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Greenland पर अमेरिका की नजर: PM Jens-Frederik Nielsen का बड़ा बयान, बोले– अमेरिका नहीं, डेनमार्क के साथ रहेंगे

Greenland US annexation threat अब सिर्फ अटकलों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। इसी बीच ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री Jens-Frederik Nielsen ने अमेरिका को सीधा संदेश देते हुए साफ कर दिया है कि अगर ग्रीनलैंड को अमेरिका और डेनमार्क में से किसी एक को चुनना पड़ा, तो उसकी पसंद डेनमार्क ही होगी, न कि अमेरिका।

यह बयान ऐसे समय पर आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ग्रीनलैंड पर कब्जे और उसे अमेरिका का हिस्सा बनाने की खुली बात कर रहे हैं।


🔴 कोपेनहेगन से आया सख्त संदेश

13 जनवरी को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में ग्रीनलैंड और डेनमार्क के प्रधानमंत्रियों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई। इस दौरान डेनमार्क की प्रधानमंत्री Mette Frederiksen भी मौजूद थीं।

नीलसन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड कोई वस्तु नहीं है जिसे खरीदा या जबरन कब्जाया जा सके। उनका यह बयान अमेरिकी संसद में ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने से जुड़े बिल के पेश होने के बाद पहला आधिकारिक और निर्णायक बयान माना जा रहा है।


🔴 अमेरिकी संसद में पेश हुआ विवादित बिल

12 जनवरी को अमेरिकी संसद में ‘ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट’ नाम का बिल पेश किया गया। इस बिल का उद्देश्य ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करना और बाद में उसे अमेरिका का राज्य बनाना है।

अगर यह बिल कभी पास होता है, तो ग्रीनलैंड अमेरिका का 51वां राज्य बन सकता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र चार्टर और देशों की संप्रभुता के सिद्धांतों के खिलाफ है।


🔴 ट्रम्प की प्रतिक्रिया: “मैं उनसे सहमत नहीं हूं”

ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रम्प ने कहा कि वे जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन को नहीं जानते और उनकी बात से सहमत नहीं हैं। ट्रम्प ने यह भी संकेत दिया कि यह बयान नीलसन के लिए “बड़ी राजनीतिक समस्या” बन सकता है।

यह टिप्पणी अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच तनाव को और गहरा करती दिख रही है।


🔴 NATO को लेकर ग्रीनलैंड का साफ रुख

नीलसन ने कहा कि डेनिश कॉमनवेल्थ का हिस्सा होने के नाते ग्रीनलैंड NATO का हिस्सा है। इसलिए ग्रीनलैंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी NATO पर ही आती है, न कि किसी एक देश पर।

उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा के नाम पर ग्रीनलैंड की संप्रभुता से समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।


🔴 डेनमार्क की PM की चेतावनी

मेटे फ्रेडरिकसेन ने कहा कि अपने सबसे करीबी सहयोगी से इस तरह के दबाव का सामना करना आसान नहीं है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि ग्रीनलैंड के लिए आने वाला समय सबसे चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि अगर ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह का सैन्य हमला हुआ, तो इससे ट्रांस-अटलांटिक डिफेंस एग्रीमेंट यानी NATO की नींव हिल सकती है।


🔴 300 साल पुराना रिश्ता और NATO संकट

ग्रीनलैंड पिछले करीब 300 वर्षों से डेनमार्क का हिस्सा रहा है। डेनमार्क NATO का पूर्ण सदस्य है। ऐसे में अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह सीधे तौर पर NATO सहयोगी पर हमला माना जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा कदम अमेरिका-यूरोप रक्षा समझौतों में ऐतिहासिक दरार पैदा कर सकता है।


🔴 ट्रम्प का तर्क: रूस और चीन से खतरा

ट्रम्प का दावा है कि रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी के कारण ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा है कि ग्रीनलैंड चारों ओर से रूसी और चीनी जहाजों से घिरा हुआ है।

ट्रम्प ने यह भी संकेत दिया कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया, तो रूस या चीन वहां अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं।


🔴 ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत

दुनिया के सबसे कम आबादी वाले इलाकों में शामिल होने के बावजूद ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति उसे बेहद अहम बनाती है। यह उत्तरी अमेरिका और आर्कटिक क्षेत्र के बीच स्थित है।

ग्रीनलैंड मिसाइल हमले की स्थिति में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाने, आर्कटिक समुद्री मार्गों पर नजर रखने और सैन्य निगरानी के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।


🔴 पिटुफिक बेस में पहले से अमेरिकी मौजूदगी

फिलहाल अमेरिका ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित पिटुफिक बेस पर 100 से अधिक सैनिक तैनात किए हुए है। यह बेस द्वितीय विश्व युद्ध के समय से अमेरिका के नियंत्रण में है और आज भी सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।


🔴 ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश और विवाद

ट्रम्प प्रशासन ने ग्रीनलैंड के लोगों को अमेरिका में शामिल होने के बदले आर्थिक लाभ देने जैसे विकल्पों पर भी चर्चा की है। इस प्रस्ताव की डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने तीखी आलोचना की है और इसे अपमानजनक बताया है।

ग्रीनलैंड के नेताओं का कहना है कि उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति किसी सौदे का हिस्सा नहीं बन सकती।


🔴 अमेरिकी उप-राष्ट्रपति और विदेश मंत्री की अहम बैठक

बीबीसी के अनुसार, अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्रियों के साथ व्हाइट हाउस में बैठक करने वाले हैं।

डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स रासमुसेन ने कहा कि यह बैठक बेहद अहम है और इसमें सभी मुद्दों पर सीधे और स्पष्ट बातचीत की जाएगी।


🔴 ग्रीनलैंड की जनता का रुख

डेनमार्क की संसद में ग्रीनलैंड का प्रतिनिधित्व करने वाली नेता आजा केम्निट्ज ने कहा कि 56,000 की आबादी वाले ग्रीनलैंड के ज्यादातर लोग अमेरिकी नागरिक नहीं बनना चाहते।

उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड न तो बिकाऊ है और न ही कभी होगा। यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि लोगों की पहचान, संस्कृति और भविष्य है।


ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका, डेनमार्क और NATO के बीच उभरता यह तनाव वैश्विक भू-राजनीति का नया केंद्र बनता जा रहा है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री का स्पष्ट संदेश बताता है कि आने वाले समय में आर्कटिक क्षेत्र सिर्फ बर्फ और संसाधनों का नहीं, बल्कि संप्रभुता और वैश्विक शक्ति संतुलन का भी बड़ा मैदान बनने वाला है।

 

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