Donald Trump की टैरिफ धमकी पर चीन का करारा जवाब: ब्रिक्स को निशाना बनाने पर भड़का ड्रैगन, बोले- कोई टकराव नहीं, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे
Donald Trump की टैरिफ की धमकी के बाद वैश्विक मंच पर एक बार फिर तनाव गहराता नजर आ रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और आगामी चुनाव के दावेदार ट्रंप ने रविवार को स्पष्ट रूप से कहा कि अगर BRICS देश अमेरिका विरोधी नीतियों का समर्थन करते हैं, तो वह इन पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा देंगे। इस धमकी के बाद चीन का आक्रामक बयान सामने आया है। चीन ने साफ कर दिया कि BRICS किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि यह एक सहयोगात्मक मंच है, लेकिन वह ट्रंप की धमकियों के आगे झुकने वाला नहीं है।
चीन का दो टूक बयान: न धमकियों से डरेंगे, न पीछे हटेंगे
बीजिंग में मीडिया से बात करते हुए विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने अमेरिका को करारा जवाब दिया। माओ ने कहा, “चीन पहले भी साफ कर चुका है कि टैरिफ वॉर में कोई विजेता नहीं होता। संरक्षणवाद से केवल नुकसान होता है और इसका कोई भविष्य नहीं है। BRICS समूह सहयोग, समावेशिता और साझा जीत के सिद्धांतों पर चलता है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि BRICS न तो किसी देश के खिलाफ साजिश रचता है, न ही टकराव चाहता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि चीन या BRICS किसी धमकी के आगे झुकेंगे।
ट्रंप की धमकी का राजनैतिक एजेंडा?
ट्रंप द्वारा दिए गए बयान को आगामी अमेरिकी चुनावों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि वह सोमवार से विभिन्न देशों को टैरिफ पत्र भेजेंगे, जिसमें पहले बैच में 15 देशों को टारगेट किया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने अपने सोशल नेटवर्क ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करके BRICS देशों पर सीधा हमला किया और कहा कि ये देश अमेरिका विरोधी नीतियों का समर्थन कर रहे हैं।
उनके अनुसार, अगर देश अमेरिका के साथ कोई ठोस व्यापार समझौता नहीं करते, तो अप्रैल में निर्धारित टैरिफ स्तर फिर से लागू कर दिए जाएंगे, और अतिरिक्त 10% शुल्क की शुरुआत BRICS देशों से होगी।
BRICS की तीखी प्रतिक्रिया: ट्रंप का नाम लिए बिना चेतावनी
ट्रंप के बयान के जवाब में BRICS समूह ने भी अपने संयुक्त घोषणापत्र में कड़ा रुख अपनाया। हालांकि ट्रंप का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया, लेकिन अमेरिकी नीतियों को लेकर समूह ने “गंभीर चिंता” जताई। घोषणापत्र में कहा गया कि किसी भी देश द्वारा लगाए जाने वाले टैरिफ अगर विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के विपरीत हैं, तो इससे वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखला और निवेश वातावरण पर गंभीर असर पड़ेगा।
BRICS बनाम अमेरिका: क्या यह नया शीत युद्ध है?
ट्रंप और BRICS के बीच यह तकरार सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि यह एक राजनैतिक शक्ति संतुलन की लड़ाई है। एक ओर ट्रंप का अमेरिका है जो “America First” की नीति के तहत दुनिया से एकतरफा व्यापार चाहता है, वहीं दूसरी ओर BRICS है जो साझा विकास और बहुपक्षीय सहयोग की वकालत करता है।
चीन, भारत, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के इस समूह में अब ईरान, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया और UAE जैसे नए सदस्य भी जुड़ चुके हैं, जिससे इसकी ताकत और वैश्विक प्रभाव और अधिक बढ़ गया है।
शी जिनपिंग और पुतिन की गैरमौजूदगी: लेकिन संदेश साफ
6-7 जुलाई को हुई BRICS बैठक में कुछ बड़े चेहरे नहीं दिखे। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जिन्होंने 2012 के बाद से हर बैठक में भाग लिया था, इस बार शामिल नहीं हुए। उनकी जगह प्रधानमंत्री ली कियांग ने प्रतिनिधित्व किया। वहीं, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भाग लिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, दोनों नेताओं की गैरमौजूदगी रणनीतिक है और इससे यह संकेत जाता है कि BRICS अब संगठन की सामूहिक शक्ति पर ज्यादा निर्भर है, न कि सिर्फ कुछ नेताओं पर।
क्या ट्रंप की धमकी असर डालेगी?
दुनिया भर के व्यापारिक विश्लेषक इस बात पर निगाहें टिकाए हुए हैं कि ट्रंप की धमकी का आर्थिक प्रभाव क्या होगा। अगर वह सच में BRICS देशों पर 10% टैरिफ लागू करते हैं, तो इससे न केवल इन देशों की अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा, बल्कि अमेरिका की भी उपभोक्ता कीमतें बढ़ेंगी और वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित होगी।
इसके अलावा, चीन पहले ही संयुक्त उत्पादन, क्षेत्रीय व्यापार सौदे और डिजिटल मुद्रा जैसे कई मोर्चों पर BRICS के सहयोग को मजबूत कर चुका है। इससे समूह को अमेरिकी दबाव के खिलाफ एक मज़बूत ढाल मिल सकती है।
BRICS का भविष्य: अमेरिका की आंख की किरकिरी
BRICS अब सिर्फ एक आर्थिक संगठन नहीं रहा, बल्कि यह एक राजनैतिक मंच बन चुका है जो अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों को चुनौती देता है। चाहे वह डॉलर पर निर्भरता को खत्म करना हो या वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग, BRICS अब हर क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
ट्रंप की धमकी के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि BRICS अब अमेरिका के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। अगर ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं, तो यह संघर्ष और अधिक तेज हो सकता है।

