Meerut में बारिश बना काल: चलती बाइक पर गिरा जामुन का पेड़, बाप-बेटी की दर्दनाक मौत, पत्नी और कैंटर चालक घायल
Meerut । उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जहां बारिश के दौरान एक विशालकाय जामुन का पेड़ सड़क किनारे उखड़कर चलती बाइक पर जा गिरा। यह हादसा मवाना-परीक्षितगढ़ मार्ग पर बृहस्पतिवार सुबह करीब साढ़े नौ बजे हुआ, जब मौसम अचानक बिगड़ा और तेज बारिश के साथ आंधी चलने लगी। उसी समय मवाना निवासी 30 वर्षीय उवैश अपनी पत्नी शहजादी और ढाई साल की बेटी बेबी निदा के साथ बाइक से सफर कर रहे थे। लेकिन यह सफर उनकी जिंदगी का आखिरी सफर बन गया।
चलती बाइक पर कहर बन गिरा पेड़, मौके पर ही पिता-बेटी की मौत
हादसा इतना भयावह था कि पेड़ के गिरते ही बाइक पूरी तरह दब गई। उवैश और मासूम निदा की मौके पर ही मौत हो गई। उनकी पत्नी शहजादी को स्थानीय लोगों की मदद से घायल अवस्था में मवाना अस्पताल पहुंचाया गया, जहां से गंभीर हालत में मेरठ रेफर कर दिया गया।
लोगों का कहना है कि उवैश अपनी बेटी को चेकअप के लिए मेरठ किसी डॉक्टर के पास ले जा रहा था। किसी को क्या पता था कि तेज बारिश और हवा मिलकर उनके पूरे परिवार पर कहर बनकर टूटेगी।
कैंटर भी बना हादसे का शिकार, चालक घायल, खेत में पलटा वाहन
इस दुखद घटना की चपेट में एक और वाहन आ गया। वही जामुन का पेड़ एक गुजरते कैंटर पर भी गिर गया, जिससे चालक रिजवान गंभीर रूप से घायल हो गया। पेड़ की मार से अनियंत्रित होकर कैंटर पास के खेत में पलट गया। रिजवान को मेरठ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी हालत गंभीर बताई जा रही है।
स्थानीय लोगों में गुस्सा, प्रशासन की लापरवाही पर उठे सवाल
हादसे के बाद मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई। लोगों में रोष देखा गया कि आखिर सड़क किनारे लगे इतने विशाल पेड़ों की समय-समय पर जांच क्यों नहीं होती? क्या प्रशासन को इंतजार रहता है कि कोई हादसा हो, तब कार्रवाई हो? स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों का कहना है कि मवाना-परीक्षितगढ़ मार्ग पर दर्जनों ऐसे पुराने पेड़ हैं जो कभी भी गिर सकते हैं।
अगर समय रहते इस पेड़ की छंटाई या कटाई कर दी गई होती, तो उवैश और उसकी नन्हीं बेटी की जान बच सकती थी।
बरसात बन रही है काल, कई जगह पेड़ों के गिरने से हो रही मौतें
यह कोई पहली घटना नहीं है जब किसी पेड़ के गिरने से जानें गई हों। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में इस मानसून सीज़न में पेड़ों के गिरने से मौतें हो चुकी हैं।
कुछ दिन पहले ही लखनऊ के गोमती नगर में एक बरगद का पेड़ गिरने से दो लोगों की मौत हो गई थी।
हरदोई में एक आम का पेड़ गिरने से एक परिवार की दो पीढ़ियां खत्म हो गईं।
वाराणसी, कानपुर और गाज़ियाबाद में भी ऐसी घटनाएं दर्ज की गई हैं।
बारिश में कमजोर और पुराने पेड़ जानलेवा बन जाते हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग इनकी समय-समय पर जांच और रखरखाव में पूरी तरह विफल नजर आते हैं।
उवैश की मौत से टूटा परिवार, शहजादी की हालत नाजुक
मेरठ का यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक परिवार के उजड़ने की कहानी है। उवैश मेहनतकश व्यक्ति था, जो अपनी बच्ची से बहुत प्यार करता था। उसकी पत्नी शहजादी का रो-रोकर बुरा हाल है, जिसे अभी तक अपनी बेटी और पति की मौत की जानकारी नहीं दी गई है।
डॉक्टरों के अनुसार, शहजादी को सिर और रीढ़ में गंभीर चोटें आई हैं। अगर सही समय पर इलाज हुआ, तो वह बच सकती है। लेकिन मानसिक सदमा झेल पाना शायद उसके लिए आसान नहीं होगा।
बारिश में सावधानी की दरकार, प्रशासन को जागना होगा
हर साल मानसून में दर्जनों लोग पेड़ों, बिजली के खंभों, स्लिप होने और दीवार गिरने जैसे हादसों में जान गंवाते हैं। लेकिन प्रशासन की तरफ से केवल बयानबाज़ी के अलावा कुछ नहीं होता।
अब वक्त आ गया है कि नगर निगम और वन विभाग संयुक्त रूप से पुराने, जर्जर और भारी पेड़ों की सूची बनाएं और जरूरी छंटाई या हटाने का काम करें। ताकि निर्दोष लोगों की जान न जाए।
स्थानीय प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया
SDM मवाना ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि मौके पर जांच टीम भेज दी गई है और पीड़ित परिवार को मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। साथ ही कहा गया कि क्षेत्र में पुराने पेड़ों की छंटाई का कार्य जल्द ही शुरू किया जाएगा।
हालांकि स्थानीय लोग प्रशासन की इस प्रतिक्रिया को ‘हादसे के बाद की जागरूकता’ बता रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि जिले भर में ऐसे पेड़ों की सूची सार्वजनिक की जाए।
दर्जनों मौतों के बावजूद नहीं बदली नीतियां
विशेषज्ञों के अनुसार, पेड़ों की उम्र, जड़ की स्थिरता, और मौसमीय प्रभावों का विश्लेषण जरूरी है। लेकिन भारत में शहरी नियोजन और पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर जो उदासीनता है, वह आए दिन होने वाले ऐसे हादसों से उजागर होती है।
ऐसे पेड़ जो आबादी के नजदीक हों और भारी बारिश या तूफान में गिर सकते हों, उन्हें सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करना चाहिए। लेकिन प्रशासन अक्सर ऐसे निर्णय लेने में देरी करता है — और नतीजा यह होता है कि निर्दोष लोगों की जान चली जाती है।

