उत्तर प्रदेश

गोमती किनारे ‘कंक्रीट के खेल’ पर NGT का बड़ा ब्रेक: 2500 करोड़ की परियोजनाओं पर संकट, नदी तल और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में निर्माण पर रोक

लखनऊ। गोमती नदी के दोनों किनारों पर चल रहे कंक्रीटीकरण और विभिन्न निर्माण कार्यों को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने सख्त रुख अपनाया है। गंगा संरक्षण से जुड़े नियमों का हवाला देते हुए अधिकरण ने गोमती नदी के किनारों, नदी तल और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में नियमों के विपरीत किसी भी तरह के निर्माण पर अंतरिम रोक लगा दी है। एनजीटी के इस आदेश के बाद गोमती के आसपास चल रही करीब 2500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

पर्यावरण कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता आलोक सिंह की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने नौ जुलाई को अंतरिम आदेश पारित किया। अधिकरण ने मामले को प्रथमदृष्टया गंभीर मानते हुए लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी एलडीए समेत सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है और चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है।

मामले में अगली सुनवाई 25 अगस्त को निर्धारित की गई है। ऐसे में अब सबकी नजरें संबंधित विभागों की ओर से एनजीटी के समक्ष दाखिल किए जाने वाले जवाब और अगली सुनवाई पर टिक गई हैं।

गोमती नदी के किनारों पर तटबंध, चार लेन सड़क और बहुमंजिला इमारतों समेत विभिन्न निर्माण कार्यों को लेकर दायर याचिका ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन पर एक बार फिर बड़ी बहस खड़ी कर दी है।


गोमती किनारे निर्माण पर NGT की सख्ती, नियमों के खिलाफ काम रोकने का आदेश

राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सामने दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि गोमती नदी के किनारे और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं।

इनमें तटबंध, चार लेन सड़क और बहुमंजिला इमारतों समेत विभिन्न परियोजनाएं शामिल बताई गई हैं।

याचिकाकर्ता का दावा है कि इनमें से कई निर्माण ऐसे क्षेत्रों में किए जा रहे हैं, जो पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं।

एनजीटी ने मामले की सुनवाई के दौरान गंगा नदी संरक्षण से जुड़े नियमों को महत्वपूर्ण माना और गोमती नदी के किनारों, नदी तल तथा सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में नियमों के विपरीत निर्माण गतिविधियों पर रोक लगा दी।

इस अंतरिम आदेश को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि गोमती नदी के आसपास कई बड़ी परियोजनाओं पर काम चल रहा है।


करीब 2500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर पड़ सकता है असर

एनजीटी के अंतरिम आदेश के बाद सबसे बड़ी चर्चा गोमती नदी के किनारों पर चल रही करीब 2500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को लेकर शुरू हो गई है।

बताया जा रहा है कि नदी के आसपास तटबंध निर्माण, सड़क परियोजनाओं और अन्य निर्माण कार्यों पर इस आदेश का प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि किन-किन परियोजनाओं का काम किस सीमा तक प्रभावित होगा, इसकी स्पष्ट स्थिति संबंधित विभागों के जवाब और आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद सामने आएगी।

लेकिन इतना तय है कि एनजीटी के आदेश के बाद अब गोमती नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र और उसके आसपास किए जा रहे निर्माण कार्यों को पर्यावरणीय नियमों की कसौटी पर परखा जाएगा।


पर्यावरण कार्यकर्ता आलोक सिंह की याचिका पर आया बड़ा आदेश

गोमती नदी के किनारों पर चल रहे निर्माण कार्यों का मामला पर्यावरण कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता आलोक सिंह द्वारा दाखिल याचिका के माध्यम से एनजीटी के सामने पहुंचा।

याचिका में नदी के किनारों और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में हो रहे निर्माण कार्यों को चुनौती दी गई है।

आलोक सिंह की ओर से उठाए गए मुद्दों पर सुनवाई करते हुए एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने नौ जुलाई को अंतरिम आदेश पारित किया।

अधिकरण ने याचिका में उठाए गए सवालों को प्रथमदृष्टया गंभीर माना है।

इसके साथ ही एलडीए समेत सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए गए हैं।


25 अगस्त को होगी अगली सुनवाई, संबंधित विभागों के जवाब पर टिकी नजर

गोमती नदी निर्माण मामले में अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।

इससे पहले संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा।

मामले में लखनऊ विकास प्राधिकरण समेत उन सभी संबंधित विभागों और पक्षों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है, जिनका नाम याचिका में उठाए गए निर्माण कार्यों से जुड़ा है।

अब संबंधित विभागों को एनजीटी के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि गोमती नदी के किनारों और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों की प्रकृति क्या है और उनके लिए किन पर्यावरणीय तथा अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया है।

अगली सुनवाई के दौरान अधिकरण संबंधित पक्षों के जवाबों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई कर सकता है।


पिपराघाट पुल से शहीद पथ तक तटबंध निर्माण पर उठाए सवाल

याचिकाकर्ता आलोक सिंह के अनुसार पिपराघाट पुल से शहीद पथ तक गोमती नदी के एक किनारे पर तटबंध का निर्माण किया जा रहा है।

वहीं शहीद पथ से किसान पथ तक नदी के दोनों किनारों पर तटबंध निर्माण का काम चलने की बात कही गई है।

याचिका में इन निर्माण कार्यों की वैधानिकता और पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

आरोप है कि नदी के प्राकृतिक क्षेत्र और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में निर्माण गतिविधियां होने से गोमती की पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है।

गोमती नदी पहले से ही प्रदूषण समेत कई पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में नदी के आसपास बड़े पैमाने पर होने वाले निर्माण कार्यों को लेकर पर्यावरणविद लगातार चिंता व्यक्त करते रहे हैं।


नदी से महज छह से 20 मीटर दूरी पर तटबंध बनाने का आरोप

याचिका में सबसे गंभीर आरोपों में से एक गोमती नदी से निर्माण की दूरी को लेकर लगाया गया है।

दावा किया गया है कि पर्यावरणीय मानकों के अनुसार नदी के किनारे से 400 मीटर तक ऐसे निर्माण नहीं होने चाहिए, लेकिन कई स्थानों पर नदी के किनारे से महज छह से 20 मीटर की दूरी पर तटबंध का निर्माण किया जा रहा है।

यदि यह दावा संबंधित रिकॉर्ड और जांच में सही पाया जाता है तो निर्माण कार्यों की वैधानिक स्थिति को लेकर बड़े सवाल खड़े हो सकते हैं।

याचिका में इसी आधार पर एनजीटी से हस्तक्षेप की मांग की गई थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अधिकरण ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।


तटबंध से लेकर चार लेन सड़क तक, कई निर्माण कार्य सवालों के घेरे में

याचिका में केवल तटबंध निर्माण को ही चुनौती नहीं दी गई है।

गोमती नदी के किनारे और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में तटबंध, चार लेन सड़क और बहुमंजिला इमारतों समेत विभिन्न निर्माण कार्यों का उल्लेख किया गया है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह के निर्माण नदी के प्राकृतिक प्रवाह और बाढ़ क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं।

नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र को पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यही क्षेत्र अधिक पानी आने की स्थिति में नदी को फैलने के लिए प्राकृतिक स्थान उपलब्ध कराता है।

यदि ऐसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण हो जाए तो भविष्य में बाढ़ और जलभराव जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ने की आशंका रहती है।


एलडीए और संबंधित विभागों की भूमिका पर भी उठे सवाल

याचिका में लखनऊ विकास प्राधिकरण, सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

आरोप है कि संबंधित विभागों के अधिकारियों की मिलीभगत से निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं।

हालांकि इन आरोपों पर संबंधित विभागों का पक्ष और एनजीटी के समक्ष दाखिल किए जाने वाले जवाब महत्वपूर्ण होंगे।

अधिकरण ने फिलहाल मामले में नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

किसी भी आरोप की अंतिम पुष्टि संबंधित पक्षों के जवाब, दस्तावेजों और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी।


पहले से प्रदूषण झेल रही गोमती पर बढ़ सकता है पर्यावरणीय दबाव

गोमती नदी लंबे समय से प्रदूषण और शहरी दबाव जैसी समस्याओं का सामना कर रही है।

शहरीकरण, अपशिष्ट, सीवेज और नदी के प्राकृतिक क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप जैसे मुद्दे समय-समय पर चर्चा में आते रहे हैं।

याचिकाकर्ता का दावा है कि नदी के किनारों और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण होने से गोमती को स्थायी पर्यावरणीय नुकसान पहुंच सकता है।

इसी आशंका को आधार बनाते हुए निर्माण कार्यों को चुनौती दी गई है।

एनजीटी द्वारा मामले को प्रथमदृष्टया गंभीर माने जाने के बाद गोमती नदी के संरक्षण और आसपास हो रहे विकास कार्यों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।


गोमती पर भी लागू होते हैं गंगा संरक्षण से जुड़े नियम

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गंगा नदी संरक्षण से जुड़े नियम गोमती नदी पर भी लागू होते हैं।

गंगा नदी (संरक्षण, सुरक्षा एवं प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016 के अनुसार गंगा का अर्थ केवल उसकी मुख्य धारा तक सीमित नहीं है।

इसके दायरे में गंगा नदी तंत्र और उससे जुड़ी सहायक नदियों को भी शामिल किया गया है।

गोमती नदी भी गंगा नदी तंत्र का हिस्सा है।

इसी कारण गोमती नदी के संरक्षण, उसके नदी तल और बाढ़ क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों पर भी संबंधित नियमों और प्रावधानों का प्रभाव पड़ता है।


सिर्फ मुख्य गंगा धारा नहीं, सहायक नदियां भी संरक्षण के दायरे में

आम तौर पर गंगा संरक्षण से जुड़े नियमों का उल्लेख होने पर लोगों का ध्यान केवल गंगा की मुख्य धारा की ओर जाता है।

लेकिन संबंधित प्रावधानों के अनुसार गंगा नदी तंत्र का दायरा व्यापक है।

इसमें उत्तराखंड की प्रमुख नदियों से लेकर प्रयागराज और गंगासागर तक की गंगा धारा तथा उसकी सहायक नदियों को भी शामिल किया गया है।

गोमती नदी गंगा की महत्वपूर्ण सहायक नदियों में शामिल है।

इसी कारण गोमती नदी से जुड़े पर्यावरणीय मामलों में गंगा संरक्षण के प्रावधान महत्वपूर्ण हो जाते हैं।


सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में निर्माण क्यों बन सकता है बड़ा खतरा?

किसी भी नदी का सक्रिय बाढ़ क्षेत्र उसके प्राकृतिक अस्तित्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।

बारिश के मौसम या अधिक जल प्रवाह के दौरान नदी अपने सामान्य किनारों से बाहर फैल सकती है। इस दौरान बाढ़ क्षेत्र अतिरिक्त पानी को समायोजित करने में प्राकृतिक भूमिका निभाता है।

यदि ऐसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सड़कें, इमारतें या अन्य स्थायी निर्माण कर दिए जाएं तो नदी के प्राकृतिक विस्तार की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

इसका असर केवल नदी के पर्यावरण पर ही नहीं बल्कि आसपास रहने वाले लोगों और शहरी क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।

इसी कारण दुनिया भर में नदियों के बाढ़ क्षेत्रों में निर्माण को लेकर कड़े पर्यावरणीय मानक बनाए जाते हैं।


विकास बनाम पर्यावरण की बहस फिर हुई तेज

गोमती नदी के आसपास चल रही परियोजनाओं पर एनजीटी के अंतरिम आदेश के बाद एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस तेज हो गई है।

एक ओर तेजी से बढ़ते शहरों में बेहतर सड़कें, बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाएं आवश्यक मानी जाती हैं।

दूसरी ओर नदियों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर होने वाला अनियंत्रित विकास भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकता है।

विशेषज्ञ लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय पर्यावरणीय प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन आवश्यक है।

गोमती नदी से जुड़ा मौजूदा मामला भी इसी बड़े सवाल को सामने ला रहा है।


2500 करोड़ के प्रोजेक्ट पर असर, अब कानूनी और पर्यावरणीय जांच महत्वपूर्ण

एनजीटी के आदेश के बाद करीब 2500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर संभावित असर की चर्चा तेज हो गई है।

इतनी बड़ी लागत वाली परियोजनाओं का प्रभावित होना विकास योजनाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण मामला है।

लेकिन पर्यावरणीय मामलों में केवल परियोजना की लागत को आधार बनाकर निर्णय नहीं किया जा सकता।

यह भी देखना आवश्यक होता है कि परियोजना से नदी, भूजल, बाढ़ क्षेत्र और आसपास की पारिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

अब एनजीटी के समक्ष संबंधित विभागों को अपनी परियोजनाओं और निर्माण कार्यों के बारे में विस्तृत जवाब देना होगा।


चार सप्ताह में जवाब, विभागों के सामने कई बड़े सवाल

एनजीटी द्वारा संबंधित पक्षों को चार सप्ताह का समय दिए जाने के बाद अब विभागों को कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देने पड़ सकते हैं।

इनमें निर्माण स्थलों की वास्तविक स्थिति, नदी से दूरी, सक्रिय बाढ़ क्षेत्र की सीमाएं, परियोजनाओं की अनुमति और पर्यावरणीय नियमों के अनुपालन जैसे विषय शामिल हो सकते हैं।

याचिका में लगाए गए आरोपों के जवाब में संबंधित विभागों को अपने दस्तावेज और कानूनी पक्ष अधिकरण के सामने रखना होगा।

इसके बाद ही मामले की आगे की दिशा अधिक स्पष्ट हो सकेगी।


नदी तल और किनारों पर निर्माण को लेकर बढ़ी सख्ती

एनजीटी का अंतरिम आदेश ऐसे समय सामने आया है, जब देश के विभिन्न हिस्सों में नदियों के किनारे अतिक्रमण और निर्माण को लेकर चिंता बढ़ रही है।

शहरीकरण के विस्तार के साथ कई शहरों में नदी क्षेत्रों पर निर्माण का दबाव बढ़ा है।

नदी किनारे निर्माण होने से जल प्रवाह, भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रभावित होने की आशंका रहती है।

गोमती नदी के मामले में अधिकरण द्वारा अपनाया गया सख्त रुख भविष्य की सुनवाई के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


क्या रुक जाएंगे सभी निर्माण कार्य? आगे की सुनवाई पर टिकी नजर

एनजीटी के अंतरिम आदेश के बाद बड़ा सवाल यह है कि गोमती नदी के आसपास चल रही परियोजनाओं का भविष्य क्या होगा।

फिलहाल अधिकरण ने नियमों के विपरीत नदी किनारे, नदी तल और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में निर्माण पर रोक लगाई है।

किस परियोजना का कौन सा हिस्सा इसके दायरे में आएगा, इसकी विस्तृत स्थिति संबंधित रिकॉर्ड, विभागीय जवाब और आगे की सुनवाई के दौरान अधिक स्पष्ट हो सकती है।

इसलिए फिलहाल सभी की नजर 25 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर है।


गोमती संरक्षण को लेकर निर्णायक साबित हो सकती है आगे की कानूनी लड़ाई

गोमती नदी लखनऊ की पहचान और प्राकृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

ऐसे में नदी के किनारों पर विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है।

याचिका में उठाए गए मुद्दे केवल वर्तमान निर्माण परियोजनाओं तक सीमित नहीं हैं।

इस मामले का प्रभाव भविष्य में नदी के आसपास तैयार होने वाली विकास योजनाओं और निर्माण नीतियों पर भी पड़ सकता है।

यदि एनजीटी आगे की सुनवाई में पर्यावरणीय नियमों को लेकर और सख्त दिशा-निर्देश जारी करता है तो संबंधित विभागों को अपनी योजनाओं में बदलाव करना पड़ सकता है।


25 अगस्त पर टिकी निगाहें, गोमती के भविष्य से जुड़ा बड़ा मामला

गोमती नदी के दोनों किनारों पर चल रहे निर्माण कार्यों को लेकर शुरू हुई कानूनी लड़ाई अब महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है।

एनजीटी ने मामले को प्रथमदृष्टया गंभीर मानते हुए अंतरिम आदेश पारित किया है और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।

करीब 2500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर संभावित प्रभाव, नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में निर्माण के आरोप और गंगा संरक्षण नियमों के लागू होने जैसे मुद्दों ने इस मामले को बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है।

अब 25 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में संबंधित विभागों के जवाब और एनजीटी के अगले रुख पर सभी की नजर रहेगी।

गोमती नदी के किनारों, नदी तल और सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में नियमों के विपरीत निर्माण पर एनजीटी की अंतरिम रोक ने करीब 2500 करोड़ रुपये की परियोजनाओं के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। पर्यावरण कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता आलोक सिंह की याचिका पर अधिकरण ने एलडीए समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। गोमती पर गंगा संरक्षण नियम लागू होने और नदी से बेहद कम दूरी पर निर्माण के आरोपों के बीच अब 25 अगस्त की सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह मामला केवल बड़ी परियोजनाओं का नहीं, बल्कि लखनऊ की जीवनरेखा कही जाने वाली गोमती के पर्यावरणीय भविष्य और शहर के विकास मॉडल के बीच संतुलन का भी बन गया है।

 

News-Desk

News Desk एक समर्पित टीम है, जिसका उद्देश्य उन खबरों को सामने लाना है जो मुख्यधारा के मीडिया में अक्सर नजरअंदाज हो जाती हैं। हम निष्पक्षता, सटीकता, और पारदर्शिता के साथ समाचारों को प्रस्तुत करते हैं, ताकि पाठकों को हर महत्वपूर्ण विषय पर सटीक जानकारी मिल सके। आपके विश्वास के साथ, हम खबरों को बिना किसी पूर्वाग्रह के आप तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। किसी भी सवाल या जानकारी के लिए, हमें संपर्क करें: info@poojanews.com

News-Desk has 22258 posts and counting. See all posts by News-Desk

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

five × three =