Kanpur-13 साल की मानसिक रूप से कमजोर बच्ची से दरिंदगी: गर्भवती होने के बाद खुला राज, दोषी को उम्रकैद; कोर्ट बोला- यह मानवता के खिलाफ अपराध











Kanpur Minor Rape Case में विशेष पॉक्सो न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 13 वर्षीय मानसिक रूप से कमजोर नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म करने और उसे गर्भवती बनाने के दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर और मानवता के खिलाफ अपराध बताते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों में किसी भी प्रकार की नरमी की गुंजाइश नहीं है।
विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) पवन कुमार राय ने दोषी मोहम्मद कमालुद्दीन उर्फ मुन्ना भाई को जीवनपर्यंत कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही अदालत ने उस पर दो लाख एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि जुर्माने की पूरी राशि पीड़िता को प्रदान की जाए ताकि उसके पुनर्वास और भविष्य की जरूरतों में सहायता मिल सके।
मां की मौत के बाद नानी और मौसी के सहारे पल रही थी बच्ची
मामले के अनुसार पीड़िता कानपुर के ट्रांसपोर्टनगर क्षेत्र स्थित ढकनापुरवा इलाके में अपनी नानी और मौसी के साथ रहती थी। जब वह मात्र दो वर्ष की थी, तभी उसकी मां का निधन हो गया था। इसके बाद नानी और मौसी ने ही उसका पालन-पोषण किया।
परिवार को समय के साथ यह भी पता चला कि बच्ची मानसिक रूप से कमजोर है। इसके बावजूद परिजनों ने उसकी देखभाल में कोई कमी नहीं रखी और उसे सुरक्षित वातावरण देने का प्रयास किया। लेकिन पड़ोस में रहने वाले आरोपी की नजर इस मासूम बच्ची पर पड़ गई और उसने उसकी कमजोरी का फायदा उठाया।
बिस्कुट का लालच देकर पार्क में ले जाता था आरोपी
अदालती रिकॉर्ड और जांच के अनुसार आरोपी मोहम्मद कमालुद्दीन उर्फ मुन्ना भाई बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले जाता था। आरोप है कि जब बच्ची रात के समय घर के आंगन में सोती थी, तब आरोपी उसे उठाकर बिस्कुट खिलाने का लालच देता और पास के पार्क में ले जाता था।
वहीं आरोपी ने कई बार उसके साथ दुष्कर्म किया। चूंकि बच्ची मानसिक रूप से कमजोर थी, इसलिए वह लंबे समय तक इस अपराध को समझ नहीं पाई और न ही किसी को इसके बारे में बता सकी।
यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा, जिसके कारण पीड़िता गर्भवती हो गई।
तबीयत बिगड़ने पर खुला मामला, जांच में चार माह की गर्भावस्था सामने आई
घटना का खुलासा तब हुआ जब बच्ची की तबीयत लगातार खराब रहने लगी। परिजनों को उसकी स्थिति पर संदेह हुआ और चिकित्सकीय जांच कराई गई।
जांच रिपोर्ट आने के बाद परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। डॉक्टरों ने बताया कि नाबालिग बच्ची लगभग चार माह की गर्भवती है।
जब परिजनों ने उससे पूछताछ की तो उसने अपने साथ हुई पूरी घटना बताई। इसके बाद मौसी ने बाबूपुरवा थाने में 17 अक्टूबर 2023 को आरोपी कमालुद्दीन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई।
कोर्ट में पेश हुए नौ गवाह, सबूतों के आधार पर हुई सजा
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत में मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत किए। विशेष लोक अभियोजक के अनुसार पीड़िता, उसकी मौसी, नानी सहित कुल नौ गवाहों को अदालत में पेश किया गया।
चिकित्सकीय रिपोर्ट, गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित होते हैं।
सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए कठोर सजा सुनाई।
गर्भपात संभव नहीं था, नाबालिग ने बच्ची को जन्म दिया
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह रहा कि जब गर्भावस्था का पता चला तब काफी समय बीत चुका था। चिकित्सकीय विशेषज्ञों की राय के अनुसार गर्भपात कराने से पीड़िता की जान को गंभीर खतरा हो सकता था।
ऐसी स्थिति में गर्भावस्था को जारी रखना पड़ा और बाद में नाबालिग ने एक बच्ची को जन्म दिया।
वर्तमान में वह बच्ची लगभग एक वर्ष की बताई जा रही है। इस प्रकार जो स्वयं अभी नाबालिग है, उसके जीवन पर अपनी बच्ची की जिम्मेदारी भी आ गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में पीड़िताओं को केवल कानूनी न्याय ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक, चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक सहायता की भी आवश्यकता होती है।
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को भी दिए गए विशेष निर्देश
अदालत ने केवल सजा सुनाने तक खुद को सीमित नहीं रखा बल्कि पीड़िता और उसकी बच्ची के भविष्य को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए।
न्यायालय ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि पीड़िता प्रतिकर योजना के तहत उचित क्षतिपूर्ति राशि उपलब्ध कराई जाए। यह राशि पीड़िता और उसकी बच्ची के संरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास के लिए उपयोग की जाएगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में आर्थिक सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था पीड़ित परिवार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
रहम की अपील खारिज, कोर्ट ने अपराध को बताया मानवता के खिलाफ
सजा सुनाए जाने के दौरान आरोपी की ओर से दया और राहत की अपील भी की गई, लेकिन अदालत ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
विशेष न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला केवल कानून के उल्लंघन का नहीं बल्कि मानवता के विरुद्ध किए गए गंभीर अपराध का उदाहरण है। एक मानसिक रूप से कमजोर नाबालिग बच्ची के साथ इस प्रकार का कृत्य समाज की संवेदनाओं को झकझोरने वाला है।
अदालत ने कहा कि अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर है और दोषी किसी भी प्रकार की सहानुभूति का पात्र नहीं है।
महिला और बाल सुरक्षा को लेकर फिर उठे सवाल
यह मामला एक बार फिर समाज में बच्चों और विशेष रूप से मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार, समाज और प्रशासन को मिलकर ऐसे बच्चों की सुरक्षा के लिए अधिक सतर्क और संवेदनशील होने की आवश्यकता है।
साथ ही बच्चों को सुरक्षित वातावरण, जागरूकता और समय पर सहायता उपलब्ध कराना भी बेहद जरूरी है ताकि इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके।









