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर जहाजों की आवाजाही सुरक्षित रहनी चाहिए और नाविकों पर हमले बंद होने चाहिए। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS), के प्रावधानों का पालन जरूरी है।

उन्होंने चेतावनी दी कि समुद्री रास्तों में बाधा और आपूर्ति शृंखलाओं पर दबाव का सबसे अधिक असर ग्लोबल साउथ के देशों पर पड़ता है। इससे ईंधन, खाद्य पदार्थों और उर्वरकों की उपलब्धता तथा कीमतें प्रभावित होती हैं। जयशंकर ने आपूर्ति शृंखलाओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करने, बाजारों तक पहुंच सीमित करने और व्यापार में असंतुलन पैदा करने जैसी स्थितियों पर भी चिंता जताई।

जयशंकर ने भारत और लाइबेरिया की ओर से नाविकों की सुरक्षा के लिए संयुक्त पहल शुरू किए जाने की जानकारी भी दी। उन्होंने कहा कि समुद्री सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा सीधे तौर पर आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी हुई हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने आतंकवाद के खतरे को नजरअंदाज नहीं करने की जरूरत पर भी जोर दिया।

दिसंबर में मियामी में होगी G20 देशों के नेताओं की बैठक

अटलांटा में विदेश मंत्रियों की बैठक 31 अक्टूबर को समाप्त होगी। इसके बाद अमेरिका के मियामी में 14 और 15 दिसंबर को G20 देशों के नेताओं का शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इसकी मेजबानी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी इस शिखर सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है।

विदेश मंत्रियों की बैठक में सामने आए मतभेदों का असर दिसंबर में होने वाले नेताओं के सम्मेलन की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संघर्ष, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच सहमति बनाना प्रमुख चुनौती होगी।

अटलांटा की बैठक में रूस को लेकर हुआ विवाद G20 के भीतर गहरे कूटनीतिक मतभेदों को सामने लाया है। एक ओर कई देशों ने लावरोव के साथ तस्वीर खिंचवाने से इनकार किया, वहीं भारत ने बातचीत, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित रखने पर जोर दिया। अब सबकी नजर दिसंबर में मियामी में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन पर है।

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