उत्तर प्रदेश

Baghpat में गरमाया सियासी माहौल: भूपेंद्र चौधरी का राकेश टिकैत पर तीखा हमला, बोले—किसानों के नहीं, विपक्ष के मोहरे बने हैं टिकैत

Baghpat में शनिवार को सियासी तापमान अचानक बढ़ गया जब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने किसान नेता राकेश टिकैत पर तीखा हमला बोला। बड़ौत पहुंचे चौधरी ने साफ शब्दों में कहा कि “राकेश टिकैत अब कोई सक्रिय किसान नेता नहीं रहे, बल्कि विपक्ष के मोहरे बनकर किसानों को गुमराह कर रहे हैं।”
इस बयान ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल मचा दी है। यह वही इलाका है, जहां किसान आंदोलन के दौरान टिकैत ने बड़ा जनसमर्थन हासिल किया था।


भूपेंद्र चौधरी का बयान बना चर्चा का विषय

राज्यमंत्री केपी मलिक के भाई रविंद्र मलिक के निधन पर शोक व्यक्त करने पहुंचे भूपेंद्र चौधरी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि “वंदे मातरम सिर्फ राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है।” उन्होंने साथ ही बताया कि अब योग्य मतदाताओं को SIR पोर्टल के माध्यम से मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा ताकि चुनाव प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बन सके।
चौधरी ने आगे कहा कि भाजपा सरकार हर वर्ग के उत्थान के लिए समर्पित है। पहले की सरकारों में अपराधियों को संरक्षण मिलता था, जबकि अब अपराधियों पर सीधा एक्शन लिया जाता है। उन्होंने कहा कि विकास की गाड़ी गांव-गांव और खेत-खेत तक पहुंच रही है।


राकेश टिकैत की पलटवार वाली मांगें — गन्ना, मुआवजा और बिजली मीटर का मुद्दा

इसी बीच, राकेश टिकैत भी खेकड़ा के मवीकलां गांव में एक शादी समारोह में पहुंचे। यहां उन्होंने सरकार से गन्ने का मूल्य 50 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाने की मांग की। उन्होंने कहा कि किसानों को लंबे समय से उनके गन्ने का बकाया नहीं मिल रहा, जिससे किसान परेशान हैं।
टिकैत ने कहा, “सरकार को चाहिए कि 2027 के चुनाव से पहले गन्ने का दाम बढ़ाए और बकाया भुगतान तुरंत कराए। यमुना नदी में आई बाढ़ से किसानों की फसलें नष्ट हो गईं — उनका मुआवजा तत्काल दिया जाना चाहिए।”


ऊर्जा निगम पर भी बरसे टिकैत

टिकैत ने ऊर्जा निगम की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जानी चाहिए। किसानों के घरों में लगाए जा रहे स्मार्ट मीटर अक्सर गलत रीडिंग देते हैं, जिससे किसानों को भारी बिलों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि “सरकार ने जो वादे अपने घोषणापत्र में किए थे, अब उन्हें पूरा करने का समय आ गया है। किसानों से जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है।”


राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर

भूपेंद्र चौधरी और राकेश टिकैत के बयानों ने पश्चिमी यूपी के राजनीतिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है। किसान संगठनों और भाजपा समर्थकों के बीच सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भूपेंद्र चौधरी, जो खुद भी बागपत के प्रभावशाली नेता हैं, का यह बयान 2027 विधानसभा चुनावों से पहले किसान राजनीति की दिशा तय कर सकता है। वहीं टिकैत लगातार सरकार पर दबाव बनाकर किसान वर्ग को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहते हैं।


भाजपा की किसान नीति और टिकैत का रुख

भाजपा नेताओं का कहना है कि सरकार ने किसानों के हित में कई योजनाएं शुरू की हैं — जैसे पीएम किसान सम्मान निधि, सिंचाई योजनाएं, फसल बीमा और नई MSP व्यवस्था पर कार्य। वहीं टिकैत का आरोप है कि “सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था, लेकिन अभी तक उस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए।”

कई स्थानीय किसान नेताओं का मानना है कि भाजपा और भारतीय किसान यूनियन (BKU) के बीच संबंध लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। पहले जो किसान भाजपा के समर्थन में थे, वे अब टिकटैट के बयानों से प्रभावित हो रहे हैं।


गन्ना मूल्य और बकाया भुगतान का पुराना विवाद

उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों का मुद्दा हमेशा से चुनावी राजनीति का केंद्र रहा है। किसान लगातार गन्ना मूल्य वृद्धि और बकाया भुगतान की मांग करते रहे हैं।
भाकियू के प्रवक्ता टिकैत ने कहा कि “चीनी मिलों को बकाया भुगतान के लिए समय सीमा तय होनी चाहिए। अगर सरकार किसानों के साथ नहीं खड़ी हुई तो आंदोलन की राह फिर खुल सकती है।”

वहीं भाजपा नेताओं ने पलटवार में कहा कि “सरकार ने अब तक सबसे अधिक गन्ना मूल्य का भुगतान कराया है और आने वाले समय में किसानों के लिए नई योजनाएं तैयार की जा रही हैं।”


विकास और अपराध नियंत्रण पर बोले चौधरी

भूपेंद्र चौधरी ने कहा कि योगी सरकार के कार्यकाल में अपराधियों का सफाया हुआ है। “पहले की सरकारों में अपराधी खुले घूमते थे, अब जेल में हैं या प्रदेश छोड़ चुके हैं।”
उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कि हर गांव तक बिजली, पानी और सड़क पहुंचे।
उन्होंने बताया कि “विकास की गंगा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेजी से बह रही है, अब गांवों में भी डिजिटल इंडिया का असर दिखने लगा है।”


सियासत के बीच किसान ही केंद्र में

टिकैत और चौधरी की जुबानी जंग के बीच एक बात साफ है — किसान अभी भी यूपी की सियासत का केंद्र हैं। चाहे वह भाजपा की नीतियां हों या भाकियू का आंदोलन, हर पक्ष अपने-अपने तरीके से किसानों को साधने में जुटा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम यूपी में गन्ना और आलू किसानों का बड़ा वोट बैंक है, और यही वर्ग 2027 के चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।


सोशल मीडिया पर गर्मागर्म बहस

भूपेंद्र चौधरी और राकेश टिकैत के बयानों के बाद ट्विटर (अब एक्स) और फेसबुक पर बहस छिड़ गई है। भाजपा समर्थक चौधरी के बयान को सही ठहरा रहे हैं, जबकि किसान संगठनों के समर्थक टिकैत को “किसानों की असली आवाज” बता रहे हैं।
कई यूजर्स ने लिखा कि “भाजपा और किसान यूनियन दोनों को बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए, टकराव से किसी का भला नहीं होगा।”


कौन क्या बोले — प्रतिक्रियाएं

  • सुधीर मान (स्थानीय भाजपा नेता): “सरकार ने किसानों के लिए जितना किया है, उतना किसी ने नहीं किया। टिकैत सिर्फ राजनीति कर रहे हैं।”

  • रविंद्र आर्य (किसान नेता): “टिकैत किसानों की जमीन पर हैं, जबकि भाजपा के नेता केवल भाषणों में किसानों की बात करते हैं।”

  • पवन शर्मा (स्थानीय नागरिक): “गन्ने के दाम में बढ़ोतरी और समय पर भुगतान जरूरी है, वरना किसान की हालत और बिगड़ेगी।”


2027 चुनाव से पहले किसान वोट बैंक पर नजर

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भूपेंद्र चौधरी का यह बयान चुनावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। भाजपा पश्चिमी यूपी में किसान वर्ग को फिर से अपने पक्ष में लाना चाहती है, जबकि टिकैत जैसे नेता किसानों के असंतोष को हवा देने की कोशिश में हैं।
दोनों ही पक्ष आगामी महीनों में रैलियों और जनसभाओं के जरिए अपने-अपने पत्ते खोल सकते हैं।


भविष्य की राह — संवाद या टकराव?

अब देखना यह है कि क्या भाजपा और किसान संगठनों के बीच संवाद का कोई रास्ता निकलता है या टकराव और बढ़ेगा। टिकैत के नए बयानों से साफ है कि वह पीछे हटने को तैयार नहीं, वहीं भाजपा भी विकास और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर डटी है।
किसानों की नाराजगी और विपक्ष की रणनीति के बीच, बागपत और आसपास के जिलों में सियासी गर्मी बढ़ती जा रही है।


**उत्तर प्रदेश की सियासत में किसान अब भी निर्णायक हैं।** भूपेंद्र चौधरी और राकेश टिकैत की यह जुबानी जंग केवल एक बयानबाजी नहीं, बल्कि आगामी चुनावी समीकरणों की झलक है। किसानों की मांगें, सरकार की योजनाएं और नेताओं के बयान — यही तय करेंगे कि 2027 में किसकी जमीन और किसकी सियासत मजबूत होगी।

 

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