Muzaffarnagar में ‘मोंकीश भाई’ का आतंक: घरों की छतों पर बंदरों का कब्जा, नागरिक पूछ रहे—आखिर जाएं तो जाएं कहां?
Muzaffarnagar शहर में इन दिनों एक नई समानांतर व्यवस्था चलती दिखाई दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस व्यवस्था में न कोई चुनाव हुआ, न कोई पदभार ग्रहण समारोह और न ही किसी अधिकारी का आदेश जारी हुआ। फिर भी कई मोहल्लों की छतों, गलियों और घरों के आंगन पर बंदरों ने अपना कब्जा जमा लिया है। शहरवासी परेशान हैं और बंदरों की टोली बेफिक्र होकर ऐसे घूम रही है, मानो इलाके की असली सत्ता उन्हीं के हाथ में हो। ऐसे में लोगों के बीच व्यंग्य में एक नाम भी चर्चा में है—‘मोंकीश भाई’!
नई मंडी क्षेत्र की पॉश कॉलोनी अग्रसैन विहार में बंदरों का आतंक लगातार बढ़ने से निवासी बेहद परेशान हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, सैकड़ों की संख्या में बंदरों की मौजूदगी ने सामान्य जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि लोगों को अपने घरों से बाहर निकलते समय भी सावधानी बरतनी पड़ती है। बच्चों, महिलाओं और पुरुषों सहित दर्जनों लोगों के घायल होने की बात भी सामने आई है।
घर अपना, छत अपनी… लेकिन कब्जा ‘मोंकीश भाई’ का!
अग्रसैन विहार के निवासियों की शिकायत है कि बंदर घरों के आंगन में रखा सामान उठा ले जाते हैं, कपड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं और छतों पर लगी फूलों की क्यारियों को तहस-नहस कर देते हैं। घरों की छतों पर उनकी उछल-कूद और रातभर होने वाले शोर ने लोगों की नींद तक छीन ली है। अब स्थिति यह है कि लोग अपने ही घरों की छत पर जाने से पहले आसपास नजर दौड़ाते हैं कि कहीं बंदरों की टोली पहले से ही वहां बैठक जमाकर तो नहीं बैठी है।
व्यंग्य की बात यह है कि नागरिक अपने घरों की सुरक्षा के लिए दरवाजे बंद कर रहे हैं, सामान संभाल रहे हैं और छतों पर जाने से बच रहे हैं, जबकि बंदरों को किसी तरह की रोक-टोक की चिंता दिखाई नहीं देती। लगता है जैसे उन्होंने मोहल्ले में स्थायी निवास ही नहीं, बल्कि पूरी कॉलोनी की निगरानी का जिम्मा भी अपने हाथ में ले लिया हो!
अग्रसैन विहार ही नहीं, प्रेमपुरी और कृष्णापुरी भी परेशान
बंदरों की समस्या केवल अग्रसैन विहार तक सीमित नहीं बताई जा रही। प्रेमपुरी, कृष्णापुरी और शहर के अन्य इलाकों से भी बंदरों की बढ़ती गतिविधियों और नागरिकों की परेशानी की शिकायतें सामने आ रही हैं। इन क्षेत्रों में भी लोगों को घरों के आसपास बंदरों के झुंड दिखाई देने, सामान को नुकसान पहुंचने और उनके हमलावर व्यवहार से जूझना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बच्चों का अकेले बाहर निकलना, बुजुर्गों का गलियों से गुजरना और महिलाओं का घरेलू काम के लिए छतों पर जाना जोखिम भरा हो गया है। यदि कोई व्यक्ति बंदरों के बीच फंस जाए तो उसे समझ नहीं आता कि रास्ता बदले या वहीं रुककर उनके हटने का इंतजार करे। आखिर मोहल्ले की गलियां नागरिकों के लिए हैं या बंदरों की निर्बाध आवाजाही के लिए?
बंदरों की ‘सरकार’ चल रही है, जिम्मेदार विभाग कहां हैं?
शहरवासियों की परेशानी के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस समस्या के समाधान की जिम्मेदारी किसकी है? नगर पालिका, वन विभाग या कोई अन्य संबंधित विभाग—नागरिकों को यह जानने में भी परेशानी हो रही है कि शिकायत लेकर किसके पास जाएं। समस्या पुरानी होती जा रही है, लेकिन लोगों को स्थायी समाधान की दरकार है।
यहां व्यंग्य भी जरूरी है। यदि किसी कॉलोनी में सड़क पर गड्ढा हो, नाली जाम हो या स्ट्रीट लाइट खराब हो तो नागरिक किसी न किसी विभाग से शिकायत कर सकते हैं। लेकिन जब बंदरों की टोली ही मोहल्ले में सक्रिय हो और घरों की छतों पर कब्जा जमाए बैठी हो, तब शिकायत का आवेदन किसके नाम लिखा जाए? क्या ‘मोंकीश भाई’ के दरबार में ही अर्जी लगानी पड़ेगी?
बंदरों को नुकसान पहुंचाए बिना चाहिए ठोस समाधान
बंदरों की समस्या का समाधान केवल उन्हें भगाने या पकड़ने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए संबंधित विभागों को वन्यजीव विशेषज्ञों और प्रशिक्षित टीमों की मदद से सुरक्षित एवं मानवीय तरीके अपनाने चाहिए। प्रभावित कॉलोनियों का सर्वे कर बंदरों की संख्या, उनके आवागमन और हमलों की स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। जरूरत के अनुसार सुरक्षित पकड़ने, स्थानांतरण और भविष्य में ऐसी समस्या की पुनरावृत्ति रोकने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।
साथ ही नागरिकों को भी खुले में खाने-पीने की चीजें न छोड़ने, छतों और आंगन में खाद्य सामग्री सुरक्षित रखने तथा बंदरों को खिलाने से बचने की सलाह दी जानी चाहिए। बंदरों को उकसाना, उनके करीब जाकर भगाने की कोशिश करना या उन्हें नुकसान पहुंचाना स्थिति को और खतरनाक बना सकता है।
अब आश्वासन नहीं, कार्रवाई का इंतजार
अग्रसैन विहार, प्रेमपुरी, कृष्णापुरी और अन्य प्रभावित क्षेत्रों के नागरिकों की मांग है कि संबंधित अधिकारी मामले को गंभीरता से लें और जल्द से जल्द प्रभावी कार्रवाई करें। लोगों को अपने ही घरों में भय के माहौल में नहीं रहना चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना स्थानीय प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
शहर में विकास और स्मार्ट सुविधाओं की चर्चा अपनी जगह है, लेकिन जब नागरिक अपनी छत पर कपड़े सुखाने या आंगन में फूलों को सुरक्षित रखने तक में असहज महसूस करें, तो जमीनी समस्याओं पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है। फिलहाल ‘मोंकीश भाई’ और उनकी टोली की बादशाहत से परेशान शहरवासी यही पूछ रहे हैं—क्या जिम्मेदार विभाग कभी इस समस्या का स्थायी समाधान करेंगे, या नागरिकों को बंदरों के साथ ही समझौता करके रहना पड़ेगा?
व्यंग्य अपनी जगह, लेकिन बंदरों के हमलों में लोगों का घायल होना और बच्चों-बुजुर्गों की सुरक्षा का सवाल बेहद गंभीर है। अब जरूरत है कि संबंधित विभाग जागें, मैदान में उतरें और नागरिकों को इस परेशानी से राहत दिलाएं। आखिर शहर की छतों पर रहने का अधिकार नागरिकों का भी है, सिर्फ ‘मोंकीश भाई’ का नहीं!

