Bolivia की संसद में लिथियम डील को लेकर मचा घमासान: सांसदों ने छीने माइक, घसीटी मेज़, सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
Bolivia की राजधानी ला पाज़ इस हफ्ते राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बन गई जब संसद में लिथियम डील को लेकर सांसद आपस में भिड़ गए। यह दृश्य किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं था। संसद में लगे नारों, छीने गए माइक, घसीटी गई मेज़ों और तीखी झड़पों ने इस मुद्दे को न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला खड़ा किया है।
रूस की कंपनी रोसएटम के साथ विवादास्पद समझौते की जड़
इस पूरी अफरा-तफरी की वजह बना एक करार — रूस की सरकारी कंपनी रोसएटम की सहायक इकाई के साथ किया गया लिथियम खनन समझौता। विपक्ष का आरोप है कि यह करार पोटोसी क्षेत्र की बहुमूल्य लिथियम खदानों को बिना पारदर्शिता के विदेशी हाथों में सौंप रहा है। सांसदों का कहना है कि सरकार ने यह फैसला जनता से पूछे बिना, महज़ राजनीतिक और आर्थिक फायदे के लिए लिया है।
It almost came to fisticuffs in Bolivia’s Lower Chamber on Wednesday, July 9, as lawmakers went head-to-head over the approval of controversial lithium production contracts. pic.twitter.com/fC2VNDrgyQ
— CGTN America (@cgtnamerica) July 10, 2025
“Lithium is not for sale” और “Don’t touch the lithium” जैसे पोस्टरों से संसद की दीवारें पट गईं। नारों की गूंज और उग्र भाषणों ने माहौल को और भी भड़काऊ बना दिया।
संसद में भिड़े सांसद, वायरल हुआ वीडियो
बोलिविया की संसद में इस लड़ाई का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। वीडियो में सांसदों को एक-दूसरे से भिड़ते, माइक छीनते, टेबल को खींचते और मंच पर चढ़कर आक्रोशित नारेबाज़ी करते देखा जा सकता है।
इस दृश्य को देखकर दर्शकों ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे संसद नहीं, कोई MMA फाइट चल रही हो। दुनियाभर से लोगों ने इस पर प्रतिक्रियाएं दी हैं और बोलिवियाई लोकतंत्र की गिरती हालत पर चिंता जताई है।
चीन से रूस तक: विदेशी कंपनियों का बोलबाला?
यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने लिथियम खनन को लेकर आवाज़ उठाई हो। इससे पहले भी सरकार पर चीन के साथ “गुप्त डील” करने का आरोप लगाया गया था। अब रूस की कंपनी के साथ यह नया समझौता सामने आने पर सवाल उठ रहे हैं कि बोलिविया के प्राकृतिक संसाधन क्या नीलाम किए जा रहे हैं?
लिथियम, जिसे “सफेद सोना” कहा जाता है, आज की दुनिया में बैटरियों, इलेक्ट्रिक वाहनों और टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के लिए सबसे अहम संसाधनों में से एक है। बोलिविया इस धातु का विशाल भंडार रखता है और इसी कारण वैश्विक शक्तियाँ इसे हथियाने की होड़ में लगी हैं।
विपक्ष का तीखा हमला: “यह देशद्रोह है!”
विपक्षी नेता अंद्रोनिको रोड्रिगेज़ ने संसद में कहा, “सरकार देश की आत्मा को बेच रही है। पोटोसी की धरती से बहता सोना अगर विदेशी कंपनियों को दे दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।”
सरकार ने इस करार को “आर्थिक प्रगति की दिशा में एक कदम” बताया है, लेकिन जनता और विपक्षी नेताओं का मानना है कि यह महज विदेशी दबाव और निजी मुनाफे का खेल है।
लिथियम की वैश्विक राजनीति: क्या बोलिविया है अगला ‘स्ट्रैटजिक युद्धभूमि’?
Bolivia अब वैश्विक लिथियम जंग का केंद्र बन चुका है। अमेरिका, चीन, रूस जैसे देशों की निगाहें इस छोटे से देश पर टिकी हैं क्योंकि यहां का सालार डी उयूनी (Salar de Uyuni) दुनिया का सबसे बड़ा लिथियम भंडार है।
विशेषज्ञों का कहना है कि “अगर सरकार ने पारदर्शी नीति नहीं अपनाई, तो आने वाले समय में यह संघर्ष और भी उग्र रूप ले सकता है।” यह संसाधन अब केवल आर्थिक नहीं, राजनीतिक और कूटनीतिक हथियार बन चुका है।
सोशल मीडिया पर आक्रोश: “ये लोकतंत्र है या ड्रामा?”
ट्विटर, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लोग संसद की इस लड़ाई के वीडियो को शेयर कर रहे हैं और बोलिविया की राजनीतिक स्थिति पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
“क्या यही लोकतंत्र है?”, “जनता से बिना पूछे कैसे इतने बड़े फैसले लिए जा सकते हैं?” — ऐसे सवालों की बौछार हो रही है।
सरकार की सफाई: “लाभदायक और जरूरी समझौता”
सरकार ने सफाई दी है कि यह समझौता बोलिविया की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए जरूरी है। उनके अनुसार, रोसएटम जैसी वैश्विक कंपनियां न केवल निवेश लाती हैं, बल्कि तकनीकी विशेषज्ञता भी प्रदान करती हैं।
लेकिन विपक्ष और जनता का कहना है कि फायदा कितना और किसको मिलेगा — यही तो असली सवाल है।
क्या यह सिर्फ एक देश की कहानी है या पूरी दुनिया की चेतावनी?
बोलिविया की यह घटना महज़ एक देश का आंतरिक मामला नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्राकृतिक संसाधनों की वैश्विक राजनीति का आईना है। लिथियम की मांग जैसे-जैसे बढ़ेगी, वैसे-वैसे ऐसे टकराव बढ़ते रहेंगे।
“Lithium is not for sale” की गूंज अब सिर्फ बोलिविया नहीं, बल्कि हर उस देश से उठेगी जो अपने संसाधनों को विदेशी शक्तियों के हाथों गिरवी नहीं रखना चाहता।
बोलिविया की संसद में हुआ यह बवाल न केवल संसाधनों के दोहन पर चेतावनी है, बल्कि यह दिखाता है कि अगर पारदर्शिता, जन-संवाद और राष्ट्रीय हितों की अनदेखी की गई, तो लोकतंत्र खुद सवालों के घेरे में आ जाएगा। ‘लिथियम फॉर सेल’ जैसी सोच को चुनौती देना अब जरूरी हो चुका है — सिर्फ बोलिविया ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए।

