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लोकतंत्र की चुनौतियाँ: नोटा (None of the Above) के बढ़ते प्रचलन का समाज और राजनीति पर प्रभाव?

भारत में नोटा (None of the Above) की शुरुआत 27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलों को दागी उम्मीदवारों को मैदान में उतारने से हतोत्साहित करना था। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (इवीएम) पर ‘इनमें से कोई नहीं’ (नोटा) का विकल्प उन मतदाताओं के लिए उपलब्ध है, जो किसी भी राजनीतिक उम्मीदवार का समर्थन नहीं करना चाहते। यह विकल्प उन्हें अपना निर्णय बताए बिना वोट न देने के अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति देता है।

बिहार के गोपालगंज सुरक्षित संसदीय सीट पर लोकसभा चुनाव का परिणाम एक बार फिर सुर्खियों में रहा। पिछले चुनावों की तरह इस बार भी ‘नोटा’ (None of the Above) ने रिकॉर्ड बनाया। नोटा के बढ़ते प्रचलन ने समाज और राजनीति पर गहरे असर डाले हैं, जो विचारणीय हैं।

2019 के लोकसभा चुनाव में गोपालगंज में सर्वाधिक नोटा को वोट मिला था, जबकि इस बार 2024 के चुनाव में इंदौर ने इस रिकॉर्ड को तोड़ दिया। बावजूद इसके, गोपालगंज में स्टेट स्तर पर नोटा का रिकॉर्ड कायम रहा। 2019 में नोटा को 51,660 वोट मिले थे, जबकि 2024 में 42,863 वोट मिले। यह आंकड़े प्रत्याशियों के प्रति नाराजगी को दर्शाते हैं, जिससे जनता नोटा के माध्यम से अपनी असंतुष्टि जाहिर कर रही है।

समाज पर प्रभाव

नोटा (None of the Above) का बढ़ता प्रचलन समाज में गहरे प्रभाव डालता है। जब लोग नोटा का विकल्प चुनते हैं, तो यह दर्शाता है कि वे किसी भी प्रत्याशी या पार्टी पर विश्वास नहीं करते। इससे समाज में एक प्रकार की निराशा और अविश्वास का माहौल बनता है। लोग चुनावों में अपनी आवाज नहीं पाते और अपनी नाराजगी जताने के लिए नोटा का सहारा लेते हैं।

राजनीतिक दलों के लिए नोटा एक बड़ा संदेश है। यह उन्हें बताता है कि जनता उनके द्वारा चुने गए प्रत्याशियों से खुश नहीं है। बावजूद इसके, अधिकांश राजनीतिक दल इस पर विचार नहीं करते और न ही अपने प्रत्याशियों के चयन में सुधार करते हैं। इससे राजनीति में गुणवत्ता की कमी बनी रहती है और जनता का विश्वास राजनीतिक प्रणाली से उठने लगता है।

नोटा (None of the Above): चुनाव में भागीदारी की कमी

चुनावों में नोटा (None of the Above) का बढ़ता उपयोग यह भी दर्शाता है कि जनता मतदान के प्रति उदासीन होती जा रही है। कई लोग मतदान के दिन वोट डालने तक नहीं जाते, जिससे मतदान प्रतिशत कम होता है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए हानिकारक है, क्योंकि लोकतंत्र की सफलता जनता की भागीदारी पर निर्भर करती है।

नोटा के बढ़ते प्रचलन को देखते हुए, राजनीतिक दलों को अपने प्रत्याशियों के चयन में सुधार करने की आवश्यकता है। उन्हें ईमानदार और योग्य उम्मीदवारों को मैदान में उतारना चाहिए, ताकि जनता का विश्वास फिर से बहाल हो सके। इसके अलावा, राजनीतिक दलों को जनता के मुद्दों को गंभीरता से लेना चाहिए और उनके समाधान के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

नोटा (None of the Above) के बढ़ते प्रचलन का समाज और राजनीति पर प्रभाव गंभीरता से अध्ययन करने की आवश्यकता है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि जनता किस प्रकार की समस्याओं का सामना कर रही है और वे किस प्रकार के सुधार चाहते हैं। इसके साथ ही, इससे राजनीतिक दलों को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों में सुधार करने का अवसर मिलेगा।

नोटा (None of the Above) का बढ़ता प्रचलन समाज और राजनीति दोनों पर गहरे प्रभाव डालता है। यह जनता की असंतुष्टि और निराशा को दर्शाता है। इसके बावजूद, राजनीतिक दल इस पर विचार नहीं कर रहे हैं, जिससे राजनीति में गुणवत्ता की कमी बनी रहती है। समाज के लिए यह आवश्यक है कि राजनीतिक दल सुधार करें और जनता का विश्वास बहाल करें, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो सके। इसके अलावा, जनता को भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए और सही प्रत्याशियों का चयन करना चाहिए, ताकि देश की राजनीतिक प्रणाली बेहतर हो सके।

Dr. Abhishek Agarwal

Dr. Abhishek Agarwal पोर्टल के संपादकीय बोर्ड के सदस्य हैं। वे एक प्रसिद्ध शिक्षाविद और शोधकर्ता हैं, जिनके लेखन में सामाजिक मुद्दों, वैश्विक रणनीतियों, संबंधों, और शिक्षा विषयों पर गहरा अध्ययन और विचार प्रकट होता है। उन्हें समाज के विभिन्न पहलुओं को समझने और लोगों की जागरूकता में मदद करने में उत्साह मिलता है। यहाँ कुछ सामग्री को अधिक प्रभावी संचार प्रदान करने के लिए संग्रहित किया गया हो सकता है। किसी भी सुझाव के मामले में, कृपया [email protected] पर लिखें

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