7 अक्टूबर के हमले ने बदल दी Israel की राजनीति, अब नेतन्याहू से हिसाब मांग रहा देश; 27 अक्टूबर को बड़ा चुनाव
7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुआ हमला Israel के लिए सिर्फ एक बड़ा सुरक्षा संकट नहीं था। उस दिन हुए हमले ने देश की राजनीति की दिशा भी बदल दी। हमले में करीब 1,200 लोग मारे गए और 251 लोगों को बंधक बनाकर गाजा ले जाया गया। इसके बाद शुरू हुई गाजा की जंग ने सुरक्षा, सेना, बंधकों और फिलिस्तीन के सवाल को इजराइली राजनीति के केंद्र में ला दिया।
तीन साल बाद 27 अक्टूबर 2026 को इजराइल में राष्ट्रीय चुनाव होने जा रहे हैं। यह हमले और उसके बाद शुरू हुए गाजा युद्ध के बाद पहला राष्ट्रीय चुनाव है। ऐसे में इस बार मुकाबला सिर्फ पार्टियों और नेताओं के बीच नहीं है। चुनावी बहस में यह सवाल भी मौजूद है कि 7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलता के लिए जिम्मेदारी किसकी थी और देश की सुरक्षा को आगे कैसे सुनिश्चित किया जाए।
7 अक्टूबर के बाद बदला चुनावी एजेंडा
हमास के हमले से पहले इजराइल की राजनीति में महंगाई, मकानों की कीमत, नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे कानूनी मामले और सरकार की न्यायिक नीतियां जैसे मुद्दे प्रमुख थे। लेकिन हमले के बाद सुरक्षा सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन गया।
हमले के समय बेंजामिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री थे और तीन साल बाद भी उनकी सरकार को उस दिन की सुरक्षा विफलता को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। हमले के पीड़ित परिवारों और सरकार के आलोचकों की ओर से स्वतंत्र जांच की मांग भी उठती रही है। नेतन्याहू ने दूसरी ओर युद्ध के दौरान अपनी सरकार के फैसलों और सैन्य कार्रवाई का बचाव किया है।
यानी इस चुनाव में नेतन्याहू के सामने सिर्फ विपक्षी पार्टियां नहीं हैं। उनके सामने 7 अक्टूबर की वह पूरी राजनीतिक विरासत भी है, जिसे लेकर इजराइल में अब तक बहस जारी है।
नेतन्याहू को पूर्व सेना प्रमुख आइजेनकोट से चुनौती
इस चुनाव में नेतन्याहू के सामने प्रमुख चुनौती पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट की ओर से है। आइजेनकोट इजराइल के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ रहे हैं और उनके परिवार ने भी गाजा युद्ध में अपना सदस्य खोया है।
हालिया सर्वेक्षणों में मुकाबला बेहद करीबी तस्वीर दिखा रहा है। 5 अक्टूबर तक उपलब्ध सात सर्वेक्षणों के औसत में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी करीब 22.1 सीटों पर थी। अलग-अलग सर्वेक्षणों में यह आंकड़ा 19 से 32 सीटों के बीच रहा है। Israel Votes 2026
वहीं व्यापक विपक्षी खेमे में कई दल अलग-अलग संख्या में सीटें हासिल करते दिख रहे हैं। इसलिए केवल किसी एक पार्टी की सीटों से यह तय नहीं होता कि अगली सरकार किसकी होगी। इजराइल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का समर्थन जरूरी है।
हालिया औसत में नेतन्याहू का गठबंधन भी 61 के आंकड़े से नीचे दिखाई दे रहा है। यानी चुनाव के बाद गठबंधन बनाने की बातचीत बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
दक्षिणपंथ पहले से मजबूत था, 7 अक्टूबर के बाद सुरक्षा मुद्दा और बड़ा हुआ
इजराइल में दक्षिणपंथी राजनीति 7 अक्टूबर से पहले भी मजबूत थी। नेतन्याहू की लिकुड और धार्मिक-राष्ट्रवादी दल लंबे समय से सत्ता की राजनीति के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं।
लेकिन हमास के हमले के बाद सुरक्षा और आतंकवाद का सवाल और ज्यादा केंद्रीय हो गया। फिलिस्तीनी राज्य, वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियां, हमास के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और इजराइल की सुरक्षा नीति जैसे मुद्दे चुनावी बहस में पहले से कहीं ज्यादा प्रमुख हो गए।
इसी वजह से इजराइल की राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव भी दिखाई देता है। सुरक्षा का मुद्दा अब केवल दक्षिणपंथी पार्टियों तक सीमित नहीं है। नेतन्याहू का विरोध करने वाली पार्टियों को भी यह बताना पड़ रहा है कि वे हमास, गाजा और भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था को किस तरह देखती हैं।
लेफ्ट की राजनीति भी बदली, शांति के साथ सुरक्षा पर जोर
7 अक्टूबर से पहले इजराइल की लेफ्ट राजनीति में फिलिस्तीन के साथ राजनीतिक समाधान और शांति प्रक्रिया जैसे मुद्दों को अपेक्षाकृत ज्यादा महत्व मिलता था। लेबर पार्टी और मेरेत्ज इस राजनीतिक धारा के प्रमुख नाम रहे हैं।
2024 में लेबर और मेरेत्ज ने मिलकर ‘द डेमोक्रेट्स’ पार्टी बनाई, जिसका नेतृत्व पूर्व सैन्य अधिकारी याइर गोलान कर रहे हैं। 2026 के चुनाव में पार्टी फिलिस्तीनियों के साथ राजनीतिक समाधान की बात करती है, लेकिन साथ ही इजराइल की सुरक्षा और हमास के शासन को समाप्त करने जैसे मुद्दों पर भी जोर देती है।
ताजा चुनावी औसत में द डेमोक्रेट्स को करीब 9 सीटें मिल रही हैं।
यही बदलाव इजराइल की राजनीति में 7 अक्टूबर के बाद की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीरों में से एक है। राजनीतिक विचारधारा अलग होने के बावजूद लगभग हर प्रमुख खेमे को सुरक्षा के सवाल पर अपनी स्पष्ट स्थिति रखनी पड़ रही है।
2021 में किंगमेकर बनी थी अरब पार्टी, 2026 में तस्वीर अलग
इजराइल की राजनीति में अरब पार्टियों की भूमिका भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण हो सकती है। इसका उदाहरण 2021 में देखने को मिला था, जब किसी एक खेमे के पास सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं था।
तब मंसूर अब्बास की राअम पार्टी ने नफ्ताली बेनेट और याइर लैपिड के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन किया था। यह इजराइल के इतिहास में पहली बार था जब कोई अरब पार्टी सरकार बनाने वाले गठबंधन का औपचारिक हिस्सा बनी।
लेकिन 2026 का राजनीतिक माहौल काफी अलग है। 7 अक्टूबर के बाद अरब पार्टियों के साथ गठबंधन करना कई यहूदी दलों के लिए राजनीतिक रूप से अधिक संवेदनशील मुद्दा बन गया है।
हालिया चुनावी औसत में जॉइंट लिस्ट को लगभग 7.7 और राअम को करीब 4.8 सीटें मिल रही हैं। यानी दोनों को मिलाकर लगभग 12-13 सीटों का संभावित प्रभाव बनता है।
अरब पार्टियों को चुनाव लड़ने की अनुमति, लेकिन राजनीतिक समीकरण कठिन
चुनाव से ठीक पहले अरब पार्टियों की भूमिका को लेकर एक और बड़ा घटनाक्रम हुआ। इजराइल की सुप्रीम कोर्ट ने राअम और जॉइंट लिस्ट को चुनाव लड़ने से रोकने वाले केंद्रीय चुनाव समिति के फैसले को पलट दिया। अदालत ने माना कि पार्टियों को अयोग्य ठहराने के लिए आवश्यक कानूनी मानदंड पूरे नहीं होते।
इस फैसले से अरब दलों के चुनाव मैदान में बने रहने का रास्ता साफ हुआ। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि वे किसी खेमे के साथ सरकार बनाने के लिए स्वतः तैयार हैं। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में अरब पार्टियों के समर्थन का सवाल खुद एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है।
यही कारण है कि 2026 का चुनाव केवल नेतन्याहू बनाम विपक्ष का सीधा मुकाबला नहीं दिखता। 120 सीटों वाली संसद में सरकार बनाने के लिए अलग-अलग दलों के बीच समर्थन और गठबंधन की गणित भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
7 अक्टूबर की छाया चुनाव तक पहुंची
तीन साल पहले हुआ हमला अब भी इजराइल के राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। हमले में 1,200 लोगों की मौत और 251 लोगों के बंधक बनाए जाने के बाद शुरू हुआ युद्ध पूरे क्षेत्र की राजनीति को बदल चुका है।
लेकिन इजराइल के भीतर इसका असर केवल विदेश नीति या सैन्य रणनीति तक सीमित नहीं रहा। सुरक्षा व्यवस्था, सेना की भूमिका, बंधकों की वापसी, सरकार की जवाबदेही और भविष्य की फिलिस्तीन नीति—इन सभी सवालों ने चुनावी राजनीति का रूप ले लिया है।
नेतन्याहू के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह 7 अक्टूबर के समय भी प्रधानमंत्री थे और अब पहली बार उसी युद्धकालीन दौर के बाद जनता राष्ट्रीय चुनाव में मतदान करेगी। दूसरी तरफ विपक्षी दलों के सामने भी चुनौती कम नहीं है—उन्हें सुरक्षा के सवाल पर अपना विकल्प पेश करना होगा और साथ ही सरकार के खिलाफ समर्थन जुटाना होगा।
किसी एक पार्टी के बहुमत की तस्वीर नहीं
मौजूदा सर्वेक्षणों को देखें तो किसी एक पार्टी के 61 सीटों तक पहुंचने की संभावना दिखाई नहीं देती। 5 अक्टूबर के एक पोल औसत में लिकुड करीब 22-23 सीटों के आसपास थी, जबकि नेतन्याहू का पूरा गठबंधन लगभग 52 सीटों और परिवर्तन खेमे के दल लगभग 50 सीटों पर थे। अरब दलों के लिए करीब 13 सीटों का अनुमान था।
हालांकि अलग-अलग सर्वेक्षणों में आंकड़े बदल रहे हैं। इसलिए इन संख्याओं को चुनाव परिणाम नहीं माना जा सकता। अंतिम तस्वीर 27 अक्टूबर को मतदान और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं से ही सामने आएगी।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि इजराइल की राजनीति में 7 अक्टूबर 2023 की घटना एक स्थायी राजनीतिक संदर्भ बन चुकी है। तीन साल बाद होने वाला यह चुनाव यह तय करने के साथ-साथ कि अगली सरकार कौन बनाएगा, सुरक्षा, जवाबदेही और गाजा युद्ध के बाद देश की दिशा पर भी जनता के रुख का संकेत देगा।

