सावन शिवरात्रि का महत्व- तिथि व मुहूर्त
वर्ष के सभी 11 शिवरात्रियों को मासिक शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। जिनमे से एक श्रावण माह की शिवरात्रि होती है। शिवरात्रि का पर्व देवों के देव महादेव को समर्पित पर्व है जिसे पुरे भारत में बड़े हर्ष के साथ मनाया जाता है।
सावन शिवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण होती है। माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों की पुकार बहुत जल्द सुन लेते हैं। इसलिये उनके भक्त अन्य देवी-देवताओं की तुलना में अधिक भी मिलते हैं। भगवान भोलेनाथ का दिन सोमवार माना जाता है और उनकी पूजा का श्रेष्ठ महीना सावन। वैसे तो हर माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि भी आती है लेकिन सावन महीने में आने वाली शिवरात्रि को फाल्गुन महीने में आने वाली महाशिवरात्रि के समान ही फलदायी माना जाता है।
शिवरात्रि साल मे 12/13 बार आने वाला मासिक त्योहार है, जो पूर्णिमा से एक दिन पहिले त्रियोदशी के दिन आता है। शिवरात्रियों में से दो सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं, फाल्गुन त्रियोदशी महा शिवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध है और दूसरी सावन शिवरात्रिके नाम से जानी जाती है। यह त्यौहार भगवान शिव-पार्वती को समर्पित है, इस दिन भक्तभगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते हैं।
- कहा जाता है कि जिस घर में बिल्व पत्र का वृक्ष लगा होता है उसे रोज पानी दोना चाहिए। इससे घर में रोज पॉजिटिव एनर्जी बनी रहती है।
- बिल्व के पौधे को घर के उत्तर-पश्चिम दिशा में लगाना सबसे शुभ होता है। यहां लगाया गया बेल का वृक्ष घर के लोगों के मान-सम्मान में वृद्धि करता है। वहीं उन्हें धन लाभ भी होता है।
- बिल्व देवी लक्ष्मी का ही एक नाम है इस कारण बिल्व की पूजा से लक्ष्मीजी की कृपा मिलती है।
- कहा जाता है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बिल्व वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में देवी कात्यायनी वास करतीं हैं।
- अष्टमी, चतुदर्शी, अमावस्या और रविवार को बिल्व पत्र नहीं तोड़ना चाहिए। ऐसा करना शुभ नहीं माना जाता।
सभी शिवभक्तों को फाल्गुन महीने के बाद सावन महीने का खास तौर पर इंतजार रहता है। दरअसल सावन के पावन सोमवार और उसमें शिवरात्रि के त्यौहार की महिमा ही अलग होती है। इस शिवरात्रि का महत्व इसलिये भी बढ़ जाता है क्योंकि इसमें भगवान शिव का जलाभिषेक करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है। सावन के पूरे महीने शिवभक्त बम भोले, हर-हर महादेव के नारे लगाते हुए नजर आते हैं। शिवरात्रि के दिन जलाभिषेक के लिये हरिद्वार, गौमुख से कांवड़ भी लेकर आते हैं। मान्यता है कि श्रावण महीने की शिवरात्रि के दिन जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करते हैं उनके कष्टों का निवारण होता है और मुरादें पूरी हो जाती हैं।
ऊं नम: शिवाय का जाप: अपने भक्तों के संकट तो बाबा भोलेनाथ शिवशंकर दूर करते ही हैं लेकिन सावन के महीने में उनकी विशेष कृपा बरसती है। इस दिन रुद्राभिषेक करने से भक्त के समस्त पापों का विनाश भोले बाबा कर देते हैं। कालसर्प दोष से मुक्ति के लिये जातक ब्रह्म मुहूर्त में शिव मंदिर में जाकर षोडषोपचार से भगवान भोलेनाथ की पूजा करें और धतूरा चढ़ाकर 108 बार शिवमंत्र का जाप करें।
साथ ही चांदी के नाग-नागिन का जोड़ा भी शिवलिंग पर चढायें, भोले बाबा आपको दोष से मुक्त करेंगें। यदि जातक शारीरिक पीड़ा से निवारण चाहते हैं तो इस दि महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना भी लाभकारी होता है।
पंचमुखी रुद्राक्ष की माला लेकर भगवान शिव के मंत्र ऊं नम: शिवाय का जाप करने से तमाम तरह के क्लेश शांत हो जाते हैं।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन शिवरात्रि का व्रत कुंवारी कन्याओं के लिए श्रेष्ठ माना गया है। यह व्रत करने से उन्हें मनचाहा वर प्राप्त होता है।
सावन के पहले सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठ स्नान करके शिवजी में पूजा के दौरान संकल्प करें। संकल्प के बाद शिवलिंग पर पहले जल और फिर बाद में गाय का दूध अर्पित करें। इसके बाद पुष्प हार और चावल, कुमकुम, बिल्व पत्र, मिठाई आदि सामग्री चढ़ाएं। ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। इसके अलावा पंचमुखी रुद्राक्ष की माला लेकर भगवान शिव के मंत्र ओम नमः शिवाय का जाप करने से हर तरह के क्लेश शांत हो जाते हैं।
2020 में सावन शिवरात्रि तिथि व मुहूर्त
इस दिन भक्तगण फाल्गुन माह में आने वाली महाशिवरात्रि की ही तरह मंदिरों में जाकर भगवान शंकर की पूजा करते है, उनका अभिषेक करते है, और व्रत आदि करते है। यहाँ हम आपको वर्ष 2020 में श्रावण माह की शिवरात्रि की तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त बता रहे है। जिसके अनुसार आप पूजन कर सकते है।
निशिथ काल पूजा – 00:07 से 00:10 (20 जुलाई 2020)
व्रत पारण का समय – 05:36 बजे (20 जुलाई 2020)
चतुर्दशी तिथि आरंभ – 00:41 बजे (19 जुलाई 2020) से
चतुर्दशी तिथि समाप्त – 00:10 बजे (20 जुलाई 2020) तक
सावन शिवरात्रि व्रत विधि :-
श्रावण शिवरात्रि व्रत भी फाल्गुन माह की शिवरात्रि की भांति ही किया जाता है। शिवरात्रि व्रत से पहले दिन यानी त्रयोदशी तिथि को लोग एक ही बार भोजन करते है। जिसके बाद शिवरात्रि के दिन प्रातःकाल जल्दी जागकर स्नान आदि करकर भगवान शिव के मंदिर जाकर उनका अभिषेक करके पूजन करते है। पूजन करने के बाद भक्त पुए दिन उपवास करने का संकल्प लेते है। जिसका पारण अगले दिन किया जाता है। बहुत से लोग शिवरात्रि के दिन रात्रि में ही व्रत का पारण कल लेते है।
शिवरात्रि वाले दिन दूसरा स्नान सायंकाल में शिव पूजा से पहले किया जाता है। इस समय शिवरात्रि की सायंकाल पूजा की जाती है। जिसके बाद अगले दिन या उसी दिन सायं काल में व्रत का पारण किया जाता है।
शिवरात्रि व्रत को सभी मुख्य व्रतों में से एक माना जाता है। कहते है इस व्रत को करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। ऐसे तो वर्ष की 12 शिवरात्रियों का व्रत महत्वपूर्ण होता है लेकिन सभी में फाल्गुन माह की शिवरात्रि और श्रावण माह की शिवरात्रि को बहुत ही शुभ और ख़ास माना जाता है।
शिवरात्रि व्रत विधि: इस व्रत के एक दिन पहले यानी त्रयोदशी तिथि को व्रती को एक समय भोजन करना चाहिए। फिर व्रत वाले दिन सुबह नित्य कर्म के पश्चात व्रत करने का संकल्प लें। फिर शाम के समय स्नान के पश्चात शिव की विधि विधान पूजा कर व्रत का समापन करना चाहिए। लेकिन एक अन्य धारणा के अनुसार व्रत के समापन का सही समय चतुर्दशी के बाद का बताया गया है।
पूजा विधि: इस दिन मंदिर या घर पर शिव जी की पूजा करनी चाहिए। इस दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाने की भी परंपरा है। पूजा के समय भगवान शिव को जल, दूध, दही, शहद, घी, चीनी, इत्र, चंदन, केसर, भांग, धतूरा, गंगाजल, भांग, सफेद फूल, सफेद चंदन, धूप आदि चीजें अर्पित करें।


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