फिल्मी चक्कर

कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन पर Kangana Ranaut का हमला पड़ा भारी? कुनिका सदानंद ने शेयर किया एक्ट्रेस का पुराना एड, बोलीं- ‘मेरा कुत्ता कुत्ता, तेरा कुत्ता टॉमी?’

बॉलीवुड में फिल्मों और अभिनय से इतर सितारों के बयान भी कई बार बड़ी बहस का कारण बन जाते हैं। इन दिनों ऐसा ही एक विवाद अभिनेत्री Kangana Ranaut और कृति सेनन को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा में है। मामला कृति सेनन के एक रक्षाबंधन विज्ञापन में पहने गए कपड़ों से शुरू हुआ, जिस पर कंगना ने सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाए। अब इस विवाद में वरिष्ठ अभिनेत्री कुनिका सदानंद की एंट्री ने चर्चा को एक नया मोड़ दे दिया है।

कुनिका सदानंद ने कंगना के एक पुराने विज्ञापन की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की है। इस पुराने विज्ञापन में कंगना खुद एक जूलरी ब्रांड को प्रमोट करती दिखाई दे रही हैं और तस्वीर में उनका पहनावा भी काफी बोल्ड नजर आता है। कुनिका ने तस्वीर के साथ तंज कसते हुए लिखा, “मेरा कुत्ता कुत्ता, तेरा कुत्ता टॉमी?”

कुनिका की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर बहस और तेज हो गई। यूजर्स ने कंगना के पुराने विज्ञापन और कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन की तुलना शुरू कर दी। अब चर्चा केवल कृति के कपड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या किसी अभिनेत्री द्वारा अलग-अलग समय पर पहने गए परिधानों को लेकर मानदंड समान होने चाहिए।

कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन से शुरू हुआ पूरा विवाद

विवाद की शुरुआत जूलरी ब्रांड GIVA के एक रक्षाबंधन विज्ञापन से हुई। करीब 36 सेकंड के इस विज्ञापन में कृति सेनन नजर आई थीं। विज्ञापन में उन्होंने ऑफ-व्हाइट रंग का ब्रालेट स्टाइल ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट पहना था।

रक्षाबंधन जैसे पारिवारिक और पारंपरिक त्योहार की थीम पर आधारित इस विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया पर एक वर्ग ने आपत्ति जताई। आलोचना करने वालों का तर्क था कि भाई-बहन के रिश्ते और पारिवारिक भावनाओं से जुड़े त्योहार को दर्शाते हुए परिधान और प्रस्तुति को भारतीय पारंपरिक संवेदनाओं के अनुरूप रखा जाना चाहिए था।

दूसरी ओर, विज्ञापन के समर्थन में यह तर्क भी सामने आया कि त्योहारों की भावना को केवल कपड़ों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसी विरोधाभास ने देखते ही देखते सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस का रूप ले लिया।

कंगना रनोट ने बिना नाम लिए कृति के विज्ञापन पर उठाए सवाल

सोशल मीडिया पर विज्ञापन को लेकर चर्चा के बीच कंगना रनोट ने कृति का नाम सीधे तौर पर लिए बिना अपनी राय रखी। कंगना ने महिलाओं के पास मौजूद फैशन विकल्पों का जिक्र करते हुए कहा कि आज महिलाएं कॉकटेल ड्रेस से लेकर लहंगा-चोली, जींस, साड़ी, बिकिनी और सलवार-कमीज तक कई तरह के कपड़े पहन सकती हैं।

इसके बाद उन्होंने सवाल उठाया कि भाई को राखी बांधते समय बिकिनी या अंडरगारमेंट जैसे परिधान पहनने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए। कंगना ने विज्ञापन को लेकर यह भी कहा कि शायद इसे जानबूझकर अजीब तरीके से बनाया गया हो।

कंगना की टिप्पणी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग राय बनती दिखाई दीं। कुछ लोगों ने उनके विचारों का समर्थन किया और त्योहारों की पारंपरिक गरिमा का हवाला दिया, जबकि दूसरे वर्ग ने इसे महिलाओं के पहनावे पर टिप्पणी और व्यक्तिगत पसंद में दखल के रूप में देखा।

कंगना ने त्योहार और पहनावे को लेकर रखी अपनी दलील

कंगना का तर्क केवल एक विज्ञापन के कपड़ों तक सीमित नहीं था। उन्होंने त्योहारों की सांस्कृतिक पहचान का सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या किसी दूसरे धर्म के महत्वपूर्ण त्योहार में भी इसी तरह के परिधान को सहजता से स्वीकार किया जाएगा।

डीडी न्यूज को दिए गए इंटरव्यू में भी कंगना ने इसी मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी मुस्लिम त्योहार के दौरान भी इस तरह के कपड़े पहने हुए विज्ञापन को उसी तरह प्रस्तुत किया जा सकता है।

कंगना का कहना था कि त्योहार केवल एक व्यावसायिक अवसर नहीं होता, बल्कि उसके पीछे एक संस्कृति और सामाजिक भावना होती है। उनके अनुसार, त्योहारों को प्रस्तुत करते समय उससे जुड़ी सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखना चाहिए।

यही टिप्पणी विवाद के सबसे अहम हिस्सों में से एक बन गई है। एक पक्ष इसे सांस्कृतिक मर्यादा का सवाल मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे महिला के पहनावे को लेकर अनावश्यक निगरानी के रूप में देख रहा है।

कृति सेनन ने दिया जवाब, बोलीं- संस्कृति नेकलाइन में नहीं, दिल में होती है

कंगना की टिप्पणी के बाद कृति सेनन ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी। उन्होंने बिना विवाद को व्यक्तिगत बनाने के त्योहारों की मूल भावना पर जोर दिया।

कृति ने कहा कि त्योहार का अर्थ किसी व्यक्ति के पहने हुए कपड़ों से नहीं, बल्कि परंपराओं के प्रति उसके मन में मौजूद भावना और उनके महत्व से तय होता है।

उन्होंने रक्षाबंधन को सुरक्षा और भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा त्योहार बताते हुए कहा कि वह और उनकी बहन एक-दूसरे को राखी बांधती हैं और दोनों यह मानती हैं कि वे एक-दूसरे की उसी तरह रक्षा कर सकती हैं, जैसे भाई-बहन के पारंपरिक रिश्ते में सुरक्षा की भावना को देखा जाता है।

कृति ने महिलाओं के पहनावे को लेकर बार-बार सवाल किए जाने पर भी आपत्ति जताई। उनका सवाल था कि आखिर महिलाओं को यह बताना कब बंद किया जाएगा कि उन्हें क्या पहनना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ एथनिक फैशन बदलता रहा है, लेकिन किसी महिला की संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान को केवल उसके कपड़ों के आधार पर मापना उचित नहीं है।

कृति की प्रतिक्रिया की सबसे ज्यादा चर्चा उस विचार को लेकर हुई जिसमें उन्होंने संस्कृति और परंपरा को महिला की सोच और भावनाओं से जोड़ते हुए कहा कि संस्कृति उसके दिल में होती है, उसकी नेकलाइन में नहीं।

कुनिका सदानंद ने कंगना का पुराना विज्ञापन निकालकर बढ़ाई बहस

जब कंगना और कृति के बीच यह वैचारिक बहस चल रही थी, तभी वरिष्ठ अभिनेत्री कुनिका सदानंद ने कंगना के पुराने विज्ञापन की तस्वीर सामने रख दी।

कुनिका द्वारा साझा की गई तस्वीर 2017 के एक जूलरी विज्ञापन की बताई जा रही है। खास बात यह है कि इस विज्ञापन को कंगना ने उस समय खुद अपने सोशल मीडिया हैंडल से शेयर किया था।

विज्ञापन में कंगना स्ट्रैपलेस और डीप नेकलाइन वाली ड्रेस में जूलरी ब्रांड को प्रमोट करती नजर आती हैं। यही वजह है कि कुनिका ने इस पुराने विज्ञापन को मौजूदा विवाद के संदर्भ में सामने रखते हुए कंगना पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़ा किया।

तस्वीर के साथ लिखा गया उनका वाक्य—“मेरा कुत्ता कुत्ता, तेरा कुत्ता टॉमी?”—सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बन गया।

कुनिका ने सीधे तौर पर लंबा स्पष्टीकरण नहीं दिया, लेकिन पुरानी तस्वीर और तंज भरी लाइन को साथ रखने से पोस्ट का संकेत साफ तौर पर मौजूदा विवाद की ओर जाता दिखाई दिया।

2017 के पुराने एड ने क्यों बदल दिया विवाद का एंगल?

कुनिका की पोस्ट के बाद बहस का स्वरूप बदल गया। पहले सवाल यह था कि कृति सेनन ने रक्षाबंधन के विज्ञापन में किस तरह के कपड़े पहने और क्या वह त्योहार की थीम के अनुरूप थे। लेकिन कंगना के पुराने विज्ञापन की तस्वीर सामने आने के बाद चर्चा का केंद्र अभिनेत्री के कथित दोहरे मानदंडों पर पहुंच गया।

सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल किया कि यदि किसी महिला के पहनावे को लेकर सांस्कृतिक और त्योहार की मर्यादा की बात की जा रही है, तो क्या वही मानदंड पुराने विज्ञापनों पर भी लागू किए जाने चाहिए।

हालांकि, किसी पुराने विज्ञापन और वर्तमान विज्ञापन की परिस्थितियां बिल्कुल समान हों, यह जरूरी नहीं है। किसी विज्ञापन का उद्देश्य, उसका संदर्भ, ब्रांड की क्रिएटिव रणनीति और कलाकार की भूमिका अलग हो सकती है। इसलिए केवल तस्वीरों की तुलना से पूरे मामले पर अंतिम फैसला निकालना भी उचित नहीं होगा।

फिर भी सोशल मीडिया की दुनिया में पुरानी तस्वीरों का सामने आना अक्सर बहस को और धार दे देता है। इस मामले में भी यही देखने को मिला।

राहुल गांधी ने कृति सेनन का किया समर्थन

विवाद राजनीतिक गलियारों तक भी पहुंच गया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कृति सेनन की पोस्ट को री-शेयर करते हुए उनका समर्थन किया।

राहुल गांधी ने कहा कि कोई महिला क्या पहनती है, क्या करती है और कहां जाती है, यह उसकी अपनी पसंद है। उन्होंने महिलाओं के कपड़ों और जीवनशैली की ऑनलाइन निगरानी या पुलिसिंग की आलोचना की।

अपने पोस्ट में राहुल गांधी ने ‘Smash the Patriarchy’ हैशटैग का इस्तेमाल किया।

राहुल के समर्थन के बाद विवाद को लेकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस भी दिखाई देने लगी। एक तरफ कृति के बयान को महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थन के रूप में देखा गया, तो दूसरी तरफ कुछ लोगों ने इसे त्योहारों की सांस्कृतिक प्रस्तुति से जुड़े मूल सवाल से अलग मुद्दा बताया।

रक्षाबंधन, परंपरा और बदलती फैशन संस्कृति की बहस

इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या त्योहारों की आधुनिक प्रस्तुति में पारंपरिक पहनावे को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए?

भारत में त्योहारों की संस्कृति लगातार बदल रही है। सोशल मीडिया, फिल्मों, विज्ञापनों और फैशन इंडस्ट्री ने पारंपरिक परिधानों की प्रस्तुति को भी काफी बदला है। साड़ी, लहंगा, सलवार-कमीज और अन्य भारतीय परिधानों के डिजाइन आज पहले की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक रूप में दिखाई देते हैं।

वहीं, त्योहारों की अपनी सांस्कृतिक संवेदनशीलता भी होती है। रक्षाबंधन जैसे त्योहार को परिवार, भाई-बहन के रिश्ते और भावनात्मक जुड़ाव से जोड़ा जाता है। ऐसे में विज्ञापन बनाने वाली कंपनियों के सामने चुनौती रहती है कि वे आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन कैसे स्थापित करें।

यही संतुलन इस विवाद की जड़ में भी दिखाई देता है।

क्या विज्ञापन में फैशन और त्योहार के बीच संतुलन जरूरी है?

विज्ञापन मूल रूप से उत्पादों को लोगों तक आकर्षक तरीके से पहुंचाने का माध्यम है। जूलरी, कपड़े और लाइफस्टाइल ब्रांड अक्सर अपने विज्ञापनों में फैशन और ग्लैमर को प्रमुखता देते हैं।

लेकिन जब किसी विज्ञापन की थीम किसी धार्मिक, सांस्कृतिक या पारिवारिक त्योहार से जुड़ती है, तो दर्शकों की अपेक्षाएं भी बदल सकती हैं। एक वर्ग पारंपरिक प्रतीकों और पहनावे को प्राथमिकता दे सकता है, जबकि दूसरा वर्ग आधुनिक प्रस्तुति को भी उसी सांस्कृतिक संदर्भ का हिस्सा मान सकता है।

इसी अंतर के कारण एक ही विज्ञापन अलग-अलग लोगों को बिल्कुल अलग तरीके से दिखाई दे सकता है।

सोशल मीडिया ने विवाद को बनाया और ज्यादा बड़ा

अगर यही विवाद कुछ वर्ष पहले होता, तो संभव है कि इसकी चर्चा सीमित माध्यमों तक रहती। लेकिन आज सोशल मीडिया पर कोई भी विज्ञापन कुछ ही घंटों में व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है।

कृति सेनन के विज्ञापन की क्लिप और तस्वीरें सोशल मीडिया पर चर्चा में आईं। इसके बाद कंगना की टिप्पणी सामने आई और फिर कृति का जवाब आया। राहुल गांधी के समर्थन के बाद राजनीतिक पहलू भी जुड़ गया। इसके बाद कुनिका सदानंद द्वारा कंगना का पुराना विज्ञापन साझा किए जाने से बहस ने एक और दिशा पकड़ ली।

इस तरह एक जूलरी विज्ञापन से शुरू हुई चर्चा धीरे-धीरे कपड़े, संस्कृति, महिला स्वतंत्रता, त्योहारों की प्रस्तुति और सेलिब्रिटी के पुराने बयानों तक पहुंच गई।

ब्रांड ने विवाद बढ़ने के बाद विज्ञापन हटाया

विवाद बढ़ने के बाद संबंधित जूलरी ब्रांड ने आधिकारिक बयान जारी किया और माफी मांगी। ब्रांड ने विज्ञापन को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से हटा दिया।

ब्रांड के इस कदम के बाद भी विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, क्योंकि तब तक विज्ञापन को लेकर अलग-अलग पक्षों की राय सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से सामने आ चुकी थी।

विज्ञापन हटाना इस बात का संकेत जरूर है कि ब्रांड ने उठे विवाद को गंभीरता से लिया, लेकिन इसके साथ यह बहस भी जारी रही कि किसी विज्ञापन को हटाना समस्या का समाधान है या फिर विज्ञापन की रचनात्मकता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर पहले से अधिक विचार करने की जरूरत है।

कंगना बनाम कृति की बहस से आगे बढ़कर मुद्दा क्या बन गया?

पहली नजर में यह विवाद दो अभिनेत्रियों की अलग-अलग राय जैसा दिखाई देता है, लेकिन इसके भीतर कई स्तर हैं। एक ओर त्योहारों की सांस्कृतिक पहचान और उनके पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने की बात है। दूसरी ओर महिलाओं के कपड़ों और व्यक्तिगत पसंद को लेकर समाज की अपेक्षाओं का सवाल है।

कृति का कहना है कि संस्कृति को कपड़ों की नेकलाइन से नहीं मापा जाना चाहिए। कंगना का तर्क है कि त्योहार की प्रस्तुति में सांस्कृतिक संदर्भ और गरिमा को ध्यान में रखना चाहिए।

दोनों पक्षों की दलीलें अलग आधार पर खड़ी हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर राय भी बंटी हुई दिखाई दे रही है।

कुनिका सदानंद की पोस्ट ने कंगना के लिए खड़ा किया असहज सवाल

कुनिका सदानंद की पोस्ट ने इस विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए पैदा की क्योंकि उन्होंने सीधे कंगना के पुराने विज्ञापन को सामने रखा। इससे कंगना की मौजूदा टिप्पणी को उनके पुराने सार्वजनिक विज्ञापन से जोड़कर देखा जाने लगा।

हालांकि, किसी व्यक्ति के पुराने विज्ञापन और वर्षों बाद दिए गए विचार के बीच संदर्भगत अंतर हो सकता है। समय के साथ किसी व्यक्ति की सोच बदल सकती है और अलग-अलग विज्ञापनों की रचनात्मक परिस्थितियां भी अलग हो सकती हैं।

फिर भी सार्वजनिक जीवन में दिए गए बयानों के साथ पुराने रिकॉर्ड सामने आना कोई नई बात नहीं है। खासकर सोशल मीडिया के दौर में किसी सेलिब्रिटी का पुराना फोटो, वीडियो या पोस्ट अचानक वर्तमान बहस का हिस्सा बन सकता है।

बॉलीवुड में कपड़ों को लेकर विवाद कोई नया विषय नहीं

फिल्म इंडस्ट्री और विज्ञापन जगत में अभिनेत्रियों के कपड़ों को लेकर विवाद समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कभी फिल्म के पोस्टर, कभी किसी गाने का कॉस्ट्यूम और कभी किसी ब्रांड का विज्ञापन सोशल मीडिया पर बहस छेड़ देता है।

इस तरह के मामलों में एक बड़ा सवाल यह भी रहता है कि किसी कलाकार के काम को उसके अभिनय और पेशेवर भूमिका के संदर्भ में देखा जाए या उसके निजी पहनावे और सार्वजनिक छवि के आधार पर।

महिला कलाकारों के मामले में यह बहस अक्सर और तीखी हो जाती है। उनसे एक साथ आधुनिक, ग्लैमरस, पारंपरिक और सांस्कृतिक अपेक्षाओं को पूरा करने की उम्मीद की जाती है। इसी विरोधाभास के कारण कपड़ों से जुड़े विवाद जल्दी व्यापक सामाजिक बहस का रूप ले लेते हैं।

रक्षाबंधन के बहाने सामने आई बदलते समाज की तस्वीर

रक्षाबंधन भारतीय समाज में भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा महत्वपूर्ण त्योहार है। लेकिन बदलते समय के साथ इस रिश्ते को देखने का नजरिया भी बदल रहा है। अब बहन केवल भाई से सुरक्षा पाने वाली भूमिका में नहीं देखी जाती, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में आपसी सुरक्षा, सहयोग और समानता पर भी जोर दिया जाता है।

कृति सेनन ने अपने बयान में इसी बदलती सोच की ओर इशारा किया। उन्होंने अपनी बहन के साथ राखी के रिश्ते का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों एक-दूसरे की रक्षा कर सकती हैं।

यही विचार आधुनिक शहरी परिवारों में बदलते रिश्तों को भी दर्शाता है, जहां पारंपरिक भूमिकाओं की जगह अधिक समान साझेदारी की अवधारणा मजबूत हो रही है।

विवाद में दर्शकों की भूमिका भी अहम

सोशल मीडिया पर किसी विज्ञापन की सफलता या विवाद दोनों ही दर्शकों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करते हैं। कंपनियां आज केवल विज्ञापन प्रसारित नहीं करतीं, बल्कि उसकी प्रतिक्रिया पर भी नजर रखती हैं।

किसी विज्ञापन को पसंद किया जाना उसकी पहुंच बढ़ाता है, जबकि आलोचना होने पर वही विज्ञापन ब्रांड के लिए संकट बन सकता है। ऐसे में ब्रांड्स को त्योहारों और सांस्कृतिक प्रतीकों पर आधारित अभियानों में रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ-साथ दर्शकों की संवेदनशीलता का भी ध्यान रखना पड़ता है।

GIVA के इस विज्ञापन के मामले में विवाद बढ़ने के बाद उसे हटाने का फैसला इसी व्यापक डिजिटल माहौल की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है।

अब सोशल मीडिया पर असली बहस किस बात की है?

कंगना रनोट और कृति सेनन के बीच शुरू हुई बहस अब केवल एक विज्ञापन की ड्रेस को लेकर नहीं रह गई है। इसमें यह सवाल भी शामिल हो गया है कि महिलाओं को उनके कपड़ों के आधार पर कितना जज किया जाना चाहिए और त्योहारों की सांस्कृतिक गरिमा की सीमा कौन तय करेगा।

कुनिका सदानंद द्वारा कंगना का पुराना विज्ञापन साझा किए जाने से एक और सवाल जुड़ गया है—क्या सार्वजनिक जीवन में किसी व्यक्ति द्वारा व्यक्त किए गए वर्तमान विचारों को उसके पुराने काम और बयानों की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए?

इन सवालों का जवाब अलग-अलग लोगों के लिए अलग हो सकता है। लेकिन इतना जरूर है कि रक्षाबंधन के एक जूलरी विज्ञापन ने बॉलीवुड, फैशन, संस्कृति और महिला स्वतंत्रता से जुड़ी कई बहसों को एक साथ सामने ला दिया है।

 

कंगना रनोट, कृति सेनन और कुनिका सदानंद से जुड़ा यह विवाद फिलहाल सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन पर कंगना की आपत्ति, कृति का जवाब, राहुल गांधी का समर्थन और इसके बाद कुनिका सदानंद द्वारा कंगना का 2017 का पुराना जूलरी विज्ञापन सामने लाए जाने से मामला कई स्तरों पर पहुंच गया है। वहीं, विज्ञापन हटाकर ब्रांड की ओर से माफी मांगे जाने के बाद भी त्योहारों की प्रस्तुति, महिलाओं के पहनावे और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर बहस जारी है। ऐसे मामलों में अलग-अलग राय होना स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक चर्चा में तथ्यों और पूरे संदर्भ को ध्यान में रखना जरूरी है।

 

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