यमन में Houthis का बड़ा हमला: अदन के राष्ट्रपति भवन और एयरपोर्ट पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 15 दिन में दूसरी बार निशाना
अदन। यमन में Houthis विद्रोहियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के बीच संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। शुक्रवार, 30 अक्टूबर को हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी शहर अदन में राष्ट्रपति भवन और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया। यमन सरकार के सैन्य प्रवक्ता ने दोनों ठिकानों पर हमले की पुष्टि की है। वहीं, पुलिस अधिकारियों ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि राष्ट्रपति भवन परिसर की ओर दो मिसाइलें दागी गईं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं हो सका कि मिसाइलें अपने निर्धारित लक्ष्य पर लगीं या नहीं। प्रत्यक्षदर्शियों ने परिसर में एंबुलेंस जाते हुए देखे जाने की जानकारी दी। फिलहाल इस हमले में किसी के हताहत होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
राष्ट्रपति भवन पर 15 दिनों के भीतर यह दूसरा बड़ा हमला है। इससे पहले 15 अक्टूबर को भी अल-माशिक राष्ट्रपति परिसर पर मिसाइल हमला हुआ था, जिसमें कई लोगों की मौत हुई थी। ताजा हमले के साथ ही अदन एयरपोर्ट को भी निशाना बनाया गया है। यमन में बढ़ते संघर्ष का असर अब सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी दिखाई दे रहा है। सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने शुक्रवार को मदीना क्षेत्र में एक ड्रोन को मार गिराने का दावा किया, हालांकि हूतियों ने सऊदी अरब की ओर कोई हमला करने से इनकार किया है।
अदन के राष्ट्रपति भवन और एयरपोर्ट पर एक साथ हमला
यमन के सैन्य प्रवक्ता माजिद अब्दुल्ला अल-नुजैली के अनुसार, हूती विद्रोहियों ने अदन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और अल-माशिक राष्ट्रपति भवन परिसर को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया। पुलिस अधिकारियों ने एएफपी को बताया कि राष्ट्रपति भवन की दिशा में दो मिसाइलें दागी गईं। शहर के निवासियों और एएफपी के पत्रकार ने भी दो धमाकों की आवाज सुनने की जानकारी दी।
हालांकि, यमन सरकार की ओर से जारी शुरुआती बयान में यह नहीं बताया गया कि मिसाइलें अपने लक्ष्य पर लगीं या उनसे कितना नुकसान हुआ। राष्ट्रपति भवन परिसर की ओर एंबुलेंस जाते देखे जाने की खबरों के बावजूद किसी के घायल होने या मारे जाने की पुष्टि नहीं की गई। इस हमले के बाद अदन में सुरक्षा व्यवस्था और सतर्कता बढ़ा दी गई।
15 अक्टूबर को भी राष्ट्रपति भवन पर हुआ था हमला
अदन स्थित राष्ट्रपति भवन परिसर पर 15 अक्टूबर को भी मिसाइल हमला किया गया था। उस समय हमले में कई लोगों की मौत हुई थी और परिसर को काफी नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आई थीं। अल-माशिक परिसर यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का प्रमुख केंद्र है। यहां सरकारी कार्यालयों के साथ सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों से जुड़ी सुविधाएं भी मौजूद हैं।
इसके अलावा, 28 अक्टूबर को हूतियों ने अदन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भी निशाना बनाया था। हमले से पहले विद्रोहियों ने लोगों को क्षेत्र खाली करने की चेतावनी दी थी। मिसाइल हमले के बाद एयरपोर्ट का संचालन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा था। यमन के अधिकारियों के मुताबिक, उस हमले में दो नागरिक घायल हुए और रनवे को भी नुकसान पहुंचा था। मरम्मत के बाद गुरुवार को एयरपोर्ट दोबारा शुरू किया गया था, लेकिन अगले ही दिन उस पर फिर हमला होने की खबर सामने आई।
अदन क्यों है यमन के लिए इतना महत्वपूर्ण?
अदन दक्षिणी यमन का प्रमुख शहर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार का महत्वपूर्ण केंद्र है। वर्ष 2014 में हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद सरकार को राजधानी छोड़नी पड़ी और अदन उसकी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया। यहां राष्ट्रपति भवन, सरकारी कार्यालय और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा स्थित हैं।
अदन एयरपोर्ट दक्षिणी यमन के उन इलाकों के लिए महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है, जो हूतियों के नियंत्रण में नहीं हैं। राहत सामग्री, मानवीय सहायता और यात्रियों की आवाजाही के लिए भी इसका अहम स्थान है। ऐसे में एयरपोर्ट पर लगातार हमलों से आम नागरिकों और राहत कार्यों पर असर पड़ने की आशंका है।
सऊदी गठबंधन का मदीना में ड्रोन मार गिराने का दावा
यमन में हमलों के बीच सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने शुक्रवार को मदीना क्षेत्र में एक ड्रोन को हवा में ही नष्ट करने का दावा किया। गठबंधन के अनुसार, यह ड्रोन हूती विद्रोहियों की ओर से भेजा गया था। इससे पहले सऊदी गठबंधन ने मक्का क्षेत्र में भी एक ड्रोन को रोकने का दावा किया था। हालांकि, इन घटनाओं को लेकर हूती विद्रोहियों का पक्ष अलग है।
हूतियों के सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने सऊदी अरब की ओर किसी भी सैन्य कार्रवाई से इनकार किया। उन्होंने कहा कि समूह ने उस दिन सऊदी क्षेत्र की ओर कोई अभियान नहीं चलाया था। हूती पहले भी मक्का और मदीना को निशाना बनाने के सऊदी आरोपों को खारिज करते रहे हैं। उनका कहना है कि उनके हमले सऊदी अरब के सैन्य और तेल से जुड़े ठिकानों पर केंद्रित हैं।
मक्का और मदीना में ड्रोन को लेकर बढ़ा तनाव
मक्का में ग्रैंड मस्जिद और काबा स्थित हैं, जबकि मदीना में पैगंबर मोहम्मद की मस्जिद है। दोनों शहर इस्लाम के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों में शामिल हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों के ऊपर ड्रोन या मिसाइलों की मौजूदगी से जुड़ी खबरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवेदनशीलता बढ़ा देती हैं।
सऊदी अरब ने अक्टूबर में हूती विद्रोहियों पर मदीना के बिजली वितरण केंद्र को निशाना बनाने का आरोप भी लगाया था। सऊदी पक्ष के अनुसार, यह केंद्र पैगंबर मोहम्मद की मस्जिद को बिजली की आपूर्ति करता है। हालांकि, हूतियों ने इस आरोप को भी खारिज किया था। इस तरह मक्का और मदीना को लेकर सऊदी गठबंधन के दावों और हूतियों के इनकार के बीच तनाव बना हुआ है।
2015 से जारी है सऊदी अरब और हूतियों के बीच संघर्ष
यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच संघर्ष वर्ष 2014 में उस समय तेज हुआ, जब हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में कई देशों के गठबंधन ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी अरब का उद्देश्य हूतियों के कब्जे को समाप्त कर सरकार को दोबारा सत्ता में स्थापित करना था।
कई वर्षों तक चले हवाई हमलों और सैन्य अभियानों के बावजूद हूतियों को पूरी तरह पीछे नहीं धकेला जा सका। वे अब भी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण बनाए हुए हैं। दूसरी ओर, सऊदी अरब सरकार समर्थक सैन्य बलों को सहायता देता रहा है। ईरान पर भी हूती विद्रोहियों को राजनीतिक और सैन्य समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं।
वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए संघर्षविराम के बाद सीमा पार हमलों में काफी कमी आई थी, लेकिन हाल के महीनों में फिर तनाव बढ़ा है। सऊदी अरब और हूतियों के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने यमन के संघर्ष को एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बना दिया है।
सऊदी अरब के लिए हूतियों से मुकाबला क्यों चुनौतीपूर्ण?
सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, वायु रक्षा प्रणाली और उन्नत मिसाइल तकनीक है। इसके बावजूद यमन में हूतियों के खिलाफ वर्षों से जारी संघर्ष का निर्णायक समाधान नहीं निकल पाया है। इसकी एक बड़ी वजह हूतियों की असममित युद्ध रणनीति है। वे अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन, मिसाइलों और अन्य हथियारों का इस्तेमाल कर बड़े सैन्य और आर्थिक ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश करते हैं।
इन हमलों को रोकने के लिए सऊदी अरब को महंगी वायु रक्षा प्रणालियों और इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता है। इससे रक्षा पर खर्च बढ़ता है। इसके अलावा, यमन का पहाड़ी और दुर्गम भूगोल भी सैन्य अभियान को कठिन बनाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में छिपे ठिकानों की पहचान करना और उन्हें पूरी तरह निष्क्रिय करना आसान नहीं है।
हूतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर जमीनी अभियान चलाने में भी सऊदी गठबंधन के लिए जोखिम हैं। इसमें सैनिकों के हताहत होने, संघर्ष लंबा खिंचने और क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका बनी रहती है। यही वजह है कि आधुनिक हथियारों और सैन्य संसाधनों के बावजूद इस संघर्ष का स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया है।
अदन के राष्ट्रपति भवन और एयरपोर्ट पर ताजा मिसाइल हमले यमन में फिर तेज होते संघर्ष का संकेत हैं। वहीं, मदीना में ड्रोन गिराने के सऊदी गठबंधन के दावे और हूतियों के इनकार ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि लगातार हमलों का असर यमन के आम नागरिकों, राहत कार्यों और पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ सकता है।

