जानसठ Muzaffarnagar में 109 किसानों ने सीखा मोटे अनाज का महत्व, मिलेट्स की खेती से सेहत और मिट्टी दोनों बचाने पर जोर
News-Desk
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प्रशिक्षण के दौरान किसानों को बताया गया कि मिलेट्स केवल पारंपरिक मोटे अनाज नहीं हैं, बल्कि बदलती कृषि परिस्थितियों और पोषण संबंधी जरूरतों के बीच इनकी उपयोगिता फिर से बढ़ रही है। कार्यक्रम में खेती के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता, प्राकृतिक उत्पादन पद्धति, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और वर्षा ऋतु में गन्ने की फसल में होने वाले कीट एवं रोगों के प्रबंधन पर भी चर्चा की गई।
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि किसानों को केवल मिलेट्स की फसल लगाने की जानकारी तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि कृषि और पशुपालन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेषज्ञों ने जानकारी साझा की। इससे प्रशिक्षण को किसानों के लिए अधिक व्यापक और उपयोगी बनाने का प्रयास किया गया।
109 किसानों की भागीदारी से प्रशिक्षण कार्यक्रम में दिखी रुचि
जानसठ विकासखंड में आयोजित इस एक दिवसीय प्रशिक्षण में 109 किसानों ने प्रतिभाग किया। किसानों की भागीदारी यह बताती है कि खेती से जुड़े नए विकल्पों, पोषण आधारित फसलों और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में रुचि बनी हुई है।
मिलेट्स को बढ़ावा देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में किसानों को इन फसलों की उपयोगिता, पोषक तत्वों और उत्पादन से जुड़े पहलुओं की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसल चयन और बेहतर कृषि प्रबंधन की दिशा में भी जागरूक किया।
कार्यक्रम में मौजूद अधिकारियों और विशेषज्ञों ने किसानों से आग्रह किया कि वे मोटे अनाज की खेती के बारे में अधिक जानकारी हासिल करें और इसकी संभावनाओं को समझते हुए कृषि व्यवस्था में उचित स्थान दें।
डॉ. सतवीर सिंह सिरोही ने बताए मिलेट्स के स्वास्थ्य लाभ
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. सतवीर सिंह सिरोही ने किया। उन्होंने किसानों को मिलेट्स से जुड़े स्वास्थ्य लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि मोटे अनाज पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण खाद्यान्न हैं और इनके उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। उन्होंने किसानों को मिलेट्स की विभिन्न फसलों और उनसे मिलने वाले पोषक तत्वों के बारे में जानकारी दी।
डॉ. सिरोही ने प्राकृतिक तरीके से मिलेट्स के उत्पादन पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि ऐसी कृषि पद्धतियां अपनाने की जरूरत है जिनसे मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान न पहुंचे और लोगों को पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध हो सके।
मोटे अनाज की खेती बढ़ाने का किसानों से आह्वान
प्रशिक्षण के दौरान किसानों से मोटे अनाज की फसलों को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया। बदलते समय में मिलेट्स को लेकर देश और दुनिया में बढ़ती रुचि का उल्लेख करते हुए किसानों को इनके उत्पादन की संभावनाओं से परिचित कराया गया।
मिलेट्स में बाजरा, ज्वार, रागी और अन्य मोटे अनाज शामिल होते हैं। इन फसलों को कई क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से उगाया जाता रहा है, लेकिन आधुनिक कृषि व्यवस्था में कुछ समय तक इनका क्षेत्र सीमित हुआ।
अब पोषण, जलवायु अनुकूल खेती और विविध कृषि व्यवस्था जैसे विषयों के कारण मिलेट्स पर दोबारा ध्यान दिया जा रहा है।
प्राकृतिक खेती से मिट्टी को बचाने पर विशेष जोर
कार्यक्रम में मिलेट्स की खेती के साथ मिट्टी के संरक्षण को भी महत्वपूर्ण विषय बनाया गया। किसानों को बताया गया कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ मिट्टी की सेहत बनाए रखना भी जरूरी है।
प्राकृतिक और संतुलित कृषि पद्धतियों से मिट्टी में जैविक गतिविधियों को बनाए रखने और लंबे समय तक कृषि उत्पादकता को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों ने किसानों को इस दिशा में जागरूक करते हुए कहा कि खेती का उद्देश्य केवल वर्तमान फसल का उत्पादन नहीं होना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कृषि भूमि को उपजाऊ बनाए रखना जरूरी है।
कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़ा ने साझा की महत्वपूर्ण जानकारी
प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़ा के प्रभारी डॉ. यशपाल सिंह और उत्तम राठी ने मिलेट्स से संबंधित विषयों पर विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने किसानों को मोटे अनाज की खेती से जुड़े विभिन्न पहलुओं से परिचित कराया। किसानों को फसल उत्पादन के साथ कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा संचालित प्रशिक्षण गतिविधियों की भी जानकारी दी गई।
किसानों को बताया गया कि कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से परिसर में और परिसर से बाहर भी विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन प्रशिक्षणों के माध्यम से किसानों को कृषि तकनीक और उत्पादन से जुड़े विषयों पर जानकारी उपलब्ध कराई जाती है।
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रशिक्षण से किसानों को मिल सकता है तकनीकी लाभ
कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका किसानों तक वैज्ञानिक कृषि तकनीक पहुंचाने में महत्वपूर्ण होती है। प्रशिक्षण, प्रदर्शन, जागरूकता कार्यक्रम और तकनीकी सलाह के माध्यम से किसानों को खेती की बदलती जरूरतों के अनुसार जानकारी दी जाती है।
जानसठ के प्रशिक्षण में भी किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र की उपलब्ध प्रशिक्षण गतिविधियों के बारे में जानकारी दी गई। इससे किसान भविष्य में अपनी फसल और कृषि संबंधी जरूरतों के अनुसार विशेषज्ञ प्रशिक्षण से जुड़ सकते हैं।
मिलेट्स की खेती के साथ पोषण पर भी हुई चर्चा
कार्यक्रम में मोटे अनाज के पोषक महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। किसानों को बताया गया कि मिलेट्स में विभिन्न महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं और इन्हें संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है।
मिलेट्स की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे केवल खेती का पक्ष नहीं है। उपभोक्ताओं में भी पौष्टिक और पारंपरिक खाद्यान्नों को लेकर जागरूकता बढ़ी है।
ऐसे में किसानों के लिए मिलेट्स की खेती संभावित बाजार मांग से जुड़ा एक विकल्प भी बन सकती है। हालांकि किसी भी फसल का क्षेत्र बढ़ाने से पहले स्थानीय बाजार, पानी की उपलब्धता, मिट्टी और लागत जैसे पहलुओं का आकलन जरूरी होता है।
पशुपालन विभाग ने भी किसानों को दी उपयोगी जानकारी
कार्यक्रम में केवल फसल उत्पादन तक चर्चा सीमित नहीं रही। पशुपालन विभाग की ओर से भी किसानों को महत्वपूर्ण जानकारी दी गई।
पशुपालन विभाग की उप पशु चिकित्साधिकारी डॉ. स्नेहा निर्वाल ने पशुओं में वर्तमान समय में फैल रहे रोगों से संबंधित जानकारी साझा की।
उन्होंने किसानों को पशुओं के स्वास्थ्य और बीमारी से बचाव के संबंध में जागरूक किया। पशुओं में बीमारी की शुरुआती पहचान और समय पर पशु चिकित्सा सहायता लेने के महत्व पर भी किसानों को ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई।
पशुओं के रखरखाव और दुग्ध उत्पादन पर चर्चा
डॉ. स्नेहा निर्वाल ने पशुओं के बेहतर रखरखाव और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने से जुड़े पहलुओं पर भी जानकारी दी।
किसानों के लिए पशुपालन आय का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है। लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए पशुओं के स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और उचित देखभाल पर ध्यान देना जरूरी होता है।
प्रशिक्षण में किसानों को इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ पशुपालन से संबंधित जानकारी दी गई।
कृषि विभाग की योजनाओं की भी जानकारी
एडीओ कृषि श्री संदीप कुमार ने विकासखंड स्तर पर कृषि विभाग की ओर से संचालित विभिन्न योजनाओं के बारे में किसानों को जानकारी दी।
किसानों के लिए सरकारी योजनाओं की जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कृषि क्षेत्र में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और अन्य प्रकार के लाभ उपलब्ध कराए जाते हैं।
उन्होंने किसानों को मिलेट्स के इतिहास और वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता के बारे में भी बताया।
मोटे अनाज का इतिहास और बदलते समय में नई प्रासंगिकता
मोटे अनाज भारतीय कृषि और भोजन की परंपरा का हिस्सा रहे हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय तक इनका उत्पादन और सेवन सामान्य कृषि जीवन का हिस्सा रहा।
बदलते खान-पान और कृषि प्राथमिकताओं के कारण कुछ समय के लिए कई मोटे अनाज पीछे चले गए। लेकिन अब पोषण और टिकाऊ कृषि से जुड़े मुद्दों के कारण इनकी उपयोगिता पर फिर से चर्चा हो रही है।
प्रशिक्षण में किसानों को मिलेट्स की इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान उपयोगिता से परिचित कराया गया।
वर्षा ऋतु में गन्ने की फसल को लेकर किसानों को सावधान किया
जानसठ क्षेत्र में गन्ना किसानों के लिए महत्वपूर्ण फसल है। इसलिए प्रशिक्षण में वर्षा ऋतु के दौरान गन्ने की फसल के प्रबंधन को भी शामिल किया गया।
एडीओ कृषि संदीप कुमार ने गन्ने की फसल में इस मौसम के दौरान होने वाले कीट, रोग और पोषक तत्व प्रबंधन पर विस्तार से चर्चा की।
बारिश और नमी बढ़ने के दौरान फसल में विभिन्न प्रकार की समस्याओं का खतरा बदल सकता है। ऐसे में किसानों के लिए समय पर फसल की निगरानी करना जरूरी है।
कीट और रोग की समय पर पहचान जरूरी
गन्ने में किसी भी कीट या रोग की शुरुआती पहचान होने पर किसान उचित कृषि सलाह के अनुसार प्रबंधन कर सकते हैं।
प्रशिक्षण में किसानों को फसल की निगरानी और पोषक तत्वों के संतुलित प्रबंधन के महत्व से परिचित कराया गया।
किसानों के लिए यह जानकारी खास तौर पर उपयोगी हो सकती है क्योंकि वर्षा ऋतु में खेतों की स्थिति तेजी से बदलती है और नमी से जुड़ी परिस्थितियों का फसल पर असर पड़ सकता है।
पोषक तत्व प्रबंधन से बेहतर फसल की दिशा में मदद
किसी भी फसल के बेहतर विकास के लिए पोषक तत्वों का संतुलित प्रबंधन आवश्यक है। केवल अधिक मात्रा में उर्वरक डालना हमेशा बेहतर उत्पादन की गारंटी नहीं देता।
किसान को मिट्टी की स्थिति और फसल की आवश्यकता के आधार पर पोषक तत्व प्रबंधन करना चाहिए। वैज्ञानिक सलाह के आधार पर किया गया संतुलित प्रबंधन लागत और मिट्टी की सेहत दोनों के लिहाज से बेहतर हो सकता है।
जानसठ प्रशिक्षण में इस विषय पर किसानों को विस्तार से जानकारी दी गई।
प्रगतिशील किसान ध्यान सिंह ने साझा किए अपने अनुभव
कार्यक्रम में प्रगतिशील किसान ध्यान सिंह ने भी किसानों के साथ अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने मोटे अनाज से संबंधित अपने अनुभवों और जानकारी को अन्य किसानों के सामने रखा।
किसानों के बीच किसान का अनुभव साझा होना प्रशिक्षण का एक उपयोगी हिस्सा माना जाता है। खेत में आने वाली वास्तविक समस्याओं और उनके व्यावहारिक समाधान पर चर्चा से दूसरे किसानों को भी सीखने का अवसर मिलता है।
ध्यान सिंह ने मोटे अनाज से संबंधित विषयों पर अपने अनुभव साझा करते हुए किसानों को इसकी खेती की संभावनाओं से परिचित कराया।
किसानों के बीच विशेषज्ञों और प्रगतिशील किसान की बातचीत
कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि इसमें कृषि विभाग के अधिकारियों, कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों, पशुपालन विभाग के अधिकारी और प्रगतिशील किसान सभी एक मंच पर मौजूद रहे।
इससे किसानों को अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी जानकारी एक ही कार्यक्रम में प्राप्त हुई।
मिलेट्स से लेकर गन्ना प्रबंधन और पशुपालन तक विभिन्न विषयों पर चर्चा ने प्रशिक्षण को बहुआयामी बनाया।
मिलेट्स से खेती में विविधता लाने की संभावना
किसानों के लिए किसी एक या सीमित फसलों पर निर्भरता कई बार जोखिम बढ़ा सकती है। कृषि में विविधता लाने से किसान अलग-अलग फसलों के माध्यम से अपनी उत्पादन व्यवस्था को संतुलित कर सकते हैं।
मिलेट्स ऐसी फसलों में शामिल हो सकते हैं जिनकी खेती कुछ परिस्थितियों में कृषि विविधीकरण का हिस्सा बन सकती है।
हालांकि किसान के लिए फसल का चुनाव स्थानीय मिट्टी, पानी, मौसम, बाजार और लागत के आधार पर करना जरूरी है। प्रशिक्षण का उद्देश्य इसी तरह की जानकारी और विकल्पों के प्रति किसानों को जागरूक करना रहा।
मिट्टी की सेहत और पौष्टिक भोजन को जोड़ा गया
कार्यक्रम में मिलेट्स की खेती को केवल किसान की आय से जोड़कर नहीं देखा गया। इसके साथ मिट्टी और उपभोक्ता स्वास्थ्य के पहलू को भी जोड़ा गया।
प्राकृतिक तरीके से उत्पादन करने से मिट्टी पर अनावश्यक दबाव कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है। वहीं पौष्टिक खाद्यान्न का उत्पादन समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है।
इस तरह मिलेट्स की खेती को खेत से लेकर भोजन की थाली तक एक व्यापक विषय के रूप में किसानों के सामने रखा गया।
सरकारी योजनाओं की जानकारी किसानों के लिए महत्वपूर्ण
कृषि विभाग की योजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जानकारी किसानों तक पहुंचना जरूरी है। कई बार योजनाओं की जानकारी के अभाव में पात्र किसान भी उनका लाभ नहीं उठा पाते।
जानसठ में आयोजित प्रशिक्षण के दौरान किसानों को विकासखंड स्तर पर चल रही कृषि योजनाओं की जानकारी दी गई।
किसानों के लिए यह अवसर भी रहा कि वे कृषि अधिकारियों और विशेषज्ञों के सामने अपनी कृषि संबंधी जिज्ञासाएं और समस्याएं रख सकें।
बारिश के मौसम में खेतों की निगरानी पर जोर
प्रशिक्षण का आयोजन ऐसे समय में हुआ जब क्षेत्र में वर्षा ऋतु का प्रभाव है। बारिश के कारण खेतों की नमी, कीटों की गतिविधि और रोगों की स्थिति में बदलाव आ सकता है।
ऐसे समय में किसान खेतों का नियमित निरीक्षण करें और किसी भी असामान्य लक्षण की स्थिति में कृषि विशेषज्ञों से सलाह लें, यह कृषि प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
गन्ने की फसल को लेकर भी किसानों को इसी प्रकार सतर्क रहने की जानकारी दी गई।
मिलेट्स को लेकर किसानों में बढ़ रही जागरूकता
मोटे अनाज को लेकर देशभर में जागरूकता बढ़ने के साथ किसानों के बीच भी इसके उत्पादन पर चर्चा बढ़ी है। पौष्टिकता, पारंपरिक खाद्य संस्कृति और कृषि विविधीकरण के कारण मिलेट्स को फिर से महत्व दिया जा रहा है।
जानसठ में आयोजित प्रशिक्षण इसी जागरूकता को स्थानीय किसानों तक पहुंचाने का एक प्रयास रहा।
किसानों को बताया गया कि मोटे अनाज केवल पुराने समय की फसल नहीं हैं, बल्कि वर्तमान परिस्थितियों में भी इनकी उपयोगिता पर विचार किया जा रहा है।
कृषि के साथ पशुपालन को भी आय के विकल्प के रूप में समझना जरूरी
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती और पशुपालन अक्सर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। किसान फसल उत्पादन के साथ पशुपालन करके अपनी आय के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं।
इसीलिए प्रशिक्षण में पशुओं के स्वास्थ्य, रोग नियंत्रण, रखरखाव और दुग्ध उत्पादन पर जानकारी देना किसानों के लिए उपयोगी रहा।
विशेषज्ञों ने किसानों को पशुओं की नियमित देखभाल और समय पर पशु चिकित्सा सलाह लेने के महत्व से अवगत कराया।
कार्यक्रम में कृषि विभाग के कई अधिकारी और कर्मचारी रहे मौजूद
प्रशिक्षण कार्यक्रम में कृषि विभाग के विषय वस्तु विशेषज्ञ श्री मनोज कुमार, प्राविधिक सहायक श्री लोकेंद्र कुमार, अश्वनी कुमार और चंद्रशेन उपस्थित रहे।
इसके अलावा ब्लॉक तकनीकी प्रबंधक राजीव कुमार, शिवपाल कुमार और सुधीर कुमार भी कार्यक्रम में मौजूद रहे।
अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी ने प्रशिक्षण कार्यक्रम के संचालन और किसानों तक तकनीकी जानकारी पहुंचाने में सहयोग किया।
किसानों के लिए प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं
ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों का वास्तविक उद्देश्य किसानों को ऐसी जानकारी उपलब्ध कराना है जिसे वे अपनी कृषि गतिविधियों में उपयोग कर सकें।
मिलेट्स की खेती, प्राकृतिक उत्पादन, गन्ने में कीट एवं रोग प्रबंधन, पोषक तत्वों की आवश्यकता और पशुपालन से जुड़ी जानकारी किसानों के दैनिक कृषि निर्णयों में उपयोगी हो सकती है।
किसानों को विशेषज्ञों से सीधे संवाद का अवसर मिलने से स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सवाल पूछने और जानकारी हासिल करने की संभावना भी बढ़ती है।
जानसठ में कृषि जागरूकता का संदेश
जानसठ में आयोजित कार्यक्रम ने एक साथ कई कृषि विषयों को सामने रखा। मिलेट्स को बढ़ावा देने के साथ मिट्टी संरक्षण, प्राकृतिक कृषि, पशु स्वास्थ्य और गन्ने की फसल प्रबंधन पर चर्चा हुई।
इससे किसानों को खेती को केवल एक फसल तक सीमित न रखकर व्यापक कृषि व्यवस्था के रूप में देखने का अवसर मिला।
कार्यक्रम में शामिल 109 किसानों तक पहुंची जानकारी भविष्य में उनके कृषि निर्णयों में उपयोगी हो सकती है।
मिलेट्स की खेती से पहले बाजार और स्थानीय परिस्थितियों को समझना जरूरी
मिलेट्स को बढ़ावा देने की दिशा में प्रशिक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन किसान के लिए किसी भी फसल को अपनाने से पहले स्थानीय परिस्थितियों का मूल्यांकन जरूरी है।
बीज की उपलब्धता, मिट्टी, पानी, उत्पादन लागत, स्थानीय बाजार, खरीदार और संभावित मूल्य जैसे पहलुओं की जानकारी लेकर किसान बेहतर निर्णय ले सकते हैं।
प्रशिक्षण से प्राप्त वैज्ञानिक जानकारी के साथ स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह किसानों के लिए उपयोगी हो सकती है।
स्वास्थ्य, मिट्टी और खेती—तीनों को जोड़ने की कोशिश
जानसठ का यह प्रशिक्षण केवल एक कृषि कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि इसमें स्वास्थ्य, मिट्टी और कृषि उत्पादन को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया।
मिलेट्स के पोषण लाभों पर चर्चा के साथ प्राकृतिक उत्पादन और मिट्टी संरक्षण की बात हुई। वहीं किसानों की रोजमर्रा की कृषि जरूरतों को ध्यान में रखते हुए गन्ने और पशुपालन से जुड़े विषय भी शामिल किए गए।
इस तरह कार्यक्रम ने किसानों को कृषि की बदलती जरूरतों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया।
आगे किसानों के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन की जरूरत
कृषि क्षेत्र लगातार बदल रहा है। मौसम में बदलाव, लागत, बाजार, कीट और रोग जैसी चुनौतियां किसानों के सामने बनी रहती हैं।
ऐसे में एक दिवसीय प्रशिक्षण किसानों को शुरुआती जानकारी देने का माध्यम बन सकता है, लेकिन लगातार तकनीकी मार्गदर्शन और खेत स्तर पर वैज्ञानिक सलाह भी महत्वपूर्ण है।
कृषि विज्ञान केंद्र और विभागीय अधिकारियों के माध्यम से किसानों तक समय-समय पर तकनीकी जानकारी पहुंचती रहे तो इसका लाभ उत्पादन और कृषि प्रबंधन में दिखाई दे सकता है।

