उत्तर प्रदेश

डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में शिक्षकों की भर्ती पर घमासान: इंटरव्यू से लेकर परिणाम तक सबकुछ गोपनीय-RMLNLU Lucknow

राजधानी लखनऊ स्थित प्रतिष्ठित डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (RMLNLU Lucknow) एक बार फिर विवादों में घिर गया है। हाल ही में सम्पन्न हुई शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पूरी प्रक्रिया को इतने गोपनीय तरीके से अंजाम दिया कि न केवल पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लग गया बल्कि कई शिक्षाविदों और अभ्यर्थियों में गहरी नाराज़गी फैल गई है।

विश्वविद्यालय में 17 सितंबर को एसोसिएट प्रोफेसर, जबकि 18 और 19 सितंबर को असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों के लिए साक्षात्कार आयोजित किए गए थे। कुल मिलाकर 17 अभ्यर्थियों की नियुक्ति की गई, जिनमें तीन का चयन कैरियर उन्नयन योजना (CAS) के तहत किया गया।


गुपचुप भर्ती और तत्काल कार्यपरिषद की बैठक

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि साक्षात्कार के केवल एक दिन बाद, यानी 20 सितंबर को, विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्यपरिषद (Executive Council) की बैठक आनन-फानन में बुला ली।
सूत्रों के मुताबिक, बैठक में सीलबंद लिफाफों में रखे गए चयन परिणाम खोले गए और उसी रात चयनित शिक्षकों को जॉइनिंग भी करा दी गई।

यह तात्कालिक कार्रवाई अब विश्वविद्यालय के भीतर ही तीखी बहस का विषय बन चुकी है। कई शिक्षक और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी इसे “पूर्व नियोजित कदम” बता रहे हैं।


साक्षात्कार से लेकर परिणाम तक सबकुछ रहा गोपनीय

विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर न तो साक्षात्कार के लिए बुलाए गए अभ्यर्थियों की सूची अपलोड की गई और न ही अंतिम परिणाम
सूत्रों ने बताया कि साक्षात्कार की तिथियां तक सार्वजनिक नहीं की गईं, बल्कि अभ्यर्थियों को व्यक्तिगत रूप से संदेश भेजकर बुलाया गया।
यहां तक कि साक्षात्कार के बाद चयनित अभ्यर्थियों की सूची और कार्यपरिषद की बैठक के मिनट्स भी वेबसाइट पर नहीं डाले गए।

कानून के विशेषज्ञों का कहना है कि यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों का उल्लंघन है, क्योंकि हर सरकारी शैक्षणिक संस्था को भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना अनिवार्य है।


भर्ती प्रक्रिया पर सवाल: “जिन्हें पात्रता नहीं थी, उन्हें भी दे दी नौकरी”

एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भर्ती में पारदर्शिता की कमी की वजह यह थी कि कुछ उम्मीदवार पात्रता की शर्तें पूरी नहीं करते थे, फिर भी उनका चयन हुआ।
अधिकारी के मुताबिक, यदि विश्वविद्यालय ने पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की होती तो कई पात्र उम्मीदवार कोर्ट या राजभवन का रुख कर सकते थे, जिससे भर्ती पर रोक लग जाती।
इसलिए प्रशासन ने पूरी प्रक्रिया को ‘इन-हाउस’ तरीके से निपटाने का निर्णय लिया।


एफआईआर दर्ज शिक्षकों की भी भर्ती!

इस विवाद ने तब और तूल पकड़ा जब यह सामने आया कि चयनित अभ्यर्थियों में तीन ऐसे नाम शामिल हैं, जिन पर पहले से एफआईआर दर्ज है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने जल्दबाजी में इनकी पुलिस वेरिफिकेशन कराए बिना ही जॉइनिंग करवा दी।
यह खुलासा विश्वविद्यालय के ही कुछ कर्मचारियों ने किया, जिन्होंने दावा किया कि “भर्ती प्रक्रिया पहले से तयशुदा थी और सब कुछ अंदरखाने में हुआ।”


पारदर्शिता का अभाव: अभ्यर्थी बोले – हमें कुछ नहीं बताया गया

भर्ती प्रक्रिया में शामिल रहे एक अभ्यर्थी ने बताया, “हमें यह तक नहीं बताया गया कि कितने पद खाली हैं या किस श्रेणी में कितने उम्मीदवार बुलाए गए हैं। बस एक ईमेल आया कि इंटरव्यू में शामिल होना है। इसके बाद कोई सूचना नहीं मिली।”
दूसरी ओर, कुछ शिक्षाविदों ने कहा कि एक राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय से इस तरह की गोपनीयता की उम्मीद नहीं की जा सकती।


प्रशासन का रुख: कुलपति और प्रवक्ता ने टाला जवाब

जब इस पूरे प्रकरण पर कुलपति से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने जवाब देने के बजाय कहा कि “इस विषय में प्रवक्ता से बात करें।”
प्रवक्ता से बात करने पर भी कई सवालों के जवाब टाल दिए गए या अस्पष्ट रहे।
प्रवक्ता का कहना था कि “भर्ती प्रक्रिया विश्वविद्यालय के नियमों के तहत की गई है”, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि क्यों साक्षात्कार और परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए।


शैक्षणिक जगत में चर्चा: “कानूनी विश्वविद्यालय में ही कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी?”

लखनऊ और आसपास के शिक्षण संस्थानों में यह मुद्दा अब मुख्य चर्चा का विषय बन गया है।
कई लोगों का कहना है कि जिस विश्वविद्यालय का उद्देश्य कानूनी शिक्षा और न्यायिक मूल्यों को सशक्त करना है, वही यदि अपनी भर्ती प्रक्रिया में कानूनी पारदर्शिता का पालन नहीं करता, तो यह शिक्षा जगत के लिए चिंताजनक संकेत है।

कानून के जानकारों का यह भी कहना है कि यह मामला सूचना का अधिकार (RTI) के तहत आने वाली पारदर्शिता नीतियों का भी उल्लंघन करता है।


राज्यपाल और उच्च शिक्षा परिषद से दखल की मांग

अब यह मामला धीरे-धीरे राज्यपाल के पास पहुंचने की चर्चा में है, क्योंकि राज्यपाल ही विश्वविद्यालय के कुलाधिपति होते हैं।
कई अभ्यर्थी और शिक्षाविद मांग कर रहे हैं कि इस भर्ती प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराई जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि चयन मानदंडों का पालन हुआ या नहीं।
सूत्रों के अनुसार, यदि शिकायतें औपचारिक रूप से दर्ज होती हैं, तो राजभवन द्वारा जांच समिति गठित की जा सकती है।


शिक्षक संघ और छात्रों की प्रतिक्रिया

विश्वविद्यालय के कुछ वरिष्ठ शिक्षकों ने कहा कि इस घटना ने संस्थान की साख पर गहरा प्रभाव डाला है।
छात्रों के बीच भी यह चर्चा आम है कि “अगर शिक्षकों की नियुक्ति में ही पारदर्शिता नहीं रही, तो शिक्षा की गुणवत्ता पर क्या भरोसा किया जा सकता है।”
कानूनी शिक्षा से जुड़े संगठनों ने कहा है कि इस तरह की घटनाएं नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाती हैं।


आगे क्या होगा?

फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन मौन साधे हुए है, लेकिन अंदरखाने यह माना जा रहा है कि यदि यह मामला मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर और उभरा तो सरकारी जांच से इंकार मुश्किल हो जाएगा। राज्य सरकार के शिक्षा विभाग ने भी इस पर प्राथमिक रिपोर्ट मांगी है।


लखनऊ का यह विवाद एक गहरी सीख दे रहा है — जब कानून पढ़ाने वाले संस्थान में ही प्रक्रिया पर सवाल उठ जाएं, तो यह केवल एक विश्वविद्यालय का नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जांच होगी या यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

 

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